आत्मिक अगुवा

द्वारा लिखित :   जैक पूनन

अध्याय

अध्याय 0

अध्याय 1
परमेश्वर द्वारा बुलाया जाना

आत्मिक अगुवे के जीवन में सबसे पहले परमेश्वर की ओर से बुलाहट होती है । उसका कार्य उसके लिए व्यवसाय नहीं, परंतु बुलाहट होती हैं ।

कोई भी व्यŠत अपने आप को आत्मिक अगुवा होने के लिए नियुŠत नही कर सकता, इस कार्य के लिए परमेश्वर की ओर से उसके पास बुलाहट होना जरूरी है । यह सम्मान कोई अपने आप नहीं लेता, वरन्‌ परमेश्वर की ओर से बुलाए जाने पर यह आदर उसे प्राप्त होता है, जैसे कि हारून को बुलाया गया था (इब्रानियों 5:4)। यह एक ऐसा सिध्दांत है जिसे बदला नहीं जा सकता । अगला वचन स्पष्ट रीति से बताता हैं कि प्रभु यीशु ने भी स्वयं को हमारा महायाजक नियुŠत नहीं किया । परंतु परमेश्वर पिता ने उनकी नियुŠत की । यदि प्रभु यीशु के विषय में यह बात थी, तो हमारी बुलाहट के विषय में हम Šया कह सकते हैं?

आज दु:ख की बात यह है कि भारत देश में अधिक संख्या में मसीही कार्यकर्ता केवल अपने स्वार्थ के लिए सेवा कर रहे हैं । उनकी सेवा एक व्यवसाय बन गयी हैं । उनके पास परमेश्वर की ओर से कोई बुलाहट नहीं है ।

व्यवसाय और बुलाहट के बीच में बहुत अंतर हैं । उदाहरण के तौर पर मान लीजिए, एक छोटा बीमार बच्चा अस्पताल में है और एक नर्स जो आठ घंटे वहाँ नौकरी करती है, उस बच्चे की देखभाल तो करेगी, परंतु केवल आठ घंटे की डयुटी समाप्त होने तर ही वह उसकी सेवा में रहेगी । बाद में वह अपने घर चली जायेगी जहाँ उसे और भी दूसरे काम करने होंगे और जहाँ पर उसे उस बच्चे की बिल्कुल भी याद नहीं आयेगी । फिर वह घूमने जायेगी, सिनेमा भी देखेगी । अगले दिन अस्पताल में आने पर ही वह उस बच्चे के बारे मे सोचेगी और उसकी सेवा करेगी । परंतु उस बच्चे की माँ सिर्फ 8 घंटे का ही कार्य उस बच्चे के लिय नहीं करेगी । एक माँ अपने बीमार बच्चे को छोड कर टीव्ही या सिनेमा देखने नहीं जा सकती हैं । व्यवसाय और बुलाहट में यह अंतर हैं ।

मसीही विश्वासियों की कलीसिया में उनकी सेवा टहल करते समय यदि इसी उदाहरण के अनुसार आप अपनी बुलाहट को जॉचेंगे तो आप जान पायेंगे कि आप एक परिचारिका है, या एक माँ ।

1थिस्सलुनीकियों 2:7 में पौलुस कहता है,

परंतु तुम्हारे मध्य हमने ऐसी विनम्रता दिर्खा, जैसे एक दूध पिलाने वाली माँ अपने बच्चों का लालनपालन कोमला से करती हैं । इस प्रकार तुम्हारे प्रति ममता होने के कारण हमें प्रसन्नता हुई कि न केवल तुम्हें परमेश्वर का सुसमाचार सुनाएं, वरन्‌ तुम्हारे लिए अपने प्राणों को भी दे दें, Šयोंकि तुम हमारे लिए अत्यंत प्रिय हो गये थे ।

पौलुस ने न केवल परमेश्वर का सुसमाचार उन मसीहियों को दिया, परंतु अपना प्राण भी दिया । कोई भी सेवा जो इस रीति से नहीं की जाती हो, वह सचमच में मसीह की ओर से नहीं होती है । पौलुस ने परमेश्वर की सेवा इसी प्रकार से की Šयोंकि उसके पास सेवा के लिये बुलाहट थी । उसने अपनी सेवा को व्यवसाय का रूप नहीं दिया ।

परमेश्वर की सेवा करना Šया ही अद्‌भुत बात हैं । यह संसार का सबसे उच्च कोटी का कार्य है, और किसी भी कार्य की इस सेवा से तुलना नहीं की जा सकती । परंतु यह केवल तब ही हो सकता है जब आपके पास इसके लिए बुलाहट हो । Šयोंकि आप इसे व्यवसाय का दर्जा नहीं दे सकते ।

परमेश्वर ने मुझे पूर्णकालीन सेवा के लिए 6 मई 1964 मे बुलाया । उस समय मै भारतीय नौसेना में एक अफसर के रूप में कार्यरत था । तब मैने अपना इस्तिफा नौसैनिक अधिकारियों को सौपा । परंतु नौसेना से सेवामुŠत किया जाना आसान साबित नहीं हुआ । मेेरे लिए यह बात मूसा की तरह फिरौन से इस्राएलियों की मुŠत की मांग करने बराबर थी । पूरे दो वर्ष तक कोशिश करने के बाद ही मुझे नौसेना से सेवामुŠत किया गया, जो परमेश्वर के ठहराए हुए समय पर हुआ ।

परमेश्वर की ओर से बुलाए जाने के फलस्वरूप से मेरे जीवन में बहुत परिवर्तन आया ।

सबसे पहले तो, कोई मेरे और मेरी सेवा के विषय में Šया कहता है इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पडता, Šयोंकि मेरा स्वामी कोई और है जिसे मुझे अपना हिसाब देना होगा ।

दूसरी बात, जब भी मैं अपनी सेवा में कोई कठिन परीक्षा या विरोध का सामना करता हूँ, तो मैं परमेश्वर पर भरोसा रखकर उसकी दया और सहारे के लिये निश्चिंत रह सकता हूँ । और यह बात हमेशा मेरे जीवन मे होती है ।

तीसरी बात मुझे इससे कोई फर्क नही पडता कि मुझे पैसे मिल रहे है या नहीं, अथवा खाने को भोजन मिल रहा है अथवा नहीं । यदि मुझे पैसे और भोजन मिलता है तो बहुत ही अच्छा है, परंतु यदि मुझे पैसे और खाने को भोजन न भी मिले तो भी मेरे लिये अच्छा है । केवल भोजन या पैसा न मिलने की वजह से मैं परमेश्वर की सेवा छोड नहीं सकता Šयोंकि परमेश्वर ने मुझे बुलाहट दी हैं ।

मै अपनी बुलाहट से अलग नहीं हो सकता हूँ । मै कोइ वेतन प्राप्त कर्मी नहीं हूँ जो अपना वेतन या भोजन न मिलने पर अपना कार्य छोड दे । यह मेरे लिये उसी माँ और बच्चेवाली बात के समान हैं । एक नर्स अपना वेतन न मिलने पर अपना काम रो कसकती है, परंतु एक माँ अपना काम नहीं छोड सकती हैं । उसे माँ होने का कोई वेतन नहीं मिलता । और फिर भी वह अपने बच्चे की देखभाल करेगी, चाहे उसे भोजन और पैसा न भी मिले तो कोई बात नहीं । प्रेरितों ने भी इसी रीति से परमेश्वर की सेवा की ।

परमेश्वर की ओर से बुलाया जाना Šया ही उत्तम बात है ।

यदि आप परमेश्वर के कार्य को व्यवसाय समझकर करते है तो आप उसकी इच्छानुसार नहीं कर सकते । इसके पीछे बुलाहट होना ही है, वरना सब व्यर्थ है । दुनिया में सभी दूसरे कार्य व्यवसाय के रूप में किये जा सकते है, परंतु माता या पिता का और परमेश्वर का कार्य व्यवसाय के रूप में नहीं किया जा सकता । यह सभी कार्य बुलाहट के रूप में हैं ।

पौलुस ने 1कुरिन्थियों 4:15 मे कहा है, 'यद्यपि मसीह मे तुम्हारे असंख्य शिक्षक है, फिर भी तुम्हारे अनेक पिता नहीं होते Šयोंकि मसीह यीशु में सुसमाचार के द्वारा मैं तुम्हारा पिता बना ।' पौलुस ने मसीहियों से कहा कि यदि तुम्हारे पास 10000 शिक्षक भी Šयों न हों, परंतु फिर भी उनके पास पिता केवल ही एक ही है। पौलुस अपनी भेडों के लिए आत्मिक माता और आत्मिक पिता दोनों के समान था। उसके लिये यह एक बुलाहट थी न कि व्यवसाय ।

Šया परमेश्वर ने मुझसे ऐसा कहा है कि 'यह बच्चा लो और मेरे खातिर उसकी देखभाल करो और मै तुम्हें बदले में मजदूरी दूॅगा' (निर्गमन 2:9)? फिरौन की बेटी ने उससे कहा, 'तू इस बालक को ले जा कर मेरे लिए दूध पिलाया कर और मैं तुझे मजदूरी दूंगी।' तब वह स्त्री उस बालक को ले जा कर दूध पिलाने लगी ।

उसने कहा कि मेरे लिए सबसे पहले मेरे अपने शारीरिक बच्चे है, फिर उसने कहा कि मेरे आत्मिक बच्चे भी है । जब हम परमेश्वर के बच्चों की सुधि लेते है तब हमे हमारी मजदूरी देना यह परमेश्वर की जिम्मेदारी है, न कि मनुष्य की । यदि हम मनुष्य की सेवा करते है तो हमे मनुष्य से मजदूरी की अपेक्षा करनी चाहिए । परंतु जब हम परमेश्वर की सेवा करते है तो परमेश्वर की ओर अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए दृष्टि करे, जिस किसी भी तरीके से जो उसकी नजरों में उचित हो, और उसी को यह निर्णय लेने दें कि हमें हर महीने कितना मिलना चाहिए । परमेश्वर के सच्चे सेवक का अपना सम्मान होता हैं ।

किंतु यह संभव है कि आप एक अगुवा होते हुए भी आपको कलीसिया में लोगों के प्रति जिम्मेदारी का एहसास न हो । हर इतवार को आप बाइबल अध्ययन करवाने मे संतुष्टि महसूस करते है । परंतु जब प्रभु यीशु दोबारा आयेंगे और आपकी संपूर्ण सेवा केवल घासफूस और लकडी के समान साबित हो जो केवल जलाने योग्य हो (1कुरिंथियों 3:1213)। यदि कोई मनुष्य इस नींव पर सोना, चांदी, का कार्य प्रकट हो जाएगा । वह दिन उसे दिखाएगा । Šयोंकि वह दिन के कार्य को परखेगी । सोचिये उस परिणाम के बारे मं ! यदि आप इस चेतावनी को अभी गंभीरता से लेंगे तो न्याय के दिन आपको लज्जित नहीं होना पडेगा ।

जब मसीह फिर से आयेगा तो अपने जीवन के प्रति और जिस प्रकार से हमने परमेश्वर की सेवा की है, उसके प्रति हम सभी, कुछ हद तक तो लज्जित होंगे ही । लेकिन हम अपने जीवनों को जाँच कर उस लज्जा को घटा सकते हैं । हमें अपनी सेवाआें को जाँच कर यह देखना आवश्यक है कि वह न्याय का दिन कैसा होगा । परमेश्वर यह कहते है, 'ये बच्चे लो और मेरे खातिर उनकी सुधि लो ।' ' उनकी देखभाल करो और मै तुम्हें तुम्हारी मजदूरी दूँगा।' यह मजदूरी सबसे पहले तो आर्थिक रीति से नहीं होगी । मेरा विश्वास है कि परमेश्वर हमारी सब सांसारिक जरूरतें पूरी करते है, Šयोंकि उन्होने आप ही हमें अपनी रोज की रोटी के लिए प्रार्थना करना सिखाया है, और उन्होंने यह ठहराया है कि जो सुसमाचार का प्रचार करते है, वे सुसमाचार से जीयें । इसलिए वह हमारी सभी सांसारिक जरूरतें पूरी करेंगे । परंतु इससे भी बढकर आत्मिक प्रतिफल भी होगा ।

पौलुस ने थिस्सुलुनीकियों के मसीहियों को लिखा कि वे उसके आनंद और मुकुट होने जा रहे है जब प्रभु दोबारा आयेंगे (1थिस्लु 2:19)। भला हमारी आशा या आनंद या उल्लास का मुकुट कौन है ? हमारे प्रभु यीशु के आगमन के समय उसके समक्ष Šया तुम ही न होंगे ? जैसे एक पिता अपने बच्चों से आनंदित होता है वैसे ही उन्होने उनमें आनंद पाया । एक अगुवा (जो एक आत्मिक पिता है) जब विश्वासियों को देखता है जो कभी कलीसिया में नये थे और आज परमेश्वर के जन बन गये है, तो इस बात से वह आनंदित होता हैं । यह आनंद उस शिल्पकार के आनंद के समान होता है जो एक बेढंगे पत्थर को मानव रूप में ढाल कर आनंदित होता है । जब तक कि वह उसे मनुष्य के रूप में न ढाल दे उसे कई महीनों और सालों तक उस चट्‌टान को काटते रहना पडता है ! यही कार्य परमेश्वर ने हमें भी दिया हैं । केवल सही रीति से लोगों को उपदेश देकर हमें संतुष्टी महसूस नहीं करनी चाहिए । यदि मसीह की पहचान उनके जीवन में नहीं दिखाई देती, तो हमने कुछ भी नहीं पाया है ।

एक संसारिक पिता, जब उसके बच्चे अपने पाँवों पर खडे होते है तो आनंदित होता है । वह नहीं चाहता कि वे उस पर सदाकाल तक निर्भर रहें । एक सच्चा आत्मिक पिता भी वैसा ही होगा । वह अपने आप को इस तरह बनाएगा कि उसके आत्मिक बच्चों को उसकी कम से कम ही जरूरत महसूस हो और वे परिपŠवता की ओर बढते रहें ।

उस परिवार की ओर गौर करें जहाँ पर बारह बच्चे हैं । आपको हैरानी होगी कि कोई माँ बारह बच्चों को संभाल सकती है, जब कि आपकी पत्नी के लिए दो बच्चे भी संभालना मुश्किल हो ! लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि उस माँ को जिसके बारह बच्चे है, कम काम करना पडता है उस माँ की तुलना में जिसके केवल दो बच्चे हैं । वह इसलिए कि बारह बच्चों वाली माँ अपने बडे बच्चों को उसकी मदद करने के लिए प्रशिक्षित करती हैं । आखिरकार बच्चे सब काम करते है और माँ को आराम मिलता हैं । यही हमें भी चरवाहा होनेे के नाते अपनी कलीसियाआें में करना है, अर्थात, जिम्मेदारियाँ बाँटना ।

लेकिन ज्यादातर कलीसियाआें में हम Šया देखते हैं ? बोझ से दबे हुए पासबान थक रहे है, Šयोंकि उन्हें अकेले ही सब कुछ करना पडता है । (बारह बच्चों की माँ को भी यदि अकेले ही सब बच्चों का काम करना पडे तो थकान हो सकती है ।) कई कलीसियाएँ ऐसी है मानो अनाथालय, जहाँ सैकडों बच्चे जमीन पर पडे रहते हैं और दूध की बोतले चुसते हुए एक दुसरे को लात मारते रहते है । यह अकेले आदमी के प्रयासों से की जानेवाली सेवा का परिणाम हैं । विश्वासी लोग कभी उन्नति नहीं कर पाते Šयोंकि उन्हें कोई भी जिम्मेदारी नहीं दी जाती । मसीह की देह में हर एक सदस्य को अपना कार्य परा करना होगा ।

प्रभु यीशु ने केवल बाहर लोगों को शिष्य बनाया और मुझे नहीं लगता कि कोई मनुष्य इससे ज्यादा लोगों को एक साथ प्रभावी रीति से संभाल सकता हो । तो इस हिसाब से 120 सदस्य वाली कलीसिया में कम से कम दस पासबान, (मेरा मतलब पूर्णकालिन सेवक नहीं,) परंतु चरवाहे का ह्दय पाये हुए भाई हो जो भेडों की देखभाल करें और उन्हें प्रोत्साहन दें ।

आज खेत तो पक चुके है, परंतु सच्चे चरवाहों की कमी हैं । यदि आप परमेश्वर की सेव करें, तो वह इसलिए कि परमेश्वर ने आपको अपनी सेवा के लिए बुलाया है, और न कि पेट पालने अथवा मनुष्य में सम्मान पाने के लिए ।

अध्याय 2
परमेश्वर को जानना

आत्मिक अगुवा औरों को परमेश्वर के मार्ग पर चलाने के योग्य होगा Šयों कि वह परमेश्वर की व्यŠतगत रीति से जानता हैं ।

दानिय्येल 11:32, 33 मे दो तरह के प्रचारकों के विषय में बताया गया हैं जो अन्त के दिनों मे पाए जायेगे । बहुत से ऐसे हाेेंगे जो मीठा मीठा बोल कर लोगों को पाप की ओर ले जायेगे । दूसरी तरफ, बहुत थोडे से ऐसे होंगे जो लोगों को परमेश्वर के बारे में बताएँगे और परमेश्वर के लिए महान कार्य करेंगे ।

आज, मसीहत में दोनों ही तरह के प्रचारक पाए जाते है । बहुत से ऐसे है जो अपने सुनने वालों से मीठा मीठा कहते हैं । परंतु जो परमेश्वर को जानते है वे सच बोलते है फिर चाहे उनके सुनने वालों को पसंद आये या न आये, और फिर चाहे लोग उनकी तारीफ करें या बुराई ।

मानव जाति भेडों के समान है । वे एक भीड के पीछे चलना पसंद करते है और अलग पहचान बनाने से डरते हैं । लेकिन यदि भीड गलत दिशा में जा रही हो तो हर कोई भटक जाता हैं । यह है आज की स्थिती । इसलिए परमेश्वर कुछ ऐसे लोगों को खोज रहे है जो उनके लिए स्थिर खडे रह कर उनके मार्ग में लोगों की अगुवाई करें । लेकिन यदिहमे इतना साहसी होना पडे कि हमारी पहचान भीड से अलग हो, तो हमें परमेश्वर और उनके मन को और उनके विचारों को और मागा] का जानना आवश्यक हैं ।

बहुत से मसीही अगुवे जिनसे मै पिछले तीस वर्षो के दरमियान हिन्दुस्तान में मिला, वे मुझे ऐसे नजर आए मानो वे परमेश्वर को और उनके विचारों को व्यŠतगत रीति से न जानते हों । वे केवल जो पाश्चात्य मसीही साहित्यों में पढते है उन्हीं को दोहराते रहते हैं । अमेरीकी मसीही अगुवों के बीच में हर दशक में कुछ ऐसे मुद्दे होते है जिनमें बहुत जोर दिया जाता है। यदि अस्सी के दशक में वहाँ किसी एक बात पर जोर दिया जाता था तो आज किसी और बात को दिया जाता है । जिस तरह पहाडी देशों में हम आवाजों की गुंजन सुनते है वैसे ही भारत में भी पाश्चात्य मसीही अगुवों के चमचे उनको जोर देेनेवाले मुद्‌दों की गुंजन करते हैं । जब अमेरीकी अगुवे कलीसिया की उन्नति के विषय में लिखते है, तो तब भारतीय मसीही अगुवे भी कलीसिया की उन्नति के विषय में बात करने लगते हैं । यदि अमेरीकी अगवे '10/40 खिडकी' के विषय में कुछ कहते है तो भारतीय प्रचारक भी विश्वास योग्यता के साथ उसी विषय को दोहराते हैं । यदि पाश्चात्य मसीही अगुवे महासंकट से पहले कलीसिया के उठाये जाने के विषय में सिखाते है, तो भारतीय बाइबल शिक्षक भी केवल वही सिखाते हैं । वे पाश्चात्य मसीहियों को चुनौति देने की हिम्मत नहीं रखते ।

परंतु Šया परमेश्वर हिन्दुस्तान में किसी से भी प्रत्यक्ष रूप से बात नहीं कर सकते ? Šया वह केवल गौरी चमडी से ही बात करते हैं ?

विकासशील देशों के मसीही लोगों मे नकल करने की जो वजह पायी जाती है, वह है उनका गुलामी का स्वभाव । हम हिन्दुस्तानी लोग पूरे दो सौ वर्ष तक अंग्रेजों की गुलामी में रहे । और यह बहुत ही कठिन बात है कि हम विचारों की गुलामी से आजाद हो जाए । लगभग सभी भारतीय मसीही यह सोचते है कि गोरी चमडी वाला आदमी उनसे ज्यादा आत्मिक है और उनका प्रधान है, Šयोंकि उसके पास बहुत अधिक पैसा है ।

एक बार एक काला अमेरीकी भाई मुझसे मिला जिसने मुझसे कहा कि वैसे तो अमेरीका के काले नागरिकों को गुलामी से मुŠत कानूनन रूप से सौ साल पहले ही मिल चुकी थी, लेकिन गुलामी की वह आत्मा उनमे से बहुतों में अब भी पाई जाती हैं । जब वे एक गोरी चमडी वाले आदमी को देखते है तो वे अपने आप को उससे छोटा महसूस करते है । वही एक बात लगभग सभी भारतीय मसीहियों में मै पाता हूँ ।

मै आपको ईमानदारी के साथ बताना चाहता हूँ कि बहुत से पाश्चात्य प्रचारकों को जिन्हें मैं हिन्दुस्तान में मिला उन्हें हकीकत में मैने संसारिक पाया । वे परमेश्वर को नहीं जानते । परंतु उनके पास बहुत पैसा है इसलिए वे नाम कमाने के लिए यहाँ वहाँ जाते रहते हैं । यदि आप भारत में किसीभी मसीही सम्मेलन की सूचना का परचा पढेंगे तो जानेंगे कि अधिकतर प्रमुख वŠता पाश्चात्य देश के हैं । अपने देश की मसीहत की यह कैसी दुर्दशा हो गई है ? यदि यह बात केवल नामधारी मसीहियों के बीच में होती, तो कोई और बात होती । परंतु जो अपने आप को 'नया जन्म पाए हुए' और 'पवित्र आत्मा पाए हुए' होने का दावा करते है उनमें भी यही बात पायी जाती हैं ।

हमे इस गुलाम मनस्थिति को छोड देने की आवश्यकता है । परंतु यदि कोई गोरी चमडी वाला आदमी हमें वेतन दे रहा हो तो हमें जरूर ऐसा करने मे कठिनाई महसूस होगी । तब हमें मनुष्य की सेवा करना छोडकर परमेश्वर की सेवा शुरू करने का निर्णय लेना आवश्यक है । हकीकत मे आप किसके सेवक है? बाइबल हमें बताती है कि हमे मनुष्य के गुलाम नहीं बनना चाहिए Šयोंकि हमे कीमत देकर खरीदा गया है । 'तुम दाम देकर मोल लिए गए हो, अत: मनुष्यों के दास न बनो' (1कुरिन्थि 7:23)

परमेश्वर को व्यŠतगत रीति से जानना यह आपके ह्दय की इच्छा हो, तो ही आप किसी पाश्चात्य अथवा किसी भारतीय अगुवे की गुंजन होने से बच पाएंगे। आत्मिक अधिकार केवल परमेश्वर को व्यŠतगत रीति से जानने पर ही आता हैं।

भाइयों, मेरी आपसे यह निवेदन है कि आप परमेश्वर को जानने वाले लोग बने। इसके द्वारा अपका व्यŠतगत जीवन महिमामय और आपकी सेवा अधिकारयुŠत बनेगी । किसी और बात से अधिक हमारे देश को इसी एक बात की आवश्यकता है कि हम अपने परमेश्वर को व्यŠतगत रीति से जानने वाले बनें ।

परमेश्वर को जानने से अधिक आसान है पवित्र बाइबल को जान लेना,Šयोंकि बाइबल को समझने के लिए आपको कोई कीमत देने की आवश्यकता नहीं पडती, परंतु केवल अध्ययन करने के द्वारा काम चल जाता हैं ।

बाइबल के अच्छे जानकार होते हुए भी यह संभव है कि आप अपने व्यŠतगत जीवन और विचारों मे अनैतिक और अपवित्र हों । आप एक अच्छे सुप्रसिध्द प्रचारक होने के साथ साथ पैसों के लोभी भी हो सकते हैं । लेकिन परमेश्वर को जाननेवाले होते हुए भी आप अपवित्र और अनैतिक मुनष्य नहीं बन सकते । परमेश्वर को जानने वाले होने के साथ साथ आप पैसो के लोभी नहीं हो सकते । यह बिल्कुल असंभव हैं । और सही वजह है कि अधिकतर प्रचारक अपने लिए आसान रास्ता अपनाते है, बजाए परमेश्वर को जानने के, वे बाइबल को समझने की कोशिश करते हैं ।

भाइयों, मै आपसे पूछना चाहता हूँ कि Šया आप केवल बाइबल को जानकर खुश है या फिर आपके ह्दय में परमेश्वर को जानने की तीव्र इच्छा हैं? फिलिप्पियों 3:8-10 में पौलुस कहता है कि उसके जीवन की सबसे बडी मनोकामना परमेश्वर को ठीक से जानना है, उसकी तुलना में संसार की सब अच्छी वस्तुएँ, उसे कूडाकरकट के समान है । पौलुस ने उस अमुल्य मोती को प्राप्त करने के लिए अपने सारे बेशकीमती मोतियों को त्याग दिया । पौलुस की सेवकाई का रहस्य इस बात में नहीं था कि उसने कई वषा] तक गमलियल के कदमों पर बैठकर बाइबल अध्ययन किया था, परंतु उसकी सफलता का कारण परमेश्वर के प्रति गहरा ज्ञान था ।

अनंतकालीन जीवन का अर्थ है कि हम परमेश्वर और उसके पुत्र प्रभु यीशु मसीह को व्यŠतगत रीति से जाने (यूहन्ना 17:3)। हमने अनंतकालीन जीवन की परिभाषा यह बताई है कि अनंतकालीन जीवन का अर्थ है स्वर्ग मे जाना । परंतु प्रभु यीशु ने अनंतकालीन जीवन की परिभाषा यह नहीं बताई । Šयोंकि अनंतकालीन जीवन का स्वर्ग में जाने से या नरक से बच जाने से कोई वास्ता नहीं । इसका अर्थ है परमेश्वर को जानना । परमेश्वर को व्यŠतगत रीति से और गहराई से जानना । मेेरे जीवन का उद्‌देश और मेरे ह्दय की कामना यही हैं । मैं जानता हूॅं कि केवल परमेश्वर को जानने से ही मेरी सेवकाई मेें मै ईश्वरीय अधिकार प्राप्त कर सकता है और इसीलिए, हमारी सभी कलीसियाओं में मैने यह प्रयत्न किया है कि लोगों को परमेश्वर के ज्ञान के प्रति अगुवाई करूँ ।

आज संसार के इतिहास मे बाइबल का ज्ञान सबसे ज्यादा पाया जाता हैं । पिन्तेकुस्त के दिन से ले कर तो लगभग पद्रह सौ साल तक संसार में कोई बाइबल कहीं पर भी प्रकाशित नहीं की गयी थी । केवल पिछले सदी में ही बाइबल का प्रकाशन और अन्य उपलब्धियाँ खुल कर सामने आयी हैं । आज हमारे पास बाइबल के कई अलगअलग अनुवाद, अलगअलग भाषाआें में, अलगअलग अध्ययन मालाआें के साथ उपलब्ध हैं ।

परंतु Šया आपको लगता है कि ये बढता हुआ बाइबल का ज्ञान प्राप्त कर लेने के द्वारा हमने पवित्र मसीहियों को उत्पन्न किया हैं ? बिल्कुल नहीं ! यदि बाइबल का ज्ञान प्राप्त कर लेने से हम पवित्रता को पा लेते, तो आज इतिहास में संसार के सबसे पवित्र लोग हम कहलाते । परंतु हम ऐसे नहीं हैं । यदि बाइबल का ज्ञान मात्र प्राप्त कर लेने से जीवन में पवित्रता आती हो तो आज शैतान भी पवित्र होता, Šयोंकि बाइबल का ज्ञान जितना उसके पास है उतना किसी भी मनुष्य के पास नहीं हैं ।

आज हमारे पास कई अनगिनत बाइबल पाठशालाएँ और महाविद्यालय है जहाँ हजारों की संख्या में विद्यार्थियों को बाइबल के पाठ पढाए जाते हैं । परंतु Šया इन पाठशालाआें में पवित्र लोग पाए जाते हैं? नहीं! कई एक बाइबल पाठशालाआें के विद्यार्थी अन्य जातियों से भी ज्यादा बुरे हैं ।

कुछ साल पहले, मैं एक भारत के सबसे बडे सुसमाचार प्रचार बाइबल पाठशाला से पढ कर निकले एक विद्यार्थी से मिला जो अपनी कक्षा में प्रथम आया था । उसने मुझसे कहा कि पाठशाला में प्रवेश लेने से पहले की दशा से भी इस समय उसकी आत्मिक दशा अधिक बुरी हो गयी हैं । यदि ऐसा हुआ तो फिर उस पाठशाला ने उस युवक को कौनसी शिक्षाएँ दी ? वहाँ उसे केवल बाइबल और मसीहत के विषय में जानकारियाँ दी गई । शैतान भी ऐसी पाठशालाआें में प्रथम आ सकता हैं ।

अनुवाद करने के ज्ञान को प्राप्त करके, और युनानी शब्दों को जानकर उस युवा विद्यार्र्थी को त्या लाभ प्राप्त हुआ, यदि तीन वर्ष तक ये सब का अध्ययन करने के बाद भी उसे क्रोध, नफरत, कडवाहट, अभिलाषा से भरे विचार और पैसों के लोभ से छुटकारा नहीं मिल पाया हो, तो इससे Šया लाभ? वहाँ पर प्राप्त किये गए प्रमाणपत्र के कारण वह किसी भी कलीसिया का पासबान तो बन जाएगा, परंतु वह अपनी कलीसिया में लोगों को Šया सिखाएगा जहाँ की सबसे बडी समस्या नैतिकता है न कि ईश्वरीय ज्ञान? वह अपने लोगों को इन सब बातों में कुछ भी मदद नहीं दे पाएगा । इसी प्रकार से भारत में परमेश्वर का कार्य नष्ट होता जा रहा हैं ।

यदि आप केवल परमेश्वर को जानते है तो ही आप अपने झुंड को परमेश्वर को जानने के लिए अगुवाई कर पाएंगे । यदि आपके व्यŠतगत जीवन में आपने अपने पापों पर विजय प्राप्त की है तो ही आप अपने झुंड को पापों पर विजय प्राप्त करने में अगुवाई कर पाएंगे । तब वे भी सुसज्जित होकर अधिकार और सामर्थ के साथ परमेश्वर की सेवा करने के लिऐ बाहर जाएंगे ।

Šया आपको लगता है कि किसी के अधिक बाइबल ज्ञान को देख कर या उनके प्रमाणपत्रों को देख कर शैतान घबराता हो ? बिलकुल नहीं, वह तो केवल उन लोगों से घबराता है जो नम्र और पवित्र है और जो परमेश्वर को जानते हैं ।

परमेश्वर हमारी मदद करे कि हम अपने से छोटे भाई और बहनों को परमेश्वर को व्यŠतगत रीति से जानने में अगुवाई कर सकें ।

अध्याय 3
परमेश्वर का भय मानना

एक आत्मिक अगुवा परमेश्वर का भय बहुतायत से मानेगा ।

जितना अधिक हम परमेश्वर को जानेंगे उतना ही अधिक उनका भय भी मानेंगे । हम परमेश्वर से घबराएंेगे तो नहीं, परंतु उनका आदर करेंगे । भजन सहिता 34:11में दाऊद यह कहता है कि हे बालकों, आओ, मेरी सुनो: मैं तुम्हें यहोवा का भय मानना सिखाऊंॅगा ।

यह कोई आसान, काम नहीं कि हम लोगों को परमेश्वर का भय मानना सिखाऍ । यह बहुत आसान काम है कि उन्हें बाइबल की पुस्तकों का अध्ययन गहराई से करना सिखाएँ !

