परमेश्वर ने माँ की रचना की

द्वारा लिखित :   श्रेणियाँ :   घर

अध्याय
नवजात शिशु की देखभाल

बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद, उसकी देखभाल का काम डॉक्टर या दाईर् द्वारा किया जाएगा।

इसके बाद, आपको हर महीने अपने बच्चे को चिकित्सा जाँच के लिए ले जाना पड़ेगा। डॉक्टर आपको टीकाकरण आदि के बारे में बताएंगे।

पहले महीने में आपका बच्चा ज्य़ादा समय सोते हुए ही गुज़ारेगा। उसकी ज़रूरतें थोड़ी ही होंगी - सोना, गर्माहट, आराम और खाना।

सोना

पहले महीने के दौरान, बच्चा शायद सिपर्फ दूध्ा पीने के लिए ही उठेगा। पिफर वह जैसे-जैसे बड़ा होगा, वह ज्य़ादा देर तक जागने लगेगा।

उसके सोने के लिए एक शांत, हवादार कमरा ;कर्षण-रहितद्ध उपलब्ध्ा कराएं। और उसे मक्ख्याेिं और मच्छरों से बचाने के लिए एक मच्छरदानी के नीचे सुलाएं।

उसे झूला झुलाकर न सुलाएं क्योंकि उसे इसकी आदत हो जाएगी, और बाद में उसकी यह आदत छुड़ानी मुश्किल हो जाएगी।

अगर आप अपने बच्चे को पेट के बल रखेंगी तो उसे ज्य़ादा अच्छा लगेगा। ऐसी अवस्था में उसे उल्टी होने पर पफन्दा नहीं लगेगा, और वह पेट की तकलीपफ़ से भी बचा रहेगा। और, उसके सिर का आकार भी सही रहेगाऋ वह चपटा नहीं होगा। लेकिन जब वह अपने पेट के बल सोए, तो आपको उस पर नज़र रखनी होगी।

गर्माहट और आराम

हमें यह याद रखना चाहिए कि बच्चे के शरीर में बड़े लोगों की तरह तापमान बनाए रखने की क्षमता नहीं होती। इसलिए गर्मी के मौसम में उसे ज़रूरत से ज्य़ादा कपड़े न पहनाएंं।

ऊनी कपड़ों से भी बच्चों की चमड़ी में खुजली हो सकती। इसलिए सर्दी के मौसम में भी जब आप उन्हें गर्म कपड़े पहनाएं, तब भी उन्हें अन्दर सूती कपड़े ही पहनाएं। यह देखने के लिए कि आपका बच्चा गर्माहट में है या नहीं, आप उसके हाथ-पैर छूकर देख सकते हैं कि वे ठण्डे या सर्द तो नहीं हो गए हैं। टोपी पहनाते समय यह ध्यान रखें कि वह जालीदार हो कि अगर वह उसके मुँह पर भी आ जाए, तो वह साँस ले सके।

जब आपका बच्चा जागे, तो यह देखें कि गीली लंगोटी ;डायपरद्ध की वजह से वह बेचैन तो नहीं हो रहा है। उसे गर्म पानी से सापफ करें और जब भी उसे नहलाएं तो उसकी तेल से मालिश ज़रूर करें। बच्चे के शरीर को अचानक ठण्ड लगने से बचाए रखना है और यह ध्यान देना है कि उसकी नाक, मुँह और कान में पानी न चला जाए। उसकी नाक और कान में से मैल सापफ करते रहना है, लेकिन उनके अन्दर ऐसा कुछ नहीं डालना है जिससे उन्हें चोट लग सके। अगर नाक बन्द हो गई है तो उसे एक मुलायम सूती कपड़े से बनी डोरी से सापफ करनी चाहिए। कान को भी इसी तरह सापफ किया जा सकता है।

जब तक बच्चे की नाभि पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, तब तक उसके पेट से जुड़ी नाड़ी का ध्यान रखना होगा। तब तक आपको उसे सूखा रखना होगा, और उसके पेट के उतने हिस्से पर एक सापफ और मुलायम पट्‌टी बाँध्नाी होगी।

अगर बच्चा थोड़ा सा भी बीमार है, तो उसे पानी से पूरा स्नान कराने की बजाए पोंछ देना अच्छा है कि उसे ठण्ड न लगे।

दूध्ा पिलाना

वास्तव में माँ के दूध्ा का कोई विकल्प नहीं है! आपके बच्चे के लिए उससे बढ़ कर और कुछ नहीं है। माँ के दूध्ा में ऐसे रोगनाशक तत्व होते हैं जो आपके बच्चे को बहुत से संक्रामक रोगों से बचाते हैं। जो बच्चे अपनी माँ का दूध्ा पीकर बढ़ते हैं, वे बहुत अच्छी तरह पफलते-पफूलते हैं, ज्य़ादा संतुष्ट रहते हैं, उनमें सुरक्षा की ज्य़ादा अनुभूति होती है, और उनके पेट में इतनी जल्दी अंतड़ियों के संक्रामक रोग नहीं होते जितनी जल्दी वे बोतल से दूध्ा पीने वाले बच्चों के हो जाते हैं।

शुरू में, सुबह 6:00 बजे से मध्यरात्राि तक, अपने बच्चे को हर तीन-चार घण्टे में दूध्ा पिलाएं। पहले महीने के बाद, आप पाएंगी कि आपका बच्चा पूरी रात सोना पसन्द करता है। तब आप उसे रात में दूध्ा पिलाना बन्द कर सकती हैं। लेकिन अगर वह भूखा हो और रात को रोने लगे, तो उसे भूखा न रखें।

एक दूध्ा पिलाने वाली माँ को ख्द़ाु भी पौष्टिक भोजन करना चाहिए जिसमें विटामिन और आयरन की गोलियाँ शामिल होनी चाहिए। उसे दिन में पर्याप्त आराम भी करना चाहिए। उसे गरम मसालेदार खाना, चॉकलेट, क़ब्ज़ की दवा, नींद की गोलियाँ, ऐस्पिरिन और दूसरी दवाइयाँ नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ये दूध्ा में से होकर बच्चे तक पहुँच कर उसे नुक़सान पहुँचा सकती हैं। छातियों को दूध्ा पिलाने से पहले और दूध्ा पिलाने के बाद, पानी से ध्ााे लेना चाहिए। आपकी छातियों मेंं दूध्ा लगा न रहने दें क्योंकि उससे मवाद भरी सूजन हो सकती है।