यदि हम चाहते है कि औरों को परमेश्वरका भय मानना सिखाएँ, तो आवश्यक है कि हम खुद सबसे पहले परमेश्वर का भय माने! परमेश्वर का भय मानना अर्थात बुध्दि को प्राप्त करना हैं । वह व्यŠत जो परमेश्वर का भय मानता है, वह अपने झुंड को और लोगों को परमेश्वर का भय मानना बहुत अच्छे से सिखा सकता है बजाए उस मनुष्य के जो केवल बाइबल की जानकारी नाममात्र के लिए रखता हो ।

जो परमेश्वर का भय नहीं मानते, वे केवल ज्ञान लोगों तर पहुँचा सकते है, परंतु बुध्दि नहीं । 'मुर्तियों के लिए बलि की हुई वस्तुआें के विषय में हम जानते है कि हम सब को ज्ञान है, ज्ञान घमंडी बनाता है, परंतु प्रेम से उन्नति होती है (1कुरिन्थियों 8:1) । इस वचन में हम पढते है कि ज्ञान मनुष्य को घमंडी बना देता है, परंतु बुध्दि मनुष्य को परिपŠव बनाकर यह सिखाती है कि अपने ज्ञान के द्वारा प्रतिदिन के जीवन को समस्याआें को कैसे हल करें । जिसने बुध्दि प्राप्त की है वही व्यŠत ही प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया को बना सकात है ।

परमेश्वर का भय मानना मसीही जीवन का मूलतत्व है, यदि आपने अपने झुंड को सबसे पहले परमेश्वर का भय मानना नहीं सिखाया है, तो चाहे दूसरे विषय उन्हें कितना भी जोर लगा कर सिखाए हो, फिर भी आप अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों में असफल रहें । आप उस शिक्षक के समान है जो अपने विद्यार्थियों को भूगोल और इतिहास उस वŠत पढाते है जब उन्हें पढना भी न आया हो ! संसार का कोई भी शिक्षक इस तरह की गलती नहीं करता ।

परमेश्वर का भय मानना सिखाना, मानो पढनालिखना सिखाने के बराबर है । परंतु अधिकतर अगुवे कलीसियाआें में अपने झुंड को सबसे पहले परमेश्वर का भय मानना नहीं सिखाते । इस बात का सबूत यह है कि ज्योति की संतानों से अधिक अंधकार की संतान अपनी पीढी में ज्यादा बुध्दिमान हैं ।

जो विद्यार्थी बाइबल पाठशाला से स्नातक होकर निकलते है उनसे मैं एक सवाल पूछना चाहता हूँ, कि Šया अपने वहाँ केवल प्रमाणपत्र पाया है, या फिर वहाँ सचमुच में परमेश्वर का भय मानना भी सीखा हैं ?

अब मैं आपसे दूसरा सवाल करना चाहता हूँ, कि आपने बाइबल पाठशाला में प्रवेश Šयों लिया? Šया नौकरी प्राप्त करने के लिए? या फिर परमेश्वर का भय मानना सीखने के लिए? आपने बाइबल पाठशालाआें का चुनाव Šयों किया? Šया इसलिए कि वह दूसरी पाठशालाआें से ज्यादा प्रतिष्ठित थी? Šया यह जानते हुए भी कि वह पाठशाला सुसमाचार प्रचार तत्व पर आधारित न होते हुए अन्य धर्मो के तत्वों से समझौता करनेवाली पाठशाला है, आपने उसे चुना? Šया आप कल्पना कर सकते है कि प्रभु यीशु अपने शिष्यों को ऐसी पाठशालाआें में भेजेंगे, ताकि वे उसकी सेवा के लिए वहाँ तैयार किये जाएँ? आप में से कितने ईमानदारी से यह कह सकते है कि आपने अपनी पाठशाला का चुनाव इसलिए किया कि आप वहाँ परमेश्वर का भय मानना सीख सके? शायद एक भी नहीं, Šया यह दु:ख की बात नहीं?

मैं जानता हूँ कि यहाँ भारत में लोग बाइबल पाठशालाओ में इसलिए प्रवेश लेते है ताकि उन्हें अमेरीका जाने का अवसर मिले, और वे वहाँ पर पैसे कमा सके। कुछ लोग अमेरीका की पाठशाला में प्रवेश पाने का प्रयत्न करते है ताकि वे वहीं जाकर बस जाएँ । Šया ऐसे भी लोग परमेश्वर की सेवा कर पाएंगे ।

Šया आप स्वीकार करते है कि आपने बाइबल पाठशाला में प्रवेश किसी स्वार्थ के कारण लिया ? यदि आप ईमानदारी बरतने के लिए तैयार है तो आपके लिये बडी आशा है, Šयोंकि परमेश्वर ईमानदार लोगों से प्रेम करते है, और अब औरों को भी चिताएँ कि वे भी वह गलती न करें जो आपने की थी । उन्हें सबसे पहले परमेश्वर का भय मानना सिखाएँ । हमारे बच्चों को वही गलती दोहराने की आवश्यकता नही है जो हमने की थी ।

नीतिवचन 24:34 में ऐसा लिखा है, घर बुध्दि से बनता है, और समझ के द्वारा स्थिर होता है । ज्ञान के द्वारा कोठरियाूं सब प्रकार की बहुमूल्य और मनभाऊ वस्तुआें से भर जाती है । गौर करने की बात यह है कि बुध्दि और ज्ञान के बीच में फर्क है । मै बाइबल के ज्ञान को तुच्छ नहीं कहना चाहता हूँ, Šयोंकि मैने स्वयं चालीस वर्ष बाइबल के अध्ययन मे बिताए हैं । और मुझे लगता है कि मुझे भी बाइबल का ज्ञान उतना ही है जितना कि औरो को ।

परंतु जो बात मै विशेष रूप से कहना चाहता हॅूं, वह है बुध्दि की विशेषत: । दिव्य प्रेम संसार में सबसे बडा है, परंतु दिव्य प्रेम हमेशा दिव्य बुध्दि के द्वारा ही संचालित किया जाता है ।

प्रेम बुध्दि के बिना घात है । प्रेम की तुलना हम किसी वाहन की टंकी में भरे इंधन से कर सकते है, और बुध्दि की तुलना उस वाहन के चालक से कर सकते है । आपको अपने झुंड को आगे बढाने के लिए प्रेम की यकीनन आवश्यकता है । लेकिन यह निर्धारित करने के लिए कि आप उन्हें किस दिशा में आगे बढाएंगे आपको बुध्दि की आवश्यकता हैं ।

बुध्दि अति आवश्यक हैं । यह संभव है कि आप बाइबल का ज्ञान सौ प्रतिशत प्राप्त करें और बुध्दि में शून्य हों ! यह उस विद्यार्थी के समान है जिसे शारीरिक प्रशिक्षण में सौ प्रतिशत अंक मिले और गणित में शून्य! अच्छा होता कि उसे गणित में सौ प्रतिशत अंक मिलते और शारीरिक प्रशिक्षण में शून्य । Šयोंकि भविष्य मे शारीरिक प्रशिक्षण से ज्यादा गणित का महत्त्व अधिक होता हैं । उसी प्रकार जीवन में बुध्दि का महत्त्व ज्ञान से अधिक होता हैं ।

हमने देखा कि ज्ञान से कोठरियाँ सजती हैं । यह कुर्सी, मेज और बिस्तरों के समान है जो हम घर की कोठरियों में रखते है । इसलिए यदि आपके पास केवल ज्ञान है, बुध्दि नहीं, तो आप उस मनुष्य के समान है जो खुले मैदान में, जहाँ कोई मकान न हो, वहाँ पर अपने कुर्सी, मेज और पलंग को सजाता हैं । कई कीमती वस्तुएँ तो वहाँ सजी हुई है, कमी है तो बस सिर्फ एक मकान की ! आप सोच सकते है कि ऐसा मनुष्य अपने पडोसियों के लिए एक हँसी का विषय है । परंतु यही एक बात हम आज मसीहत मे अगुवों और प्रचारकों के जीवन में पाते हैं । उनके पास ज्ञान है, परंतु बुध्दि नहीं, Šयोंकि वे परमेश्वर का भय नहीं मानते ।

इन दिनों मे हम मुश्किल से किसी प्रचारक को परमेश्वर के भय के विषय में प्रचार करते हुए सुनते है । और यही वह वजह है कि अधिकांश विश्वासी लोग बुध्दिमान नहीं है । और उनके जीवन में नाना प्रकार के भय हैं ।

अध्याय 4
परमेश्वर की सुनना

आत्मिक अगुवा प्रतिदिन समय निकालकर परमेश्वर की वाणी को सुनता है ।

एक वाŠय जो अŠसर बाइबल के अधिकतर अध्यायों के आरंभ में पाया जाता है वह है परमेश्वर यह कहते है ।

जब वह बेडौल धरती को पुन:निर्मित कर रहे थे तब परमेश्वर ने पहले छ: दिनों तक कुछ न कुछ कहा । प्रत्येक बार जब परमेश्वर ने कुछ कहा तब यह पृथ्वी और भी बेहतर होती गई ।

इसलिए बाइबल के पहले ही पन्ने पर हम एक महत्त्वपूर्ण सच्चाई को सीखते है कि हम प्रतिदिन परमेश्वर जो कहना चाहते है, उसे सुने । और यदि परमेश्वर जो हमसे कहते है उसके अनुसार हम अपना समर्पण प्रतिदिन करेंगे, तो हम एक अच्छे और उपयोगी मसीही जन के रूप मे बदल जाएेंगे ।

परमेशवर हमसे Šया कहना चाहते है उसे सुनना और बाइबल का साधारण तौर पर अध्ययन करना इसमें बहुत अंतर है । याद रहे कि वे वही लोग थे जिन्होने प्रभु यीशु को क्रुस पर चढाया था, जो अपनी बाइबल का अध्ययन प्रति दिन करते थे । उन्होंने बाइबल का अध्ययन तो किया, परंतु परमेश्वर उनके ह्दय से Šया बात करना चाहते है यह सुनने मे वे असमर्थ रहे, हे आदरणीय भाइयो, इब्राहीम की संतानों और तुम में से जो परमेश्वर का भय मानते हो, हमारे लिए ही यह उध्दार का वचन भेजा गया है (प्रेरित 13:26) । और फिर हम इसी एक खतरे का सामना भी करते है । और फिर हम भी उतने ही अन्धे हो सकते है जितने कि वे थे ।

उत्पति की पुस्तक भी हमे यह सिखाती है कि परमेश्वर हमसे प्रतिदिन बात करना चाहते है ।

परंतु अधिकतर मसीही अगुवे परमेश्वर की वाणी प्रतिदिन नहीं सुनते । वे केवल मनुष्य के लिखे हुए लेखों को ही पढते हैं ।

यह एक अर्थहीन बात है कि आप केवल वही प्रचार करें जो आपने किसी अन्य मनुष्य को प्रचार करते हुए सुना था, Šयोंकि किसी मनुष्य का वचन किसी भी अनंतकालीन फल को नहीं उत्पन्न कर सकता । केवल वह वचन जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, वही अनंंतकालीन फल को उत्पन्न कर सकता है, जैसे कि हम यशायाह 55:11में पढते है उसी प्रकार मेरे मुंह से निकलनेवाला वचन होगा । वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, वरन्‌ मेरी इच्छा पूरी करेगा और जिस काम के लिए मैने उसको भेजा है उसे पूरा करके ही लौटेगा ।

उत्पत्ति 1मे हम पढते है कि जब जब परमेश्वर ने कुछ कहा, तब तब अद्‌भुत बातों ने जन्म लिया । यदि आप उन बातों का प्रचार करें जिसके विषय में परमेश्वर ने हमसे सबसे पहले बात की है, तो यही आपकी सेवा में भी हो सकता है ।

पौलुस ने तीमुथियुस को यह चिताया कि यदि वय स्वयं को और औरों को बचाना चाहता है, तो वह सबसे पहले स्वयं के जीवन को जाँचे, फिर औरों को सिखाए (1तीमुथियुस 4:16) । स्वयं के जीवन पर और अपनी शिक्षा पर विशेष ध्यान दे और इन बातों पर स्थिर रहे, Šयोंकि ऐसा करने से तू अपने और अपने सुनने वालों के भी उध्दार का कारण होगा । स्वयं को धोखा देने से बचने का एक ही रास्ता है कि हम उन बातों को सुने जो परमेश्वर हमसे कहना चाहते हैं ।

यदि आप उन बातों को जो परमेश्वर आपसे कहना चाहते है नहीं सुनते है, तो आप नीचे दिये गए तीन में से एक विषय पर प्रचार करते है :

  1. संसार के महान मसीही प्रचारक, विशेषकर अमेरीकी प्रचारक Šया कहते है इन बातों को जानकर आप भी वैसा ही प्रचार करेंगे Šयोंकि अधिकतर पैसा सेवा के लिए भारत में वहीं से आता है । (मैने कहा, महान मसीही प्रचारक, इसलिए कि ये परमेश्वर की नजरों मे महान नहीं है ) । आप उनकी लीिख हुई पुस्तकें पढकर उन्हीं को दोहराएंगे । जब आप जानेंगे कि कोई एक वेिशेष विषय संसार की कलीसियाआें में वर्तमान में प्रसिध्द है, तो आप भी उसी विषय पर अधिक बोलना पसंद करने लगेंगे । आपका अज्ञानी झुंड आपसे प्रभावित होकर यह समझेगा कि आप बहुत ज्ञानी और आत्मिक हैं !
    अथवा
  2. जिस प्रकार पाठशाला का एक शिक्षक रसायनशास्त्र पढ कर उसे अपने छात्रों को पढाता है उसी तरह बाइबल के विषयों का अध्ययन करके आपण बाइबल की शिक्षा देंगे । बाइबल के विषयों में डॉŠटरेट करना रसायनशास्त्र के विषय में डॉŠटरेट करने की तुलना में आसान है । कई साधारण बाइबल पाठशालाएँ आजकल नाम के भूखे पासवान और प्रचारकों को सम्मान के रूप में डॉŠटर की उपाधि मुफ्त में दे रहे है, जिससे वे चंद रूपये और कमा सकें ! इस तरह की उपाधियाँ आप जितनी चाहे पा सकते है, परंतु इसके द्वारा आप केवल एक ज्ञानी व्यŠत ही कहलाएंगे । हो सकता है आप फिर भी परमेश्वर को अथवा उसके वचनों को न जानते हों ।
    अथवा
  3. आप इन बातों को जानने और समझने की कोशिश करेंगे कि आपका झुंड किस विषय पर उपदेश सुनना पसंद करता है । Šयोंकि आप उनके बीच में उनकी लोकप्रियता पाना चाहते है । आप उन व्यापारियों के समान होंगे जो बाजार का निरीक्षण करके यह पता लगाते है कि ग्राहकों को सबसे ज्यादा Šया पसंद हैं । कई एक पासबान अपनी कलीसियाआें में इसी तरह प्रचार कर रहे हैं । और इसी प्रकार पुराने नियम में झूठे भविष्यवŠताआें ने भी प्रचार किया, और उन्होने प्रसिध्दी प्राप्त कर ली । हर एक झूठा भविष्यवŠता यह जानने की कोशिश करता था कि इस्त्राएल राष्ट्र किस विषय को ज्यादा पसंद करते है और फिर वे उन्हीं विषयों पर प्रचार किया करते थे । इसलिए वे लोगों के बीच में प्रसिध्द हुए और उन्होंने बहुत धन कमाया । आज मसीहत में भी कई ऐसे झूठे भविष्यवŠता पाए जाते हैं । परंतु इस्त्राएल के सब सच्चे भविष्यद्वŠता लोगों को नापसंद थे, Šयोंकि वे यहूदियों की जरूरतों के अनुसार प्रचार करते थे, न कि उनकी पसंद और नापसंद के अनुसार।

एक बार प्रभु यीशु ने मार्था को अधिक काम में व्यस्त होने की वजह से डाँटा, Šयोंकि वह मरियम की तरह उनके कदमों पर बैठकर उनका वचन नहीं सुन रही थी । प्रभु ने आगे यह भी कहा कि जो काम मरियम कर रही थी, केवल वही जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण काम है (लूका 10:42) । परंतु कुछ बातें है वास्तव में एक ही बात आवश्यक है और मरियम ने उस उत्तम भाग को चुन लिया है जो उस से छीना न जाएगा । हमारी प्रतिक्रिया शमूएल की तरह हो, जिसने कहा कि, हे प्रभु, बोल, तेरा दास सुनता है ।

हम बाइबल के पहले ही पन्ने पर Šया पाते है? जब कभी परमेश्वर ने कहा तो कुछ अद्‌भुत बात का अस्तित्व तुरंत हुआ : जैसे ज्योति निर्माण हुई, पृथ्वी पर पानी अलग हुआ, पेडपौंधे, पशुपक्षी, पछलियाँ इत्यादि उत्पन्न हुए ।

यशायाह 55:10,11वचन यह कहता है कि जिस प्रकार आकाश से वर्षा और हिम गिरते है और पृथ्वी को सींचे बिना वापस नहीं जाते और भूमी को उपजाऊ और फलदाई बनाते है, जिस से बोने वाले को बीज और खाने वाले को रोटी मिलती है, उसी प्रकार मेरे मुंह से निकलने वाला वचन होगा । वह व्यर्थ ठहर कर मेरे पासन लौटेगा, वरन्‌ मेरी इच्छा पूरी करेगा और जिस काम के लिए मैने उसको भेजा है उसे पूरा कर के ही लौटेगा ।

परमेश्वर के मुख से निकला हुआ वचन परमेश्वर के पास खाली हाथ नहीं लौटता, परंतु हर एक वह कार्य जिसके लिए परमेश्वर ने उसे भेजा है उसे पूरा करके ही लौटता है । इस वचन में दिए गए दो शब्दों पर गौर करें । संसार के सभी लोग उनका महत्त्व जानते है अर्थात्‌ पूर्ण करना और सफलता ।

हम सब अपने जीवन में भी किसी बात को प्राप्त करना और सफलता पाना चाहते है । परंतु यह जीवन बहुत छोटा है और समय हमारे पास इतना कम है कि हम अलगअलग तौर तरीके अपनाकर और भी नहीं । हम अपने जीवन में कुछ तरीकों को अपनाकर परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते, जिससे कि बीस वर्ष बाद यह जाने कि यह तरीका परमेश्वर के काम करने का नहीं था, और हम गलत दिशा में कार्य कर रहे थे । यदि हम उस वचन को जो परमेश्वर हमसे कहना चाहते है, सुनें तो हत इस विषय में समय की बर्बादी से बच सकते है । ऐसा करने से हमेशा हम सफलता और पूर्णता प्राप्त करेंगे ।

मैं उस मनुष्य की सुनना चाहता हूँ, जो हमेशा परमेश्वर की सुनता है, Šयोंकि ऐसा मनुष्य मुझे पाँच मिनट में जो सिखा सकता हैं वह बात, बडीबडी उपाधियाँ पाए हुए पासबान एक घंटे में भी नहीं सिखा सकते । प्राध्यापक गमलिएल या अन्य किसी यहूदी शिक्षक की तुलना में यूहन्ना बाप्तिस्मा देनेवाला परमेश्वर के विषय में लोगों को अधिक सिखाया करता था ।

जब आप परमेश्वर की सुनते है, तो आप भी उन सब बातों का प्रचार नहीं करेंगे जो आपने मसीही साहित्यों में पढी है, या किसी संदेश में सुनी है । जो मनुष्य परमेश्वर की सुनता है वह प्रकाशन के द्वारा सुनता है, बौध्दिक ज्ञान या अध्ययन के द्वारा नहीं । ऐसा मनुष्य सबसे पहले उन बातों का अनुभव करता है जो उसने पुस्तकों में पढी है और फिर अपने जीवन के द्वारा बोलता हैं ।

आप जो बुध्दि के द्वारा सिखाते है, वह केवल लोगों के दिमाग को ही छू पाता है, परंतु जो बातें आप अपने ह्दय से तथा अपने जीवन के अनुभवों से सिखाते है, वे बातें लोगों के ह्दय में प्रवेश करेगी और उनके जीवनों को बदल देंगी । मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि आप अपना संदेश पहले से तैयार न करें अथवा बोलते समय लिखित में न रखें ।

चाहे आप लिखित परचा उपदेश देते समय अपने पास रखें या न रखें यह इस बात पर निर्भर है कि आपकी स्मरण शŠत कितनी अच्छी है, न कि आप कितने आत्मिक हैं । मै जो कहना चाहता हूॅ, वह यह है कि आप जो कुछ भी बोलते है, वह केवल ह्दय और जीवन से निकलना चाहिए ।

आज हमारे देश में ईश्वरीय ज्ञान के विषय में अन्य धर्मो से समझौत करनेवाले बाइबल विद्यालय भी है और सुसमाचारीय ईश्वरीय ज्ञान वाले विद्यालय भी है । इन दोनों विद्यालयों में Šया अंतर हैं ? एक में, एक दिमाग से दूसरे दिमाग तक केवल जानकारियाँ पहुँचाई जाती है, परंतु ये सिध्दान्तों में गलत हैं । जब कि दूसरे में जो ज्ञान बाँटा जाता है वह तत्त्व में सही है, परंतु आत्मिक दृष्टि से देखा जाए तो सुसमाचारीय विद्यालय समझौता करनेवाले विद्यालय से बेहतर न हो । दोनों ही विद्यालयों में हो सकता है कि इनके शिक्षक और विद्यार्थी पैसों के लोभी और शारीरिक अभिलाषाआें के गुलाम हों ।

प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को इस प्रकार नहीं सिखाया । वह इस संसार में इसलिए नहीं आए कि हमे ईश्वरीय ज्ञान की बेहतर जानकारियाँ दे । वह इसलिए आए ताकि वह हमें अपने स्वरूप में बना सके, हमारे चरित्र को, और हमारे व्यŠतत्व को भी ।

प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को ईश्वरीय ज्ञान से ज्यादा चरित्र के विषय में सिखाया । आपके विषय में Šया कहा जा सकता है? Šया आप अपने झुंड को यह सिखाते है कि वे शरीर की अभिलाषाआें और आंॅखों की अभिलाषा तथा जीविका का घमंड इन सब बातों पर कैसे विजय प्राप्त करें ?

हमारी कलीसियाआें में बहुत से ऐसे लोग है जो परमेश्वर की वाणी जानने के लिए प्रति रविवार हमारी प्रतीक्षा करते है कि उन्हें ईश्वरीय शिक्षा प्रदान की जाएँ । यदि मै आप की जगह होता तो डर जाता, Šयोंकि हम सब जो लोगों को सिखाते है उसके विषय में परमेश्वर के सामने जिम्मेदार हैं । एक दिन हमें परमेश्वर को हिसाब देना होगा, अपने प्रत्येक उपदेश के लिए जो हमने प्रचार किया । जो कुछ हमने कहा, किसलिए कहा, और कैसे कहा उसका हमें जवाब देना होगा । यदि आप अपनी इस जिम्मेदारी को गंभीरता से लेंगे तो आपकी सेवा स्पष्ट रीति से बदल सकती हैं ।

पिछले बीस वषा]ं में मैने अपनी सेवा को परमेश्वर के प्रकाश में जाँचा है । जब भी मैं परमेश्वर का वचन प्रचार करता हूँ, तो मैं परमेश्वर से पूछता हॅूं कि कहीं मैने कुछ व्यर्थ बातें तो नहीं कह दी, या मैने कही लोगों का समय तो बरबाद नहीं किया, कहीं मैने स्वयं के सम्मान की लालसा तो नहीं की ? इस प्रकार मैने धीरेधीरे अपने आपको इन बुराइयों से तथा लोगों के सिर पर से जानेवाले प्रचार करने से शुध्द किया हैं ।

Šया आप उपदेश देने के बाद परमेश्वर की वाणी सुनते है? Šया आप उससे यह पूछते है कि Šया इससे बेहतर कोई तरीके से मै बोल सकता था? वास्तव में जो संदेश औरों के लिए बहुत अच्छा था, Šया वह परमेश्वर की दृष्टि में अच्छा था, Šया वह परमेश्वर की दृष्टि में अच्छा था? यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल हैं ।

आपकी कलीसियाआें में आपके पास बहुत सारे लोग है जो हर रविवार आपकी सुनते है ? Šया आप उनके जीवन के मूल्यों को बदल पाये है? अनंतकाल में मुल्यों को बदल पाये है जिस से कि वे सांसारिक नहीं परंतु स्वर्गीय बाते बता सकें ? यही वह प्रश्न है जिसे आपको अपने आप से अŠसर पूछना चाहिए ।

हमें सावधानी के साथ परमेश्वर की वाणी को सुनना चाहिए विशेष करके तब, जब हम कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने जा रहे हों ।

परमेश्वर हमसे कई माध्यमों से बात करते हैं ।

परमेश्वर प्रथम हमसे अपने वचन के द्वारा बात करते हैं । यदि कोई बात स्पष्ट रीति से उनके वचन में लिखी हो, तो हमें परमेश्वर की इच्छा जानने के ए प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं Šयोंकि वह पहले से वचन में प्रकट हो चुकी हैं।

परमेश्वर हमसे हमारी परिस्थितियों के द्वारा भी बात करते है । परमेश्वर के पास सभी दरवाजों के तालों की चाबी हैं । मै मर गया था और देख, मै युगानुयुग जीवित हूँ । मृत्यु और अधोलोक की कुंजिया मेरे पास है (प्रकाशित 1:18) । और जब वह कोई द्वार खोलते है तो कोई भी उसे बंद नहीं कर सकता,और जो द्वार वह बंद करते है उसे कोई भी नहीं खोल सकता (प्रकाशित 3:8) । इसलिए हमारी परिस्थितियाँ अŠसर इस बात का संकेत देती है कि Šया परमेश्वर चाहते है कि हम किसी खास द्वार से जाएँ अथवा नहीं । हमें उन दरवाजों को खटखटाने की आवश्यकता नहीं जिन्हे परमेश्वर ने न खोला हो । जब हम किसी बंद द्वार को देखते हे तब हमे प्रार्थना जरूर करनी चाहिए । किंतु यदि बारबार प्रार्थना करने के बावजूद भी कोई द्वार बंद ही राहे, तो हो सकता है कि इसका अर्थ यह हो कि परमेश्वर नही चाहते कि हम उस द्वार में प्रवेश करें । हमें परमेश्वर से पूछना चाहिऐ कि यदि ऐसा है तो वह हमे बताए, अथवा यह बताए कि Šया हमें प्रार्थना में और निरंतर लगे रहना है, जिससे कि वह द्वार खुल सके (लूका 11:5-9)

परमेश्वर हमसे परिपŠव और आत्मिक भाइयों की सलाहों के द्वारा भी बात करते हैं । यह वे लोग हे जो कई उतारचढाव के अनुभव से गुजरे है और ये ही लोग हमें चितायेंगे उन गड्‌ढों से जिनके विषय में हम स्वयं अनजान हैं । हमें उनकी बातों को आँख बंद करके सुनने की आवश्यकता नहीं, परंतु उनकी आत्मिक सलाह हमारी सहायता कर सकती हैं ।

परमेश्वर अŠसर हमसे उस समय बात करते है जब हम विश्वासियों के साथ संगति रखते हैं । इस प्रकार वह हमें मसीह की देह में अन्य सदस्यों पर निर्भर रहना सिखाते है, और अपने वचन के प्रकाशन के लिए भी ।

हम जब भी बीमार होते है तो या किसी कठिन परिस्थिति से गुजरते है तब परमेश्वर हमे कुछ महत्त्वपूर्ण बातें सिखाते हैं ।

परमेश्वर हमे औरों की गलतियों से भी सावधान करते रहेंगे । उदाहरण के तौर पर, यदि हम परमेश्वर के किसी दास के विषय में सुनते है कि वह पाप में गिर गया है, तो यह अच्छी बात है कि हम परमेश्वर से पूछें कि हमें उस व्यŠत की गलतियों से Šया सीखना चाहिए (Šयोंकि हम सब कमजोर है) । हम अपने आप को कैसे शुध्द रख सकते हैं ।

परमेश्वर हमसे उस समय भी बात कर सकते है जब हम किसी बुरी खबर के विषय में सुनते हैं । उस समय कुछ लोग आ पहुँचे, और उनसे उन गलीलियों की चर्चा करने लगे, जिनका लोहू पीलातुस ने उन ही के बलिदानों के साथ मिलाया था । यह सुन यीशु ने उनसे उत्तर में यह कहा, Šया तुम समझते हो, कि ये गलीली, और सब गलीलियों से पापी थे कि उन पर ऐसी विपत्ति पडी? मैं तुमसे कहता हूँ कि नहीं, परंतु यदि तुम मन न फिरायोगे तो तुम सब भी इसी रीति से नाश होंगे । या Šया तुम समझते हो कि वे अठारह जन जिन पर शीलोह का गुम्मट गिरा, और वे दब कर मर गए, यरूशलेम के और सब रहनेवालों से अधिक अपराधी थे ? मैं तुमसे कहता हूँ कि नही, परंतु यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम भी सब इसी रीति से नाश होंगे (लूका 13:14) ।

मै एक चेतावनी का शब्द उसमें जोडना चाहता हूॅ । यदि आप परमेश्वर की वाणी को सुनने के प्रयास में बाइबल का कोई भी पन्ना खोलकर किसी भी वचन पर हाथ रखते है, तो आप गलत करते है ।

यदि आप किसी विशेष लडकी से विवाह करने में उत्सुक हो तो हो सकता है कि आप अपनी बाइबल में कोई ऐसा वचन ढूंढेंगे जिससे आपको ऐसा लगे मानो परमेश्वर आपकी अगुवाई कर रहे हो । और आप ऐसा तब तक करते रहेंगे जब तक कि कोई वचन न मिल जाए । इस तरीके से आप स्वयं को धोखा दे सकते है।

मैने एक व्यŠत की कहानी सुनी । उसने एक बार परमेश्वर की इच्छा जानने के लिए इसी प्रकार से अपनी बाइबल खोली और उसमें यह वचन पाया, कि उसने जा के फांसी लगा ली । पहली बार उसने बाइबल खोली, पर्व के समय नहीं, कही ऐसा न हो कि लोगों मे दंगा हो जाये (मत्ती 26:5) । उसने फिर से उसी प्रकार अपनी बाइबल खोली और उसमें पाया कि, जा और तू भी ऐसा ही कर (लुका 10:37) । उसने कहा, वही जिसने उस पर दया की । यीशु ने उससे कहा, जा तू भी ऐसा ही कर । उसने अपनी बाइबल तीसरी बार वैसे ही खोली और उसमें पाया कि, जो कुछ भी तू करें जल्दी कर (युहन्ना 13:27) । उसकी इन गलतियों से वह जान गया कि इस तरीके से परमेश्वर की इच्छा को जानना गलत है ।

ऐसा भी समय आ सकता है, जब हम बहुत निराशा में हो और अनजाने में बाइबल खोलते ही किसी वचन पर हमारी नजर पडे और परमेश्वर की ओर से हमें उस वचन के द्वारा प्रोत्साहन मिल जाए । यह तरीका प्रोत्साहन पाने के लिए चल जाएगा, परंतु मार्गदर्शन पाने के लिए नहीं ।

मै आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि आप परमेश्वर की वाणी को सुनने की आदत अपने जीवन मे डाले । यह एक जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण आदत है जिसे आप अपने जीवन में डाल सकते है ।

अध्याय 5
मसीह की देह द्वारा संतुलित

आत्मिक अगुवा इस बात को मानेगा किउसकी सेवा असंतुलित है । इसलिए मसीह की देह के बाकी अंगो की सेवकाईद्वारा वह अपना संतुलन बनाना चाहेगा ।

मसीह के देह की तुलना एक अस्पताल से की जा सकती है । जब कोई बीमार पडता है तो वह ऐसे अस्पताल में जाता है जहाँ उसकी मदद करने के लिए कई विभाग होते है । हो सकता है उसकी जरूरत केवल एक इंजेŠशन की हो, या हड्‌िडयों का इलाज या फिर कान के डॉŠटर के पास जाना चाहता हो । इस प्रकार अस्पताल में कई विभाग होते है । आँखो का डॉŠटर केवल लोगों की आँखे जाँचने में ही अपना पूरा समय बिता देता है । परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उसके लिए शरीर के बाकी अंग भी जरूरी नहीं है, परंतु उसकी विशेषता आँखों की हैं ।

मसीह की देह में भी प्रत्येक विश्वासी की बुलाहट और उनके वरदान भिन्न हैं । और प्रत्येक जन अपन आप में असंतुलित है । पृथ्वी पर जो अकेले संतुलित व्यŠत थे, वह थे प्रभु यीशु मसीह । बाकी हम सब, यहाँ तक कि हम में से जो बेहतर है, वह भी असंतुलित है । हम अपना संतुलन तभी पा सकते है जब हम अपने अन्य भाई बहनों के साथ मिलकर काम करते है, अर्थात्‌ परमेश्वर के अस्पताल के अन्य विभागों के साथ । ताकि इसमें किसी एक मनुष्य का अपना स्वयं का महत्त्व न रहें ।

एक अच्छे अस्पताल में कई विभाग होते है जहाँ लोगों की भिन्न भिन्न जरूरतें पूरी की जाती है । उसी प्रकार मसीह की देह में भी भिन्न भिन्न सेवाएँ और कई प्रकार के आत्मिक वरदान है जि से कि लोगों की सहायता की जा सके । किसी भी कलीसिया या झुंड के पास आत्मा के सभी वरदान नहीं होते, परंतु मसीह की संपूर्ण देह में वह सब वरदान पाए जाते हैं ।