बोतल से दूध्ा पिलाना

अगर आपकी छाती में भरपूर दूध्ा है, तो अपने बच्चे को तब तक बोतल का दूध्ा न दें जब तक वह छ: से नौ महीने तक का नहीं हो जाता। अगर देना है तो गाय का ताज़ा दूध्ा अच्छी तरह उबाल कर देंं। बच्चों का पाउडर वाला दूध्ा सामान्यत: ताज़ा और किटाणु-रहित होता है। लेकिन डिब्बे का दूध्ा ख्ऱाीदने से पहले उसके ख़्ाारिज होने की तारीख़ ज़रूर देख लें। पीने के पानी को भी उबालना चाहिए।

शरीर के वज़न के हर एक किलो के अनुपात में, एक बच्चे को प्रतिदिन 125 मि- लीटर ताज़ा दूध्ा और 75 मि- लीटर पानी की ज़रूरत रहती है। तो एक तीन किलो के बच्चे के लिए प्रतिदिन दो बड़े चम्मच चीनी के साथ 400 मि- लीटर दूध्ा और 200 मि- लीटर पानी की ज़रूरत होगी। इन्हें दिन की पाँच ख्ऱाुाक़ों में बाँटा जा सकता है। ;अगर आप डिब्बे का दूध्ा इस्तेमाल कर रहे हैं तो उस पर लिखे निर्देशानुसार करेंद्ध।

बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होगा, उसे दूध्ा की ज्य़ादा और पानी की कम ज़रूरत पड़ेगी। गर्मियों के मौसम में, या जब भी बच्चे को दस्त या बुख्ऱाा हो, उसकी ख्ऱाुाक़ में ज्य़ादा पानी देना शुरू कर दें। कर्करेखा पर बसे भारत जैसे देशों में, जिनमें किटाणु आसानी से बढ़ते हैं, दूध्ा की बोतल और उसके निप्पल को अच्छी तरह उबालना चाहिए। बोतलों को कम-से-कम दस मिनट उबालना चाहिए, और उसके निप्पलों को अलग से हल्के नमक के पानी में उबालना चाहिए। यह ध्यान रखें कि उबाली हुई बोतल और निप्पल के भीतरी भाग को न छुआ जाए।

यह जाँच लें कि बच्चे को देने से पहले दूध्ा बहुत गर्म न हो, ऐसा न हो कि उसकी ज़बान जल जाए! पहले महीने के बाद आप उसे विटामिन की बूँदें और ताज़े पफलों का रस भी देना शुरू कर सकते हैंं। यह ध्यान रखें कि रस अच्छी तरह से छाना हुआ हो।

कुछ सामान्य बातों में सावध्नााी रखना

जिन लोगों को सर्दी या संक्रामक रोग हों, उन्हें आपके बच्चे के नज़दीक न आने दें। अगर आपको भी सर्दी हुई है, तो आप भी बच्चे को दूध्ा पिलाते समय अपने नाक और मुख को ढाँप लें।

नीचे कुछ ऐसी बातें लिखी हैं जिनके बारे में आपको तुरन्त डॉक्टर को सूचित करना चाहिए:

  1. 1- बच्चे की आँखों में से किसी भी तरह का स्त्रााव्‌ होने पर ;यह याद रखें कि पहले तीन महीनों में बच्चों की आँखों में कोई आँसू नहीं होते।द्ध
  2. 2- बच्चे की त्वचा पर किसी तरह की खुजली के चिन्ह्‌ नज़र आने पर।
  3. 3- पीलिया होने पर। बहुत से बच्चों के शरीर में तीसरे दिन पीलिया के लक्षण नज़र आने लगते हैं जो आम तौर पर एक सप्ताह में दूर हो जाते हैं। लेकिन अगर वे दूर न हों, तो डॉक्टर को सूचित करें।
  4. 4- बच्चों की चूचियों के आसपास कभी-कभी सूजन आ जाती है और उनमें से एक पीला स्त्रााव्‌ निकलने लगता है। यह कई बच्चों में सामान्य होता है लेकिन अगर उनमें मवाद पड़ जाए तो डॉक्टर को उसकी सूचना देनी चाहिए।
  5. 5- नाभि में से किसी तरह की बदबू या मवाद आने पर।
  6. 6- किसी भी जगह से रक्त का स्त्रााव्‌ होने पर जैसे - मुख, नाभि, त्वचा, मलाशय या योनि।
  7. 7- लगातार बदबूदार दस्त होने पर। ;पहले तीन महीने तक, बच्चों को प्रतिदिन तीन से चार बार पेट में मरोड़ उठते हैंद्ध।
  8. 8- बच्चे के सही तरह न बढ़ने पर। ;एक औसत बच्चे का वज़न 5 महीने में दोगुना और एक साल में तीन गुना हो जाना चाहिएद्ध।

अध्याय
एक बढ़ता हुआ बच्चा

जब परमेश्वर एक माँ को पालने और बड़ा करने के लिए एक बच्चा देता है, तो वह उसके लिए एक ज़बरदस्त और पुण्य ज़िम्मेदारी होती है। अगर एक माँ अपनी इस ज़िम्मेदारी को अनेदखा करती या इसके प्रति लापरवाह होती है, तो वह अपने बच्चे को ;शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप मेंद्ध जीवन भर के लिए अपंग बना देगी। इस कारण, एक माता को अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए कितना सचेत रहने की ज़रूरत है!

चेतावनी के ऐसे शब्द की आज के इस समय में ख्स़ाा ज़रूरत है क्योंकि आज माताओं में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि वे अपने परिवार के लिए ज्य़ादा पैसा कमाने पर ध्यान देने की वजह से अपने बच्चों को फ्आयाय् के भरोसे छोड़ देती हैं। बच्चों के प्रति ऐसी लापरवाही के परिणाम सिपर्फ बाद के सालों में ही नज़र आते हैं जब उनके बारे में कुछ भी कर पाना असम्भव हो जाता है।

हमारे पूरी करने के लिए इससे ज्य़ादा पुण्य ज़िम्मेदारी और कोई नहीं होती कि हम अपने बच्चों का पालन-पोषण एक अच्छी आत्मिक, मानसिक और शारीरिक स्वस्थता में करें।

खाना-पीना ;ख्ऱाुाक़द्ध

अगर आपका बच्चा छाती से दूध्ा पीता है, तो उसे सिपर्फ विटमिन और आयरन की बूँदों की, और उसके साथ पहले तीन महीने तक ताज़े पफलों के रस की भी ज़रूरत होगी।

जब बच्चा तीन महीने का हो जाए, तो आप ठोस आहार देना शुरू कर सकती हैंंं। सबसे पहला ठोस भोजन अन्न हो सकता है। बाज़ार में अनेक प्रकार के डिब्बाबन्द अन्न मिलते हैं। एक सबसे सस्ता अन्न रागी पाउडर है। दो चम्मच रागी पाउडर एक पतले कपड़े में बाँध्ा लें और उसे पानी के एक कप में तब तक भींच-भींच कर निकालें जब तक कपड़े में सिपर्फ उसका छिलका और चोकर ही बचे रह जाएं। इस में एक कप दूध्ा मिलाएं और पिफर उस मिश्रण को उबालेंं और तब तक हिलाएं जब तक वह गहरे भूरे रंग का न हो जाए। उसमें चीनी मिलाएं और हल्का गर्म हो जाने पर बच्चे को खिलाएं। यह बहुत पौष्टिक होता है।

बच्चा जब चार महीने का हो जाए, तो उसे अच्छी तरह पके हुए केले मसल कर ;शुरूआत में आध्ाा-एक चम्मचद्ध दिया करें। दूसरे पफल जैसे सेब को भी पका कर और मसल कर दे सकते हैं। आप बहुत से अन्न का मिश्रण भी बना सकते हैं जैसे चावल, रागी, गेहूँ, ज्वार, दाल, हरा चना आदि को ध्कााेर, सुखा कर, और पिफर पीस कर आटा बना सकते हैं। पिफर आप इस पाउडर का दलिया बना कर अपने बच्चे को दे सकते हैं।

छ: महीने के एक बच्चे के प्रतिदिन का आहार कुछ इस तरह का हो सकता है:

सुबह 6-7 बजे : माँ का दूध्ा या बोतल का दूध्ा

सुबह 9 बजे : संतरे का रस ;या टमाटर या किसी दूसरे पफल का रसद्ध। विटामिन और आयरन की बूँदें, अन्न या इडली, और कुछ देर बाद माँ का या बोतल का दूध्ा। हरी सब्ज़ियों सहित विभिन्न सब्ज़ियों को कुकर में पका कर उनका रस निकाल लें। इस रस को ठोस चीज़ों के साथ मिलाकर दिया करें।

दोपहर 1 बजे : पकी और घुटी हुई सब्ज़ियाँ जैसे गाजर आदिऋ और बोतल का दूध्ा।

दोपहर 4 बजे : बिस्किट

शाम 6 बजे : अन्न और पफल, माँ का या बोतल का दूध्ा

10 बजे : दूध्ा ;अगर वह भूखा हैद्ध।

बच्चा जब एक साल का हो जाए, तो उसके खाने में माँस और मछली भी जोड़े जा सकते हैं। हालांकि घुटी हुई सब्ज़ियों के साथ माँस और मछली पहले भी दिए जा सकते हैं, लेकिन इसकी बजाए दही और दूध्ा की बनी चीज़ें देना ही अच्छा है। यह इसलिए क्योंकि माँस और मछली के अन्दर के प्रोटीन से बच्चे के गुर्दों पर ज़ोर पड़ सकता है। इसलिए पफलियों और पत्तेदार सब्ज़ियों में पाया जाने वाला प्रोटीन ज्य़ादा अच्छा है।

एक साल का हो जाने पर आपका बच्चा दूध्ा के साथ-साथ सुबह नाश्ते में दो छोटी इडली, दोपहर और रात को चावल, दाल और सब्ज़ी खाने लायक़ हो जाना चाहिए। अगर गाय का दूध्ा दिया जाता है, तो 300 मि- लीटर कापफी होगा।

बच्चे की किसी प्रकार की दवाइयाँ, ख्स़ाा कर प्रतिजैविक दवाइयाँ डॉक्टर की सलाह बिना न दें।

बच्चे को खिलाना

  1. 1- बच्चे जब तक तीन महीने का न हो जाए, उसे ठोस खाना न दें।
  2. 2- ठोस भोजन, थोड़ी-थोड़ी मात्राा में, एक के बाद एक शुरू करना चाहिए।
  3. 3- अगर बच्चा तैयार है, तो 6 महीने के बाद उसे सारे तरल पदार्थ कप में देना शुरू कर दें ;अगर वह गिराए, तो निराश न हों, वह ध्राीे-ध्राीे सीख जाएगा!द्ध
  4. 4- अगर किसी नई खाने की वस्तु से पाचन-क्रिया में अस्वस्थता हो रही है ;उल्टी या दस्त हो रहा हैद्ध, तो उस खाने को और उसके साथ दूसरे ठोस भोजन भी बन्द कर दें। पिफर दोबारा से कोई ठोस भोजन शुरू करने से पहले थोड़ा समय तक ठहर जाएंं।
  5. 5- अगर पाचन-क्रिया की अस्वस्थता बनी रहती है, तो डॉक्टर की सलाह लें।
  6. 6- बच्चे को बोतल का दूध्ा ठोस खाना देने के बाद ही दें क्योंकि हो सकता है कि दूध्ा पीने के बाद पिफर वह ठोस आहार लेना न चाहे।
  7. 7- बच्चा अगर खाने मेंं दिलचस्पी न दिखाए, तो उसे ज़बरदस्ती खिलाने की कोशिश न करें। हो सकता है वह अपने खाने में कुछ परिवर्तन चाह रहा हो। बच्चे के खाने के समय को दिलचस्प बनाने की कोशिश करें। बहुत मीठे खाने से बचने की कोशिश करें क्योंकि उनसे भूख भी कम हो सकती है और बच्चे के दाँत भी ख्ऱााब हो जाते हैं।
  8. 8- यह याद रखें कि दूसरे साल में बच्चों का वज़न इतनी तेज़ी से नहीं बढ़ता जितनी तेज़ी से वह पहले साल में बढ़ता है। अगर दूसरे साल में बच्चे का ज्य़ादा विकास न हो तो कोई चिंता की बात नहीं है।

शौच की आदतें

पेशाब की ग्रन्थी और पेट की अंतड़ियों पर नियंत्राण दो या तीन वर्ष की आयु के बाद ही हो पाता है। लेकिन अगर आप बहुत सी मैली नैप्किन्ज़ से बचना चाहती हों तो खिलाने-पिलाने के तुरन्त बाद उसे पॉट पर बैठा सकती हैं। अगर आप थोड़ा ध्यान रखें तो आप उसके शौच के समय को जान सकती हैैंं। बच्चे को जल्दी ही टॉयलेट या पॉट का इस्तमाल करना सिखा दें कि जिससे वह खुले में मल-मूत्रा न करे।