हमें यह जानना आवश्यक है कि कौनसी विशेश बुलाहट हमारे पास देह मं हैं ।

यह संसार आत्मिक रूप से बीमार लोगों से भरा पडा है और किसी को भी स्थिति आशाहीन नहीं हैं। प्रत्येक व्यŠत प्रभु के द्वारा पूर्ण चंगाई प्राप्त कर सकता है । सुसमाचार का यही वह शुभ संदेश है जिसकी घोषणा हम करते है । संसार का घोर अपराधी और सबसे टेढा आदमी भी परमेश्वर के अस्पताल में चंगाई प्राप्त कर सकता हैं । एक अच्छा अस्पताल किसी भी गंभीर बीमार व्यŠत को अस्वीकार नहीं करता । छोटे अस्पताल ऐसा जरूर करते है Šयों कि उनके पास किसी गंभीर रूप से बीमार व्यŠत को देखभाल के लिए आवश्यक सुविधाएँ नहीं होती । उसी प्रकार, एक अच्छी कलीसिया संसार के सब से बडे पापाी को भी यह नहीं कहेगी कि उसकी स्थिति आशारहित है । यदि पापी व्यŠत जो इलाज उसे दिया जा रहा है उसे स्वेच्छा से स्वीकार करे, तो एक अच्छी कलीसिया इस योग्य होगी कि वह संसार के सबसे बडे पापी को एक बडे संत के रूप में बदल सके ।

हम कलीसिया की तुलना किसी मानवीय देह के साथ भी कर सकते है । मानवीय देह में हर एक अंग का अपना कार्य होता है, और वह अंग अपने खुद के कार्य को पूरा करने का ध्यान रखता हैं । परंत वह दूसरे अंगों के साथ जिनके भिन्न कार्य है उनकी सराहना करता है, कदर करता है और उन्हे सहयोग भी देता हैं । इसी प्रकार जब हम मसीह की देह में अन्य सेवाआें के साथ मिलकर कार्य करते है, तो उसमें भी यही बात होनी चाहिए ।

1कुरिन्थियों 12 में पवित्र आत्मा आँख, कान, हाथ, और पाँव का उदाहरण देकर यही दर्शाता है कि मसीह की देह में आत्मा के वरदानों का उपयोग कैसे होता है ।

जब आप मुझे सुनेंगे तो आप जानेंगे कि मै बाइबल के कुछ चूने हुए विषयों पर बारबार जोर देता हूँ । वह इसलिए Šयोंकि परमेश्वर ने मुझे उसी विषय का बोझ दिया हैं । ़वह सेवा जिसमें परमेश्वर ने मुझे बुलाया है, उसमें मैं बना हुआ हूँ । यदि मैं कुछ और करने की कोशिश करूँ तो मै परमेश्वर की योजनाआें को विफल कर दूॅंगा । परंतु मैं अन्य सेवाआें के विरोध में नहीं हूँ, मै उनका आदर करता हूँ । पेट, हाथ की कद्र करता है, परंतु वह उन कामों को करने का प्रयत्न नहीं करता जिन्हें हाथ करता हैं । उदाहरण के तौर पर पेट कभी थाली में से खाना उठाने की कोशिश नहीं करता । वह हाथ को अपना काम करने देता है और फिर अपना काम करता है अर्थात्‌ भोजन का पाचन करना, जिसे हाथों ने उठाकर मुँह में डाला हैं । हम मसीह की देह में एक दूसरे के लिए कैसे सहयोग देते है इसका यह चित्र हैं ।

कई विश्वासियों ने मसीह की देह में सेवाआें की विभिन्नता के इस सच्चाई को नहीं जाना । यदि आप इस सच्चाई को नही जानेंगे तो आप वह सब कार्य जो परमेश्वर आपके द्वारा पूरा करना चाहते है, नहीं कर पाएंगे ।

यह हमारे लिए अच्छा होगा कि हम अपने विचारों में स्पष्ट हो जाएँ कि परमेश्वर ने किस बात के लिए हमें बुलाया हैं । वह बोझ जो परमेश्वर हमारे ह्दय में डालते है वह अकसर इस बात की ओर संकेत करता है कि किस सेवा के लिए मसीह की दह में परमेश्वर ने हमें रखा हैं ।

जहाँ तक मेरा सवाल है, मेरे लिए यह बात कई वषा] से अब तक एकदम स्पष्ट हो गयी है कि प्रभु यीशु मसीह की देह में मेरी Šया सेवा है तथा अपनी सेवा में परमेश्वर मुझे किस विषय पर जोर देने को कहते हैं । उस स्पष्टता ने मेरे जीवन में एक विश्राम और एक बडी आजादी के अनुभव को लाया है । अब कोई मुझे मेरी सेवा से अलग नहीं कर सकता, फिर चाहे वे मुझे असंतुलित होने का दोष भी Šयों न लगाएँ ।

पुराने नियम में कोई भी भविष्यवŠता अपनी सेवा में संतुलित नहीं था । केवल कूटनीतिज्ञ प्रचारक ही संतुलित होने का प्रयास करते थे । सभी भविष्यवŠता असंतुलित थे । वे एक ही बात को बारबार दोहराते रहते थे, Šयोंकि इस्त्राएल और यहूदा की उनकी पीढी से यही जरूरत थी । और उसी बात को परमेश्वर ने उनके ह्दय में बोझ के रूप में डाला था ।

मै यह नहीं कह रहा हँू कि जब हम परमेश्वर की सेवा करना आरंभ करते है, तो हम सब अपनी बुलाहट और वरदान को एकदम से जान पाएँगे । मेरी सेवा Šया है इस बात को जानने के लिए मुझे पंद्रह वर्ष लगे । हो सकता है आपको इतना समय न लगे । हो सकता है इससे बहुत कम समय लगे । कितना समय लगे यह बात परमेश्वर को तय करने दीजिये । परंतु इस बात को स्पष्ट रीति से आपको समझना आवश्यक है कि आपके पास मसीह की देह में एक विशेष और अद्‌भुत सेवा है जिसे कोई और पूरा नहीं कर सकता । और यह कि सेवा कभी भी संतुलित नहीं होगी, वह हमेशा असंतुलित ही रहेगी । मसीह की देह मे आपको अपना संतुलन पाने के लिए अन्य सेवाआें के साथ संगति में रहकर काम करना होगा । एक दूसरे पर निर्भर होकर परमेश्वर हमें इसी प्रकार नम्रता सिखाते हैं । प्रभु की स्तुति हो ।

हम में से प्रत्येक जन जीवन के किसी क्षेत्र में मजबूत है, तो किसी क्षेत्र में कमजोर, ठीक उसी तरह जैसे कि एक विद्यार्थी अंग्रेजी में अच्छा है तो गणित में कमजोर । परंतु हमें यह जानना आवश्यक है कि हम किस क्षेत्र में कमजोर है ताकि उसे मजबूत कर सकें । आपकी कलीसिया यदि सुसमाचार की सेवा में मजबूत है, तो हो सकता है कि पवित्रता पर जोर न देती हो । यदि ऐसा है तो आप जानते है कि आपको कलीसिया को किस विषय पर जोर देने की आवश्यकता हैं ।

अपनी प्रसिध्दी से अपने कार्य की सफलता को कभी न जाँचे । प्रभु यीशु ने उन सभी लोगों को धिŠकारा जो लोगों के बीच में प्रिय और प्रसिध्द थे, Šयोंकि एक झूठे भविष्यवŠता की यही पहचान थी (लूका 6:26) । इसलिए यदि आप एक लोकप्रिय प्रचारक है तो संभव है कि आप एक झूठे भविष्यवŠता हो । दूसरी तरफ प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि जब लोग उनके विरोध में कुछ कहते है तो उन्हें आनंदित होना चाहिए Šयोंकि एक सच्चे भविष्यवŠता की यही पहचान हैं ।

जो कुछ यहाँ प्रभु यीशु ने कहा उस पर Šया आप सचमुच विश्वास करते है?

याद रहे कि इस्त्राएल के और कलीसिया के इतिहास में प्रत्येक सच्चा भविष्यवŠता हमेशा आलोचना का विषय रहा है, जिसे तुच्छ जाना गया और उसके समय के धार्मिक गुरूआें ने उसे झूठा ठहराया गया और तिरस्कार का पात्र समझा ।

र्को भी भविष्यवŠता इन बातों से बच नाही पाया, फिर चाहे वे पुराने नियम के एलिया और यिर्मयाह हो, या नये नियम के पौलुस और युहन्ना बाप्तिस्मा देने वाला हो, या आधुनिक काल के वॉचमैन हो या जॉन वैस्ली ही Šयों न हो ।

इसलिए हम अपनी मेहनत की सफलत को अपनी लोकप्रियता के माप से कभी न नापे ।

हमें अपने मेहनत की सफलता को आँकडो के द्वारा भी नहीं नापना चाहिए, अर्थात्‌ हमने कितने लोगों को सुसमाचार सुनाया, अथवा कितने लोगों ने हमारी सभाआें मे अपने हाथ खडे किये आदि ।

यदि हम आँकडों को महत्त्व देना चाहते है तो हमे प्रभु यीशु मसीह की सेवा असफल दिखाई देगी, Šयोंकि उनकी सेवा के अंत में उनके पास अपने पिता के सम्मुख पेश करने के लिए केवल ग्यारह शिष्य थे (युहन्ना 17) । परंतु उनकी सेवा की सफलता इस बात मेें दिखाई देती थी कि वे ग्यारह शिष्य किस प्रकार के जन थे । आज के ग्यारह करोड ऐसे विश्वासी जो पैसों के लोभी, अधूरे मन वाले और संसार से समझौता करनेवाले सांसारिक विश्वासियों की तुलना में प्रभु यीशु के ग्याहर शिष्य परमेश्वर के लिए बहुत ही बहुमूल्य और उपयोगी थे ।

मैं ऐसा सोचता हूँ कि यदि मै अपने संपूर्ण जीवन में केवल ग्यारह लोगों को तैयार कर पाया जो उन पहले प्रेरितों की तरह गुणवान हो, तो मेरी सेवा सचमुच में एक बहुत बडी सफलता होगी । लेकिन उस तरह के दो या तीन लोग भी तैयार करना आसान नहीं हैं । ये बहुत ही आसान है कि हम एक ऐसी भीड को जमा करें जो मसीह पर विश्वास तो करती है, परंतु संसार के साथ समझौता भी करती है और प्रभु यीशु से सच्चा प्रेम अपने दिल में रखती हों ।

प्रत्येक नया कार्य जो परमेश्वर ने पिछले दो हजार वषा] में मसीहत में किया, उसमें दूसरी पीढी के आते ही गिरावट आ गई, और उसमें वह जोश और सरगर्मी नही रही जो उस कार्य के आरंभ के समय में थी । ऐसा Šयों ? एक कारण जो था, वह यह है कि दूसरी पीढी आँकडो को महत्व देने लगी । उन्हें ऐसा लगा कि उनकी बढती हुई संख्या इस बात का संकेत है कि परमेश्वर उन्हे आशीष दे रहे हैं ।

परंतु बडी तेजी से बढनेवाले दल इस संसार में पिछले कुछ वषा] में केवल ढोंगी और अन्य धर्मो के मानने वाले थे । यह किस बात को साबित करता है ? केवल इस बात को कि आँकडों में बढना यह कोई परमेश्वर की आशीषों को सबूत नहीं ।

परमेश्वर हमे बुला रहे है कि हम अपनी सेवा जो परमेश्वर ने मसीह की देह हमे दी है कि हम उस पर ध्यान लगाएँ, और साथ ही दूसरी विभिन्न सेवाआें को भी सहयोग दें । यह असंभव है कि हम अपनी सेवा के परिणामों को जाँच सकें, Šयोंकि हम मसीह की देह के अंग हैं ।

हमें केवल इस बात का निश्चय करना होगा कि परमेश्वर का दिया हुआ कार्य बडे ही विश्वासयोग्यता के साथ करें ।

अध्याय 6
समर्पण द्वारा तोडा जाना

एक आत्म्कि अगुवा एक टूटा हुआ मनुष्य होता है ।

परमेश्वर हमें हमारे शुरूवात के वर्षो मे किसी अधिकार को हम पर रखते है जिसके अधीन हमें रहना है, ताकि वह हमें तोड सके । इस तरह से वह हमं तोडता हैं । यहाँ तक कि जब तक परमेश्वर ने प्रभु यीशु को सेवा नहीं दी, तब तक उन्हें तीस वर्ष तक युसूफ और मरियम के अधिकार में अधीन रहना पडा ।

समर्पण का नियम मसीह की देह में एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम है । यह बिलकुल उसी नियम के समान है जो हमारे शरीर में कार्य करते है ।

उदाहरण के तौर पर दाहिना हाथ दाहिने कंधी को हिस्सा है, और उसी की अगुवाई के अधीन रहेगा । बाँया हाथ दायें भाग का हिस्सा नहीं है, परंतु बाएँ कधे का हिस्सा है इसलिए वह बाएं कंधे के ही अधीन रहेगा । मसीह की देह में भी परमेश्वर कुछ सदस्यों को (जैसे कि वे जो स्थानीय कलीसिया में है अथवा कार्यकर्ताआें के दल में है) एक दूसरे के साथ मजबूती से जोडते हैं ।

परमेश्वर दो तरीकों से हमारा मार्गदर्शन करते है, 1) व्यŠतगत रीति से और 2) सामूहिक रीति से ।

सिर दाहिना हाथ को बगैर दाहिने कंधे को हिलाए अपने स्वयं के बल पर हिलने कह सकता हैं । यह सिर का हाथ के लिए व्यŠतगत मार्गदर्शन है । हमारे व्यŠतगत जीवन के विषय में बहुत सी ऐसी बातें है अर्थात्‌ शादी, नोकरी इत्यादि जिसमें हमें जीना है, और इन बातों में हमें मसीह जो हमारा सिर है उनकी ओर से व्यŠतगत मार्गदर्शन की आवश्यकता है । हम देह के बाकी अंगों से भी सलाह पा सकते है, परंतु हमे मार्गदर्शन अपने प्रभु से लेना चाहिए ।

परंतु जब सिर दाहिने बाजू से हिलने कोकहता है तो बगैर किसी विशेष मार्गदर्शन के उसके साथ दाहिना हाथ भी हिलता है (इसे सामूहिक मार्गदर्शन कहते है)। वह यह नहीं कहता कि मुझे व्यŠतगत मार्गदर्शन नहीं दिया इसलिए मै नहीं हिलूंगा ।

सामूहिक मामलों में किसी को व्यŠतगत मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं होती । यदि आप मसीह की देह के किसी हिस्से से जुडे है तो परमेश्वर केवल आपके अगुवों को मार्गदर्शित करेंगे, आपको केवल उनका अनुसरण करना होगा । मैं केवल सामुहिक विषय की बात कर रहा हूॅ न कि व्यŠतगत्‌, ताकि इस बात का संबंध देह के उस भाग से जोड दूँ जिसके साथ आप जुडे है । यदि आपको इस बात की फिकर है, कि परमेश्वर ने आपको देह के किसी अंग के साथ जोडा है तो आप उसी अंग के अगुवे के अधीन रहकर उनका अनुसरण करें ।

हम प्रेरितों के काम 16:9 में पढते है कि राम के समय पौलुस को एक दर्शन दिखाई दिया जिसमें उसने देखा कि मैसीडोनिया का एक पुरूष खडा हुआ उससे यह निवेदन कर रहा है कि वह मैसीडोनिया में आकर उसकी सहायता करे । हम यह देखते है कि पौलुस और उसके सहकर्मी (जो उसके साथ परमेश्वर द्वारा जोडे गए थे ) त्रोआस में थे और उस समय एक दर्शन पौलुस को मिलता है जिसमें पौलुस एक व्यŠत को देखता है जो पौलुस को मैसीडोनिया आकर सहायता करने के लिए कहता हैं । दसवें वचन में हम देखते है कि हालांकि केवल पौलुस ने यह दर्शन देखा, परंतु उसके सभी सहकर्मी इस बात से सहमत हो गये कि परमेश्वर ने उन्हे ंमैसीडोनिया में सुसमाचार प्रचार करने के लिए बुलाया है । जब उन्होंने परमशेवर की ओर से कोई व्यŠतगत मार्गदर्शन नहीं पाया तो वे सब उस दर्शन के विषय में कैसे सहमत हो गये ? Šयों कि उन्हें पौलुस पर एक अगुवे के रूप में पूरा भरोसा था । एक दल में परमेश्वर व्यŠतगत रीति से प्रत्येक सदस्य को मार्गदर्शन नहीं करते । वह केवल अगुवे को मार्गदर्शन करते हैं ।

यदि आपको अपने अगुवे पर भरोसा नहीं है, तो फिर जरूर आपको उस दल या कलीसिया को तुरंत छोड देना चाहिए । परंतु वहीं रहकर आपको किसी मसीही संस्था या कलीसिया के बीच में किसी झगडे या बलवे का कारण नहीं बनना चाहिए । यदि आप किसी दल में रहकर उसके अगुवे के विरोध में बलवा करेंगे तो परमेश्वर आपको कभी आशीष नही देगे, फिर चाहे वह अगुवा गलत ही Šयों न हो । उस झुंड को छोडकर दूसरे में शामिल हो जाए । ऐसा करना आपके लिए उचित होगा ।

आपको मनुष्य द्वारा नियुŠत किये गये कलीसियाई अधिकार और परमेश्वर द्वारा नियुŠत आत्मिक अधिकार के बीच फर्क को जानना होगा । आज कई मसीही लोग अगुवों के पद पर है, परंतु वे परमेश्वर द्वारा नियुŠत किये गए नहीं है और न ही उन्होने आत्मिक बच्चों की तरह कलीसिया की देखभाल की, जैसे प्रेरित पौलुस ने की थी, परंतु वे चुनाव के माध्यम से मानवीय अधिकारीगणों द्वारा नियुŠत किये हुए है । एक डायसिस का बिशप किसी पुरोहित को किसी पॅरीश में और एक कलीसिया में किसी पासबान को भेजता हैं । ऐसे भेजे हुए लोग आत्मिक अधिकारी नहीं, परंतु कलीसियाई अधिकारी है ।

आत्मिक अधिकारी स्वयं परमेश्वर द्वारा नियुŠत किये जाते है । कलीसियाई अधिकारियों की तरह वे अपने आपको दूसरों पर जबरदस्ती नहीं थोप देते । वे औरों का इंतजार करते है कि वे उनकी अपनी स्वेच्छा से उनके आत्मिक अधिकारों के अधीन होते है Šयोंकि वे उन पर परमेश्वर के अभिषेक को पहचान पाते है । आत्मिक अगुवा वह है जो औरों के विश्वास को जीत पाया हो ।

किसी आत्मिक मनुष्य के अधीन होने से हम न केवल मूर्खता करने से बच जाते है, परंतु हम बुध्दि को भी बहुतायत से पाते है । वह हमें उन खतरों से सावधान कर सकेगा जिसका उसने स्वयं अपने जीवन में सामना किया हो और, जिनके विषय में हम अज्ञात हो सकते है । इसलिए किसी आत्मिक अधिकारी के अधीन रहना हमारे लिए उतना ही सुरक्षित है जितना कि माँ बाप की अधीनता में बच्चे सुरक्षित है ।

1पतरस 5:5 में हम पढते है कि इसी प्रकार नवयुवक भी अपने अपने प्राचीनों के अधीन रहें और सबके सब एक दूसरे के प्रति नम्रता धारण करें, Šयोंकि परमेश्वर अभिमानियों का तो विरोध करते है, परंतु दीनों पर अनुग्रह करते हैं । परमेश्वर की ओर से आत्मिक अधिकार प्राप्त करने का गहरा रहस्य यही है । मैं कई अच्छे भाइयों को जानता हूँ जिन्हें परमेश्वर की ओर से कभी आत्मिक अधिकार प्राप्त नहीं हुआ, जिसका कारण केवल यह है कि वे अपने संपूर्ण जीवन में कभी किसी के अधीन होना नहीं सीख पाए और इसलिए उनकी अपनी इच्छाएं नहीं तोडी जा सकी ।

अधिकार एक ऐसे व्यŠत के हाथ में बहुत ही घातक चीज सिध्द हो सकती है जो कभी तोडा न गया हो । यदि आप टूटे हुए नहीं है और फिर भी लोगों के ऊपर अपने अधिकार का उपयोग करने की कोशिश करेंगे तो आप उन्हें बरबाद कर देंगे और इस प्रक्रिया से स्वयं को भी बहुत नुकसान पहुँचाएंगे । इस से पहले कि परमेश्वर हमारे हाथों में कोई अधिकार सौपे, उन्हें हमारे अभिमान की सामर्थ को तोडना पडता हैं ।

यहाँ तक कि घर के अन्दर, यदि पिता या पति को अपने अधिकार का उपयोग करना हो तो उसे भी टूटा हुआ मनुष्य होना आवश्यक है । यदि आप चाहते है कि आपकी पत्नी या बच्चे आपके अधिकार में रहे तो सबसे पहले आपको आत्मिक अधिकारों के अधीन रहना जरूरी है । केवल तभी परमेश्वर आपको उन कामों मे जिन्हें आपको घर में करना है, आपकी सहायता करेंगे ।

मैं अपने स्वयं के अनुभव संक्षेप में बताना चाहता हँू । 20 और 30 वर्ष की आयु के दरमियान परमेश्वर ने मेरे जीवन में इस बात की अनुमति दी कि मैं आम जनता के बीच में कलीसिया के अंदर प्राचीनों द्वारा अपमानित किया जाऊँ, Šयोंकि वे मेरी सेवकाई से जलन रखते थे । इन सब बातों में भी परमेश्वर ने मुझे अपना मुँह बंद रखकर बगैर कोई सवाल पूछे उन प्राचीनों के अधीन रहने को कहा, और मैने वैसा ही किया । जब मैं उनकी कलीसिया में था और जब मैने उनकी कलीसिया छोड दी उस समय भी, मैने उन लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे ।

उन दिनों में मुझे यह नहीं पता था कि भविष्य में मेरे लिए परमेश्वर ने कौनसी सेवा रखी हैं । किंतु परमेश्वर मुझे उन वषा] के दौरान तोड रहे थे, जिससे कि मैं भविष्य में आत्मिक अधिकार का उपयोग करने के योग्य बन सकूँ। वह मुझे समय असमय तोड कर यह बताना चाहता था कि औरों ने जो मेरे जीवन के साथ किया वह सब परमेश्वर के नियंत्रण में था । परिणाम स्वरूप कई वर्षो के बाद जब परमेश्वर ने मुझे आत्मिक अधिकार दिया तो मैं अधिकार जिताने वाले की तरह नहीं, परंतु तरस खानेवाले की तरह लोगों के बीच में अपने अधिकार का उपयोग कर सकूँ ।

इस समय भी परमेश्वर का मुझे तोडने का काम समाप्त नहीं हुआ है । पिछले कुछ वषा] में, परमेश्वर मुझे कुछ नयी और अद्‌भुत परीक्षाआें में से ले गए जिनका अनुभव मैने अपने जीवन में पहले कभी नहीं किया था । परंतु उनका उद्देश्य मेरे जीवन के लिए वही था कि मुझे और तोडे ताकि वह मुझमें अपना जीवन और अपना अधिकार और उंडेल सके ।

एक और तरीका है जिसके द्वारा परमेश्वर हमारी सामर्थ और घमंड को तोडते है और वह यह है कि हमारे अगुवों द्वारा वह हमें अनुशासित करते हैं । लगभग सभी विश्वासी अनुशासन को स्वीकार करने मे कठिनाई का अनुभव करते हैं । यहाँ तक कि दो साल के बच्चे के लिए भी अनुशासन या ताडना को स्वीकार करना कठिन होता है, विशेष कर के उस समय जब यह अनुशासन सबके सामने अमल मेंं लाया जा रहा हो तब ।

अन्य लोगों की उपस्थिति में पिछली बार आपने अनुशासन को आनंद के साथ कब स्वीकारा था ? Šया आपने अनुशासन को कम से कम एक बार भी अपने जीवन में स्वीकार किया है? यदि ऐसा नहीं है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि आपके पास आत्मिक अधिकार नहीं हैं ।

यदि कोई अगुवा जो प्रभु में आपके ऊपर नियुŠत किया है, आपको अनुशासित करे तो भी कोई बात नहीं भले ही उसका तरीका कठोर ही Šयों न हो । आप अपने आपको परमेश्वर के हाथों के नीचे अधीन करें, जिसने उसे अगुवे को आपके अनुशासन के लिए नियुŠत किया है, फिर चाहे आप निर्दोष ही Šयों न हो।

प्रभु यीशु को सब लोगों के सामने उसके विरोधियों द्वारा झूठे आरोप लगाकर अपमानित किया गया । फिर भी उन्होंने कोई शिकायत नहीं की, इस तरह उन्होने हमारे अनुसरण के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया ।

यदि परमेश्वर आपके किसी विरोधी को आपकी आलोचना करने की अनुमति देता है तो आप केवल अपने आप से यह पूछें कि कहीं उसकी आलोचना में कोई सच्चाई तो नहीं है । आपको केवल इतना ही करना है । वास्तव में देखा जाए तो वह आपका मुफ्त में चके अप करा रहा है । आप इस बात की चिंता न करें कि उसने इन सब बातों की स्कॅनिंग कहाँ से की और इस स्कॅनिंग के पीछे उसका Šया उद्देश्य हैं । Šयोंकि ये सब बातें जरूरी नहीं हैं । आपको केवल इतना करने की आवश्यकता है कि बस अपने आप से यह पूछे कि इस स्कॅनिंग के द्वारा आपके जीवन में Šया किसी ऐसी बात का पता लग पाया है जो मसीहकी पहचान पर आधारित न हो ।

मैने अपनां सेवकाई में यह देखा है कि लोग कई तरह से मेरे विषय में आलोचना करते है । मै यह भी जानता हूँ कि परमेश्वर के सच्चे दासों को हमेशा झूठे आरोप लगाकर बदनाम किया जाता है तथा उनकी आलोचना की जाती है । इसलिए मै आलोचना के कारण कतई परेशान नहीं होता, परंतु मै केवल प्रभु से इतना कहता हूँ कि वह मुझे बताये कि इन बातों में कहीं सच्चाई तो नहीं ।

अकसर हमारे विरोधी हमारे बारे में, हमारे दोस्तों की तुलना में कुछ ज्यादा ही सच बोलते हैं । इसलिए हमें सभी आलोचनाआें को झूठा नहीं कहना चाहिए।

मान लीजिए कि मेरे चेहरे पर एक काला दाग लगा है और मेरा कोई विरोधी इस काले दाग की ओर उंगली दिखाता है, तो मुझे उसे धन्यवाद देना चाहिए, Šयोंकि उसने मुझे वह बात दर्शायी है जो मैं अपने आप से शायद कभी नहीं जान पाता । मैं अब जाकर उस दाग को धो तो सकता हूँ । फिर चाहे मेरे विरोधी का ऐसा करने के पीछे उद्देश्य मेरा अपमान करने का भी Šयों न हो । अनजाने में उसने मेरी मदद ही तो की है, ताकि मैं अपने आपको ठीक कर सकूँ ।

यहूदा इस्करियोती और पतरस के बीच में यही एक बडा अंतर था। जब पतरस ने प्रभु को क्रूस की ओर जाने से रोकने की मूर्खता की तो प्रभु के कठोर शब्दों में उससे कहा, शैतान, मेरे पीछे से हट जा । प्रभु यीशु द्वारा किसी भी मनुष्य को दी गई डाँट में यह डाँट सबसे ज्यादा कठोर थी । यहाँ तक कि फरीसियों को भी उन्होंने केवल, साँप के बच्चे कहा था । परंतु पतरस को उन्होंने शैतान कहा । प्रभु यीशु उसे सबसे ज्यादा डाँटते है जिससे वे सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं । प्रभु यीशु जिनसे प्रेम करते है उनको डाँटते और ताडना देते हैं (प्रकाशित वाŠय 3:19) ।

उसके तुरंत बाद जब बहुत से शिष्य प्रभु यीशु की शिक्षाआें मे असहमत होकर उनसे दूर जा रहे थे, तब प्रभु यीशु ने अपने खास चेलों से कहा कि Šया वे भी उसे छोडकर जाना चाहते है, तब पतरस ही वह व्यŠत था जिसने तुरंत जबाब देकर कहा, हे, प्रभु, आपको छोडकर हम किसके पास जाएं, अनंतकाल के जीवन के बातें तो आप ही के पास है (यूहन्ना 6:60, 66-68) । पतरस ने कौनसी अनंत जीवन की बातें यीशु से सुनी थी? यही कि हे शैतान, मेरे पीछे से हट जा ।

Šया हम अनुशासन के शब्दों को उन वचनों के रूप में देखते है जो हमें अनंतकालिन जीवन की ओर ले जाते हैं ?