गर्मियों में देखभाल

गर्मियों के महीनों में, बच्चे के लिए एक डायपर और एक पतला कपड़ा, और रात के समय एक सूती कम्बल कापफी है। उसे ज्य़ादा कपड़े पहनाने से बचें। जब ध्पाू में बाहर जाएं, तो बच्चे की आँखों को सूरज की सीध्ाी किरणों से बचाएं। अगर आपको गर्मी दाने नज़र आएं, तो कोई लोशन या जिन्क ऑक्साइड क्रीम आदि लगाएं।

बड़ी उम्र के लोगों की ही तरह, बच्चों को भी गर्मियों में ज्य़ादा तरल पदार्थों की ज़रूरत होती है। इसलिए बच्चे को मामूली नमक मिला हुआ बहुत सा चीनी का पानी पिलाएं। यह याद रखें कि जब बच्चे को दस्त होते हैं तो उसके शरीर में से बहुत सा पानी निकल जाता है। अगर आपके बच्चे को डायरिया हो जाए तो अपने डॉक्टर को सूचित करें। अगर यह गर्मी के महीने में हो, तो यह गंभीर हो सकता है। बच्चे के लिए हमेशा ही उबला हुआ पानी इस्तेमाल करना अच्छा है क्योंकि कर्क रेखा पर बसे भारत जैसे देश में पानी से ज्य़ादा रोग पफैलते हैं। इसलिए जब आप एक बच्चे के साथ सपफर करें, तो अपने साथ कापफी मात्राा में उबला हुआ पानी रखें।

सर्दियों में देखभाल

अपने बच्चे को ठण्ड और तेज़ हवा से बचा कर रखें। उसे अन्दर सूती और बाहर ऊनी कपड़े पहनाएं। उसको ओढ़ाने वाले कम्बल हल्के और गर्म होने चाहिए। यह ध्यान रखें कि उसके गले में कुछ कस कर न बाँध्ों। उसकी टाँगों को बचाने के लिए उसे लम्बे पायजामे पहनाएं। याद रखें कि एक बच्चे के सिर से ज्य़ादा उसके हाथ-पैरों में से गर्माहट निकल जाती है। इसलिए सर्दी में लम्बे पायजामे और मोज़े पहनाएं। अगर आप उसे कमर के नीचे सही तरह नहीं ढाँपेंगे, तो उसके सिर पर टोपी पहनाने से कुछ नहीं होगा!

उसकी गर्दन, जाँघों और बग़लों में देखें कि उसे खुजली तो नहीं हो रही है ;यह गर्मियों के महीनों में भी देखना चाहिएद्ध। अगर आप वहाँ पाउडर लगाएंगे तो बच्चों को अच्छा लगेगा। यह ख्स़ाा ध्यान रखें कि बच्चे को जहाँ डायपर पहनाया जाता है उसकी वह जगह सापफ और सूखी रहे। अगर आप बच्चे को सही कपड़े पहनाएंगी तो उसे न्यूमोनिया और पफेपफड़े की बीमारी से बचाया जा सकता है। यह आपको सुनिश्चित करना होगा कि मौसम के हिसाब से बच्चे के कपड़े सही हों, और वह आराम में, सूखा और सापफ हो, और वह अपने हाथ-पैर भी बिना किसी रुकावट चला सकता हो।

उसके सोने के लिए हर समय आरामदायक वातावरण होना चाहिए।

दाँत निकलना

छठे या आठवें महीने तक पहला दाँत निकल आता है। अकसर पहले आगे के नीचे वाले दो दाँत निकलते हैं। सामान्य तौर पर ऐसे समय में मसूड़ों की तकलीपफ की वजह से बच्चा चिड़चिड़ा और खाने में दिलचस्पी न रखने वाला हो जाता है। ऐसे समय में बहुत से बच्चों के मुख से लगातार लार भी गिरती रहती है। ऐसे बच्चों को बिब लगा कर रखें। आपको अपने बच्चे के दाँतों की अच्छी सपफाई और देखभाल सुनिश्चित करनी चाहिए। उसके खाने के बाद उसका मुँह अच्छी तरह सापफ करें या खाने के बाद पीने के लिए उसे उबला हुआ पानी दें।

स्वच्छता

बच्चे के आरम्भिक सालों से ही उसे सापफ रहने की अच्छी आदतें डालें तो वह बड़ा होकर भी स्वच्छता पसन्द करने वाला बन जाएगा।

अगर वह आपका एक शब्द भी न समझता हो, तब भी उसके साथ प्रार्थना और आराध्नाा किया करें। ऐसी बातों का उसके अर्ध्चोतन मन पर गहरा प्रभाव होगा। पिफर वह जैसे-जैसे बड़ा होगा, उसे आत्मिक स्वच्छता का भी मूल्य पता चलता जाएगा।

अध्याय
मील के पत्थर और रोग-प्रतिरक्षा

क्या यह एक रोमांचक बात नहीं कि हम अपने बच्चे को एक विशिष्ट चारित्रािक गुणों वाले व्यक्ति के रूप में विकसित होते हुए देखते हैं?

जब वह बढ़ता है, तो आपका यह सोचना स्वाभाविक है कि उसका विकास मानसिक और शारीरिक तौर पर सामान्य रीति से हो रहा है या नहीं।

ऐसे कोई आदर्श मानक ;मापदण्डद्ध नहीं होतेे जो एक सामान्य विकास की ओर संकेत करते हों।

बच्चे एक-दूसरे से भिन्न्‌ होते हैं और अगर एक बच्चा दूसरे बच्चे की तुलना में तीन महीना बाद चलता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह किसी भी तरह से असामान्य या पिछड़ा हुआ है। वह दूसरे बच्चे की तरह ही सामान्य रूप में बड़ा हो सकता है औैर स्वस्थ रह सकता है। इसलिए, इसमें व्यर्थ चिंता करने की कोई बात नहीं है।

पिफर भी, बढ़ते हुए बच्चों के विकास के विभिन्न चरणों में कुछ बातें सामान्य होती हैं:

1 महीने में : बच्चा अपनी आँखें वस्तुओं पर स्थिर कर सकेगा और ध्माीी रफ्रतार से हिलती-डुलती वस्तुओं की दिशा में उसका सिर घुमा सकेगा। पेट के बल होने पर वह अपना सिर भी उठा सकेगा।

4 महीने मेंं : वह अपनी माँ को पहचानने लगेगा, लोगों को देख कर मुस्कुराने लगेगा, चीज़ें पकड़ने लगेगा और अपने हाथों को जाँचने लगेगा। गोद में उठाने पर वह अपना सिर सीध्ाा रख सकेगा, औैर फ्किलकारीय् मारेगा और हँसेगा।

7 से 8 महीने में : वह बिना सहारा लिए बैठ सकेगा, गोद में उठाए जाने के लिए अपने बाहें पसार सकेगा, और चीज़ों को अपने मुख में रख सकेगा।

9 से 10 महीने में : बच्चा सहारे से खड़ा हो सकेगा, अभिवादन के लिए हाथ उठा सकेगा, और बैठ व खड़ा हो सकेगा।

1 साल में : वह बिना सहारे चल सकेगा, और समझ के साथ एक-दो शब्द भी बोल सकेगा। उसके सिर के ऊपर का मुलायम हिस्सा भरने लगेगा। अब तक शायद उसके 6 दाँत निकल आए होंगे, और वह अपने हाथ में एक प्याला पकड़ कर उसमें से पी सकेगा।

2 साल में : बच्चा भाग सकेगा और ब्लॉक्स बना सकेगा। वह छोटे-छोटे वाक्य बना कर बोल सकेगा और सहज निर्देशों का पालन कर सकेगा ;जब वह करना चाहेगा तब!द्ध। यही समय वह सबसे उपयुक्त समय हो सकता है जब उसकी इच्छा को अध्नाीता में रहना और उसे आज्ञापालन करना सिखाया जा सकता है। अब तक वह अपने मल-मूत्रा को ;दिन के समयद्ध नियंत्राित करना सीख चुका होगा, ख्स़ाा तौर पर लड़कियाँ यह सीख ही लेती हैं। लड़कों को यह सीखने में शायद कुछ महीने और लग जाते हैं।

सबसे ज़रूरी बात यह है कि आपको अपने बच्चे को सामान्य रूप से बढ़ने देना है।

अपने बच्चे की तुलना अपने पड़ौसी के बच्चे से न किया करें!

आपके बच्चे को कभी ऐसा कुछ करने के लिए ज़बरदस्ती न करें जिसके लिए वह अभी तैयार नहीं है, चाहे वह बैठना हो, प्याले में से पीना हो, या चलना हो। उसे उसकी अपनी रफ्रतार से बढ़ने की आज़ादी दें। जब वह बढ़ रहा हो तो उसे कुछ-कुछ करने के लिए प्रोत्साहित करते रहें जैसे अपने आप तैयार होना आदि। उसे दूसरों बच्चों के साथ खेलने के लिए भी प्रोत्साहित करें। उसे ज़रूरत से ज्य़ादा बचाए रखने की कोशिश न करें।

रोग-प्रतिरक्षा

इसमें अध्काितर अस्पताल निम्न प्रक्रिया व समय-सारणी का अनुसरण करते हैं:

  • स पहले 3 महीने के अन्दर - बी-सी-जी-
  • स 6 सप्ताह में - डी-पी-टी - ;ट्रिपल ऐन्टिजैनद्ध पहली ख्ऱाुाक़ऋ ओ-पी-वी- ;ओरल पोलियो वैैक्सीनद्ध पहली ख्ऱाुाक़़
  • स 10 सप्ताह - डी-पी-टी- दूसरी ख्ऱाुाक़़ऋ ओ-पी-वी- दूसरी ख्ऱाुाक़
  • स 14 सप्ताह - डी-पी-टी- तीसरी ख्ऱाुाक़ऋ ओ-पी-वी- तीसरी ख्ऱाुाक़
  • स 18 सप्ताह - ओ-पी-वी- चौथी ख्ऱाुाक़
  • स 22 सप्ताह - ओ-पी-वी- पाँचवी ख्ऱाुाक़
  • स 9 महीने - चिकित्सा जाँच
  • स 9-12 महीने - खसरा का टीका
  • स 18 महीने - डी-पी-टी- पहला बूस्टरऋ ओ-पी-वी- पहला बूस्टर
  • स 5 वर्ष - डी-पी-टी- दूसरा बूस्टरऋ ओ-पी-वी- दूसरा बूस्टर

डिम्थीरिया या पोलियो का ख्त़ारा होने पर दोबारा उचित बूस्टर की ख्ऱाुाक़ दिलाएं।

कोई गहरी चोट लग जाने पर टैटनस का बूस्टर टीका दोबारा लगाएं।

टी-ए-बी- ;ऐन्टी-टाइपफोइडद्ध बूस्टर हर साल लगाते रहना चाहिए।

इस दौरान, माँसपेशी ;जाँघद्ध में हैपटाइटिस बी ऐन्टिजैन ;0-5 मि-ली-द्ध का टीका लगा लेना भी ठीक रहता है। इसकी दूसरी ख्ऱाुाक़ एक महीने के बाद देनी चाहिए।

समयपूर्व जन्मे बच्चे और जुड़वाँ बच्चों की देखभाल

समयपूर्व जन्मा बच्चा वह है जो गर्भावस्था की अवध्ाि पूरी होने से पहले पैदा हुआ है या जो दो किलो से कम वज़न का है। जुड़वाँ या तीन बच्चे, गर्भावस्था काल पूरा होने के बाद भी अकसर दो किलो से कम वज़न के ही होते हैं और उन्हें भी समयपूर्व ही मानना चाहिए।

समयपूर्व जन्में बच्चे अपने शरीर का तापमान बनाए नहीं रख पाते और कभी-कभी ठीक से साँस नहीं ले पाते, निगल नहीं पाते, खाना हज़म नहीं कर पाते और संक्रामक रोगों का प्रतिकार नहीं कर पाते। वे बहुत जल्दी थक जाते हैं।

एक समयपूर्व जन्मा बच्चा वैसे तो तब तक अस्पताल में ही रखा जाना चाहिए जब तक उसका वज़न 2-5 किलो नहीं हो जाता, लेकिन आपको उसे घर में रखना हो तो निम्न बातों का ध्यान रखें:

  1. 1- बच्चे को ऐसे कमरे में रखें जिसका नियमित तापमान, अनुकूल तौर से 28 डिग्री सैल्सियस बना रह सके। उसे ख्स़ाा तौर हवा के तेज़ झोंकों से बचा कर रखें। सर्दियों में बिस्तर को गर्म पानी की बोतल से गर्म रखा जा सकता है।
  2. 2- बच्चे का तब तक पूरा ध्यान रखें जब तक उसकी साँस नियमित और सहज न हो जाए। उसका सिर नीचा रखें कि उसके गले में बनने वाले पदार्थों का स्त्रााव्‌ उसके गले में पफंदा लगाने की बजाए उसकी मुँह में हो कर निकल सके।
  3. 3- उसे ज्य़ादा गोद में लेने की कोशिश न करें क्योंकि इससे वह जल्दी ही थक जाएगा।
  4. 4- दूध्ा पिलाना। जो बच्चे दूध्ा नहीं खींच पाते, उन्हें ड्रॉपर से दूध्ा पिलाया जा सकता है। जो निगल नहीं सकते, उन्हें नली से खिलाना पड़ता है। शुरू में शायद वे दूध्ा सहन न कर सकें इसलिए उन्हें चीनी का पानी दिया जा सकता है। ;250-300 मि-ली- पानी में एक टेबलस्पून चीनी मिलाएं।द्ध ध्राीे-ध्राीे उन्हें पानी मिला दूध्ा दिया जा सकता है। चौथे या पाँचवें दिन बच्चे को विटामिन सी, और एक सप्ताह बाद विटामिन ए और विटामिन डी की बूँदें पिलाई जा सकती हैं।
  5. 5- बच्चे को संक्रामक रोगों से बचा कर रखें। दूध्ा पिलाते समय सपफाई का और अपने आपको सापफ रखने का बहुत ध्यान रखें।

बच्चा जब 2-5 किलो का हो जाए तो उसे एक सामान्य बच्चे की तरह मानें। सामान्य रूप से विकसित होने में शुरू में वह ध्माीा होगा, लेकिन पिफर सामान्य हो जाएगा। बहुत कमज़ोर और कुपोषित बच्चों के लिए ख्स़ाा ख्ऱाुाक़ें मिलती हैं।

एक अनिवार्य बात

आप अपने बच्चे को बड़ा नहीं कर सकते। सिपर्फ परमेश्वर ही ऐसा कर सकता है। लेकिन आप उसके स्वास्थ्यवर्ध्का विकास के लिए एक वातावरण तैयार कर सकते हैं।

इस ज़िम्मेदारी को पूरा करते हुए, एक सबसे फ्अनिवार्यय् बात यह है कि आपको अपने बच्चे के साथ समय व्यतीत करना पड़ेगा। कभी इतने व्यस्त न हो जाएं कि यह बात आपकी व्यस्त दिनचर्या में से बाहर निकल जाए। यह आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

यह समय निकालने के लिए शायद आपको कुछ दूसरी बातों को दूर हटाना पड़ेगा, लेकिन आगे जाकर आपको इससे बड़ा लाभ होगा।

अध्याय
शारीरिक खामियाँ और दूसरी मुश्किलेें

परमेश्वर अपने ही बच्चों के परिवारों में दु:ख और बीमारी क्यों आने देता है, इस बात का कोई आसान जवाब नहीं है। शायद इसका उद्देश्य हमें परमेश्वर की कृपा और सामर्थ्य का ज्य़ादा भरपूर अनुभव देना हो सकता है ; 2 कुरि-12:7-10द्ध , या इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इस तरह हम दूसरों के साथ ज्य़ादा संवेदनशील हो सकें ; 2 कुरि- 1:4-8द्ध।

हमें उपलब्ध्ा हर तरह की उस चिकित्सा सुविध्ाा के लिए परमेश्वर का ध्न्यावाद करना चाहिए। और हाँ, वह अद्भुत रीति से भी चंगा कर सकता है।

यहाँ दिए गए निर्देश आपको यह जानने में मदद करने के लिए हैं कि आपको कब एक डॉक्टर के पास जाना चाहिए। ये निर्देश इसलिए नहीं हैं कि ये आपके लिए डॉक्टर के पास जाने का विकल्प बन जाएं।

रोग प्रतिकारक शक्ति को तैयार होने में वर्षों लगते हैं। यह स्पष्ट है कि बच्चों में ऐसी रोग प्रतिकारक शक्ति नहीं होती इसलिए वे बड़ी उम्र के लोगों से ज्य़ादा जल्दी-जल्दी और ज्य़ादा गंभीर रूप में बीमार पड़ते हैं। इसके अलावा वे अपनी तकलीपफ़ बताने में भी असमर्थ होते हैं। वे सिपर्फ रो सकते हैं। इसलिए माताओं के रूप में हमारे लिए बच्चों की कुछ सामान्य शिकायतों के बारे में जान लेना अच्छा है।

शारीरिक खामियाँ

चुन्ध्याािई हुई या बहंगी आँखें : पहले दो-तीन महीनों तक बच्चों की आँखें बहंगी नज़र आ सकती हैैं क्योंकि वे अपनी नज़र को लक्षित या स्थिर नहीं कर सकते। अगर यह दशा डेढ़ या दो साल तक बनी रहे, तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो जो आँख कमज़ोर है वह पूरी तरह ख्ऱााब हो सकती है।

अवरु( अश्रु-नलिका : कभी-कभी ऐसा होता है कि एक आँख या पिफर दोनों ही आँखों में सेे पानी और एक चिपचिपा पीला पदार्थ निकलता रह सकता है। इसकी सूचना डॉक्टर को देनी चाहिए कि अश्रु-नलिका को खोला जा सके। यह एक साल की अवस्था से पहले हो जाना अच्छा है।

साँस में खरखराहट : बच्चा जब पीठ के बल लेटा होता है, तब यह ज्य़ादा होती है, उसे करवट से लिटाने से इसमें राहत मिल सकती है। अकसर यह छठे महीने तक ग़ायब हो जाती है। एक बच्चे की साँस में, जो अब तक ख्म़ाााेशी से साँस ले रहा था, अचानक खरखराहट पैदा हो जाए तो इसकी जानकारी तुरन्त डॉक्टर को देनी चाहिए।

चिरा-होंठ व तालू : जिन बच्चों की यह दशा होती है, वह अपने दूध्ा को आसानी से पफेपफड़ों में पहुँचा देते हैं। उन्हें सर्दी भी जल्दी हो जाती है। उन्हें दूध्ा पीने में भी तकलीपफ हो सकती है। जो भी हो, उन्हें शल्य-चिकित्सा ;सर्जरीद्ध की ज़रूरत पड़ेगीऋ उनके लिए जितनी जल्दी हो सके, डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

हर्निया ;अन्त्रावृ(द्ध: यह नाभि के क्षेत्रा में पेट के अन्दर सूजन आ जाना होता है। जब बच्चा रोता है, खाँसता है, या ज़ोर लगाता है, तब उसके पेट का उभार ज्य़ादा सापफ नज़र आता है। यह अकसर सर्दी या किसी बीमारी के बाद होता है। कई बार यह गाँठ ;अन्दर की तरपफ दबा करद्ध एक टेप से बान्ध्ा देने से ख्त्म़ा हो जाती है। अगर वह ठीक न हो, तो उसे सर्जरी द्वारा ठीक करना होगा। ऐसा बहुत कम होता है, लेकिन अगर अंतड़ियाँ इस गाँठ में उलझ जाएं, तो तुरन्त डॉक्टर के पास जाएं क्योंकि यह बहुत ख्त़ारनाक हो सकता है।