इस प्रकार से पतरस ने अनुशासन को स्वीकार किया जिसकी वजह से वह वो व्यŠत बन पाया जो वास्तव में उसे बनना था ।

एक और अवसर था जब पतरस को प्रभु की ओर से अनुशासित किया गया । पतरस ने प्रभु से अंतिम प्रभुभोज में कहा, हे प्रभु, यदि सारे शिष्य आपको छोड भी दे तो भी मै आपको कभी नहीं छोडूंगा । तभी प्रभुे ने तुरंत पतरस को जबाब दिया कि अगले बारह घंटों के अंदर तू मुझे तीन बार इन्कार करेगा । परंतु उस उत्तर से पतरस बेचैन नहीं हुआ। ऐसे ही व्यŠत को परमेश्वर ने अंत में चुनकर अपने प्रेरितों का अगुवा बनाया और पेंतिकुस्त के दिन अपना प्रतिनिधी बनाया ।

परंतु पतरस ने अपने आप को अनुशासन के द्वारा नम्र बनाया और इसलिए परमेश्वर ने उसे ऊँचा उठाया । अपने स्वयं के अनुभव के द्वारा सीखने के बाद पतरस अब हमे अपनी पहली पत्री के पाँचवे अध्याय के पाँचवे और छठें वचन में हमेशा नम्र होने के लिए कहता हैं । हम नम्र होने के द्वारा कुछ नहीं खोएंगे, परंतु एक दिन परमेश्वर हमे ऊँचा उठायेंगे ।

पतरस के अनुशासन की तुलना में यहूदा इस्करियोती की अनुशासन के प्रति विपरीत प्रतिक्रिया पर गौर करें । जब एक स्त्री ने प्रभु यीशु का अभिषेक एक कीमती इत्र से किया, तो यहूदा ने कहा, ये तो पैसों की बर्बादी है, इससे तो अच्छा यह होता कि इतने पैसे गरीबों मे ंबाँट दिये जाते (यूहन्ना 12:5, मत्ती 26:10-13)। प्रभु यीशु ने बडे प्यार से यहूदा को समझा कर कहा, कि उस स्त्री को जाने दो, Šयोंकि उसने एक अच्छा काम किया है । परंतु यहूदा को यह बात बुरी लगी ।

अगले ही वचन में (मत्ती 26:14), हम पढते है कि तब बारहों में से एक , जिसका नाम यहूदा इस्करियोती था मुख्य याजकों के पास गया और जाकर महायाजक के साथ मिल कर उसने प्रभु यीशु को पकडवाने की बात तय कर ली । इस बात का समय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । यहूदा इसलिए नाराज था, Šयोंकि प्रभु यीशु ने उसे सबके सामने अनुशासित किया था ।

जो कुछ प्रभु यीशु ने यहुदा से कहा था, वह केवल इतना ही था कि उस स्त्री के कार्य के प्रति उसकी जो प्रतिक्रिया थी, वह गलत थी । परंतु उसे क्रोध दिलाने के लिए इतना बहाना काफी था । यदि आप एक टूटे हुए व्यŠत नहीं है, तो छोटी सी बात भी आपको क्रोध दिला सकती हैं ।

परंतु यहूदा की प्रतिक्रिया का अनंतकालिन परिणाम भी देखिये । और साथ में पतरस के प्रतिक्रिया का भी अनंत कालिन प्रतिफल देखिए । दोनों का अनुशासन द्वारा परीक्षा ली गई, एक उसमें असफल रहा, तो दूसरा सफल हो गया।

आज, हम भी इसी रीति से परखे जाते है ।

यदि सब के सामने किया गया अनुशासन हमें चोट पहुँचाता है तो इसके द्वारा यह साबित होता है कि हम मनुष्यों द्वारा अपना आदर ढूॅंढ रहे हैं । यदि ऐसा है तो अच्छा है कि यह हम अभी जान ले, ताकि हम अपने आप को इस स्वार्थ की भावना से शुध्द कर सकें । परमेश्वर ने ऐसी परिस्थिति हमारे जीवन मे आने दी, यह शायद इसलिए ताकि वह हमे यह बता सके कि किस तरह हम मनुष्यों के विचारों के गुलाम है । अब हम अपने आप को शुध्द कर सकते है और स्वतंत्र रह सकते हैं ।

इसलिए अनुशासन के प्रति हर समय पतरस की प्रतिक्रिया रखें, फिर चाहे परमेश्वर हमें सीधे अपनी आत्मा के द्वारा अनुशासित करें या किसी और व्यŠत के माध्यम से । अनंतकालिन जीवन का यही मार्ग हमारे लिए है । यदि हम अपने आपको नम्र बनाएंगे तो हम परमेश्वर की ओर से अनुग्रह पायेगे, और उचित समय आने पर वह हमें अवश्य ऊँचा उठायेंगे ।

जो लोग टूटे हुए नहीं होते , वे अकसर अकेले ही होते है, वे अकेले अगुवे और अकेले विश्वासी होते है, वे किसी के अधीन नहीं होते । वे जहॉ जाना चाहते है, जाते है और जो जो करना चाहते है, करते हैं । ऐसे विश्वासी जो टूटे हुए न हो, वे केवल उन्ही के साथ काम कर पाते है जो उनकी आज्ञा मानते है और उनकी बातों को स्वीकार करते है । ऐसे कई विश्वासी है, जो तितलियों के समान एक फूल से दूसरे फूल पर फूदकते रहते है । ़वे एक कलीसिया से दूसरी कलीसिया में घूमते रहते है या एक संस्था से दूसरी संस्था में भटकते फिरते है । वे अपने जीवन को गँवाते है और बगैरे कुछ प्राप्त किये कैन की भाँति भटकने वाले बन जाते है, Šयोंकि कैन की तरह वे भी प्रभु के अनुशासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं (उत्पत्ति 4:12) ।

परमेश्वर आत्मिक अधिकार को किसी ऐसे व्यŠत के हाथों में नहीं सौप सकते जो टूटा हुआ न हो Šयोंकि वह एक देह को बनाने जा रहा है, न कि किसी विश्वासी के झुण्ड को ।

अध्याय 7
औरों के प्रति जिम्मेदारी

एक आत्मिक अगुवा अपने झुंड के लोगों की आत्मा के ऊपर निगरानी रखेगा, Šयोंकि एक दिन उसे परमेश्वर को उन सब का हिसाब उसे देना होगा (इब्रानियों 13:17) ।

मैने अपने सहकर्मियों से जो हमारे हिंदुस्तान की कलीसिया में है, कहा कि मै उनके लिए जिम्मेदार रहूँगा, Šयोंकि उन्होने मुझे अपने आत्मिक भाई के रूप में ग्रहण किया है । और इसलिए मैं उनकी भलाई किन बातों में है यह उन्हें बताता हूँ, फिर चाहे इसमें उन्हें बुरा ही Šयों न लगे । जैसे मैं अपने बच्चों से अपने घर मे कहता हूँ, वैसे ही इनसे भी कहता हूँ । प्रत्येक पासबान और अगुवा परमेश्वर के सामने उन सारे लोगों के लिए जिम्मेदार है जो उसके अधीन हैं ।

परमेश्वर अपने बच्चो को आत्मिक अगुवे देते है, ठीक उसी तरह जैसे घरों में वह बच्चो को पिता देते है । मै चार बेटों को पिता हूँ । जब मेरे लडके मेरे साथ घर में रहते थे, तो उन वर्षो के दौरान मै उनका मार्गदर्शन करता और बहुत सारी बातों में उन्हें सलाह देता था । उन्होने अपने आपको मेरी अधीनता में किया और मेरी आज्ञा का पालन किया । उस बात ने उन्हें कई खतरों से सुरक्षा दिलाई । अभी भी हालांकि वे बडे हो गए है, फिर भी मैं उन्हे समय असमय सलाह देता रहता हूँ, Šयोंकि मै उनका पिता हॅूं । इसी प्रकार हमें भी उन लोगाेें का आत्मिक पिता बनना है, जिन्हें परमेश्वर ने हमे दिया हैं ।

यदि आप आपके झुंड के लिए पिता के समान बनने को तैयार है तो परमेश्वर आपको भविष्यवाणी का शब्द देंगे । इससे पहे कि वह आपको उनके लिए एक उचित शब्द दे, आपको अपने झुंड को अपने दिल में रखकर परमेश्वर के सम्मुख उन्हें चलाना होगा । पौलुस के पास अपनी हर एक कलीसिया के लिए शब्द था, Šयोंकि वह उन्हें अपने दिल में लिए चलता था और जैसा फिलिप्पियों 1:7 में वह कहता है वह उनके लिए प्रार्थना करता था । यदि आप अपने दिल में आपके झुंड के लिए इस प्रकार की चिन्ता और बोझ नहीं रखते तो आप केवल एक व्यवसायिक पासबान होंगे जो केवल वेतन के लिए काम करता हो ।

लोगों की आत्माआें के लिए हिसाब देना ? इसका Šया अर्थ है? हिसाब यह एक आर्थिक शब्द हैं । यदि आप बहीखाता तैयार कर रहे है और पन्ने की बायी ओर आपने पाँच हजार रूपये की आमदनी लिखी हो और दायी ओर चार हजार नौ सौ निन्नानवें खर्च बताया हो तो हिसाब में कुछ गडबड जरूर हैं । आपको उस एक रूपये का भी हिसाब देना होगा, Šयोंकि हिसाबकिताब एकदम सही होना चाहिए । परमेश्वर को हिसाब देना, अर्थात यह जानना है कि आत्मिक रीति से आपके झुंड में Šया हो रहा हैं । आपको यह बात बहुत ही गंभीरता से लेनी होगी, Šयोंकि आत्मिक अगुवाई यह एक बडी जिम्मेदारी का काम है, किसी अस्पताल में चल रहे पेचीदा शल्यक्रिया की तुलना में यह कई गुना अधिक महत्वपूर्ण हैं । जिंदगियाँ अनंतकाल के लिए खतरे में रहती हैं ।

आप अपनी कलीसिया के विश्वासियों के लिए जिम्मेदार हैं । आप उन्हें आत्मिक नहीं बना सकते, परंतु आपको हर तरह यह प्रयास करना चाहिए जिससे कि वे परमेश्वर के साथ व्यŠतगत संबंध स्थापित कर सकें । आपका ध्येय यह होना चाहिए कि आप मसीह में उन सबको मसीह में सिध्द करके उपस्थित करे (कलुस्सियों 1:28) । आप उन्हें विश्वास से पीछे हटने के लिए रोक तो नहीं सकते, परंतु विश्वास से पीछे हटने से पहले आप उन्हें चेतावनी जरूर दे सकते है ।

एक बार हमारी कलीसिया का एक जवान भाई अपने विश्वास से पीछे हट गया, इसका मुझे बहुत दु:ख हुगा । मैने परमेश्वर से पूछा कि ऐसा Šयों हुआ, कहीं मुझ में कोई कमी तो नहीं रह गई, उसके जीवन में हो रही बातों के प्रति मै गैरजिम्मेदार तो नहीं था ? Šया कोई चेतावनी या प्रोत्साहन का शब्द जो मुझे उसे देना चाहिए था जो मैं नहीं दे पाया ? इस तरह से मैने अपने आपको जाँचा और परखा Šयोंकि उस जवान भाई के प्रति परमेश्वर की नजरों में मै जिम्मेदार था ।

जब भी कोई व्यŠत जो हमारे अधीन हो हमसे दूर चला जाए तो हमें हर वŠत अपने आपको जाँचना चाहिए । हमें अपने आपको दोषी नहीं मानना चाहिए, परंतु हमेशा परमेश्वर से पूछना चाहिए, यदि वह इस विषय में हमसे कुछ कहना चाहता हो । शैतान को हमारे जीवन मे दोष की भावना लाने की इजाजत मत दीजिए । परंतु हमें अपनी गलतियों से सबक सिखना चाहिए जिससे हम भविष्य में ना दोहराए ।

परमेश्वर हमें वह सब बातें बताते है जो शायद हम अपनी बुध्दि से न समझ सके । यदि हम परमेश्वर की वाणी के प्रति जागरूक रहे तो वह पहले से ही हमे उन लोगों के प्रति जो भविष्य मे विश्वास से पीछे हटने पर हो, सावधान करेंगे । हो सकता है किसी दिन बगैर किसी खास वजह के, वह हमें किसी से जाकर मिलने को कहेंगे । इस तरह के कई अनुभव मेरे जीवन मं है । अकसर मुझे यह पता नहीं होता कि मुझे Šयों किसी व्यŠत से मिलने जाना है, Šयोंकि परमेश्वर किसी के पाप या उनकी समस्या के विषय में पहले की जानकारी रखकर अपने मस्तिष्क को दुषित करने की मेरी इच्छा नहीं) । फिर परमेश्वर मुझे उस भाई से कुछ कहने को प्रेरित करते है जिससे शायद उसे मदद मिले, बगैर मेरे यह जाने कि उसकी समस्या Šया थी । और अकसर मुझे यह पता भी नहीं चल पाता कि मैने उसकी सहायता की ।

यदि परमेश्वर की वाणी सुनने की हमारी आदत है तो वह हमारी परिस्थितियों को अपने हाथ में लेंगे ताकि हम औरों से मिलकर उनसे उनकी जरूरतों के अनुसार बात कर सके जिससे उनकी सहायता हो ।

प्रभु यीशु भी उसी प्रकार जीते थे, प्रभु यहोवा ने मुझे शिष्य की जीभ दी है कि मै थकितो को अपने वचन से संभालना जानूं ।

प्रतिदिन भोर को वह मुझे जगाते और मेरा कान खोलते है कि मै शिष्य के समान सुनूं (यशायाह 50:4) । हर दिन पिता उससे कुछ कहते और थके हुआें को प्रोत्साहित करने के लिए शब्द देते । इसी प्रकार का अगुवा हम सब को बनना चाहिए ।

जब मै नौसेना में था, तो जहाजों में जिस प्रकार की डयुटी होती थी उसे निगरानी कहते थे । ये चारचार घंटों की होती थी, जिसमें एक अफसर निगरानी रखता था और जहाज में हो रही सारी घटनाआें के लिए जिम्मेदार होता था । यदि मै समुद्र में आधी रात से सुबह चार बजे तक पहरे पर होता, तो मुझे पुल पर खडे होकर दो या तीन नाविकों के साथ निगरानी करनी पडती थी । जहाज में बाकी के सब उस समय नींद में होते । सब मुझे यह देखना होता कि कहीं कोई दूसरा जहाज हमारे मार्ग से गुजर तो नहीं रहा और हमारा जहाज सही दिशा में जा रहा है या नहीं ।

तेज हवा और लहरों की वजह से मुझे दिशा बदलनी होती थी । जहाज की सुरक्षा और उसकी दिशा यह सब उन चार घंटों के दौरान मेरी जिम्मेदारी होती थी । मै अपनी निगरानी के समय एक मिनट के लिए भी सो नहीं सकता था ।

इसलिए यदि बाइबल हमें औरों पर निगरानी रखने को कहती है, तो यह बहुत ही गंभीर बात है । यह अगुवे के जीवन में चौकसी की माँग करती है कि वह औरों के जीवन की निगरानी कर सके, ताकि उसे इस बात की चिन्ता हो कि वे अपने मार्ग से न भटके और न ही खो जाए ।

प्रत्येक अच्छे अस्पताल में डॉŠटरों की प्रतिदिन की पारियाँ होती है, जिससे कि वे मरीजों की हालत पर निगरानी रख सके । ये डॉŠटर सामूहिक रूप से वार्डो में मरीजों के ऊपर नजर नहीं डालते, परंतु प्रत्येक मरीज के पास जाकर उसे जाँचते है ।

परंतु कई एक पासबान Šया करते है? वे इतवार को कलीसिया में सामुहिक रूप से अपने सदस्यों पर नजर घूमाते है और मान लेते है कि वे सब आत्मिक रीति से ठीक हैं ।

कलीसियाआें और अस्पतालों में बहुत से ऐसे लोग होते है जो बाहरी रूप से स्वस्थ नजर आते है, परंतु अंदर बहुत बीमार होते है । कुछ जो बाहर से बहुत स्वस्थ नजर आते है, हो सकता है कि अंदर से उन्हें केन्सर हो, जो उनके शरीर के अंदरूनी भाग को खोखला कर रहा हो । ऐसा भी हो सकता है कि जो लोग आपकी कलीसिया में बहुत खुश नजर आते है और जोर से ताली बजाकर हालेलुय्याह कहते है, उनके पारिवारिक जीवन में गंभीर समस्याएँ हो ।

जैसा अस्पताल में डॉŠटर प्रत्येक रोगी को व्यŠतगत रीति से जाँचता है वैसे ही एक आत्मिक अगुवे को प्रत्येक सदस्य को व्यŠतगत रीति से जॉचना चाहिए, उसकी देखभाल करनी चाहिए ।

बाइबल भी चरवाहों से कहती है कि वे अपने अपने झुंड को हालत अच्छे से जाने (नीति 27:23) ।

जब कलीसिया के सदस्यों की संख्या बढने लगती है तो एक अगुवे के पास अपने सदस्यों की उचित देखभाल करने का एक मात्र तरीका यही है कि वह अन्य विश्वासयोग्य व्यŠतयों को, जिन्हे इस काम का प्रशिक्षण मिला है, इस काम के लिए जिम्मेदारियॉं बाँटे ।

किसी भी एक व्यŠत के लिए यह असंभव है कि वह एक बहुत बडी संख्या की व्यŠतगत रीति से देखभाल कर सके । मेरा यह व्यŠतगत मानना है कि बारह लोगों की संख्या बिलकुल ठीक है, Šयोंकि प्रभु यीशु ने भी इतने ही शिष्यों की देखभाल की । कोई भी डॉŠटर अकेला ढेर सारे वार्डो में जाकर मरीजों की जाँच नहीं कर सकता, फिर चाहे वह कितना भी अच्छा डॉŠटर Šयों न हो । हम सब की अपनी सीमित शारीरिक क्षमताएँ होती हैं ।

जिनके पास प्रेरितों की सेवा है और जिनके ऊपर ढेर सारी कलीसियाआें की जिम्मेदारी है उन्हें अपनी कलीसिया के प्राचीनों का पूरा ध्यान रखना होगा । यदि प्राचीन लोग आत्मिक होंगे तो ही उनकी कलीसियाएं आत्मिक होगी ।

दु:ख की बात यह है कि कई पासबान और प्राचीन ऐसे होते है मानो प्रायवेट अस्पताल के डॉŠटर जो केवल मरीजों को जाँचकर उनकी दवा का परचा लिखकर दे देते है और उन्हे भेज देते है । फिर चाहे वे जी रहे है या मर चुकें इस बात का उनको पता नहीं होता ।

आत्मिक अगुवा अपनी कलीसिया के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी बडी गंभीरता से ग्रहण करता हैं ।

अध्याय 8
जीवन के द्वारा सेवाटहल

आत्मिक अगुवा औरों की सेवाटहल अपने जीवन से करता है, न कि अपनी बुध्दि से ।

पुरानी वाचा के अनुसार परमेश्वर उन लोगों का भी उपयोग करता था जिनका नैतिक जीवन साफसुथरा न था। शिमशोन जब पाप ही में जीवन व्यतीत कर रहा था तब उसने इस्त्राएलियों को छुडाया । जब उसने व्यभिचार किया तब भी परमेश्वर के पवित्र आत्मा ने उसे फिर भी नहीं छोडा । परमेशवर के अभिषेक ने उसे केवल उस वŠत छोडा जब उसने परमेश्वर के साथ बॉंधी गई वाचा को तोडा और अपने बाल काटे । दाऊद की बहुत सी पत्नियाँ थी, परमेश्वर का अभिषेक उस पर बना रहा और उसने यहाँ तक कि परमेश्वर के वचनों को भी लिखा ।

परंतु नयी वाचा के अनुसार सेवा बिलकुल ही भिन्न है । 2 कुरिन्थियों 3 पुरानी वाचा और नये वाचा की सेवा के भेद को बताता है । दोनों के बीच का भेद केवल इतना ही है कि पुराने वाचा के अनुसार याजकगण व्यवस्था का ध्यानपूर्वक अध्ययन करके लोगों को परमेश्वर के वचनों के बारे में सिखाते थे । परंतु नये वाचा के अनुसार हम प्रभु यीशु का अनुसरण करते है जिन्होने अपने जीवन से और परमेश्वर के साथ उनका जो रिश्ता था उसके द्वारा हम से परमेश्वर के वचन कहे । अपने जीवन के द्वारा प्रचार करना और अपनी बुध्दि से प्रचार करना इन दोनों बातों में बहुत अंतर है ।

यदि भारत में अधिकतर विश्वासियों के जीवन में गहराई की कमी हो तो इसकी वजह यह है कि उनके अगुवों के जीवन में भी गहराई की कमी है । लोगों के जीवन शारीरिक दशा में है, Šयोंकि उनके अगुवों का जीवन भी, अपने विचारों में, अपनी पत्नीबच्चे तथा सहकर्मियों के साथ संबंधों में भी शारीरिक है । ऐसे अगुवों की सेवकाई केवल एक टूटीफूटी सी अवस्था है । यह एक पुराने वाचा की सेवा है ।

यदि कोई भी प्रचारक केवल जानकारियाँ बाँटता है तो वह पुराने वाचा का प्रचारक है । हो सकता है कि उसकी दी गई सभी जानकारी सही हो, परंतु यदि वह अपने जीवन से प्रचार नहीं कर रहा हो तो वह नई वाचा का सेवक नही है । पुरानी वाचा अक्षरों की वाचा थी, परंतु नई वाचा जीवन की वाचा है । शब्द तो मारते है, परंतु आत्मा जीवन देता है । पुरानी वाचा में परमेश्वर ने हमें पालन करने के लिए व्यवस्था दी, परंतु नई वाचा परमेश्वर ने हमें प्रभु यीशु मसीह में एक आदेश के रूप में दी । उसका जीवन मनुष्य की ज्योति है । यह ज्योति आज कोई तत्व या शिक्षा नहीं, परंतु स्वयं प्रभु यीशु का जीवन हमारे द्वारा प्रगट हुआ है । इसको छोड जो कुछ भी है वह अंधकार है, फिर चाहे वह सुसमाचारीय तत्व ही Šयों न हो ।

पुराने नियम में परमेश्वर की लिखित व्यवस्था ज्योति थी, जैसा कि हम भजन संहिता 119 : 105 में पढते है कि तेरा वचन मेरे पाँव के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए उजियाला है । परंतु जब वचन देहधारी हुआ और प्रभु यीशु मसीह स्वयं जगत की ज्योति बना (युहन्ना 1:4) । उनमें जीवन था और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था। परंतु प्रभु यीशु मसीह ने अपने शिष्यों से कहा कि उनका जीवन जगत की ज्योति केवल तब तक हो सकता है जब तक कि वह इस संसार में है (युहन्ना 9 : 5) । अब Šयोंकि वह स्वर्ग में जा चुके है, इसलिए उन्होंने हमे जगत की ज्योति होने के लिए इस संसार में छोड दिया है (मत्ती 5 :14) । इसलिए हमारी जिम्मेदारी बहुत बडी है कि हम अपने जीवन के द्वारा उस ज्योति को फैलाएँ ।

एक कलीसिया अपने आप में उसका अगुवा बन जाती है । प्रकाशितवाŠय 2 और 3 में हम देखते है कि सात में से सभी कलीसिया को परमेश्वर ने वही संदेश कहा जो उन्होंने उनके दूतों से कहा था। प्रत्येक संदेशों का अंत इसी वाŠय के साथ समाप्त हुआ कि आत्मा उस कलीसिया से वही बात कह रहा था । जहाँ पाँच दूत (प्राचीन) शारीरिक थे, उनकी कलीसियाएँ भी शारीरिक थी और जहाँ दो दूत आत्मिक थे, उनकी कलीसिया भी आत्मिक थी । लौदिकीया का दूत गुनगुना था इसलिए उसकी कलीसिया भी वैसी ही थी। फिलेदिलफिया का दूत विश्वासयोग्य था इसलिए उसकी कलीसिया भी वैसी ही थी ।

उत्पत्ति 1मे एक वाŠय बारबार दोहराया गया है, वह है अपनी जातिजाति के अनुसार । हम यहाँ पढते है कि फलों के पेड अपनी जाति के अनुसार फल लाते, पौधे अपनी जाति के अनुसार और बनैले पशु और रेंगनेवाले जीव अपनी अपनी जाति के अनुसार जीवों को उत्पन्न करते है (वचन 11,12, 21,25) । इस सृष्टि में हर प्राणी या पेड अपनी ही समानता में प्रजनन करता है ।

परमेश्वर ने आदम को अपनी समानता में बनाया (उत्पत्ति 5:1) । परंतु आदम ने अपने ही समान पुत्र को जन्म दिया (वचन 3) । वह परमेश्वर की समानता से संतान उत्पन्न नहीं कर सका । वह केवल अपनी समानता में पुत्र को जन्म दे सका ।

आत्मिक रीति से भी, हम सब अपनी अपनी पहचान और स्वरूप के अनुसार ही आत्मिक बच्चे उत्पन्न करते है । यदि हम बुध्दिजीवी है, तो हम अपनी सेवाआें द्वारा बुध्दिजीवियों को ही उत्पन्न करेंगे । यदि हम हताश है तो हम हताश लोगों को ही उत्पन्न करेंगे, यदि हम अहंकारी है, तो हम केवल घमंडी और अहंकारियों को उत्पन्न करेंगे । ़दूसरी तरफ यदि हमारे पास सेवक की आत्मा है, तो हमारे आत्मिक बच्चों के पास भी सेवक की आत्मा ही होगी ।

हालांकि यह संभव है, कि शायद कोई भाई अपने अगुवे के अधिकार से निकल कर स्वयं ही परमेश्वर को खोजे और अपने अगुवे के शारीरिक होते हुए भी आत्मिक बन जाएँ। परंतु ऐसा कभीकभार ही होता है । आमतौर पर अधिकतर विश्वासी लोग भेडों के समान होते है जो आँख बंद करके अपने अगुवे का जहाँ जहाँ वह जाता है वहाँ वहाँ अनुसरण करते है । जैसा प्रचारक वैसे लोग । और जब अगुवा और भेडें दोनों ही अंधे होते है, तो वे दोनों भी गड्‌ढे में जा गिरते है ।

याद रहे कि विश्वासी लोग कलीसिया से बाहर जाकर अपने ही स्वरूप में औरों को भी उत्पन्न करेंगे । इसीलिए आपके अपने स्वरूप के अनुसार ही नातीपाेेती भी होंगे ! इसलिए बेहतर यही है कि आप सावधानी बरतें कि आप किस प्रकार बच्चे उत्पन्न करने जा रहे है, Šयोंकि यह प्रक्रिया प्रभु यीशु के दुबारा आने तक चलती रहेगी ।

इसलिए शुरूवात में ही यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम इस बात का ध्यान रखें कि कलीसिया में हम शिष्य बनाने जा रहे है, न कि धर्मांतरित लोग । ऐसा करने के लिए आपको स्वयं एक शिष्य बनना होगा । आपके पास ऐसा जीवन होना चाहिए जो आप औरों के साथ बाँट सके।

धर्मांतरिक लोग बाहर जाकर औरों को भी धर्मांतरिक करेंगे। यह सब धर्मांतरित लोग उध्दार का संदेश तो समझ जायेंगे, परंतु प्रभु के पीछे चलने की उनकी कोई इच्छा नहीं होगी । उनके पास ज्ञान तो होगा, परंतु जीवन नहीं होगा। यदि आप शिष्य बनायेंगे तो वे भी जाकर औरों को शिष्य बनाएंगे। इसलिए जीवन दूसरों तक पहुॅंचाना ही मूल आवश्यकता है ।

पुराने नियम में जो वाचा का तंबू था वह कलीसिया की तस्वीर थी। जैसा कि आप जानते है कि उस वाचा के तंबू के तीन भाग थे, पहला बाहरी आंगन, दूसरापवित्र स्थान, तीसरा महापवित्र स्थान, (जहाँ परमेश्वर निवास करते थे) । वे लोग जो बाहरी आंगन में है वे कलीसिया के उन विश्वासियों का प्रतीक है जिनके केवल पाप क्षमा हो चुके है, और उन्होंने कलीसिया में कोई जिम्मेदारी नहीं ली है । वे सभाआें में आते है,संदेश सुनते है, भेंट चढाते है, रोटी तोडते है और घर चले जाते है । जो लोग पवित्र स्थान में है, वे लोग उनके समान है जो कलीसिया में किसी न कसी प्रकार से सेवा करने के इच्छुक है, जैसे लेवी दीया जलाकर वेदी पर धूप जलाते थे । परंतु वे जो महापवित्र स्थान में है वे लोग नई वाचा में प्रवेश करके परमेश्वर को खोजते है और अन्य शिष्यों के साथ एक शरीर में कलीसिया के रूप में बंध जाते है । वे अपने जीवन के द्वारा सेवा करते है, और सच्ची कलीसिया को बनाते है, एक ऐसी सक्रीय कलीसिया जो शैतान से युध्द करती है और मसीह की देह को शुध्द करती है । कई कलीसियाआें में यह सब बाते नहीं होती ।

सभी कलीसियाआें में चाहे सबसे बेहतरीन, या चाहे सबसे साधारण कलीसिया हो, वे जो बाहरी आंॅगन में बैठते है वे सब एक समान ही होंगेअर्थात्‌ अधूरे मनवाले, संसारिक, स्वार्थी, पैसों के लोभी और अभिलाषी । परंतु एक अच्छी कलीसिया में अच्छे मजबूत अगुवे होंगे जो आत्मिक है और जो कलीसिया की रीढ होंगे। ये अगुवे निर्णय लेते है कि उनकी कलीसिया को किस दिशा में जाना हैं।

मुख्य अगुवों का झुंड अधिकतर ऐसे दो लोगों से शुरू होता है जो मिलकर एक हो गये हों । परमेश्वर उनके साथ होंगे और उनका झुंड संख्या में और एकता में बढने लगेगा । मानवीय शरीर भी दो अलग असमान अंगों के साथ मिलकर बनता है जो माता के गर्भ के समान होता है । जैसे ही गर्भ बडा होने लगता है कोशिकाएं एक दूसरे के साथ जुडी रहती है । परंतु कभी किसी समय यदि वे अलगअलग हो जाएं तो गर्भ में पल रही नन्ही सी जान का अंत हो जाता है ।

स्थानीय कलीसिया मसीह के देह के रूप में इसी तरह बदलती है । यदि मुख्य अगुवों का झुंड टूट जाए, तो वह सच्ची कलीसिया का अंत समझा जाता है, फिर चाहे बाहरी ढॉंचा एक संस्था के रूप में Šयों न बना रहे ।

नये नियम में इब्रानियों की पुत्री एक ऐसी पुस्तक है जो पुराने और नये वाचा के फर्क को दर्शाती है । दुर्भाग्य से कई मसीहों के लिए इब्रानियों की पुत्री उनकी प्रिय पुस्तक नहीं है । रोमियों, इफिसियों, फिलिप्पियों, ये सब पत्रियों तो उनहें पसंद है, परंतु इब्रानियों नहीं । वह इसीलिए कि इब्रानियो की पुस्तक मांस से भरी हुई है, ना कि दूध से, और कई एक विश्वासी ऐसे हे जिनके दाँत भी नहीं निकले है । वे अभी भी नवजात शिशु के समान है । इब्रानियों का सबसे पहला वाŠय यह कहता है कि बीते समयों में परमेश्वर ने भविषयवŠताआें द्वारा हमसे बातें की, परंतु इस समय हमसे उसने अपने पुत्र के द्वारा बाते की। पुरानी वाचा केवल परमेश्वर की आज्ञाआें को पहुँचाने के लिए थी। परंतु नई वाचा एक जीवन की वाचा है जो हमे परमेश्वर ने अपने पुत्र द्वारा दी है ।

इसीलिए पिता ने प्रभु यीशु को इस पृथ्वी पर एक नवजात शिशु के रूप में भेजा। यह शायद परमेश्वर के लिए कठिन होता कि वह प्रभु यीशु को पृथ्वी पर एक बडे आदमी के रूप में भेजे । परंतु वह एक बालक के रूप में आये ताकि वह भी उन सब बातों का अनुभव कर सके जिनका अनुभव हम करते है, और उन सारी परीक्षाआें का सामना कर सकें जिन्हें हम बचपन से करते आ रहे है ।

परंतु अधिकतर मसीही लोग प्रभु यीशु मसीह के बारे में केवल उनकी साढे तीन वर्ष को सेवा और कलवरी की मृत्यु के विषय मे ही सोचते है । मुझे लगता है कि लगभग निनानवे प्रतिशत विश्वासी प्रभु यीशु मसीह के सेवापूर्व तीस वर्षो के विषय में कभी नहीं सोचते है जो उन्होंने नासरत में बिताए। वे केवल उनके जन्म के विषय में सोचते है जिसे वे हर साल मनाते है । वे उनकी मृत्यु और पुनरूत्थान के विषय में सोचते है । वह भी हर साल मनाया जाता है । और वे उनके आश्चर्यकर्म के विषय में सोचते है ।

शायद ही कोई प्रभु यीशु मसीह के जीवन के मुख्य भाग के बारे में सोचता हो । उनकी सेवा उनके पृथ्वी पर के जीवन का केवल दसवाँ भाग थी, अर्थात्‌ साढे तैतीस वर्षो में से साढे तीन वर्ष । और उनका जन्म और मृत्यु, केवल एक एक दिन की घटना थी। उनके जीवन का मुख्य भाग वे तीस वर्ष थे जो उन्होंने नासरत में बिताए थे। उनकी संपूर्ण सेवकाई उन तीस वषा] पर आधारित थी । उन उपदेशों को तैयार करने के लिए जिन्हें उन्होने अपनी सेवकाई के दौरान प्रचार किया, उन्हें तीस वर्ष लगे। उन्होंने पहाडी उपदेश को उस प्रकार प्रचार नहीं किया जैसे वर्तमान समय के प्रचारक करते है । वे यहाँ वहाँ की पुस्तके पढते है, डिŠशनरियँा और कॉन्करडन्सेस खोजते है, एक ही अक्षर से शुरू होने वाले तीन मुद्दे अच्छी तरह अपनी डायरी में लिखते है और अपने संदेश तैयार करते है । नहीं । वह संदेश तो उनके जीवन पर आधारित थाा, जिसे तैयार करने के लिए उन्हें तीस वर्ष लगे। इसलिए वे इतने सामर्थी थे और लोग उस अधिकार से अचंभित होते थे, जिसके साथ प्रभु यीशु बोलते थे । (मत्ती 7:28,29) ।

पुरानी वाचा के दिनों में हम पढते है कि परमेश्वर ने यिर्मयाह से कुछ विशेष दिनों में ही बात की। यिर्मयाह भविष्यद्वŠता ने अपने लेखक को वह सब बातें कही जो परमेश्वर ने उससे कही थी। और बारूक ने यिर्मयाह के द्वारा कही हुई सारी बातें लिख ली । उसी प्रकार परमेश्वर ने यहेजकेल के साथ भी कुछ विशेष दिनों में ही बात की, और बताया कि यहूदा के लोगों से जाकर Šया कहना है । और यहेजकेल ने वैसा ही लोगों से जाकर कहा । यह सब अच्छा था। यदि इस प्रकार का प्रचार भी हमारे बीच में होता रहता तो यह अच्छा होता।

परंतु नये वाचा की सेवा इससे भी बेहतर है । परमेश्वर ने प्रभु यीशु से गिने चुने विशेष दिनों में ही बातें नहीं की, जैसे पुराने नियम के भविष्यवŠताआें के साथ की थी। प्रति दिन परमेश्वर प्रभु यीशु से बात करते और प्रति दिन प्रभु यीशु भी अपने जीवन के द्वारा लोगों से बात करते थे। उनकी सेवा उनके जीवन से बहती थी। बहती हुई जीवन के जल की नदी का यही अर्थ है, जो हमारे भीतरी भाग से बहती है । Šयोंकि मै अपनी इच्छा नही, वरन्‌ अपने भेजनेवाले की इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ग से उतरा हूँ (यूहन्ना 7 : 38) ।

इन सब बातों के प्रकाश मे, अपने आप से यह पूछना उचित है कि हम अपनी कलीसिया में नई वाचा के शिष्य तैयार कर रहे है या पुराने वाचा के बदले हुए लोग । इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप नई वाचा के सेवक है या पुरानी वाचा के ।

पुराने नियम का भविष्यवŠता केवल एक संदेशवाहक था। संदेश पहुँचाने के लिए जो बात जरूरी है वह है अच्छी स्मरणशŠत । परंतु नये वाचा में परमेश्वर ने हमें औरों तक पहुँचाने के लिए कोई संदेश नहीं दिया, परंतु अपना जीवन दिया। इसलिए जिस बात की आवश्यकता है वह एक अच्छी स्मरण शŠत नहीं, परंतु एक अच्छा जीवन अर्थात्‌ ईश्वरीय जीवन है ।

मै आपको दोनों का फर्क समझाता हूँ । यदि आप नल से थोडा पानी इकट्‌ठा करें, अर्थात्‌ परमेश्वर से संदेश पाते है और उसे उण्डेलते है तो यह एक पुराने वाचा की सेवकाई की तस्वीर होगी । फिर जाकर आप उसी नल से थोडा और पानी इकट्‌ठा करके लाते है, अर्थात्‌ परमेश्वर से संदेश पाते है और उण्डेल देते है ।

परंतु नए नियम के अनुसार प्रभु यीशु का स्वयं के जीवन का जल हमारे अंदर दिया गया है । और वह लगातार हमारे जीवन के द्वारा बहता रहता है । इसलिए संदेश पाने के लिए हमें बार बार परमेश्वर के पास जाते रहने की आवश्यकता नहीं । वह हमें एक संदेश देनेवाला बनाते है । हमारा जीवन ही एक संदेश है जिसे हम अपने जीवन से प्रचार करते है ।

बहुतों के पास उण्डेलने की सेवा होती है । कुछ लोगों के पास जब वे उण्डेलते है तो देने के लिए कुछ भी नहीं होता, जब कि औरों के पास देने के लिए कुछ होता है । दोनों भी प्रकार के लोग उण्डेलते जाते हे और अंत में दोनों सुख जाते है ।

परंतु प्रभु यीशु ने सामरी स्त्री से कहा कि वह उसके अंदर अनंतकालिन जीवन का झरना उण्डेलेगा जो निरंतर उसमें से होकर बहता रहेगा । अनंत कालिन जीवन का अर्थ है कि परमेश्वर के स्वयं का जीवन।

यही वह जीवन के जल की धारा है जिसे परमेश्वर चाहते है कि हमारे भीतर से निरंतर बहती रहे और न ही कोई संदेश। नई वाचा की सेवा यही है ।

अध्याय 9
परमेश्वर की सामर्थ द्वारा सेवकाई

एक आत्मिक अगुवा जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर की इच्छा से करता है परमेश्वर के द्वारा, तथा परमेश्वर की महिमा के लिए करता है । इसलिए उसके कार्य अंतिम आग के द्वारा परखे जायेंगे, जैसे सोनाचांदी और कोमती पत्थर। और यदि कोई इस नीव पर सोना, चांदी, बहुमूल्य पत्थर, काठ या घास या फूस का रद्दा रखें, तो हर एक का काम प्रकट हो जाएगा, Šयोंकि वह दिन उसे बताएगा, इसलिए कि आग के साथ प्रकट होगा, और वह आग हर एक का काम परखेगी कि कैसा है (1कुरिंथियो 3:12-15)।

2 कुरिंथियों 3:5,6 मे ंपौलुस कहता है कि जब तक कि परमेश्वर हमे तैयार न करे, और प्रशिक्षित न करे तब तक हम नई वाचा के सेवक कभी नहीं बन पायेंगे। Šयोंकि आत्मिक अगुवा परमेश्वर की दी हुई योग्यता के द्वारा सेवा करता है । इसलिए वह अपने परिश्रम के लिए स्वयं को श्रेय नहीं दे सकता ।

यदि सचमुच में परमेश्वर का जीवन हमारे द्वारा बह रहा है और औरों को आशीषित कर रहा है, तो हम अपने लिए इस बात का श्रेय नहीं ले सकते, Šयोंकि हमने जिस चीज को उत्पन्न नही किया उस बात का श्रेय हम नहीं ले सकते ।

उदाहरण के तौर पर, यदि मै केक लाऊँ जो किसी और ने बनाया हो और मै सबके बीच में बाँट दूँ और सब उसे बेहद पसंद करे और यह कहे कि भाई जैक, यह केक तो बहुत ही बढिया है तो मै इस बात पर जरा भी घमंड नहीं कर सकता Šयोंकि इसे मैने नहीं बनाया। मै तो केवल उसे बाँट रहा था जिसे किसी और ने बनाया था। परंतु यदि मैने स्वयं उसे बनाया होता तो जरूर घमंड करता यह सोचकर कि मैने एक बहुत अच्छा कार्य किया । परंतु दूसरे के द्वारा किए हुए काम पर मै अपनी मोहर कैसे लगा सकता हूँ ।

यह एक तरीका हे जिससे हम जान सके कि जो सेवा हम औरों तक पहुँचा रहे है वह परमेश्वर ने हमारे अंदर आरम्भ की है या स्वयं हमने । Šया हम अपनी सेवकाई के विषय में घमंड करते है जैसा कि केक बनाने के विषय में ? हो सकता है हमने उस सेवकाई को आरम्भ किया हो । परमेश्वर का उससे कोई लेना देना न हो । यदि परमेश्वर ने उसे आरम्भ किया या केक बनाया तो उसके विषय में हम घमंड नहीं कर सकते ।

Šया आप सोचते है कि प्रभु यीशु मसीह के शिष्य उन मछलियों और रोटियों के विषय में घमंड कर सकते थे जो उन्होंने केवल भीड के साथ बाँटी थी? नहीं ! न ही वह लडका जिसने प्रभु यीशु मसीह को अपना भोजन दिया, इस बात के लिए स्वयं को श्रेय नहीं दे सकता था । शिष्यों ने केवल वही बाँटा जिसे प्रभु यीशु मसीह को दिया गया, वह भी इस बात के लिए स्वयं को श्रेय नही दे सकते थे । शिष्यों ने केवल वही बाँटा जिसे प्रभु यीशु ने उन्हें दिया था ।

परमेश्वर की स्तुति हो कि हमे केवल बाँटने का काम मिला है न कि उत्पन्न करने का । इसीलिए हम निरंतर निश्चिंत रह सकते है । परेशानियाँ हमारे जीवन में केवल तभी आती है जब हमें कुछ आरम्भ करना होता है, न कि बाँटना। यह सच है कि बाँटने के कार्य में हम थक सकते है, परंतु इसमें कोई परेशानी नहीं होती। हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से होती है । हम जानते है कि हम कोई भी अच्छी वस्तु उत्पन्न नहीं कर सकते, इसलिए हम उसकी कोशिश भी नहीं करते।

याद रहे कि हम जो कुछ भी अपने जीवन में परमेश्वर के पवित्र आत्मा के मदद के बगैर प्राप्त करते है, वह केवल मानवीय ही है और उसका अनंतकालिन मूल्य नहीं है । अपना प्रचार करके आप बहुत कुछ बगैर प्रार्थना के, बगैर परमेश्वर की मदद माँग लो, बगैर परमेश्वर के, पवित्र आत्मा के सामर्थ से बहुत कुछ प्राप्त भी कर लो, और चाहे आपके पास बडी मानवीय योग्यताएं हो और जिनसे आप बडेबडे कार्य भी कर पाते हो, परंतु फिर भी एक दिन आयेगा जब आप जानेंगे कि आपके वे सब महान कार्य परमेश्वर की दृष्टि में घासफूँस और लकडियों के समान ही थे।

आपके अपने विषय में हो सकता है ऐसा सोचते है कि आप एक बहुत अच्छे प्रचारक है Šयोंकि आप लोगों की भावनाआें को उत्तेजित कर सकते है । परंतु देखे कि किस प्रकार आधुनिक पश्चिमी संगीत लोगों को उत्तेजित करता है । किसी भी प्रचारक की तुलना में पश्चिमी संगीत लोगों को उत्तेजित कर सकता है । परंतु यह सब खाली एक झूठी भावनाएँ होती है ।

हो सकता हे कि आप एक महान बुध्दिजीवी है, जब आप प्रचार करते है तब लोगों के दिमाग को हिला सकते है, घंटो तक उन्हें स्तब्ध रख सके। यह एक मानवीय सामर्थ और योग्यता है । हो सकता है वहाँ ईश्वरीय जीवन न बाँटा जाता हो।

जो कुछ भी आप अपनी सेवा में बगैर पवित्र आत्मा की सहायता से प्राप्त करते है वह इस संसार के साथ नाश हो जायेगा । आप इस बात से बिलकुल निश्चिंत रहे है । मुझे मालूम नहीं कि यदि आप मेरा विश्वास करते है या नहीं, और यदि हाँ तो आप मानवीय तरीकों को अपनाकर अपना समय और बर्बाद नहीं करेंगे ।

मैं ऐसा कोई भी काम करके अपना समय नष्ट नहीं करना चाहता, जो अनंतकाल में नाश होने जा रहा है । मै उस सामर्थ से सेवा करना चाहता हूँ जो परमेश्वर देते है । हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है ।

फरीसी लोग प्रभु यीशु के समय में बाइबल के महान गुरू थे । वे लोग अपने तत्वों के प्रति सिध्दांतवादी थे, न कि सुदकियों को तरह समझौता करनेवाले। हम यह बात जानते है Šयोंकि प्रभु यीशु ने भी उनके तत्वों की खराई को कबूल करके अपने शिष्यों से कहा कि जो कुछ फरीसी लोग सिखाते हैउन सबका पालन करो (मत्ती 23:3) । यही फरीसी उन दिनों में बाइबल पाठशालाआें के प्रमुख शिक्षक थे। गमलियल उस बाइबल पाठशाला का प्रधानाध्यापक था जहाँ तरसुस का शाऊल पढता था। कई एक फरीसी मिशन के महान अगुवे भी थे। प्रभु यीशु मसीह ने उनके विषय में कहा कि वे नये विश्वासी तैयार कर सके (मत्ती 23:15) । इस काम के लिए त्याग और समर्पण की आवश्यकता है ।

फिर भी हम देखते है कि प्रभु यीशु मसीह के जीवन का अधिक समय इन रूढीवादी बाइबल पाठशाला के शिक्षक और मिशन के अगुवों का सामना करने में गुजरा । लेकिन हमें यह अवश्य जान लेना चाहिए कि ऐसा Šयों हुआ । Šयोंकि यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो हम भी उन फरीसीयों के समान बन जायेंंगे। और फिर परमेश्वर हमारा निरंतर सामना करते रहेंगे।

ये अगुवे हमेशा प्रभु यीशु से प्रश्न करते रहते थे कि उन्होंने या उनके शिष्यों ने ऐसा Šयों किया अथवा वैसा Šयों नहीं किया। वे हमेशा अपनी परंपराआें को लेकर प्रभु यीशु में और उनके शिष्यों में गलतियाँ ढँूढते थे ।

मैने देखा है कि इस तरह का व्यवहार विश्वासियों में भी पाया जाता है, जो कभीकभी तेरी भी आलोचना करते है । वे मुझ से सवाल करते है कि मैने ऐसा Šयों कहा या वैसा Šयों नही कहा ।

उन्हें शब्दों का वादविवाद करना अच्छा लगता है(1तीमु 6:4) । इसी एक बात से दूर रहने के लिए पौलुस तीमुथियुस से कहता है । परंतु शायद उन्हें इस बात की चिंता नहीं हे कि उनके पास ईश्वरीय जीवन नहीं है । वे उन लोगों के समान है जो मरे हुए व्यŠत की ऊँगलियाँ गिनते है और यदि किसी ऊॅगली का नख भी यदि गायब हो तो एक बडा बखेडा कर देेते है ।

मै एक जीवित व्यŠत को पसंद करूँगा जिसके पाँच ऊँगलियाँ गायब है, बजाए उस मृत व्यŠत के जिसकी पाँचों ऊँगलियाँ और नाखून तो सलामत है, परंतु उसमें जीवन नहीं है । कई एक ऐसे ईश्वरीय ज्ञान के शिक्षक है जो शायद अपने तत्वों में सही हों, परंतु वे सही भी है और मरे हुए भी। मै एक ऐसी भाई के साथ का करना पसंद करूँगा जिसकी बाप्तिस्मा की शिक्षा, भले ही गलत हो, परंतु जो पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो, बजाए उस व्यŠत के जिसकी बाप्तिस्मा की शिक्षा तो सही है, परंतु वह एक मरा हुआ व्यŠत हो ।

अब मेरे कहने का अर्थ गलत मत निकालिए! मैं अपने संपूर्ण मसीही जीवन तत्वों के प्रति हमेशा मजबूत रहा हूँ । मैंने कई एक कलीसियाआें को छोड दिया Šयोंकि वे परमेश्वर के वचनों की शिक्षा संपूर्ण रीति से नहीं सिखाते थे। इसलिए मैं तत्वों के महत्व को घटा नहीं रहा हूँ, परंतु मैं जो कहने की कोशिश कर रहा हूँ वह यह है कि जीवन और आत्मिकता बहुत अधिक महत्वपूर्ण है ।

एक दिन जब प्रभु यीशु ने एक फरीसी को डाँटकर उसकी गलती सुधारी तो प्रभु यीशु के एक शिष्य ने उससे आकर यह कहा कि इस कथन को सुनकर फरीसीयों ने ठोकर खाई। प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें बताया कि वे उन फरीसीयों के लिए परेशान न हो, Šयोंकि वे लोगों के अंधे अगुवे है,और प्रत्येक पौधा जिसे मेरेे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड दिया जायेगा ।(मत्ती 15:12,13) ।

मैं चाहता हूँ कि आप एक पल के लिए उसी पिछले वाŠय पर गौर करें । जो कुछ आप प्रचार करते है, आप एक बीज को बोते है । जो कुछ बोते है, यदि वह परमेश्वर की ओर से नहीं है तो वह एक दिन उखाडा जाएगा ।

यदि हम अपना काम पवित्र आत्मा के द्वारा दी गई योग्यता से करते है तो हमारा कार्य अनंतकाल तक बना रहेगा, परंतु यदि हम परमेश्वर का कार्य बगैर प्रार्थना के, बगैर परमेश्वर पर निर्भर हुए और बगैर उसके आत्मा की सहायता के करते है, तो वह सब एक दिन वास्तव में उखाड दिया जाएगा ।

मसीही सेवा में बहुत से ऐसे काम है जिसमें हमें पवित्र आत्मा के सामर्थ की आवश्यकता नहीं होती, परंतु केवल लगनेवाला पैसा और एक अच्छे व्यवस्थापक की जरूरत होती है ।

उदाहरण के तौर पर, यदि आप किसी मसीही सम्मेलन का आयोजन करने जा रहे है तो उसमें कई बातें शामिल है, अर्थात एक बडा भवन किराये पर लेना, निमंत्रण पत्र भेजना, लोगों के ठहरने का तथा खाने पीने का प्रबंध इत्यादि करना होगा। परंतु ये सारे काम किसी भी अच्छे व्यवस्थापक के द्वारा किये जा सकते है जो कि एक मसीही भी न हो। हकीकत में कई संसारिक सम्मेलन मसीही सम्मेलनों की तुलना में कई गुना बेहतर रीति से आयोजित किये जाते है । परंतु मसीही सम्मेलन की भूमिका जो अनंतकाल तक बने रहने जा रही है वह है वचन की सेवकाई और वह सेवा आत्मा के अभिषेक से ही की जानी चाहिए।

मै एक अच्छे प्रबंधो का महत्व कम नही कर रहा हँू। वह किसी भी सम्मेलन की सफलता के लिए आवश्यक है । परंतु याद रहे कि जो अनंतकालिन है वह केवल वही है जो पवित्र आत्मा के सामर्थ द्वारा किया जाता है ।

इन बातों को हम अपने स्वयं की सेवकाई में अमल करे। अपने आप से यह पूछें कि अपनी सेवा के कौन से हिस्से के विषय मं हम यह कह सकते है कि वह केवल मानवीय प्रशिक्षण और मानवीय तरीकों का परिणाम है । हो सकता है, यदि हम अपने आप में ईमानदार हों तो इस सवाल ा जवाब पाकर आश्चर्यचकित हो जाएंगे ।

प्रभु यीशु मसीह कल, आज और सर्वदा एक से है । आज भी उनका सामना उन बाइबल पाठशाला के शिक्षकों और मिशन संस्थाआें के अगुवों से है जिनके पास ज्ञान तो है, परंतु जीवन नहीं है और जो बगैर पवित्र आत्मा के अभिषेक के लोगों को जानकारियाँ बाँटते है । यदि हम प्रभु यीशु के पदचिन्हों पर चलें तो जैसे प्रेरितों का सामना अपने दिनों में ऐसे लोगों के साथ हुआ, तो हमारा भी सामना ऐसे लोगों के साथ हमारे समय में होगा ।

मै प्रभु के साथ चल कर ऐसे लोगों का सामना करना पसंद करूँगा, बजाए इसके कि उनको खुश करके प्रभु को दु:खी करूँ। यदि परमेश्वर को खुश करने की यही एक कीमत हो तो हकीकत में यदि जरूरत पडे तो मै सारे संसार का सामना करने को तैयार हूँ। यदि मै अब तक मनुष्यों को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता रहता तो मै मसीह का दास न होता ।(गलातियों 1:10)

आइये, हम इस प्रकार चाल चलें कि हम असहाय होकर और परमेश्वर पर निर्भर होकर अपनी सेवा करें और हमेशा आत्मा के अभिषेक को अपने ऊपर होने की लालसा करें ।

अध्याय 10
आत्मिक अधिकार का उपयोग

एक आत्मिक अगुवा आत्मिक अधिकार से सेवा करेगा ।

प्रभु यीशु के प्रचार से भीड बहुत प्रभावित थी Šयोंकि वे उनके सिखाने के तरीके में और कइ र्समय से सिखा रहे फरोसीयों के तरीके में अंतर देखते थे। फरोसीयों के पास ढेर सारा ज्ञान था । प्रभु यीशु मसीह के पास ज्ञान उनसे भी ज्यादा था, परंतु यह उनका अधिकार था जिससे उनके सुनने वाले प्रभावित थे, न कि उनके ज्ञान से (मत्ती 7:29)

यदि हमारे पास ज्ञान है, परंतु कोई आत्मिक अधिकार नहीं है तो हमारी सेवा में हम उन फरीसियों के समान हो जाएंगे। प्रभु यीशु मसीह के शब्दों के पीछे परमेश्वर की सहमती थी। यही आत्मिक अधिकार से बोलने का अर्थ है ।

प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि जब वह सहायक आएगा, जिसे मै पिता की ओर से तुम्हारे पास भेजूँगा अर्थात्‌ सत्य का आत्मा, जो पिता से निकलता है, वह मेरी गवाही देगा और तुम भी गवाह हो, Šयोंकि तुम आरंभ से ही मेरे साथ रहे हो (यूहन्ना 15:26,27) । इसका अर्थ यह है कि जब भी वे प्रचार करेंगे तो पवित्र आत्मा अपनी सहमती देगा । बिलकुल ऐसा ही मै अपनी सेवा में चाहता हूँ कि हर समय रहे । जब मै प्रभु यीशु की गवाही दूँ तो पवित्र आत्मा भी गवाही दे। मै चाहता हूँ कि वह मेरे सुननेवालों के ह्दय से कहे कि इन बातों को सुनो Šयोंकि यह परमेश्वर की ओर से है । तभी मै ईश्वरीय अधिकार के साथ बोल पाऊँगा । परंतु मै केवल प्रभु यीशु मसीह के विषय में सही गवाही दूँ और पवित्र आत्मा अपनी सहमती न दे, तो मै कोई झूठा व्यŠत तो नहीं समझा जाऊँगा, Šयोंकि मेरे तत्व सब सुसमाचारीय है, परंतु मै केवल मृत्यु की सेवकाई करता रहा हँू, न जीवन की ।

कई ऐसे माध्यम है जिनके द्वारा हम लोगों के ऊपर अधिकार का उपयोग कर सकते है, जैसे मानवीय, धार्मिक तथा आत्मिक । और इन तीनों के बीच में बहुत अंतर है । प्रभु यीशु मसीह का अधिकार मानवीय तथा धार्मिक अधिकार नहीं था। वह कभी किसी संसारिक राजा अथवा किसी इस्त्राएल के धार्मिक अगुवे की तरह न तो पेश आये और न ही उन्होंने वैसी बातें की । उनका अधिकार ईश्वरीय और आत्मिक था ।

मानवीय अधिकार का अच्छा उदाहरण वह अधिकार है जिसका फिल्मी सितारे और पश्चिमी संगीतकार उपयोग करते है । लोग किस प्रकार उनकी पूजा करते है और उनके दीवाने हो जाते है यह हम तब देख सकते है जब लोग बारिश अथवा तपती धूप में उनकी एक झलक पाने के लिए घंटो खडे रहते हे। वे अपनी मानवीय योग्यता का उपयोग करके लोगों के दिल और दिमाग पर राज्य करते है और फिर उनको पैसा देने के लिए भी तैयार कर लेते है । इस प्रकार का अधिकार मसीहत में कई प्रचारकों में भी पाया जाता है । यह एक मानवीय शŠत है, न कि पवित्र आत्मा की सामर्थ ।

एक और तरीका जिसके द्वारा मानवीय अधिकार का उपयोग किया जा सकता है वह है पैसा । आज संसार का नियंत्रण उन लोगों के द्वारा नहीं किया जा रहा है जिनके पास हथियार है, परंतु उनके द्वारा किया जा रहा है जिनके पास दौलत है । पैसा यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण साधन है, युध्द में भी और चुनावों में भी। हर एक देश में व्यापारियों को उन्नति करने के लिए अपने राजनेतिक अगुवों को इन व्यापारियों को खुश करना पडता है जिससे कि वे उनके द्वारा पैसा पा कर सलाह प्राप्त करने की कोशिश करें। इसलिए पैसों की बडी सामर्थ होती है । और यही वह ताकत है जो बहुतायत से मसीहत में भी उपयोग की जा रही है । पैसा यकीनन बहुत कुछ अच्छा कर सकता है, परंतु Šयोंकि पैसा बलवान है, इसलिए वह नुकसान भी बहुत अधिक करता है ।

यदि मसीही कार्य कहीं पर पैसों के बल पर नियंत्रित होता है तो वह कभी भी आत्मिक कार्य नहीं हो सकता । प्रभु यीशु ने पैसों का सीधा परमेश्वर के विरोध में बताया । उन्होंने कहा कि इस संसार में परमेश्वर और दौलत यह दो ही ऐसे स्वामी है जो मनुष्य का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते है ।(लूका 16:13)

एक आत्मिक अगुवा पैसे देने के द्वारा जो अधिकार प्राप्त करता है, वह आत्मिक अधिकार नहीं हो सकता । संसार और मसीहत, दोनों में भी वही व्यŠत प्रतिष्ठित है जिसके पास पैसा होता है । जिनके पास पैसा हो उनके आगे हर कोई झुकेगा । यदि वे उनको उस बात के लिए कीमत देंगे तो वे उनकी किसी भी बात पर सहमत होंगे और हर वह काम करेंगे, जो वे कहेंगे। ये बात मसीही संस्थाओ में और सांसारिक संस्थाओ में, दोनों में सही है ।

लगभग सभी पासबान संस्था के अधिकारियों द्वारा नियंत्रित किये जाते है, Šयोंकि वे ही उनका वेतन निर्धारित करते है । ऐसे पासबान ऐसा कुछ भी नही कह सकते जिससे उन अधिकारियों को ठेस पहुँचे ! कलीसियाआें में अकसर धनी व्यŠतयों को ही अधिकारी बनाया जाता है । और यही वे धनी लोग होते हे जिन्हें सबसे ज्यादा डाँटा जाना चाहिए । परंतु एक पासबान ऐसे लोगों को कैसे डाँट सकता है जिन्होने पासबान के मुँह को पैसो से बंद कर रखा हो ? वह ऐसा नहीं कर सकता । इसलिए उसे उनके कानों को खुश करने के लिए वही सब कहना पडता है जो वे सुनना चाहते है । यदि वह उनको नाखुश करें तो वे उनका वेतन नहीं बढायेंगे और यह बात उसके लिए अपने विचार बदलने के लिए काफी होगी। वह अपने गरीब परिवार के विषय में सोचेंगे जिन्हें संघर्ष करना पडेगा । उसे कलीसिया द्वारा दिया गया वह सुविधाजनक घर भी छोडना पडेगा तथा अपने बच्चों का नाम उस अच्छी पाठशाला से भी निकालना पडेगा । यह सब विचार उसे भयभीत कर देते है और वह मजबूरन अधिकारियों के सामने हथियार डाल देता है । यही वह वजह है कि भारत में आज बहुत थोडे ही भविष्यवŠता है । लगभग सभी प्रचारक पैसाेे के लोभ के शिकार हो चुके है । ऐसे प्रचारक अपने आत्मिक अधिकार का उपयोग कैसे कर सकते है?

आप जो औरों पर अधिकार का उपयोग करते है, ऐसे भाइयों से मै कहना चाहता हँू कि यदि आप किसी को पैसे से नियंत्रित करना चाहते हों, तो जिस अधिकार का आप उपयोग करेंगे वह आत्मिक अधिकार नहीं होगा ।

प्रभु यीशु ने किसी को पैसों के माध्यम से नियंत्रण नहीं किया । उनका कोई भी शिष्य पैसों के खातिर उनके पीछे नहीं चला, Šयोंकि उनके पास उनको देने के लिए धन संपत्ति नहीं थी। उसने उनकी सेव समाप्त होने के बाद के लाभों को वादा नही किया, परंतु केवल पीडा और कष्ट की बात कही। उसने उन्हें सिखाया कि सबसे पहले परमेश्वर और उनके राज्य की खोज करो और लगने वाली सारी जरूरतें उनके स्वर्गीय पिता द्वारा पूरी की जायेगी, अर्थात्‌ अन्नवस्त्र इत्यादि ।

प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को बगैर किसी पैसों के इस संसार में सुसमाचार सुनाने के लिए भेजा ताकि वे लोगों को पैसों द्वारा नियंत्रित तथा लोभित नहीं कर सके। फिर भी उन्होंने हमारी तुलना में उस युग के संसार को बडे बेहतरीन रीति से सुसमाचार द्वारा बदल दिया, जब कि उनके पास हमारी तरह पैसा और अन्य साधन नहीं थे तथा सुसमाचार के प्रशिक्षण पर कोई सम्मेलन भी नहीं होते थे !

आर्थिक सामर्थ एक ऐसी चीज है जिसके विषय में परमेश्वर का कार्य करते समय हमें बडी सावधानी बरतनी चाहिए, Šयोंकि यह हमसे हमारे आत्मिक अधिकार को छिन सकता है । संगीत की सामर्थ एक और ऐसी ताकत है जिससे हमें बेहद सावधान रहना आवश्यक है । पश्चिमी संगीत लोगों को अपने बहाव में इस कदर बहा सकता है कि वे आत्महत्या तक कर ले । इस तरह संसार में आज कई प्रकार की ताकत है । हमें यह सावधानी रखनी होगी कि कही हम इन ताकतों को गलती से आत्मिक अधिकार समझ कर स्वीकार न कर बैठें । यदि हम आत्मिक ताकत और मानवीय ताकत के बीच के फरक को नहीं पहचान पाते है तो अपनी सेवा की सफलता के विषय में अपने आप को धोखा देना बडा आसान होगा ।

हमसे कुछ लोग, जो सामर्थ हम उपयोग में ला रहे है वो शायद पैसों अथवा संगीत की सामर्थ न हो, परंतु ज्ञान की ताकत है । यह ताकत भी मानवीय ताकत है और आत्मिक अधिकार के होने में और इसके होने में फरक है । हम लोगों को अपनी शिक्षा द्वारा प्रभावित कर के हमारी बातें सुनने के लिए तैयार कर सकते है! हो सकता है आपने ईश्वरीय ज्ञान के विषय में इतनी शिक्षा प्राप्त कर ली है कि आप युनानी भाषा में पतरस के उन शब्दों का अर्थ समझा सके जिसे उसने अपनी पत्री में उपयोग किया, ऐसे अर्थ जो शायद पतरस स्वयं भी न जानता हो !

परंतु एक आत्मिक मनुष्य बाइबल की शिक्षा एकदम भिन्न प्रकार से देगा और उसका परिणाम भी उसी प्रकार भिन्न होगा । बाइबल मानवीय बुध्दि की सामर्थ के द्वारा भी सिखाई जा सकती है तथा परमेश्वर के पवित्र आत्मा की सामर्थ से भी सिखाई जा सकती है । इन दोनों तरीकों में तथा उनके परिणाम में बहुत अधिक अंतर है ।

आज कलीसिया की सबसे बडी जरूरतों में इस बात की प्रथम आवश्यकता है कि उसके अगुवों की सेवकाई में आत्मिक अधिकार दिखायी दे । आत्मिक अधिकार धार्मिक अधिकार से पूरी रीति से अलग है । मसीहत में हम आज आम तौर पर जो देखते है वह है धार्मिक अधिकार, जहाँ पर अच्छे अच्छे अगुवे अपने झुंड पर राज्य करते है ।

स्थानीय कलीसिया को परमेश्वर ने प्रजातांत्रिक कलीसिया होने के लिए नहीं चुना था जहाँ पर प्रत्येक सदस्य को अपने उम्मीदवार को कलीसिया का अगुवा होने के लिए चुनने का अधिकार हो, न ही परमेश्वर ने स्थानीय कलीसिया को किसी शाŠतशाली अगुवे द्वारा तानाशाही करने तथा सदस्यों को उसके आगे झुककर उसकी इच्छाआें से दबकर उसकी जी हुजूरी करने के लिए चुना है ।

जब हम परमेश्वर का वचन प्रचार करते है तो लोगों के ऊपर अधिकार प्राप्त करना आसान हो जाता है । लोग हमारी सेवा की सराहना करते है Šयोंकि उन्हें उसके द्वारा आशीष मिलती है । फिर यह हमारे लिए बडा आसान हो जाता है कि हम अपने प्रशंसकों की नजरों में छोटेछोटे ईश्वर बन जाएँ । हमें हमेशा इस बात के प्रति सावधान रहना चाहिए। औरों पर जो अधिकार हमारे पास है उसका हमें अपने वरदानों के माध्यम से गलत उपयोग नहीं करना चाहिए । यदि वे हम पर निर्भर होने लगे है तो बडी विनम्रता से उन्हें प्रभु पर निर्भर होना सिखाएं जिससे उन्हीं की आत्मिक उन्नति हो और उन्हेें आत्मिक लाभ हो । हमारी बुलाहट मसीह की देह को बनाने के लिए है, न कि अपने लिए एक छोटासा साम्राज्य बनाने के लिए । आत्मिक अधिकार का यही एक मार्ग है ।

परमेश्वर की ओर से पौलुस को इतना आत्मिक अधिकार दिया गया था कि उसने कुरिन्थियों की कलीसिया के एक सदस्य को उसके शरीर के विनाश के लिए शैतान को सौंप दिया ताकि वह व्यŠत नाश होने से बच जाए (1कुरिन्थियों 5:5) । उसके बाद वह व्यŠत बचाया गया और पश्चाताप द्वारा कलीसिया में वापस शामिल हो गया । पौलुस उस कलीसिया का संस्थापक था और ऐसे स्थापना करने वाले पिता के पास वह आत्मिक अधिकार होता है जिसका उपयोग कोई और नहीं कर सकता । उन प्रेरितों के पास परमेश्वर के द्वारा दिया गया ऐसा ईश्वरीय अधिकार था कि वे अन्य लोगों को उध्दार मे ला सके। प्रेम से भरे हुए अधिकार का यही एक आदर्श है जिसे हमारे पास भी होने की आवश्यकता है । हम प्रेरित पौलुस के जीवन में ऐसे अधिकार का कई बार प्रदर्शन देखते है जो हमोर लिए एक बडी चुनौति है ।

जब शिष्यों ने प्रभु यीशु को साढे तीन वषा] तक पास से देखा तब जाना की दूसरे अगुवों और प्रचारकों की तुलना में, जो मंदीर में पाए जाते थे, उनसे प्रभु यीशु एकदम भिन्न थे । उन्होंने किसी को भी प्रभु यीशु की तरह जीते हुए और बोलते हुए नहीं देखा । उनके पास उनके जीवन और उनकी सेवा में अधिकार था। प्रभु यीशु मसीह से मिलने से पहले वे ऐसा सोचते थे कि आत्मिक सेवा वह है जो मंदिर में उन्होंने उनके याजकों को करते देखा था । और यदि वे प्रभु यीशु मसीह से कभी भी न मिले होते तो उन्होंने शायद उन मंदीरों के याजकों को अपना आदर्श मान लिया होता, परंतु अब उनके पास एक नया आदर्श था जिसका वे अपनी सेवा में अनुसरण कर सके।

हमारे युवाआें को अनुसरण करने के लिए जिस महत्वपूर्ण बात की आवश्यकता है वह है एक अच्छा आदर्श । और यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम आत्मिक अधिकार पाये हुए सेवक वह आदर्श बन सके ।

अध्याय 11
भय से छुटकारा

एक आत्मिक अगुवा मनुष्यों और परिस्थितियों पर आधारित किसी भय में दबकर कोई फैसला नहीं करता ।

मेरे घर के सामने क तŠती लटकी हुइ है जिसमे यशायाह 8:12,13 यह वचन बडे, अक्षरों मे लिखा है कि जिस जिस बात को ये लोग राजद्रोह कहते है उसे तुम राजद्रोह न कहना और जिस बात से ये डरते है उस से तू न तो डरना, और न भय खाना। यदि आप परमेश्वर का भय मानते है, तो आपको किसी और का भय मानने की आवश्यकता नहीं । यह वचन मुझे पिछले पच्चीस वर्षो से प्रोत्साहित करता आ रहा है। भय के विषय में जो सच्चाई मैने परमेश्वर से सीखी है उनमें से कुछ मै आपको बताना चाहता हूँ ।

सबसे पहले मैेन जाना कि भय यह एक शैतान के हथियारों में सबसे प्रमुख हथियार है । दूसरी बात जो मैने सीखी वह यह है कि यदि कभीकभार आपके जीवन में भय की भावना आये तो स्वयं को दोषी महसूस करने की आवश्यकता नहीं Šयोंकि मै अभी भी शरीर में हॅूं । इस विषय में हम सच्चे और ईमानदार होना चाहिए । प्रेरित पौलुस बडी ईमानदारी से स्वीकार करता था कि उसके जीवन में कभीकभी भय था (2 कुरिंंथियो 7:5) ।

तीसरी बात मैने सिखी और यह सबसे महत्वपूर्ण है कि यदि मेरे जीवन में भय भी हो, तो भी मुझे भय पर आधारित कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए । मेरे सारे फैसले हमेशा विश्वास पर आधारित होने चाहिए जो मै परमेश्वर पर करता हूँ, जो भय के एकदम विपरीत है । और अब पिछले कई वषा] से उसी प्रकार जीने की कोशिश कर रहा हूँ । और परमेश्वर ने हमें बहुतायत से सहायता की और प्रोत्साहित किया ।

और अब मै जान पाया कि Šयोंकि प्रभु यीशु बारबार कहते थे,

"मत डर, मत डर, मत डर !"