जन्म के निशान : बहुत से नए जन्में बच्चों की त्वचा पर काले ध्ब्बो होते हैं। ये अकसर समय के साथ-साथ मिट जाते हैं। लेकिन अगर यह ध्ब्बो बढ़ते हुए नज़र आएं तो डॉक्टर को सूचित करें।

समस्याएं और बीमारियाँ

बच्चे अपनी भूख और बेचैनी रोने द्वारा प्रकट करते हैं। वैसे, कई बार वे अकारण भी रोने लगते हैं, इसलिए आपको पहले उनके रोने का कारण जान लेना चाहिए। बच्चा तब भी रोता है जब उसे अपनी करवट बदलनी होती है, वह गीला या गन्दा हो जाता है, या बहुत ठण्डा या बहुत गर्म, या नींद में होता है। यह भी हो सकता है कि उसकी पाचन क्रिया में कोई समस्या हो। जब बच्चा भूख से रोएगा तो वह अपने हाथ भी चबा सकता है। जब उसका वज़न न बढ़े, तो इसकी वजह यह हो सकती हैै कि उसे भरपेट दूध्ा नहीं मिल रहा है।

अगर बच्चे में निम्न लक्षण नज़र आएं, तो डाक्टर को सूचित करेंं: चिड़चिड़ापन और नींद से बोझिल रहना, लगातार दूध्ा पीने से इनकार, असामान्य रूप में रोना और रिरियाना, उल्टी, तेज़-तेज़ साँस चलना, आवाज़ में ख्ऱााश, खाँसी, दस्त, 38 डिग्री सैल्सियस से ज्य़ादा बुख्ऱाा, मरोड़ उठना, या बच्चे के सामान्य व्यवहार में नज़र आने वाला कोई बदलाव।

पाचन क्रिया की समस्याएं

दस्त व उल्टी : इसमें बच्चे का मल बहुत बदबूदार और पानीनुमा होगा औैर उसमें बिना पचा हुआ दूध्ा भी होगा, या उसमें हरी लार और ख्ऩाू भी होगा। बच्चे को बुख्ऱाा भी होगा। ऐसे समय में आपको बच्चे के लंगोट ;डायपरद्ध ध्नााेे मे बहुत सावध्नााी रखनी होगी और अपने हाथ बार-बार सापफ करते रहने होंगे। लंगोट पानी में उबालें या किसी किटाणुनाशक पदार्थ में भिगो कर रखें, और ध्पाू में सूखने के लिए डालें। खाने की सभी चीज़ों को ढाँक कर रखें कि उन पर मक्खियाँ न बैठें। बच्चे को उसकी ख्ऱााेाक़ में पानी ज्य़ादा दें और सारा ठोस भोजन बन्द कर दें। कई बार तो उसका दूध्ा बन्द कर उसे सिपर्फ थोड़े से नमक के साथ उबला हुआ ग्लूकोज़ का पानी ही देना होगा। इसमें डॉक्टर को सूचित करना ज़रूरी है क्योंकि रोग के संक्रामण की वजह से उसे ऐन्टी-बायोटिक्स देनी पड़ सकता है। दस्त और उल्टी के मामले में लापरवाही न करें क्योंकि इससे आपके बच्चे की हालत बहुत तेज़ी से ख्ऱााब हो सकती है। दस्त-उल्टी ;डायरियाद्ध के दौर के बाद, आपको अपने बच्चे की ख्ऱाुाक़ दोबारा शुरू करने से पहले बहुत सावध्नााी बरतनी होगी। शुरू में दूध्ा और खाने को पानी मिला कर हल्का करने के बाद ही बच्चे को दें और ध्राीे-ध्राीे उसे ठोस करती जाएं। अगर डायरिया कीटाणु की वजह से न होकर खाने में बदलाव या ज्य़ादा खिलाने से हुआ है, तो उसे पानी से हल्की की गई ख्ऱाुाक़ एक-दो दिन और ज्य़ादा दें तो वह सामान्य हो जाएगा। जो बच्चे माँ का दूध्ा पीते हैं, उन्हें यह तकलीपफ ज्य़ादा नहीं होती।

उल्टी : बच्चा उल्टी न करे, इसलिए उसे हर बार दूध्ा पिलाने के बाद सीध्ाा करके रखें कि उसे डकार आए ;जो हवा उसके पेट में चली गई है, वह बाहर की तरपफ निकल जाए। अगर उल्टी के साथ ऊपर दिए गए कोई भी लक्षण नज़र आएं, तो डॉक्टर से मिलें।

क़ब्ज़ : अगर बच्चे का मल बहुत सख्त़ है और उसकी अंतड़ियों की क्रिया की वजह से वह बेचैन हो रहा है, तो उसे पफलों का रस दें या किशमिश को रात भर भिगो कर उबालें और पीस कर उसका रस निकाल कर दें। उसके खाने में ज्य़ादा पानी और चीनी दें। कई बार बच्चों को इसलिए भी क़ब्ज़ हो जाता है क्योंकि उन्हें पर्याप्त ख्ऱाुाक़ नहीं मिलती। ऐसा होने पर वे यक़ीनन अपने ाूखे होने के संकेत देंगे। अगर क़ब्ज़ बहुत ज्य़ादा है तो सीध्ो तौर पर बच्चे के मलाशय में दवा रखनी पड़ेगी ;सपोज़िटरी या ऐनीमाद्ध।

पेट में मरोड़ : बच्चे के पहले तीन महीनों में यह सामान्यत: होता ही है। बच्चा चिल्लाता है और दूध्ा पीने के बाद वायु छोड़ता है। इससे बचने के लिए यह ध्यान रखें कि बच्चे के पेट में हवा न जाए। उसकी बोतल का छेद इतना बड़ा होना चाहिए कि उसमें से एक सैकण्ड में दो बूँद दूध्ा निकल सके। बच्चे को उसके पेट के बल सुलाने से भी कुछ राहत मिल सकती है। कभी-कभी उसके मलाशय में दवा रखनी ;सपोज़िटरीद्ध पड़ सकती है। अगर पेट में लगातार मरोड़ उठते रहें, तो डॉक्टर से सलाह लें। कुछ बच्चों में सारे उपाय करने के बाद भी पेट में मरोड़ उठते रहते हैं, लेकिन पिफर ध्राीे-ध्राीे ठीक हो जाते हैं।