इस बात पर नये नियम की शिक्षाआें में उतना ही जोर दिया गया है जितना कि

"पाप मत कर, पाप मत कर, पाप मत कर ।"

प्रभु यीशु मसीह हमेशा पाप के विरोध में थे और हमेशा भय के विरोध में थे। उन्होंने हमें कहा कि केवल परमेश्वर का भय मानो, किसी और का नहीं। उनसे न डो, जो शरीर को घात करते है पर आत्मा को घात नहीं कर सकते, वरन्‌ उन से डरो जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नाश कर सकते है (मत्ती 10:28) । ये हमें सीखने के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण पाठ है । Šयोंकि एक आत्मिक अगुवे को भय पर आधारित किसी भी निर्णय को नहीं लेना चाहिए ।

एक और वचन की तŠती जो मेरे घर में कइ र् वषा] से लटक रही है वह है गलतियाँ 1:10 यदि मैं अब तक मनुष्यों को ही प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होता ।

यदि आप मनुष्य को खुश करने की कोशिश करते है तो आप कभी भी परमेश्वर के दास नहीं बन पाएंगे। और मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मनुष्य को खुश करने को इस आदत से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं।

कई मसीही सेवा के कार्य का ब्यौरा जो भारत से पश्चिमी देशों में भेजा जाता है वह आमतौर पर वहाँ के लोगों को खुश करने के लिए होता है, ताकि वे लोग आर्थिक रीति से यहाँ के कार्य के लिए सहायता भेज सके। आप अपना ब्यौरा जो अपने काम के विषय लिखकर भेजते है तो उसके पीछे आपका उद्देश्य Šया है उसे अच्छी तरह से जाँच लें ।

कई एक उपदेश इसी उद्देश्य से तैयार किये जाते है कि लोगों को खुश और प्रभावित कर सके। परंतु जो लोग इस तरह के उद्देश्य से प्रचार करते है वे लोग कभी मसीह यीशु के सच्चे दास नहीं बन सकते । आप एक प्रभु के बडे दास है यह कहकर अपनी कलीसिया के सीधे सादे विश्वासियों को मूर्ख बनाना आसान है । परंतु आप परमेशव्र और शैतान दोनों को मूर्ख नहीं बना सकते । Šयोंकि परमेश्वर और शैतान दोनों भी बहुत अच्छे से जानते है कि आप किस प्रकार के व्यŠत है ।

यदि आके दिल में यह भय है कि यदि मै किसी को नाखुश करूँ तो वह मुझे किसी एक प्रकार से नुकसान पहुँचा सकता है तो आप ऐसे में उसे हमेशा प्रसन्न रखने की कोशिश करेंगे । परंतु फिर आप परमेश्वर के दास कभी नहीं बन सकेंगे । यदि आप कभी भी भय में रह कर कोई काम करेंगे तो आप इस बात को निश्चित जान ले कि आपको परमेश्वर नहीं, परंतु शैतान चला रहा है ।

यदि हम अपने जीवनों में पलटकर देखें, तो हम पायेंगे कि भूतकाल में हमने कई एक ऐसे फैसले लिए जो भय पर आधारित थे। उन सब फैसलों में हमारा मार्गदर्शन परमेश्वर द्वारा नहीं किया गया था। उनमें कुछ फैसलों के परिणाम इतने गंभीर भले ही न रहे हो, परंतु फिर भी परमेश्वर की ओर से जो उत्तम बात थी उसे हमने उस कारण खो दिया। भविष्य में हमे चाहिए कि हम इसके विपरीत फैसले ले ।

यह हमारे लिए स्वाभाविक है कि हम भयभीत हों Šयोंकि हम मनुष्य है । उदाहरण के तौर पर यदि आप अचानक अपने सामने एक बडे साँप को देखेंगे जहाँ आप बैठे है, तो स्वाभाविक है कि आप घबरा जाएँ और कूदने लगे, और आपका रŠतचाप बढ जाए । परंतु आप हर वŠत इस भय में नही रहते है कि आप जहाँ भी जाएंगे वहाँ आपको साँप दिखेंगे !

हमें किसी भी व्यŠत के भय में जीवन नहीं जीना चाहिये ।

हमे कभी भी कोई ऐसा फैसला नही लेना चाहिए जो मनुष्य या शैतान के भय पर आधारित हो । प्रत्येक फैसला जो हम लेते है वह हमारे परमेश्वर के भय पर आधारित हो, और हमारे स्वर्गीय पिता पर संपूर्ण विश्वास पर आधारित हो। केवल तभी हमें इस बात का निश्चय हो सकता है कि हम परमेश्वर के पवित्र आत्मा के द्वारा चलाए जा रहे है ।

इब्रानियों 13:6 ये हम सब के लिए जो परमेश्वर की सेवा करते हैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण वचन है । उसमें ऐसा लिखा है कि इसलिए हम बेधडक होकर कहते है कि प्रभु मेरा सहायक है । मै न डरूँगा, मनुष्य मेरा Šया कर सकता हैं।

हमे हमेशा सतर्क रहना और भयभीत रहना इन दोनों बातों के बीच के अन्तर को जानना चाहिए। हमें हमेशा इस संसार में चतुर होने की आवश्यकता है, जैसा साँप चतुर है । परंतु हमे किसी पुरूष या स्त्री, दुष्ट आत्मा या स्वयं शैतान से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं ।

प्रभु यीशु सचेत थे, जब उन्होंने सुना कि यहुदिया प्रांत के लोग उनकी हत्या करना चाहते हे, तो वह वहाँ नहीं गये (यूहन्ना 7:1) । इन बातों के पश्चात यीशु गलील में घूमते फिरते रहे, वह यहुदिया में नहीं जाना चाहते थे Šयोंकि यहूदी उन्हें मार डालने की खोज में थे। यह सतर्कता और चतुराई थी। परंतु प्रभु यीशु कभी किसी से नहीं डरते थे।

यदि आपको रात के अंधेरे में किसी जंगल में जाना पडे तो आप Šया करेंगे? आप अपने साथ दीया या लालटेन लेकर जायेंगे । यह सावधानी है, इसका अर्थ आपको भय है ऐसा नहीं । यदि कहीं पर कोई आपकी हत्या करना चाहता है तो आप वहाँ पर न जाएँ, जब तक कि परमेश्वर आपको वहाँ जाने के लिए न कहे। प्रभु यीशु आखिर पवित्र आत्मा से प्रेरित होकर यरूशलेम की ओर गये, जहाँ पर वह मारे गये । परंतु यह सब परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर के ठहराये हुए समय पर हुआ ।

हम किसी मनुष्य से भयभीत नहीं है । यदि हम परमेश्वरकी इच्छाआें को पूरी कर रहे है और परम प्रधान की छाया में जी रहे हों (भजन 91:1) तो कौन मनुष्य है जो हमे हानि पहुँचा सकता है? बाइबल पूछती है कि कौन तुम्हें नुकसान पहुँचा सकता है? (1पतरस 3:13) परमेश्वर इस योग्य है कि मनुष्य हमारे साथ जो कुछ भी करता है उसे हमारी भलाई में बदल दे (रोमियों 8:28) । यदि यह सारी बातें सच है तो फिर हमे डरने की Šया आवश्यकता है?

यदि हम इस बात पर विश्वास करेंगे तो यह बात हमारे जीवन में एक अनोखा अधिकार लेकर आयेगी । हमसे हमारा आत्मिक अधिकार इसलिए शैतान छीन लेता है Šयोंकि हम मनुष्य का भय मानते है या हम उन्हें प्रसन्न करने की अथवा प्रभावित करने की या उनके सामने अपनी सफाई देने की कोशिश करते है । हमें इन सब बातों को पूरी तरह से छोड देेने की आवश्यकता है ।

परंतु यह आसान नहीं है । यह एक निरंतर चलने वाला युध्द है । एक बार आपने यह निर्णय ले लिया कि आप किसी झुंड में कोई फलानेफलाने व्यŠतयों को खुश करने की कोशिशें छोड देंगे तो आप सोच सकते है कि मनुष्य को खुश करने की यह आदत आपके जीवन में अब नहीं रही, परंतु बहुत जल्दी आप यह पायेंगे कि किसी और झुंड के किसी व्यŠत को खुश करने की आप कोशिश कर रहे है । इन बातों का कोई अंत नहीं । हमें विश्वासयोग्यता के साथ इस युध्द में लडते जाना है जब तक कि हम सभी मनुष्यों को खुश करने की इस आदत को छोड न दे। हमें निरंतर इस पास से सचेत रहने और उससे युध्द करने की आवश्यकता है । हमें कभी किसी मनुष्य से प्रमाणपत्र पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए ।

कुछ ऐसे विश्वासी हे जो बडे घमंड में कहते है कि हमें किसी से राय माँगने की आवश्यकता नहीं । परंतु ऐसे लोगे आत्मिक नहीं होते। वे केवल हठीले लोग है । किसी आत्मिक भाई की राय बहुत ही महत्वपूर्ण हो सकती है । वह हमें हमारे जीवन के विषय में वह सब बाते बता सकता है जो हम नहीं देख सकते, परंतु जो वह देख पाता है । ऐसे किसी मनुष्य को आदर और सम्मान देने से और उसके अधिकार के अधीन होने से हमें अवश्य ही बहुत मदद मिल सकती है । महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हम सीखें कि बगैर गुलाम बने हम एक आत्मिक व्यŠत के अधीन कैसे रह सकते है ।

यदि हम चाहते है कि हमारी कलीसिया के सदस्य केवल परमेश्वर का भय माने और मनुष्य तथा अंधकार की शŠतयों के भय से मुŠत हो जाएँ, तो आवश्यक है कि हम स्वयं सबसे पहले वैसे बनें । Šयोंकि परमेश्वर सब बातों का नियंत्रण कर रहे है इसलिए हमें इस पृथ्वी पर किसी भी चीज या व्यŠत से डरने की आवश्यकता नहीं ।

एक बार जब मैं एक ऐसे देश में जाने की योजना बना रहा था जहाँ सुसमाचार का प्रचार करने की मनाही थी, तब परमेश्वर ने मुझे यह वचन स्मरण दिलाया, तब यीशु ने उनके पास आकर कहा स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है । इसलिए जाओ और सब जातियों के लोगों को चले बनाओ तथा उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बाप्तिस्मा दो (मत्ती 28:18,19) । मैने देखा कि Šयोंकि परमेश्वर के पास स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार है इसलिए वह हमें सब राष्ट्रों में जाकर लोगों को उसका चेला बनाने की आज्ञा देते है । यदि हम इस बात के आधार पर न जाएँ, तो जहाँ हम जाएँगे वहीं हमे बडी परेशानियों का सामना करता पडेगा ।

इसीलिए यह मत्ती 28 की महान आज्ञा का महत्वपूर्ण शब्द है । बहुत से प्रचारक जाओ ! यह अच्छी बात है, परंतु हमें किस आधार पर जाना है? इस बात पर कि प्रभु को इस पृथ्वी के संपूर्ण मानवजाति पर और सारी दुष्टात्मा की शŠतयों पर अधिकार है । यदि आप सच में इन बातों में विश्वास नहीं करते है, तो बेहतर यही है कि आप कहीं न जाएं !

मत्ती 28 का यह वचन उस समय एक नये प्रकाशन के रूप में मुझे मिला ।फिर मुझे अहसास हुआ कि मै बगैरे किसी झिझक के उस देश में जा सकता हूँ । जब मैने उस देश में प्रवेश किया तब स्वाभ ाविक तौर पर मेरे अंदर भय था। परंतु मैने उस भय पर आधारित अपना फैसला नहीं लिया ।

यदि आपको ऐसा लगता है कि संसार में कहीं कोई ऐसा देश है जहाँ प्रभु यीशु मसीह को संपूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं है, तो मेरी आपसे यह सलाह है कि आप वहाँ न जाएँ ! मै स्वयं भी वहाँ नहीं जाऊँगा । मैं घबरा जाऊँगा । परंतु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि पृथ्वी पर ऐसा कोई भी देश नहीं है ! इस पृथ्वी का एक एक कोना हमारे प्रभु के अधिकार के अधीन है ।

उसी प्रकार, यदि आपको ऐसा लगता है कि कही कोई ऐसा व्यŠत है चाहे कितना भी बलवान Šयों न हो, जिसके ऊपर हमारे प्रभु का अधिकार न चलता हो, तो आपको हमेशा उस आदमी के भय में जीना होगा। परंतु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि संसार में ऐसा कोई व्यŠत नहीं । हमारे प्रभु के पास प्रत्येक मानव जाति के ऊपर अधिकार है । यहाँ तक कि नबुकद्‌नेजर राजा ने भी इस बात को माना, जैसे कि हम दानिय्येल 4:35 में पढते है ।

यदि ऐसा कोई आत्मा है जो कलवरी के क्रूस पर हमारे प्रभु द्वारा हराया न गया हो, परंतु किसी तरह से बच निकला हो, तो आपको हमेशा उसी दुष्ट शŠत के भय में जीना होगा । परंतु ऐसा कोई दुष्टात्मा नहीं है, जो क्रूस पर हराया न गया हो । वहाँ शैतान स्वयं हमेशा के लिए हार गया था । यही बात हमें शैतान और उसकी सेना के सब प्रकार के भय से हमें मुŠत करती है, और हमारी सेवा में हमें एक अद्‌भुत साहस दिलाती है ।

इसलिए जहाँ भी परमेश्वर हमें जाने की बुलाहट देते है वहाँ हम जाते है । हो सकता है कुछ स्थानों में खतरा हो । परंतु यदि हमें इस बात का पूरा विश्वास है कि परमेश्वर हमें उस स्थान पर जाने की अगुवाई कर रहे है तो हमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं । सवाल यह नहीं है कि किसी स्थान पर मसीही व्यŠत को सतावट है या नहीं । परंतु सवाल यह है कि परमेश्वर हमें वहाँ जाने के लिए कह रहे हैं या नहीं । यदि वह हमें अगुवाई कर रह है तो उनका अधिकार और उनकी सामर्थ हमारे साथ होगी । हमे किसी बात का भय रखने की आवश्यकता नहीं, परंतु यदि परमेश्वर हमें किसी स्थान पर जाने के लिए नहीं कह रहे है तो हमें वहाँ नहीं जाना चाहिए, फिर चाहे वहाँ मनुष्य हमें भेजने की कितनी भी कोशिश Šयों न करे, अथवा हमारे अंदर की जोशीली आत्मा ही Šयों न हमें जाने के लिए कहे !

हमें अपने आपसे अवश्य पूछना चाहिए कि हम उस स्थान में Šयों जा रहे है । यदि हम वहाँ इसलिए जा रहे है कि हम जाकर शिष्य तैयार करना चाहते है, और हमारा कोई दूसरा उद्देश्य नहीं तो हम इस बात से निश्चिंत रह सकते हे कि परमेश्वर हमारे साथ हमेशा रहेंगे, संसार के अंत तक जैसी कि उन्होंने प्रतिज्ञा की है । परमेश्वर हमारे मन की बातों को जाँचते है (यिर्मयाह 12:3) और हमारे इरादों को परखते है ।

परमेश्वर अपने आपको उन सभी लोगों पर प्रकट नहीं करते जो स्वयं को विश्वासी कहलाते है । यूहन्ना 2:24 में हम यह पढते है । परंतु यदि ईमानदारी से आप परमेश्वर से यह कहे, प्रभु, मैं उस स्थान में इसलिए जा रहा हूँ Šयोंकि मै समझता हूँ कि आप मुझे वहाँ भेज रहे है । और वहाँ मै केवल शिष्य तैयार करने जा रहा हूँ, उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बाप्तिस्मा देने और आपने जो कुछ भी आज्ञा दी है उसका पालन करना सिखाने जा रहा हूँ । मै वहाँ पैसा कमाने या नाम कमाने तथा और किसी व्यŠतगत स्वार्थ के लिए नहीं जा रहा हूँ । यदि आप ऐसा ईमानदारी से कहेंगे तो निश्चय परमेश्वर का अधिकार आपके साथ रहेगा ।

और फिर आपको भय में जीने की आवश्यकता नहीं, यह सोचकर कि मेरी पत्नी, बच्चों का Šया होगा तथा हमारी आर्थिक जरूरते कैंसे पूरी होगी । केवल यह सवाल महत्वपूर्ण है कि Šया परमेश्वर ने आपको बुलाया है या नहीं ? Šया परमेश्वर आपको वहाँ भेज रहे है या कोई मनुष्य आपको भेज रहा है? या फिर आपकी वह जोश की आत्मा आपको वहाँ ले जा रही है?

यदि आपके पास ऐसी कोई योजना है जो वह परमेश्वर की ओर से नहीं तो मैं वचनों में से एक भी ऐसी प्रतिज्ञा नहीं पाता जिससे आपको तसल्ली मिल सके । लेकिन यदि आपकी योजना परमेश्वर की योजना से मेल खाती है अर्थात्‌ शिष्य तैयार करना, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बाप्तिस्मा देना और प्रभु यीशु की दी हुई आज्ञाआें का पालन करना सिखाना, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको किसी मनुष्य या दुष्ट शŠत से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं रहेगी ।

परमेश्वर के प्रत्येक सेवक को यह जानना अनिवार्य है कि उस अधिकार का उपयोग करके जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में है वह दुष्टात्मा से पीडीत लोगों को कैसे छुडायें । दुष्ट शŠतयाँ आपसे या मुझ से नहीं घबराती है, वे केवल परमेश्वर से घबराती हे, जिन्होंने क्रूस पर शैतान की सारी सामर्थ छीन ली (कलुस्सियों 2:14,15) । सुसमाचार का यही शुभ संदेश है जिसे सबसे पहले हमें अनुभव करने की आवश्यकता हे और फिर औरों को बताएँ । यदि हम इस बात पर विश्वास करते है तो हम औरों को शेैतान की ताकतों से छुटकारा दे सकते है ।

हमें इस बात से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं कि दुष्ट शŠतयाँ हमारे साथ Šया करने की कोशिश कर रही ह, Šयोंकि बगैर परमेश्वर की अनुमति के हमारे सिर के किसी बाल को भी वे छू नहीं सकती । परंतु हिंदुस्तान में कई ऐसे विश्वासी है जो डरते है कि हो सकता है कि किसी दिन कोई उन पर जादूटोना कर दे । उनके जीवन में इस तरह का भय Šयों होता है? Šयोंकि वे नहीं जानते कि शैतान को क्रूस के द्वारा हरा दिया गया है ।

मुझे यदि है, एक बार में एक पासबान से मिला जो बहुत दिनों से बीमार था, और जो अपनी इस बीमारी के लिए किसी दुश्मन को कोसता था कि उसने मुझ पर जादूटोना कर दिया है । यह कैसे हो सकता है? Šया परमेश्वर जादू टोना और काला जादू की ताकतों से कम शŠतशाली है? नहीं! यह तो उस पासबान का अविश्वास था जिसने उसे ऐसा सोचने पर मजबूर किया था । कोई भी दुष्ट शŠत हमारे प्रभु के नाम के सामर्थ और उसके अधिकार के सामने खडी नहीं रह सकती, चाहे वह पृथ्वी पर हो या फिर आसमान से जहाँ से वे कार्य करते है (इफि 6 : 12) । यदि आपको इस बात पर विश्वास नहीं, तो मेरी आपसे यह सलाह है कि आप परमेश्वर की सेवा छोडकर कोई और काम करें । प्रचार करना छोड दे Šयोंकि ऐसे में आप अपने भय और अविश्वास को औरों के जीवन में उण्डेलेंगे । भय शैतान का हथियार है और उसे हम उस हथियार को हम पर उपयोग करने की अनुमति न दें ।

दुष्टात्मा को परमेश्वर की अनुमति से कभी यह छूट दी जा सकती है कि वे किसी विश्वासी को कभी सताए, जैसा कि हम अय्युब के जीवन में देखते है । परमेश्वर ने शैतान के एक दूत को अनुमति दी कि वह प्रेरित पौलुस को परेशान करे (2 कुरिंथियों 12:7) । वह बात पौलुस के लिए इतनी कष्टदायक थी, मानो उसके शरीर में कोई काँटा हो । हो सकता है यह काँटा कोइ बीमारी हो या फिर कोई व्यŠत हो जिसने निरंतर पौलुस को जहाँ भी वह गया परेशान किया । यदि हमारे शरीर में कोई काँटा है और उसे हम स्वयं नहीं निकाल पा रहे है, तो परमेश्वर को पुकारें कि वह उसे निकाल दे । परंतु यदि हमें नम्र बनाए रखने का महान उद्देश्य वह काँटा पूरा कर रहा हो तो कभीकभी परमेश्वर ऐसा करने से इन्कार करते है जैसा कि उन्होंने पौलुस से कहा । एक बार शैतान को यहाँ तक अनुमति दी गई थी कि वह पौलुस को थिस्सलुनिका जाने से रोके । परंतु तीमुथियुस वहाँ जा सका और इस प्रकार परमेश्वर का उद्देश्य फिर पूरा हो गया (1थिस्स 2:18, 3:2) ।

मै यह जोर देकर कहना चाहता हूँ कि किसी भी नये जन्मे मसीही के जीवन में दुष्टात्मा प्रवेश नहीं कर सकती । अफसोस है कि बहुत से प्रचारक इन दिनों में वचन के विपरीत तत्वों का प्रचार कर रहे है और यह कह रहे है कि विश्वासी लोग भी दुष्ट शŠतयों से भर सकते है, और इस प्रकार कई विश्वासियों को भय और दोष के अधीन कर रहे हैं ।

ऐसे प्रचारक बाइबल के किसी भी वचन का सहारा लेकर अपनी शिक्षा को साबित नहीं कर सकते । परंतु वे कहते है कि उन्होंने देखा है कि इस तरह की कुछ घटनाएँ घटी थी । और इस प्रकार अपने अनुभवों को वे परमेश्वर के वचनों से अधिक महत्व देते है । यह बात अपने आप में उन्हें गलत साबित करती है ।

मसीह और दुष्टात्मा की शŠत कभी एक साथ एक ही ह्दय में नहीं रह सकती । ज्योति और अंधकार एक साथ किसी भी स्थान में नहीं रह सकते । यह सच है कि यहूदियों के मंदीर में जहाँ प्रभु यीशु ने प्रचार किया वहाँ कुछ यहूदी दुष्टात्मा की शŠतयों से भरे हुए थे। परंतु हम किसी नये जन्मे विश्वासी के जीवन में यह नहीं पढते कि वह दुष्टात्मा की शŠत से भरा हुआ था (प्रेरित 2 के बाद) ।

एक मसीही व्यŠत दुष्टात्मा की शŠतयों द्वारा बाहर से सताया जा सकता है, जैसे अय्यूब और पौलुस सताए गए परंतु वह भी केवल परमेश्वर की अनुमति से। और यदि परमेश्वर इन बस बातों की अनुमति देते है तो आप निश्चिंत रह सकते है कि अय्युब और पौलुस की तरह ये सारी बाते भी आपके आत्मिक लाभ के लिए है ।

यदि आपको कभी शक हो कि कोई व्यŠत दुष्टात्मा से ग्रसित है अथवा नहीं तो आप उसे यह तीन अंगीकार अपने संपूर्ण ह्दय से करने के लिए कहिए :

  1. यीशु मसीह मेरे प्रभु है ।
  2. यीशु मसीह देह में आये ताकि वह पाप को हरा सके ।
  3. शैतान, तू प्रभु यीशु मसीह द्वारा क्रूस पर हराया गया है । अब मेरा तुझसे कोई संबंध नहीं ।

दुष्टात्मा की शŠतयों से भरे लोग इन तीनों अंगीकारों को अपनी आत्मा से कबूल नहीं कर पायेंगे ।

हर बार जब हम बीमार पडते है, हम प्रार्थना करें कि चंगे हो जाएंॅ । परंतु परमेश्वर को हम यह बता सकते हे कि यदि उनकी कोई योजना हो कि इस बीमारी के द्वारा हम कोई आत्मिक लाभ प्राप्त हो तो हम उसे खुशी स्वीकार करेंगे, और उसके नाम की स्तुति करेंगे ।

पुरानी वाचा के अन्तर्गत परमेश्वर ने एक अच्छे स्वस्थ और लंबी आयु की प्रतिज्ञा उन लोगों से की जो मातापिता का आदर करते है । परंतु इसमें कौन सी बातें शामिल है ? इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर जब वे बडे होते है तब उन पर निगरानी करेंगे ताकि कोई दुर्घटना या बीमारी उन पर नहीं आये । Šया परमेश्वर ने उन लोगों की विशेष रखवाली की जिन्होंने अपने मातापिता का आदर किया? जी हाँ ! यह एक सच्ची और अर्थपूर्ण प्रतिज्ञा है जिसका परमेश्वर ने पालन किया । परमेश्वर ने परिस्थितियों को नियंत्रित किया कि जा बच्चे जो मातापिता का आदर करते है वे पृथ्वी पर बहुत लंबा जीवन जीये ।

उसी प्रकार, परमेश्वर हमारे जीवन में परिस्थितियों का भी नियंत्रण कर सकते है, ताकि परमेश्वर की इच्छा पूरी किये बगैर मर न जाए, फिर चाहे 33 की उम्र हो या 90 वर्ष की ।

नई वाचा के अन्तर्गत, हम जानते है कि लंबी उम्र ज्यादा महत्व नहीं रखती हो, परंतु एक ऐसा जीवन जो परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में व्यतीत हो, फिर चाहे वह लंबी उम्र हो या छोटी । प्रभु स्वयं केवल 33 वर्ष ही जीए, परंतु उन्होंने अपने पिता को दिये हुए कार्य को पूरा किया ।

डेविड ब्रेनर्ड केवल 29 वर्ष तक जीवित रहे और वॉचमैन भी 60 वर्ष की आयु तक । परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि जहॉ तक हम जानते है उन दोनों ने परमेश्वर के दिये हुए कार्य को पृथ्वी से विदा लेने से पहले पूरा किया और तब तक परमेश्वर उनके जीवनों को परिस्थितियों का नियंत्रण करते रहे ताकि कोई बीमारी या दुर्घटना उनके जीवन को घटा न सके, तब तक की पृथ्वी पर का उनका कार्य पूरा न हो ।

इस पृथ्वी पर अनेक प्रकार के कीटाणू है जो हमारे शरीर को खोकला कर देते हे । उनमें से कुछ तो ऐसे होते है जिनके पास हमें खत्म करने की सामर्थ है । परंतु हमारे परमेश्वर इतने सामर्थी है कि वह हन कीटाणूआें को नियंत्रण में रखते है जिससे कि वे हमें मार न डाले ।

परमेश्वर इतने सामर्थी है कि वह शराब पिये हुए वाहन चालकों को नियंत्रण रखते है कि सडक पर दुर्घटना द्वारा वह मार न डाले जाएं ।

वह प्रति क्षण हमारी निगरानी करते है तथा न तो कभी वह सोते है और न ही कभी झपकी लेते हे। यदि हम इस बात पर विश्वास करते है, तो हम परिस्थितियों के भय से, बीमारियों के भय से, दुर्घटना के भय से तथा सभी प्रकार के भय से मुŠत हो जाएंगे ।

यदि आप परमेश्वर का भय मानते है तो सचमुच आपको किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं ।

अध्याय 12
औरों को भय से मुŠत करना

आत्मिक अगुवा कभी भय को माध्यम बनाकर लोगों को अपने अधीन करने की कोशिश नहीं करेगा । इसके विपरीत वह लोगों को भय से मुŠत कराने की कोशिश करेगा ।

भय एक ऐसा हथियार है जो केवल शैतान के औजारों में ही पाया जाता है । प्रभु यीशु इसलिए आये ताकि वह लोगों को भय से छुटकारा दे सके । प्रत्येक आत्मिक अगुवे की यही जिम्मेदारी है ।

इब्रानियों 2:14 ऐसा कहता है कि प्रभु यीशु ने मांस और लोहू धारण किया ताकि वह उन लोगों को छुडा सके जो आजीवन मृत्यु के भय के द्वारा बंधन और गुलामी के अधीन थे ।

रोमियों 8:15 बताता है कि हमने बंधुवाई की आत्मा नहीं पाई जो हमें वापस भय की ओर ले जाए, परंतु लेपालकपन की आत्मा पायी है ।

पौलुस यहाँ पर पवित्र आत्मा और गुलामी की आत्मा इन दोनों के बीच फर्क बताता है । पवित्र आत्मा हमें परमेश्वर की संतान बनाता है और गुलामी की आत्मा हमें भयभीत करती है । भय हमेशा गुलामी को लेकर आता है । संसार भर में लोग भय में जीवन बीता रहे है । अफसोस है कि विश्वासी लोग भी भय में जी रहे है ।

यदि कोई व्यŠत आपको भयभीत कर सकता है तो आप उसके गुलाम बन जाएंगे । यही वह सिध्दांत है जिसके आधार पर सभी झूठे शिक्षक कार्य करते है । वे लोग जिनके पास मजबूत मानवीय बल है, भय को हथियार बनाकर लोगों पर इस्तेमाल कर रहे है, और ये कहकर डरा रहे है कि यदि कभी उन्होंने उनकी संगति को छोड दी तो उन पर या उनके परिवार पर कठिन विपत्ति आ पडेगी। यह सब व्यर्थ बातें है । परंतु जब लोग बारबार कई समय तक इन्हीं धमकियों को सुनते रहते है, तो वे उन पर विश्वास करने लगते है, और उन झूठे शिक्षकों को छोडकर जाने से डरने लगते है । भले ही सब कुछ उन्हें उस झुंड में गलत ही नजर आता हो, तो भी वे भय की वजह से वही अटके रहेंगे। हो सकता है कि उनका अगुवा व्यभिचार में जी रहा है, परंतु सदस्य उसके विरोध में भय की वजह से बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे । ऐसा भय उन्हें गुलामी की ओर ही ले जाता है ।

जब भी कोई मसीही अगुवा भय को हथियार बनाकर विश्वासियों को अपने अधिकार के अधीन करने के लिए भयभीत करता है, या दशवांस देने के लिए, या कोई और काम करने के लिए अपनी अधीनता में लेता है तो वह शैतान का हथियार इस्तेमाल कर रहा है ।

हमें लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार काम कराने के लिए कभी भय के हथियार को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए । यदि कोई इस हथियार का उपयोग करता है, तो वह भी ऐसा झुंड तैयार करता है जो केवल झूठी शिक्षावाला ही झुंड होगा ।

परमेश्वर की सच्ची कलीसिया में प्रत्येक भाई और बहन को अपने स्वयं के निर्णय लेने की खुली आजादी होनी चाहिए। यदि कलीसिया के लोग पाप में जी रहे है तो हमे कलीसिया में लोगों को अनुशासित करने की आवश्यकता है । परंतु श्राप द्वारा और न्याय द्वारा उन्हें भयभीत न किया जाए।

कई एक पासबान जो अपनी कलीसिया से कहते है कि यदि उन्होंने कलीसिया में दशवांस नहीं दिया तो जरूर उन्हें डॉŠटर और अस्पताल में खर्च करने पडेंगे । यह गलत है । हम बुलाए गए है कि हम लोगों को इस प्रकार के भय से मुŠत करें । लोगों को अपना दशवांस तथा अन्य भेंट खुशी और उत्साह से देने दीजिए, न कि किसी सजा या न्याय के भय में आकर । परमेश्वर इस तरह से इकट्‌टा किये हुए पैसे किसी से भी नहीं लेना चाहते । और वे सब पासबान जो लोगों को दबाव में डालकर उनसे पैसे निकलवाते है, वे आज नहीं तो कल परमेश्वर के दंड को पायेंगे ।

पुराने वाचा के अंतर्गत, लोगों ने भय में रहकर परमेश्वर की सेवा की। व्यवस्था विवरण 28 में इस्त्राएलियोंं को चेतावनी दी गई थी कि यदि वे परमेश्वर की आज्ञाआें का पालन नहीं करेंगे तो उनहें गरीबी, बीमारी, पागलपन या अन्य किसी विपत्ति द्वारा दंड दिय जाएगा । इसलिए वे भय की वजह से परमेश्वर के वचनों को पालन करते थे । मलाकी ने इस्त्राएलियों से कहा कि यदि वे अपना दशवांस नहीं देंगे तो उन पर श्राप आयेगा (मलाकी 3:10) । परंतु ये व्यवस्था के अंतर्गत था ।

प्रभु यीशु हमें इन सब पारंपरिक आज्ञाकारिता से छुडाने आये । जकरयाह, जो युहन्ना बाप्तिस्मा देनेवाले का पिता था, उसने नई वाचा के विषय में भविष्यवाणी की और कहा कि अब हम एक सच्ची भŠती में, बिना भय के परमेश्वर की सेवा कर सकत है (लूका 1:74) ।

आपके जीवन में Šया ऐसी कोई बात है जिसे आप भय में आकर करते है? Šया आप रोज सुबह बाइबल इसलिए पढते है कि यदि आप नहीं पढेंगे तो कोई विपत्ति आप पर आा जाएगी? यह केवल एक सीधासाधा अंधविश्वास है । और परमेश्वर यकीनन नहीं चाहते कि आप इस प्रकार के अंधविश्वास में आकर बाइबल पढें! वह चाहते है कि आप उनके प्रेम की गहराई को जाने जो आपके लिए है और यह कि आप इस प्रकार के सब भय से मुŠत हो जाएं। परमेश्वर ने हमे प्रभु यीशु के लोहू के द्वारा शुध्द किया और हमें धर्मी भी ठहराया इसका कारण यही थाा कि परमेश्वर चाहते थे कि शैतान हम में कभी दोष की भावना न डाल सके ।

कोई भी सेवा जो परमेश्वर के लोगों में दोष की भावना उत्पन्न करती है वह सेवा कभी परमेश्वर की ओर से नहीं हो सकती । प्रभु यीशु इसलिए आया ताकि वह लोगों को आजाद कर सके, न कि उन्हें और बंधनों में डाले!

बहुत से विश्वासी पहले से ही अपनी कई समस्याओ में जूझ रहे है । जब वे हमारी कलीसिया मे ंआते है तब हमें उन्हें दोष लगाकर और समस्या में डालने की आवश्यकता नही । वे इसलिए आते है ताकि सहायता और छुटकारा पाये, न कि डाँट खाये और दोषी ठहर कर निराश घर लौट जाएं ।

परमेश्वर अपने लोगों की खुशी की चीखों में आनंदित होते है, और यही हमें परमेश्वर के लोगों को सुनाना है ।

कलीसिया की सभाआें में परमेश्वर की स्तुति करने का उद्देश्य यह है कि उनका हमारे प्रति जो प्रेम है उसका आनंद हम उठाएं और इस सच्चाई से आनंदित हो कि वह हमसे खुश होते है और वह हम से प्रसनन है । परमेश्वर ने हमें क्षमा की, इसलिए नहीं कि हम बहुत अच्छे थे, परंतु इसलिए कि उन्होंने हमसे प्रेम किया । उन्होंने मसीह में हम को चुना, जबकि हम में कुछ भी भलाई नहीं थी। Šयोंकि अब हमने पश्चाताप कर लिया है तो अब हमें और वह कितना अधिक प्रेम करेंगे ?

फिर भी शैतान अपने बच्चों की तुलना में परमेश्वर के बच्चों को दोष लगाने में बहुत अधिक सफल हुआ है । वास्तव में शैतान के बच्चों में दोष की भावना होनी चाहिए, न कि हम में । वे धोखाधडी की दुनिया के रहते है और फिर भी खुशी से जीवन बिताते है । परंतु परमेश्वर के लोगों को संसार के सबसे अधिक आनंदित लोग बनकर जीना चाहिए, परंतु वे तुच्छता और दोष की भावना में जीते है । यह नम्रता नहीं, परंतु अविश्वास है !

कई विश्वासी पवित्र आत्मा से भरे हुए होने का दावा तो करते है, परंतु वे अभी भी भय के गुलाम है । कोई व्यŠत पवित्र आत्मा से भरा हुआ हो और भय का भी गुलाम हो, तो यह कैसे संभव हो सकता है? कई झूठे भविष्यवŠता आते है और उनसे कहते है कि उन पर कोई विपत्ति आनेवाली है, तो वे उसी क्षण भय से भर जाते है । फिर वे झूठे भविष्यवŠता पैसे इकट्‌ठा करते है कि वे उनकी सुरक्षा के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें और वहाँ से निकलकर किसी और परिवार में जाने के लिए निकल पडते है, कि उन्हें धोखा दे सके । हमें ऐसे झूठे भविष्यवŠताआें से सावधान रहने की आवश्यकता है । आज संसार में कई ऐसे झूठे भविष्यवŠता घूम रहे है कि वे लोगों के मस्तिष्क में भय पैदा कर सके ।

चाहे दस हजार झूठे भविष्यवŠता हमारे विरोध में झूठी भविष्यवाणी करे तो भी हमारा कुछ बुरा नहीं होगा । यह केवल पलटकर उन्हीं पर चला जाएगा। हमें आवश्यकता है कि हम अपनी कलीसिया के लोगों को यह सच्चाई सिखाकर उन्हें साहसी बनाएं। यदि हमारे अंदर किसी भी प्रकार का भय होगा तो हम कभी परमेश्वर के सम्मुख आत्मविश्वास के साथ और शैतान के विरोध साहस के साथ नहीं जा सकते । यदि हम परमेश्वर का भय मानते है, तो हमें किसी भी बात से डरने की आवश्यकता नहीं ।

भय यह शैतान का एक हथियार है जो भी अपनी सेवा में भय का उपयोग करता है वह शैतान की संगति में है ।

प्रभु यीशु ने नरक के विषय में लोगों को जानकारी दी, परंतु कभी वहाँ की भयानक तथा भयभीत करनेवाली बातों से उन्हें नहीं डराया । और उन्होंने अपने उन शिष्यों को जो उन्हें छोडकर चले गए थे उन्हें बुरे परिणामों की बात कहकर नहीं धमकाया ।

बाइबल सभी स्वामियों को अपने सेवकों को न धमकाने की आज्ञा देती है (इफि 6:9) ।

यदि भय शैतान का हथियार है, तो हम परमेश्वर के सेवक होने के नाते कभी उसका इस्तेमाल कैसे कर सकते है । फिर भी कई मसीही अगुवे है जो अपने झुंड को नियंत्रित करने के लिए भय का इस्तेमाल कर रहे है ।

चाहे हमे लोग बुरे नामों से ही Šयों न बुलाए, तो भी हम उन्हें न्याय और परमेश्वर के क्रोध के नाम पर भयभीत न करें । फरीसियों ने प्रभु यीशु को शैतान का राजकुमार कहा, फिर भी जवाब में प्रभु यीशु ने उन्हें नहीं धमकाया, परंतु क्षमा कर दी (मत्ती 13:13) । आओ, हम उनका अनुसरण करें ।

जब हम लोगों से बाते करते है, तो हम अपने शब्दों के साथ उन्हें एक आत्मा भी देते है । हो सकता है इसके बारे में हमें मालूम न हो, परंतु यह वास्तव है । यदि हमारे सांसों से दुर्गंध आती है तो जब भी हम मुॅंह खोलेंगे तब लोग यह बात जान जायेंगे, लेकिन हो सकता है कि हम स्वयं इसके विषय में जानते न हों! आत्माआें के दुर्गंध के साथ भी ऐसा ही है जो हमारे अंदर से आती है! हो सकता है कि हम पवित्रता के विषय में प्रचार कर रहे हों, परंतु जो आत्मा हमारे अंदर से निकल रही है वह पवित्र न हो ।

हम नम्रता के विषय में प्रचार कर सकते है, परंतु जो आत्मा हमारे अंदर से निकलती है वह शायद नम्र न हो ! हो सकता है दो भाई नम्रता के ऊपर प्रचार करें, एक के पास नम्र आत्मा है और वह अपने सुनने वालो ं तर उसी एक आत्मा को पहुँचाता हो । परंतु दूसरे के पास एक हठीही आत्मा हो तो वह उसी आत्मा को लोगों तक पहुँचाएगा, हालांकि दोनों के उपदेश का विषय एक ही है ! इन दोनों प्रचारकों मे एक बहुत बडा अन्तर है जिसे हमें जान लेने की आवश्यकता है ।

उसी प्रकार यदि हमारे स्वयं के अंदर भय होगा तो हम लोगों के जीवन में भय की आत्मा डाल सकते है । अपने प्रचार में उस ढंग से कहकर हम विश्वासियों को भी दोषी ठहरा सकते है । हो सकता है हम गंभीर हों, परंतु जो आत्मा हमारे अंदर से निकल रही है वह लोगों को बंधन में डाल सकती है ।

हमारे उपदेश का प्रभाव उस आत्मा पर निर्भर करता है जो हमारे ह्दय से बाहर निकलती है, और न कि केवल वह ज्ञान जो हमारी समझ से आता है । हम अपने उपदेश में दूसरों तक जीवन पहुँचाते है, न कि मात्र संदेश।

यदि आप किसी प्रकार के भय के गुलाम हैं, तो वह भय की आत्मा आपके अंदर से निकलकर औरों को दूषित करेगी जिनसे आप बात कर रहे है और वे भी उसी भय की आत्मा के बंधन में बंध जायेंगे । यह बिलकुल मानवीय देह के समान है । यदि आप आपने खून में किसी बीमारी को पाल रहे है, तो वही बीमारी आप अपने बच्चों में भी उंडेल रहे हें।

इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने जीवन से सभी प्रकार के भय को निकाल सके, अर्थात्‌ मनुष्य का भय, बीमारियों का भय मृत्यु का भय, बुरी परिस्थितियों को भय, दुर्घटनाआें का भय, गरीबी का भय हमारे जैसे गरीब देश में इस प्रकार का भय में वास्तविकता हो सकती है एक ऐसा भय जो अपने बच्चों के भविष्य के विषय में हो अर्थात्‌ उनकी अच्छी पढाई, नौकरी आदि । और ऐसे कई प्रकार के भय हो सकते है ।

केवल एक ही बात जो हमारे अंदर से भय को पूरी तरह से निकाल कर फेंक सकती है, वह हैं परमेश्वर का भय और उन पर विश्वास । यदि हम परमेश्वर का भय मानते है, तो हम किसी चीज या व्यŠत से नहीं डरेंगे ।

यदि हम परमेश्वर पर भरोसा रखते है, तो हम जानते है कि वह अपने खोजियों को उनका प्रतिफल देने वाले है तथा वह उनका आदर करते है जो उनका आदर करते है । जहाँ विश्वास होता है वहाँ भय नहीं रह सकता, भले ही कभीकभार ऐसे अवसर आये जब हम भयभीत हो जाएँ ।

महतवपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारे विचारों पर किसका अधिकार है, भय का या विश्वास का ?

हमे अपने आप से भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि कहीं मैं औरों पर अपना अधिकार जमाने के लिए भय के हथियार को इस्तेमाल तो नहीं कर रहा ।

अध्याय 13
स्वयं को नम्र करना

एक आत्मिक अगुवा हमेशा अपने आपको नम्र बनाने के लिए तैयार रहता है ।

परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करते है, परंतु नम्र लोगों पर दया करते है । यदि हम अपने आप को परमेश्वर के सामर्थी हाथ के नीचे नम्र करें, तो वह हमें उचित समय आने पर ऊँचा उठायेंगे (1पतरस 5:56) ।

ऊपर उठाए जाने का अथृ यह नहीं कि हम संसार में या मसीहत में महान पुरूष बन जायेंगे और लोगों का आदर पायेंगे । यह तो आत्मिक उन्नति को दर्शाता है, जहाँ हमें आत्मिक अधिकार परमेश्वर की इच्छाआें को पूरा करने के लिए दिए जाते है । परंतु ऊपर उठाया जाना हमारे नम्रता पर निर्भर करता है ।

हम जानते है कि यह संसार ऐसे लोगों से भरा पडा है, जा औरों की दृष्टि में बडा बनना चाहते है । प्रत्येक राजनेता और प्रत्येक व्यापारी बडा बनना चाहता है । दु:ख की बात है कि वे जो अपने आपको मसीह के सेवक कहते है वे भी बडे और बडे बनना चाहते है । वे इस प्रकार के बडे पदों की लालसा करते है जैसे, रेव्ह डॉŠटर तथा अपनी संस्थाआें मेंंं ऐसे स्थान पाना चाहते है, जैसे संचालक इत्यादि । आज की दुखद बात यह है कि व्यापार और मसीहत में कोई अंतर नहीं रहा ।

युवा विश्वासी अपने अगुवों को बडी बडी महासभाआें में एक फिल्मी सितारों की तरह खडे देखते है, जो महंगेमहंगे होटलों और घरों मे रहते है, और महंगी, महंगी कारों में घुमते है । वे अपने अगुवों को जब निहारते है तो परमेश्वर के तौर तरीकों को जाने बगैर वे अपने अगुवों की तरह सुप्रसिध्द बनने के सपने देखते है । वे ऐसा सोचते है कि ये प्रचारक कई वषा] तक परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य रहे होंगे जिसकी वजह से परमेशव्र ने उन्हें ये प्रतिफल दिया । और वे कल्पना करते है कि वे भी एक दिन अपनी विश्वास योग्यता की वजह से इसी प्रकार बडे प्रचारक बनकर प्रसिध्दी प्राप्त करेंगे ।

जब युवा इन प्रचारकों को अमेरिका और खाडी के देशों से पैसे और तोहफे पाते हुए देखते है तो वे सोचते है कि एक दिन आयेगा जब हम भी ऐसे ही धनवान बनेंगे । इन युवाआें के लिए प्रभु यीशु आदर्श नहीं है, परंतु यह अमीर,फिल्मी सितारे जैसे प्रसिध्द प्रचारक है। मसीहत में आज यहीं एक बुराई है ।

अपने युवाआें को हमें अपने जीवनों द्वारा यह सिखाने की आवश्यकता है कि यदि हम प्रभु का अनुसरण करें, तो हम धनवान या प्रसिध्द नहीं बनेंगे, परंतु धर्मी बनेंगे । साथ ही साथ हमें गलत समझा जायेगा, त्यागा जायेगा और सताया जायेगा । परंतु हम उन लोगों से प्रेम करने के योग्य होंग जो हमसे नफरत करते है, और उन्हें आशीष दे पायेंगे जो हमें श्राप देते है । यही वह बात है जिसे हमें अगली पीढी के सामने प्रदर्शित करने की आवश्यकता है । यदि हम ऐसा न करें तो वे किसी और, यीशु का अनुसरण करेंगे, जिसे वे आज के शारीरिक प्रचारकों मेें देखते है ।

परमेश्वर के सामर्थी हाथ के नीचे अपने आपको आधीन करने का अर्थ यह है कि खुशी से हर परिस्थिति को जो परमेश्वर आपके जीवन में भेजते है, स्वीकार करें। वह उन परिस्थितियों को इसलिए अनुमती देते है कि वे हमें नम्र बनाए, जिससे हम घटे और परमेश्वर बढे । जब हम लोगों की नजरों में छोटे बनते है तो लोग हम पर निर्भर न होते हुए परमेश्वर पर निर्भर होना सीखते है ।

प्रभु का दास होने के नाते उनकी तुलना में जो मेरी आलोचना करते है मुझे बडा आदर देनेवालों से ज्यादा डर लगता । मै यह पाता हूँ कि वे अपेक्षा करते है कि मै उनके लिए परमेश्वर की इच्छा जानूँ । मै हमेशा ना में जवाब देता हँू । मै उन्हें बताता हूँ कि केवल पुरानी वाचा के लिए किसी भविष्यवŠता के पास जाते थे। नई वाचा के अंतर्गत परमेश्वर का प्रत्येक बच्चा, सबसे छोटा भी सीधे परमेश्वर के पास जाकर व्यŠतगत रीति से उनकी इच्छा जान सकता है । इब्रा 8:11में इस बात का उल्लेख स्पष्ट रीति से किया गया है कि नई वाचा में यह हमारा एक बडा सौभाग्य है । अब हम सब पवित्र आत्मा पा सकते है और वह हमारा मार्गदर्शन है । तो मै अपने भाईयों से कहता हूँ कि मैं उन्हें सलाह तो दे सकता हूँ, परंतु कभी उनके लिए परमेश्वर की इच्छा नहीं जान सकता। अपनी सेवा के शुरूवात से ही मैने इस बात पर जोर दिया है । परिणाम स्वरूप लोग आज हमारी कलीसियाआें में परमेश्वर को स्वयं जानते है, और मुझ पर निर्भर नहीं रहते। वे सीधे मसीह से जो उनका सिर है जुडे हुऐ है । और इस प्रकार मसीह की देह हमारे बीच में इन वषा] के दौरान बनाई गई।

मसीह की देह को बनाने का यह पहला सिध्दांत है : लोगों को उनके सिर से जोडना और अपने आप से उनको निर्भर होने से रोकना ।

भूतकाल में इस क्षेत्र में असफल होने की वजह से हमें अपने आपको नम्र करके गहरा पश्चाताप करने की आवश्यकता है । हमारी यह तीव्र इच्छा होनी चाहिए कि हमारे जीवन में मसीह बढे और हम घटें । परमेश्वर हमें घटाने के लिए कई परिस्थितियों में से हमें ले जाता है कि मसीह हमारे जीवन में बढे । यदि उन परिस्थितियों में अपने आपको नम्र करें तो हमारे जीवन के लिए परमेश्वर का जो उद्देश्य है वह पूरा होगा ।

नम्र होने का अर्थ यह है कि जिनका हमने दिल दुखाया हो उनसे माफी माँगे । प्रभु के सेवक होने के नाते हमें उन सब लोगों के सेवक होने की आवश्यकता है और उन सबके आधीन होने के लिए तैयार रहना है जिससे की उन्हे आशीष दे सके। जब हम कोई गलती करते है तो उसे स्वीकार करने तथा माफी मॉगने के लिए भी तैयार रहें । केवल एक ही व्यŠत है जो गलती कभी नहीं कर सकता वह है परमेश्वर !

मैने परमेश्वर से कहा है कि मै आकाश के नीचे किसी से भी माँफी माँगने के लिए तैयार हूँ, चाहे बच्चे, चाहे नौकर, चाहे भिखारी या कोई भी Šयों न हो, और फिर मैं अपने पद या प्रतिष्ठा को लेकर कभी अड नहीं जाऊँगा और मैने ऐसा ही किया भी है और परमेश्वर ने मुझे आशीष दी हैं ।

अपने झुंड के आगे किसी भी प्रकार के झूठे मान और प्रतिष्ठा को लेकर कभी न अडें । यदि आपसे कोई गलती हो जाए तो आप उनसे माफी माँगे और कबूल करें कि आप गलत थे । और जिसके लिए आप शर्मिदा भी है । उनकी नजरों में आपके प्रति आदर और सम्मान इससे केवल बढेगा ही, घटेगा नहीं । ऐसा दिखावा Šयों करें कि आप कभी गलती करते ही नहीं है ?

मैने एक महाविद्यालय के विद्यार्थी के बारे में सुना जिसने अपने प्राध्यापक को एक बहुत ही कठिन प्रश्न पूछा । उस प्राध्यापक ने उसे केवल तीन शब्दों में जवाब दिया, अर्थात मै नहीं जानता ! उस दिन उस विद्यार्थी की नजरों में अपने प्राध्यापक के लिए इज्जत और बढ गई Šयोंकि उसने न केवल उनकी नम्रता को देखा, परंतु उनकी ईमानदारी को भी जाना, कि वह हमें वह सब बातें नहीं पढाते है जो वह स्वयं नहीं जानते ।

मैने अपनी कलीसिया के लोगों को सबके सामने कहा है कि मै तब तक गलतियाँ करता रहूँगा जब तक कि मै मर न जाँऊ, और इसकी केवल एक ही वजह है कि मै परमेश्वर नहीं । जब तक मैं इस संसार में हूँ मुझसे गलतियाँ होती रहेंगी । आशा है कि मै हर बार मूर्खता से वही गलतियों को नहीं दोहराऊंॅगा जो मैं दस या बीस साल पहले किया करता था, Šयोंकि मैने अपनी उन गलतियों से बहुत कुछ सीखा है । मैने अपनी गलतियों से कुछ बुध्दि प्राप्त की है, परंतु मैं अभी सिध्द नहीं हूँ ।

आप मे से कई जो यहाँ विवाहित है, जानते है कि अनजाने में अपनी पत्नियों का दिल दुखाना कितना आसान है, भले ही ऐसा करने का आप को कोई गलत उद्देश्य न हो । हो सकता है आप अच्छे उद्देश्य से कुछ कहना चाहते हो, परंतु आपकी पत्नी उसका गलत अर्थ निकाल बैठे, इसके विपरीत ऐसा भी हो सकता है कि आपकी पत्नी कुछ कहें और आप कुुछ कहें और आप उसका कोई दूसरा अर्थ निकाल लें । ऐसी हालत में आपको Šया करना चाहिए ? मैं आपको बताना चाहता हूँ कि केवल माफी माँग लेने से आप दोनों के बीच में सुलह बडे आसानी से हो सकती है, बजाए इसके कि अपने इरादों के विषय में समझाने के लिए एक लंबा भाषण दें, अथवा एक दूसरे पर आरोप लगाएँ ।

मान लीजिए आप ऐसी परिस्थिति में है जहाँ पर आपके सहकर्मी आपको गलत समझ रहे हों, हो सकता है उनको इस विषय पर सफाई देकर उन्हें समझाना व्यर्थ हो, Šयोंकि वे सुनने के लिए इच्छुक नहीं है । ऐसे हालत में Šया करना चाहिए, खास तौर पर उस वŠत जब आपको मालूम हो कि आप निर्दोष है? Šया अपने आप पर अफसोस करना चाहिए ? बिलकुल नहीं । केवल इस बात का विश्वास हो कि आपका विवेक परमेश्वर और मनुष्य की नजरें साफ है और फिर इस बात को परमेश्वर पर छ़़ोड दें । केवल इतना ही आपको करना है । यही वह तरीका है जिसे मै कई वषा] से अपना रहा हूँ और परमेश्वर ने इसके द्वारा मुझे आशीष भी दी है । आपको भी मैं यही सलाह दूँगा ।

हर कोई जो परमेश्वर की सेवा करता है वह शैतान के हमलों का निशाना बनने जा रहा है । जितना ज्यादा हम परमेश्वर के लिए उपयोगी बनेंगे उतना ही ज्यादा शत्रु हम पर वार करेगा । हम उसको रोक नहीं सकेंगे । शैतान झूठे आरोपों, निंदा अथवा झूठी कहानियों के द्वारा हम पर वार करेगा । और वह हमारे पत्नी, बच्चों पर भी आक्रमण करेगा ।

उन बुरी बातों के विषय में सोचिए जो प्रभु यीशु मसीह के बारे में उस जमाने के लोग कहा करते थे और आज भी उसके विषय में जो लोग कह रहे है । उन्होंने उसे पेटू और शराबी कहा (लूका 6:35), एक पागल मनुष्य (मरकुस 3:21), और शैतानों का प्रधान कहा (मत्ती 12:24) तथा ऐसे कई बुरे नाम दिये । वे कहते थे कि वह झूठा है और बाइबल और मूसा की शिक्षाआें के खिलाफ सिखाता है (यहून्ना 9:29) । और इस प्रकार उन्हाेेंने लोगों को भडकाकर प्रभु की शिक्षाआें से सुनने से अलग रखा । परंतु उन्होंने इन सब आरोपों को नजर अंदाज कर दिया । उसने किसी भी आरोपों की सफाई नहीं दी । हमे भी नहीं देनी चाहिए ।

प्रभु यीशु मसीह ने केवल तत्वों से संबंधित प्रश्नों के ही उत्तर दिये। आज भी लोग हमारे प्रभु के विषय अनुचित रीति से बात करते है, परंतु फिर भी परमेश्वर उन पर न्याय और दंड नहीं बरसाते ।

उन्होंने पौलुस को झूठा भविष्यवŠता और धोखेबाज कहा और कहा कि वह एक ऐसे समाज का है जिसके विषय में हर जगह बुरा कहा जाता है (प्रेरित 24:14, 28:22) । और इस प्रकार उन्होंने पौलुस से भी लोगों को दूर रखा कि उसकी न सुनें ।

कलीसिया के इतिहास में परमेश्वर के सार बडे दासों के जीवनों में यही होता आया है, चाहे जॉन वेस्ली हो या चार्ल्स फिनी या बिल्यम बुथ या वॉचमैन नी, और जितने भी सच्चे भविष्यवŠता जो थे, उनके साथ यही हुआ है ।

आज से कुछ शताब्दियों पहले जर्मनी में हैनूरी सुसो नामक एक व्यŠत रहता था । वह बहुत ही धार्मिक व्यŠत था तथा अविवाहित था । वह हमेशा प्रार्थना करता था कि परमेश्वर उसे तोडकर प्रभु यीशु की तरह नम्र बनाए । परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाआें का जवाब इस प्रकार दिया, एक दिन सुसो ने अपने द्वार पर दस्तक सुनी । जब उसने द्वार खोला तो उसने एक अजनबी महिला को अपने हाथों में एक नवजात शिशु को लिए खडा पाया, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था । वह एक बुरी स्त्री थी जो अपने नाजायज औलाद से छुटकारा पाना चाहती थी, उसने सोचा कि हैनरी सुसो ही एक ऐसा व्यŠत है जिस पर मै अपना पाप लाद सकती हूँ । इसलिए उसने ऊँची आवाज में चिल्लाकर कहा जिससे कि सभी पडोसी उनकी बात को सुन सके कि सुसो यह है तुम्हारे पापों का फल, और यह कहकर वह सुसो के हाथों में वह बच्चा पकडाकर चली गई । सुसो भौचŠका हो गया । एक ही पल में उसकी इज्जत शहर के अंदर खतरे में पड गई । उसने उस बच्चे को उठाया परमेश्वर के सामने घुटने टेके और कहा, परमेश्वर आप ही जानते है कि मै निर्दोष हॅूं, अब बताएं कि मै Šया करू? परमेश्वर ने उत्तर दिया, जो मैने किया वही तू कर, औरों के पापों के लिए दु:ख उठा । सुसो ने परमेश्वर की बात को माना और अपनी सफाई में कभी किसी से कुछ न कहा । उसे इस बात की संतुष्टी थी कि परमेश्वर को सारी सच्चाई मालुम है और औरों के द्वारा गलत समझे जाने के लिए वह तैयार था । कई वर्षो बाद उस महिला को अपने पापों का अहसास हुआ और वह लौटकर सुसो के द्वार पर आई और सारे पडोसियों को समझाकर कहा कि मैने झूठ बोला था, परंतु सुसो निर्दोष था । परंतु इतने वषा] के दरम्यान Šया हुआ? हैन्‌री सुसो की प्रार्थनाआंे का जवाब दिया गया । वह अपने स्वामी की तरह टूटा और नम्र बना । परमेश्वर सुसो के जीवन में शुध्दिकरण का कार्य सफलतापूर्वक कर पाये, जिससे कि मनुष्य की राय से बढकर उसे हमेशा परमेश्वर की राय महत्वपूर्ण लगे ।

Šया आप प्रभु यीशु मसीह की तरह बनने के लिए अपने जीवन में इस हद तक कीमत देने को तैयार है? या फिर आप अभी भी मनुष्यों में आदर ढूंढते है?

परमेश्वर हमें भिन्न तरीकों से तोडते है, जैसे गलतफहमी के जरीये, झूठे आरोपोंं के द्वारा, लोगों के सामने अपमानित होने के द्वारा इत्यादि । इन सब परिस्थितियों में, आवश्यक है कि हम उन लोगों की तरफ न देखे जो हमें सता रहे है । हो सकता है वे हमारे भाई हों या हमारे बैरी । इससे कोई फरक नहीं पडता । प्रत्येक यहुदा इस्करूतियों के हाथों के पीछे हमारा स्वर्गीय पिता है जो हमे पीने के लिए प्याला दे रहा है । यदि हम ऐसी परिस्थितियों में पिता के हाथ को देखेंगे तो खुशी से प्याले मं से पियेंगे, फिर वह चाहे कितना भी कडवा और दर्दनाक Šयों ना हो । परंतु हम केवल यहूदा को देखेंगे और अपनी तलवार बाहर निकालेंगे जैसे पतरस ने किया और लोगों के कान काट डालेंगे या चरित्र हत्या या और कुछ ।

जब हम पर हमला होता है या झूठा आरोप लगाया जाता है, तब परमेश्वर चाहते है कि हम उनके सामर्थी हाथ के नीचे अपने आपको नम्र करें । ऐसा करना उस वŠत आसान हो जाता है जिस वŠत हम परमेश्वर के हाथ को देखते है, न कि मनुष्य के ।

पिछले कुछ वषा] के दौरान मैने विश्वासियों को मेरे और मेरी शिक्षाआें के बारे में तरह तरह की बुरी बातें कहते हुए सुना । उन्होंने मेरे और मेरे परिवार के विषय में भी झूठे आरोप लगाए और मेरे विरूध्द में काफी लेख और पुस्तके लिखी।

लेकिन परमेश्वर ने मुझे हमेशा शांत रहने के लिए कहा । इसलिए मैने भी उनका जवाब कभी नहीं दिया । परिणाम स्वरूप परमेश्वर ने मुझ में और मेरे परिवार के सदस्यों में शुध्दिकरण का कार्य अद्‌भुत रीति से किया । परमेश्वर बुराई को हमारी भलाई के लिए बदल देता है ।

जैसे पौलुस ने उस ठठेरे के विषय में कहा, कि परमेश्वर आप ही एक हमारे बैरियों से उनके कार्यो के अनुसार बदला लेंगे (2 तीमु 4:14) । इसलिए बदला लेने की सभी बातों को हम सुरक्षित परमेश्वर के हाथों मेें सौप सकते है (रोम 12:19) ।

यह अच्छा है कि हम सभी बातों को परमेश्वर को सौप दे । वह जानते है कि वह Šया कर रहे है । और सब कुछ उन्हीं के नियंत्रण में है । वह हमें प्रभु यीशु मसीह की समानता में ढालने के लिए हमें वैसा ही तोडते है जैसे कि एक शिल्पकार औजार से पत्थरों को आकार देता है । पत्थर के कुछ भाग इतने कठिन होते है कि उसे तोडने के लिए परमेश्वर झूठे आरोप और सतावट का उपयोग करते है । यदि हम उस कटाई के आधीन हो जाएं, तो अंत में हम मसीह के स्वरूप वाले आत्मिक अधिकार प्राप्त व्यŠत बनकर उभरेंगे ।

जब यहूदा ने यीशु को धोखा दिया तब प्रभु यीशु ने उसे मित्र कहकर पुकारा, Šयोंकि उन्होंने अपने पिता के हाथों को स्पष्टता से देखा था । यदि हम अपनी सभी परिस्थितियों में परमेश्वर के प्रभुत्व को देखेंगे, तो अपने आप को नम्र करने के लिए हमें आसानी होगी । और परमेश्वर के लिए यह आसान हो जायेगा कि वह हमें उचित समय पर उठाये । परमेश्वर को मालूम है कि वह उचित समय कब है कि वह हमारे कंधों से बोझ हटाकर हमें अधिकार दे । इसलिए हम उनकी बाट जोहते रहें । कोई भी व्यŠत जो उनकी बाट जोहता है वह कभी निराश नहीं होगा और न ही सामर्थ (यशायाह 49:23) ।

उठाए जाने का अर्थ यह नहीं, जैसा कि मैने पहले भी कहा कि परमेश्वर इस संसार में हमारी तरŠकी करें । वह हमें बडी मसीही संस्थाआें का प्रधान नहीं बना देगा । व्यŠतगत रीति से मैं किसी भी संस्था का प्रधान नहीं बनना चाहता, बडी संस्थाआें की बात तो छोड ही दो । मै केवल परमेश्वर का और लोगों का सेवक बनना चाहता हूँ और केवल वही करना चाहता हँू जो परमेश्वर मुझे करने के लिए कहे और उन लोगों की जिम्मेदारी लूँ जिन्हें परमेश्वर ने मुझको सौपा है, फिर चाहे वे दस लोग हो या दस हजार । परमेश्वर उस संख्या को ठहराते है, न की मै । और मै यकीनन इस बात में दिलचस्पी नहीं रखता कि मैं लोगों या पैसों पर या संपत्ति पर अपना नियंत्रण रखूँ । मै केवल वचन के प्रचार तथा इस जरूरतमंद संसार में औरों की सेवा में लगे रहना चाहता हूँ ।

हम प्रभु यीशु के पदचिन्हों पर चलते रहें । लोगों को हमारे विरूध्द जो बुरा वे कहना चाहते है कहने दो । यदि हम परमेश्वर के पीछे चलने के लिए गंभीर है, तो हम जानेंगे कि वह हमें कई कठिन अनुभवों में से ले जाते है । परंतु इन सब बातों में उनका उद्देश्य हमें लोगों की राय तथा उस जंजीर से मुŠत करने का होगा जो हमें पृथ्वी पर बाँधकर रखता है, ताकि हम ऊकाब की नाई आसमान में ऊँची उडान भर सकें (यशायाह 40:31) ।

परमेश्वर हमारी परिस्थितियों को यह आज्ञा देंगे कि हम मनुष्य के सामने नम्र बनें, कि अंत में हम उस स्थान में पहुँच जाएँ जहाँ हमें केवल परमेश्वर की राय ही उत्तम लगे । फिर हमारा आत्मिक अधिकार सचमुच में शŠतशाली होगा । हम में से हर एक के साथ ऐसा ही हो ।

अध्याय 14
मलिकिसिदक का याजक पद

आत्मिक अगुवा अपने स्वामी प्रभु यीशु की तरह, परमेश्वर के सम्मुख मलिकिसिदक की तरह एक याजक होगा (इब्रानियों 6:207:7) ।

मलिकिसिदक का याजकपद लेवियों के याजकपद से बिलकुल भिन्न है (इब्रानियों की पत्री 8) । लेवियों के याजकपद में कई प्रकार के रीति रिवाज और बाहरी बातें होती है । हारून के पुत्रों को यहाँ तक बताया गया था कि जब वे परमेश्वर के सम्मुख सेवा टहल करते है उस वŠत किस प्रकार के अंदरूनी कपडे पहनने उन्हें चाहिए (लैव्यववस्था 6:10, 16:4) । परंतु मलिकिसिदक के याजकपद का कपडों और रिवाजों से कोई लेना देना नहीं है ।

मलिकिसिदक पूरी बाइबल में केवल तीन वाक्य में ही प्रकट हुआ है, फिर भी हमारे प्रभु को उसके नाम के अनुसार एक महायाजक कहा गया है (उत्पत्ति 14:18-20) ।

मलिकिसिदक ने ऐसा Šया किया जिसकी वजह से वह इतना अद्‌भुत माना गया ?

इब्राहीम युध्द करके लौट रहा था जहाँ उसने चौदह राजाआें को और उनकी सेनाआें को हटाकर अपने भतीजे लूत को और उसके परिवार को छुडाया जिन्हें उन राजाआें के कैद कर रखा था । इब्राहीम वास्तव में थका हुआ था और अपनी जीत पर घमंड कर रहा था, Šयोंकि उसने वह युध्द 318 नौकरों की मदद से ही जीता था, उनमें से एक भी सिपाही नहीं था । उसने लूट का माल बहुत संख्या में पाया जो कि उन दिनें की रीति के अनुसार युध्द की जीत के बाद एक दूसरे में बाँट दिया जाता था । इसमें कोई शक नहीं कि उसके वे तीन सौ अठराह नौकर अमीर बनने की बात सोच रहे थे ।

वे और इब्राहीम उस दिन थके हुए थे और दो प्रकार खतरों के बीच में खडे हुए थे एक की जीत का घमंड और दूसरा लुटे हुए धन की लालच । परंतु उसे इन खतरों से सावधान करने के लिए उसके पास कोई नहीं था । उसके पास केवल 318 नौकर थे । इब्राहीम नि:संदेह परमेश्वर का बडा जन था, परंतु वह एक अकेला व्यŠत भी था । वह उतना ही अकेला था, जितना कि आज के कई मसीही अगुवे अकेले होते है, जो अपनी संस्था के सबसे ऊँचे पद पर होते है और उनके हाथ के नीचे केवल हाँ करनेवाले लोग होते है, और उनकी गलती निकालने वाला, उन्हे आवाहन देने वाला कोई नहीं होता । ऐसे लोग शैतान के निशाने बडे आसानी से बन जाते है जिन्हें वह एक एक करके उठाता जाता हैं ।

परंतु परमेश्वर इब्राहीम की फिक्र किया करते थे और उन्होंने दूसरे दास से उसकी मदद करने के लिए कहा । मलिकिसिदक ने इब्राहीम की तीनों जरूरतों को पूरा किया, Šयोंकि उसने बगैरे यह जाने कि वे जरूरतें कौनसी थी, वही किया जो परमेश्वर ने उसे करने के लिए कहा था ।

सबसे पहले उसने इब्राहीम के लिए भोजन लाया । मलिकिसिदक एक समझदार व्यŠत था । वह उन लोगों में से नहीं था जो अति आत्मिक थे और जो ऐसा सोचते थे कि आत्मिक लोगों को त्यागी होना चाहिए । उसने इब्राहीम को उपवास और प्रार्थना करने को नही कहा, परंतु उसे खाने के लिए उत्तम भोजन दिया । कई वर्षो बाद परमेश्वर ने एलिया के लिए जब वह निराश और थका हुआ था, वही किया । परमेश्वर ने एक दूत को भेजा, उसे चेतावनी देेने के लिए नहीं, परंतु स्वादिष्ट भोजन देने के लिए (1राजा 19:5-8) । हमारे लिए भी यह एक अच्छा उदाहरण है कि हम थके और निराश भाईबहनों के लिए अच्छा भोजन लेकर जाएं । जब कोई विश्वासी निराश या कमजोर महसूस करता है, तो हो सकता है कि उसे चेतावनी की नहीं, परंतु कुछ अच्छे भोजन की आवश्यकता हो, Šयोंकि हम यह कभी न भूलें कि वह केवल प्राण और आत्मा है, परंतु वह शरीर भी है ।

इब्राहीम को भोजन देने के बाद मलिकिसिदक ने आत्मिक रीति से भी उसकी साहयता की, यह उसने प्रचार करके नहीं किया, परंतु दो छोटे वाŠयों में उसकी जीत के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए उसने उसकी मदद की ।

उसने कहा, धन्य हो, हे परम प्रधान के इब्राहीम, जो आकाश और पृथ्वी के मालिक है । और धन्य है परम प्रधान परमेश्वर जिन्होंने तेरे शत्रुआें को तेरे वश में किया (उत्पत्ति 14:19,20) ।

मलिकिसिदक लगभग दो घंटो तक इब्राहीम और उसके नौकरों को भोजन खिलाता रहा, और फिर उसने 15 सेकंड परमेश्वर की स्तुति की । परंतु मलिकिसिदक की छोटी सी स्तुति के शब्दों में इब्राहीम दो बातें सीख पाया ।

सबसेपहली बात इब्राहमी को इस बात का अहसास हुआ कि वह एक ऐसे परमेश्वर का जन है जो स्वर्ग और पृथ्वी के मालिक है । जिन्होंने उसे सदोम के राजाआें की लूट के माल का लालच करने से बचाया जिससे उसने युध्द किया था । हालांकि सदोम का धन लालच के योग्य रहा होगा, Šयोंकि सदोम यह एक अति संपन्न नगरी थी, फिर भी इब्राहीम ने परमेश्वर की तुलना में जो स्वर्र्ग और पृथ्वी का मालिक है, सदोम के धन को कचरे की नाई तुच्छ जाना । मलिकिसिदक ने इब्राहिम की सहायता की ताकि वह जाने कि वह किसका जन है ।

मलिकिसिदक की बुध्दि पर यहाँ गौर करें । उसे इब्राहीम को उपदेश देते हुए यह नहीं कहा कि, परमेश्वर ने मुझ से कहा कि तुम लालची हुए जा रहे हो और मै तुम्हें परमेश्वर की ओर से चेतावनी का शब्द सुनाने आया हूॅ । नही ! उन स्वयं नियुŠत भविष्यवŠताओ से सावधान रहे, जो हमेशा दावा करते है कि उनके पास आपके लिए परमेश्वर की ओर से कोई शब्द है ! ऐसे भविष्यवŠता झूठे भविष्यवŠता है । मलिकिसिदक ने इब्राहीम का ध्यान लूट की दौलत से हटाकर परमेश्वर की ओर ले गया । और इस संसार की वस्तुएँ इब्राहीम की नजरों में अजीब रीति से धुँधली होती गई । लोगों की सहायता करने का यह एक तरीका है । हम मलिकिसिदक के करूणामय तौर तरीकों से बहुत कुछ सीख सकते है, जिने इब्राहीम को एक गंभीर आत्मिक खतरे से, जिसका इब्राहीम सामना कर रहा था, बचाया ।

दूसरी बात इब्राहीम ने स्पष्ट रीति से देखा कि उन राजाआें को हराने के पीछे वह या उसके 318 नौकर नहीं थे, परंतु परमेश्वर थे । वह एक दूसरा प्रकाशन था जिसने इब्राहीम को घमंड से बचाया । और मलिकिसिदक सफलतापूर्वक इब्राहीम का ध्यान उसकी जीत से हटाकर परमेश्वर की ओर ले गया।

सबसे उत्तम प्रचारक वह है जो हमारे ध्यान को हम से हटाकर तथा हमारे काया] से घटाकर परमेश्वर अपने स्वयं की ओर ले जाता है ।

एलिपस, बिलदद,सोपर तीन अति धार्मिक प्रचारक जिन्होंने अय्युब को भाषण दिया, उनकी तुलना में मलिकिसिदक बिलकुल विपरीत था । वे तीन प्रचारक फरीसियों के पूर्वज थे । आज मसीहत में हम फरीसियों की कई संतानों को पाते है । आज हमें जो चाहिए वह है कई मलिकिसिदक ।

और अब हम कहानी के सबसे उत्तम भाग की ओर आते है जहाँ यह लिखा हुआ है कि मलिकिसिदक इब्राहीम को आशीष देने के बाद उस स्थान से अदृश्य हो गया । हम बाइबल में उसके बारे में और कुछ नहीं पढते, केवल यही कि उसका नाम मसीह के अनुरूप में प्रकट होता है ।

हो सकता है मलिकिसिदक उस दि सुबह अपने तंबू में प्रार्थना कर रहा होगा जब परमेश्वर ने उससे बातें की और उसे बताया कि उसे Šया करना होगा। वह इब्राहीम को नहीं जानता था, परंतु परमेश्वर को जानता था । और इतना ही काफी था । परमेश्वर ने उसे बताया कि उसे Šया करना है, और उसे बहुतों के लिए आशीष का कारण बनाया ।

Šया ही अद्‌भुत सेवा के लिए हम जो मलिकिसिदक के अनुसार याजक है, बुलाए गए है ! हमें लोगों को शारीरिक तथा आत्मिक रीति से आशीष देना है और धन्यवाद कहे जाने के पहले ही वहाँ से हट जाना है ।

आप Šया चाहते है कि लोग आपके बारे में यह सोचे कि आप परमेश्वर के महान दास है या आप चाहते है कि वे जाने की आपके परमेश्वर महान है । आत्मिक सेवा और धार्मिक सेवा के बीच में Šया अंतर है यह इसी के द्वारा दिख पडता है । वहाँ हारून के महायाजक पद और मलिकिसिदक के महायाजक पद के बीच के अंतर को देखा जा सकता है । हारून लगातार लोगों के सामने प्रकट होता रहा और उनका आदर पाता रहा । मलिकिसिदक लोगों की सहायता करता और वहाँ से अदृश्य हो जाया करता था !

प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने पृथ्वी पर के जीवनकाल में लोगों की सेवा इसी प्रकार की थी । वह जगह जगह जाकर लोगों से मिलते और उनकी आत्मिक शारीरिक जरूरतों को पूरी करते, जो जीवन के संघषा] में जख्मी हो गए थे । वह नहीं चाहते थे कि उनके द्वारा की गई चंगाईयों का कोई प्रचार करें । वह नहीं चाहते थे कि वह चंगा करनेवाले इस नाम से जाने जाए । वह कभी राजा नहीं बनना चाहते थे । वह लोगों की सहायता करने आये तथा अपना जीवन उनके लिए अर्पण करने आए । वह प्रसिध्दी नहीं चाहते थे । वह हेरोद या पिलातुस या अन्नास या कैफा, इनमें से किसी को भी अपने आप को परमेश्वर का पुत्र होने की बात साबित करके नहीं दिखाना चाहते थे, अपने पुनरूत्थान के बाद उन्होंने किसी भी फरीसी या सदुकी पर अपने आप को प्रकट नहीं किया, Šयोंकि वह मनुष्य के बीच अपनी सफाई प्रस्तुत नहीं करना चाहते थे । वह जानते थे कि मनुष्य की राय केवल कचरे के डिब्बे में फेंके जाने योग्य हैं ।

आह, आज मसीहत में इस प्रकार के अगुवे और प्रचारक कहाँ मिलेंगे?

जरा सोचिए कि वह बात कैसी होगी यदि हम मलिकिसिद की तरह जीना शुरू करें, परमेश्वर की सुनना और उनसे हमारे प्रतिदिन के कार्य के लिए मार्गदर्शन की खोज करना । यह सबसे उपयोगी किस्म का जीवन होगा जो पृथ्वी पर हम में से कोई भी जी सकता है ।

भजन का लिखनेवाला कहता है, निश्चय भलाई और करूणा जीवन भर साथ साथ बनी रहेगी , (भजन 23:6) । जीने का यही तरीका है । हम जहाँ भी जाएं, हमें अपने पीछे भलाई या क्षमा का कोई शब्द या कार्य छोड जाना चाहिए।

जब पतरस ने कुरनेलियुस को प्रभु यीशु की सेवा और जीवन का बयान किया तो उसने सब कुद इसी एक वाŠय में कहा, परमेश्वर ने किस रीति से यीशु नासरी को पवित्र आत्मा और सामर्थ से अभिषेक किया : वह भलाई करते, और सबको जो शैतान के सताए हुए थे, अच्छा करते फिरते, Šयोंकि परमेश्वर उनके साथ थे । पवित्र आत्मा से अभिषेक पाने का यह प्रतिफल है। परमेश्वर हमारे साथ रहेंगे और हम हर जगह जाकर लोगों को आशीष देंगे तथा उन्हें मुŠत करायेंगे ।

आप बिना प्रभु यीशु से कुछ प्राप्त किये उसके पृथ्वी पर के जीवन के संपर्क में नीं आ सकते, जिससे कि आपको आत्मिक और शारीरिक दोनों भी आशीष मिले । वह स्त्री जिसे बारह वषा] से लोहू बहने की बीमारी थी उसने यह बात तब जानी जब उसने उनके वस्त्र को हुआ ।

Šया हम भी ऐसा ही जीवन जीने के लिए नहीं बुलाए गए जिससे कि जो भी हमारे संपर्क में आए वह आत्मिक और शारीरिक, दोनों भी आशीषें पाए?

हम सब मलिकिसिदक के अनुसार याजक होने के लिए बुलाए गए है ।

अध्याय 15
एक आदर्श

आत्मिक अगुवा औरों के सामने एक ऐसा आदर्श रखेगा ताकि वह औरों से यह कहने पाये कि, मेरा अनुसरण करो, जैसा कि मैं मसीह का अनुसरण करता हूँ । वह प्रयास करेगा कि वह औरों को प्रत्यक्ष प्रभु यीशु मसीह से जोडें जो कलीसिया के सिर है ।

परंतु देखा गया है कि कई मसीही अगुवे, विश्वासियों को अपने साथ ही जोडने की कोशिश करते है । और जब वे पाते है कि ये विश्वासी लोग, दूसरे अगुवों की तुलना में उनसे ज्यादा जुडे होते है, तो वे बहुत खुश रहते है । ऐसे अगुवे अपने झुंड के लिए छोटे से ईश्वर बन जाते है । वे प्राचीनों की आधीनता के विषय में वचन में दी गई शिक्षा का अपने स्वार्थ के लिए दुरूपयोग करते है ।

बाइबल बताती है कि एक दिन ख्रिस्त विरोधी परमेश्वर के मंदिर में बैठकर अपने आपको लोगों के सामने परमेश्वर के रूप में पेश करेगा (2थिस्सलुनीकियों 2:4) । कलीसिया परमेश्वर का मंदिर है, और प्रेरित युहन्ना ने कहा है कि उसके समय में भी कलीसियाआें के लोगों के अंदर ख्रिस्त विरोधी की आत्मा थी (1यूहन्ना 2:18,19) । आज ऐसे और भी कई है ।

पाप इस विश्व मेें तब आया जब एक सिरजे हुए जन ने ऊँचा उठकर बडा बनने की चाहत में औरों की नजरों में अपने आपको परमेश्वर के समान बनाना चाहा । इसी कारण से लुसीफर शैतान बन गया, यह बात हमें नहीं भुलना चाहिए। यदि हम कभी उस आत्मा को हमारे अंदर पाते है तो हमें यह पहचानना होगा कि वह कौन है अर्थात्‌ शैतान की आत्मा ।

दूसरी ओर, उध्दार तब आया जब परमेश्वर के प्रभु यीशु ने खुद को नम्र और दीन बनाया । और जहाँ तक संभव हो सका उन्होंने अपने आपको अदृश्य रखा । हमें भी इस बात को भूलना नहीं चाहिए ।

पाप लुसीफर के अहंकार की वजह से आया और उध्दार प्रभु यीशु मसीह की नम्रता के कारण आया ।

जब लोग आज के मसीही अगुवों को अपने नाम का ढिंढोरा पीटते हुए तथा अपनी पत्रिकाआें में अपनी तस्वीरे छापते हुए देखते है, तब Šया आपको लगता है कि लोग उनमें प्रभु यीशु की सच्ची तस्वीर को देखते है, जिन्हाेेंने अपने आपको दीन और नम्र बनाया था ? बिल्कुल भी नहीं ।

वह आदर्श, जो आज के युवा विश्वासियों की जरुरत है, वह है, खुद को घटाने वाले, नम्र और दीन बनाने वाले लोग जो अपने आपको छुपा कर और अपरिचित रह कर, और अपने विषय में बडी चर्चा की लालसा न रखकर अपना काम चुपचाप से करके चले जाते है । यदि वह सेवा है जिसकी लालसा हम सभों को करनी चाहिए ।

मान लीजिए, आपने प्रभु के लिए कोई कार्य किया हो और किसी को पता नहीं चहा कि वह कार्य आपने किया है । इस बात से आपको उत्साहित होना चाहिए । इतना ही नहीं, परंतु आपके किए हुए कार्य का श्रेय यदि कोई और ले जाए तो आपको इससे और भी ज्यादा उत्साह मिलना चाहिए । और यदि आप इस प्रकार का स्वभाव रखते है, तो आप सचमुच में मलिकिसिदक के अनुसार याजक है ।

एक युवा मसीही होने के नाते, मुझे आज भी याद है कि जब मै कलीसिया के अगुवें और प्राचीनों के बीच में बैठता था उन दिनों में मैने उनमें से किसी में भी मसीह का आत्मा नहीं पाया, इस बात का मुझे बहुत अफसोस है । मैं उनका न्याय नहीं कर रहा हूँ Šयोंकि मै उनका न्यायाधीश नहीं हॅूं । मैं केवल इतना ही कह रहा हूँ कि मैं उनको परमेश्वर का भय मानने वाले अच्छे आदर्श के रूप में, आदर नहीं दे सकता था ताकि मैं उनका अनुसरण कर सकूं ।

हमें किसी का न्याय करने की आवश्यकता नहीं है । परंतु हमें उनकी पहचान करने योग्य होना चाहिए । प्रभु यीशु ने औरों का न्याय न करने के विषय में कहा और उसके तुरंत बाद ही उन्होंने अपने शिष्यों से यह कहा कि वे सूअरों, कुत्तों और झूठे भविष्यद्वŠताआें को औाें के बीच में सावधानी से पहचान लेना सीखें (मत्ती 7:1की तुलना 6 वें और 15 वें वचन से करें)। यदि हम में परखने की योग्यता न हो तो हम कुत्तों और झूठे भविष्यवŠताआें के द्वारा गुमराह किये जा सकते है (फिलिप्पियों की पत्री: 3:2 देखे) ।

इसीलिए मै अपने प्राचीनों का न्याय नहीं कर रहा था, परंतु मैं उनका अनुसरण करने हेतु उनमें एक अच्छे आदर्श को उनके जीवन में नहीं पा रहा था, Šयोंकि उनमें सेवक की वह आत्मा नहीं थी जो प्रभु यीशु में थी। वे लोग उनमें से नहीं थे जो प्रभु यीशु के समान संतो के पाँव धाने को तैयार हो । इसीलिए मैने उस वŠत यह निर्णय लिया कि मै केवल प्रभु यीशु ही की ओर देखूंगा, जब तक कि मै किसी मसीही अगुवे को ना पा लूँ जो अनुसरण करने हेतु आदर्श रखता हो।

हमारे पास आनेवाली पीढी को, मसीह की समानता सचमुच में Šया होती है इसका प्रदर्शन करने की एक बडी भारी जिम्मेदारी सौपी गयी है । लोग जो हमें देखते है कि हम किस प्रकार जीते है, किस प्रकार सेवा और प्रचार करते है, वे हममे सचमुच में यह देखने पाए कि प्रभु के सच्चे सेवक होने का Šया अर्थ है, पुराने प्रेरितों और नए भविष्यवŠताआें की नाई, न कि 21वी शताब्दी के उन प्रचारकों के समान जो फिल्मी सितारों जैसे दिखायी देते है ।

चाहे हमें इस बात का अहसास हो या ना हो जहाँ भी हमी जाते है, अपने पीछे छबि को छोडते है । एक ऐसी छबि जो लोगों के दिल और दिमाग में सब भी बनी रहेगी जब हम वहाँ से चले जाएंगे और वे यह भी भूल जाएंगे कि हमने उन्हें कौनसा उपदेश दिया था ।

प्रेरितों के काम 20:17-35 में हम देखते है कि जब पौलुस ने इफिसियों की कलीसिया के प्राचीनों से विदा लेने के लिए उन्हें बुलाया, तो गौर करें कि उसने उनसे Šया कहा । उसने उन्हें स्मरण दिलाया कि वह उनके बीच तीन वषा] से रह रहा था (31वचन), और उसने उन्हें रात और दिन प्रचार किया । तीन वर्ष लगभग एक हजार दिन के बराबर होते है । और यदि पौलुस ने प्रतिदिन दो संदेश दिये हो, तो उसके अनुसार ज्सैे यहां बताया गया है, पौलुस ने शायद 2 हजार उपदेश वहाँ दिये होंगे ।

इफिसुस एक ऐसी जगह है जहाँ पर एक बहुत बडी बेदारी आयी थी, और जहाँ पर मसीहियों ने अपने सभी जादू टोना और काले जादू की पुस्तकें, जो लगभग 5 लाख रूपयों की कीमत की थी, जला दिये थे । इफिसुस यह भी जगह थी जहाँ पर पौलुस के शरीर को कोई रूमाल छू जाते थे, तो उन रूमालों को बीमारों को चंगा करने तथा दुष्टात्मा से पीडित लोगों को छुटकारा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता था । परमेश्वर ने पौलुस के द्वारा इफिसुस में कुछ ऐसे अनोखे आश्चर्यकर्म किये, जो वहाँ पर भी दुबारा देखने को नहीं मिले (प्रेरितों के काम 18:11,12, 19) ।

इन सब के अंत में, पौलुस प्राचीनों को किस बात का स्मरण दिलाता है? Šया वह अपने उपदेशों अथवा चमत्कारों के विषय में उन्हें स्मरण दिलाता है? नहीं । वह उनको कहता है कि वे उस बात का स्मरण करें कि जब से उन्होंने उसे पहली बार देखा था तब से उसने उनके मध्य में किस तरह नम्रता के साथ जीवन व्यतीत किया (वचन 19) । चाहे वे उसके उपदेशों को भूल भी गये होंगे, परंतु उसने जिस प्रकार उनके बीच जीवन व्यतीत किया था, उस बात को वे कभी नहीं भूल पाए होंगे । उसके जीवन ने उन पर एक गहरा असर डाला था। वे उसके सादेपन तथा दया को कभी नहीं भूल पाए । वह इस बात को याद करते थे कि किस तरह वह उनके बीच में अपने हाथों से तंबू बनाने का कार्य करता था जिससे कि उसका तथा उसके सहकर्मियों का गुजारा हो सके और वह उन पर बोझ न बन सके तथा अन्य मसीही कार्यकर्ताआें के लिए एक आदर्श बन जाए (वचन 34,35) । वे ये भी नहीं भूल पाए, कि उन तीन वर्षो के दौरान पौलुस ने न कभी पैसों की माँग की, न कभी पुरस्कार की, उसने यहाँ तक कि उनसे कभी एक जोडा कपडे की भी माँग नहीं की (वचन 33) ।

पौलुस ने उन्हें इस बात का भी स्मरण दिलाया कि किस प्रकार बगैर किसी समझौता किये हुए उसने परमेश्वर के वचनों की पूरी शिक्षा उन्हें दी थी (प्रेरित 20:27) । वह मनुष्य को खुश करने वाला तथा अपने नाम की बडाई का खोजने वाला नहीं था । उसने पश्चाताप का तथा सभी ऐसे विषयों का प्रचार किया जो लोगों में अप्रिय विषय थे, चाहे वे उसके सुनने वालों के लिए लाभदायक हुए हो और फिर चाहे उससे किसी को चोट भी Šयों न पहुँची हो (प्रेरितों के काम 20:20,21) । यही वह सब बाते है, जिनकी ओर पौलुस ने इशारा किया ।

यदि आप पौलुस की तरह तीन साल तक किसी कलीसिया में पासबान का काम करेंगे, और उसके बाद उसे छोडेंगे, तो आपका झुंड आपको किस बात के लिए याद रखेगा ? Šया वे आपको एक प्रभावी प्रचारक के रूप में याद रखेंगे, या फिर परमेश्वर के एक नम्र दास के रूप में जिसने अपने जीवन का आदर्श रखा हो, जैसा कि यीशु स्वयं थे? Šया वे आपके बारे में ऐसा सोचेंगे कि एक व्यŠत जिसने उन्हें परमेश्वर की ओर आकर्षित किया और मसीह की समानता में और अधिक बनने के लिए प्रेरित किया हो, या फिर एक व्यŠत जिसने उन्हें कैसे परचे बाँटे जाते है यह सिखाया हो?

हमारी बुलाहट तथा वरदान चाहे जो भी हो, वे केवल हमारे भीतरी जीवन से जो मसीह के स्वरूप में है, बहने चाहिए ।

जिसके पास चंगाई का वरदान हो वह अपने वरदान का उपयोग वैसा ही करें, जैसे प्रभु यीशु ने किया था । प्रभु यीशु एक नम्र व्यŠत थे जिन्होंने सादा जीवन व्यतीत किया, लोगों के बीच में वह खुले आम घुमे, बीमारों पर उन्होंने बडी दया दिखाई और किसी से कभी कुछ नहीं लिया, न तो चंगा करने से पहले और न ही चंगा करने के बाद । उन्होंने लोगों को मुफ्त में चंगा किया ।

परंतु मैने अपने संपूर्ण जीवन में उनके समान एक भी चंगा करने वाला प्रचारक नहीं देखा । यदि आप किसी ऐसे व्यŠत को जानते हो तो, कृपया मुझे भी बताएँ, Šयोंकि मै उससे खुशी से मिलूँगा । परंतु अब तक मै ऐसे किसी भी व्यŠत से नहीं मिल पाया ।

बजाए इसके मैने बहुत ऐसे पैसों के लोभी प्रचारक देखे है जो दिखावा करते है कि उनके पास चंगाई का वरदान है और लोगों को अपनी मानसिक चतुराई के द्वारा ठगते है ।

दु:ख की बात तो यह है कि आज के युवा जिनके पास परखने की योग्यता नही है, वे ऐसे धोखेबाजों को अनुसरण करते है और अपने लिए इसी प्रकार की सेवा को खोजते है । और इस तरह एक नई पीढी गुमराह कर ली जाती है । इसी बात से मुझे बहुत दु:ख पहुँचता हैं ।

चाहे हम प्रेरिताई सेवा के लिए बुलाए गए हों, या भविष्यवाणी की सेवा के लिए, या प्रचारकीय सेवा के लिए या पासबान की सेवा के लिए, हमारी बुलाहट हो या सिखाने की सेवा के लिए बुलाए गए है, हमारी कोई भी सेवा Šयों ना हों, हमें उसे मसीह के तरीके से ही करना चाहिए । मसीह का आत्मा हमें सभीं प्रकार की बुलाहट में प्रेरित करने पाए ।

यदि आप सोचते है कि परमेश्वर ने आपको किसी कलीसिया में पासबान होने के लिए बुलाया है, तो उस कार्य को इस तरह से कीजिए जैसे प्रभु यीशु किया करते थे । और अपने झुंड पर अंत तक बने रहनेवाली जो छाप आप छोडेंगे, वह यह मानों एक ऐसे व्यŠत के द्वारा हो जो मसीह की महिमा से प्रकाशमय हुआ हो ।

हमारी पुरानी गलतियों के विषय मेें मुझे कुछ बताने दीजिए ।

हम अपना भूतकाल नहीं बदल सकते । हमारे जीवन का वह हिस्सा पूरा हो चुका है । हम सब असफल रहे और हम पश्चाताप करके अपनी गलतियाँ कबूल करके परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हे कि वह अपने बेशकिमती लोहू के द्वारा हमारे पापों को धोकर हमें शुध्द कर दें ।

मैने अपने जीवन में बहुत गलतियाँ की है । परंतु अपनी गलतियों से मैने बहुत से पाठ भी सीखें है । इसीलिए मेरी वे सब गलतियाँ मेरे लिए व्यर्थ नहीं ठहरी । मैने औरों की गलतियों से भी बहुत से बहुमूल्य पाठ सिखें है । और इस प्रकार मै स्वयं दूसरों की गलती अपने जीवन में दोहराने से बच गया ।

हो सकता है कि भूतकाल में किय गये कई बातों के लिए हम शर्मिदंगी महसूस करते हो । परंतु एक बार जब हमने पश्चात्ताप कर लिया और जहाँ जरूरी हो वहाँ सुधार कर लिया हो, तो हम अपनी पुरानी गलतियों से कुछ सीख सकते है और भूतकाल को हमेशा के लिए पीछे फेंक सकते है ।

हम हमारी पुरानी गलतियों के कारण कभी भी शैतान को अपने जीवन में दोष लगाने या दोषी ठहराने का मौका न दें । जो मसीह में है उनमें से किसी पर भी कोई दंड की आज्ञा नहीं है ।

जब परमेश्वर हमे मसीह के लोहू से छुडाते है (रोमियों5:9),तब वह हम पर हमेशा उसके बाद इस प्रकार देखते है कि मानों हमने अपने संपूर्ण जीवन में कभी भी पाप न किया हो ।

इसीलिए शैतान को या और किसी को भी यह कहने की अनुमति न दे कि आप किसी भी लायक नहीं, सिर्फ इसलिए कि आप भूतकाल में असफल हए थे । आप परमेश्वर के हाथों के बहुमूल्य पात्र हो, Šयोंकि आपने पश्चात्ताप किया है । अपना बाकी का जीवन आप परमेश्वर की महिमा के लिए बिता सकते है ।

हम प्राचीनों के लिए यह आनंद की बात है कि हम युवाआें को शिष्य बनाएं, Šयोंकि उनके सामने उनका संपूर्ण जीवन रखा है । हमारी कलीसिया के युवाआें की युवा शŠत पर गौर करें, जो उनमें से प्रत्येक के पास है । याद रहे कि शैतान उन्हें पाना चाहता है । परंत इससे पहले कि वह उन्हें पा ले, हमें उन्हें परमेश्वर और उनके राज्य के लिए पा लेना जरूरी है ।

उन युवाआें के ह्दयों में, एक संघर्ष जारी है । यदि शैतान उन्हें उध्दार प्राप्त करने से नहीं रोक पाता है तो कम से कम वह उनसे यह तो अवश्य ही चाहेगा कि वे संसार के साथ समझौता करनेवाले बने । परंतु परमेश्वर ने आपको चरवाहे के रूप में उनके ऊपर रखा है, यह जानने के लिए कि वे प्रभु यीशु के सच्चे शिष्य बने और न कि समझौता करने वाले । इसलिए मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि अपनी बुलाहट का गंभीरता से स्वीकार करें ।

परमेश्वर हमारी सहायता करें कि हम अपने मुँह के बल गिरकर पश्चात्ताप करें और उनसे माफी माँगे उस अनादर के लिए जो हमने भूतकाल में उनके नाम को पहुॅंचाया, और युवा पीढी के विश्वासियों के सामने एक बुरा आदर्श रखा ।

वह हमारा सहायता करें कि आने वाले दिनों में हम नम्र बने और उनके लोगों के धार्मिक अगुवे बने । आमीन ।

जिसके कान हो, वह सुने ।