हिचकियाँ : यह थोड़ा गर्म पानी पिलाने से, या बच्चे की लेटने की अवस्था बदलने से बन्द हो सकती हैं। वैसे भी, हिचकियाँ अपने आप बन्द हो जाती हैं।

मुँह के छाले : ;ज़बान पर खुमी की वजह से सपफेद परत का जम जानाद्ध। बच्चों में यह अकसर किसी बीमारी के बाद होता है। इससे बचने कि लिए दूध्ा पिलाने के बाद बच्चे को थोड़ा गर्म पानी पिलाएं। निप्पल और बोतल को अच्छी तरह उबाला करें।

सर्दी-जुक़ाम, कान और छाती की समस्याएंं

सर्दी-जुक़ाम : जब एक बच्चे को सर्दी-जुक़ाम होता है, तो वह अपना खाना छोड़ देता है और अपना पेट ख्ऱााब कर लेता है। सर्दी-जुक़ाम से छाती और कान में भी दर्द होता है, इसलिए आपको अपने बच्चे को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। उसे ऐसे हर एक व्यक्ति से दूर रखें जिसे सर्दी-जुक़ाम हुआ हो। अगर आपको भी हुआ हो, तो अपने नाक-मुँह ढाँप कर रखें। अगर बच्चे को सर्दी-जुक़ाम हो, तो उसे विटामिन सी की बूँदें और तरल पदार्थ देते रहें। उसका सिर नीचे की तरपफ रखें कि बच्चे में से होने वाले स्त्रााव्‌ बाहर की तरपफ ही निकलें। अगर रोग का संक्रामण कानों या पफेपफड़ों तक पहुँच जाए, और उसकी आवाज़ में भी खरखराहट होने लगे, तो डॉक्टर को सूचित करें। बच्चे को डॉक्टर की सलाह के बिना ऐन्टी-बायोटिक्स न दें।

कान का दर्द : इसका संकेत बच्चे के रोने और उसके सिर को इध्रा-उध्रा हिलाने से मिलता है। उसका एक या दोनों कान भी बहना शुरू हो सकते हैं।

छाती की तकलीपफ़ : इसके लक्षण हैं बच्चे का ज़ोर-ज़ोर से साँस लेना, खाँसना और बुख्ऱाा हो जाना। इसमें बच्चे को ऐन्टी-बायोटिक्स की ज़रूरत पड़ सकती है, इसलिए डॉक्टर की सलाह लें।

चर्म रोग

लंगोट ;डायपरद्ध से होने वाली खुजली : एक बच्चे की त्वचा संवेदनशील होने की वजह से अकसर उसे लंगोट बाँध्नो की जगह में खुजली हो जाती है। इससे बचने के लिए बार-बार लंगोट बदलते रहना चाहिए कि लंगोट बाँध्नो की जगह को सूखा व सापफ रखा जा सके। अगर ख़्ाारिश हो गई है तो उस जगह को सापफ कर उसमें जिन्क ऑक्साइड मरहम लगाएं। सारे लंगोट थोड़ा सिरका मिले हुए पानी में सोक कर रखे जा सकते हैं। जब बच्चे के लंगोट या कपड़े में से साबुन अच्छी तरह सापफ नहीं होते, तो उनसे भी बच्चे को ख़्ाारिश और खुजली हो जाती है। इसलिए बच्चों के सारे कपड़े बहुत अच्छी तरह खंगाल कर उनमें से सारा साबुन निकाल देना चाहिए।

घमोरियाँ : ये गर्मी के मौसम में होती हैं और तब भी हो जाती हैं जब हम बच्चे को ज़रूरत से ज्य़ादा कपड़े पहना देते हैें। तब कोई सौम्य मरहम, ज़िन्क ऑक्साइड मरहम इस्तेमाल करें, और ख्स़ाा तौर पर, बच्चे की जांघों-बगलों आदि में घमोरियों का पाउडर लगाएं। उसके कपड़े अकसर बदलते रहें।

छाजन ;एक्ज़िमाद्ध : यह किसी ऐलर्जी की वजह से हो सकता है, इसलिए इसकी वजह ढूँढने के बाद इससे बचा जा सकता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, यह दूर हो जाती है।

चर्मरोग या इम्पैटिगो : इस दशा में खुजली वाले पफोड़े होते हैं जिनमें से मवाद भरा होता है। बच्चे के तौलिए, कपड़े आदि अच्छी तरह पानी में उबाल लेने चाहिए। इसमें जल्दी से जल्दी डॉक्टर को मिलना चाहिए और इलाज शुरू कर देना चाहिए क्योंकि यह तेज़ी से पफैल सकता है।

खाज : सामान्य तौर पर यह खुजली बड़े बच्चों को उनके हाथों और पैरों की अँगुलियों के बीच में होती है और बहुत संक्रामक होती है। अगर बच्चा इसे खुजाता है तो यह ज्य़ादा पफैलती है। डॉक्टर को दिखा कर इसका इलाज करना चाहिए। जो भी मरहम लगाया जाए वह दिन में तीन बार से ज्य़ादा न लगाया जाए। यह ध्यान रखें कि मरहम बच्चे की आँख, नाक, और मुँह के पास न लगाया जाए।

बुख्ऱाा और चक्कर

कई बार तेज़ बुख्ऱाा से बच्चे को चक्कर ;दौरेद्ध आने लगते हैं। आम तौर पर यह बुख्ऱाा कम हो जाने पर अपने आप ख्त्म़ा हो जाते हैं। बुख्ऱाा कम करने के लिए सिर और शरीर को बपर्फ से ठण्डा करें। एक प्लास्टिक की थैली में बपर्फ के टुकड़े डाल कर उसे एक तौलिए पर बच्चे के माथे पर रखने और उसे क्रोसिन ;पैरासिटामोलद्ध सिरप पिलाने से बुख्ऱाा जल्दी ही उतर जाएगा।

जब एक बच्चे को चक्कर आएंगे तो वह अकसर बेहोश हो जाएगा, पीला पड़ जाएगा, उसके हाथ-पैर पफड़पफड़ाएंगे और उसकी आँखें चढ़ जाएंगी। ऐसे समय में, उसके मुँह में दाँतों के बीच में एक कपड़ा मोड़ कर रख दें कि वह अपने होंठ और जबान न काट ले। लेकिन यह ध्यान रखें कि बच्चे की साँस अवरु( न हो जाए। उसके मुँह से निकलने वाली लार सापफ करते रहें और उसका सिर नीचे की तरपफ रखें जिससे उसमें से होने वाले स्त्रााव्‌ उसके शरीर में वापिस न खींचे जाएं। डॉक्टर को सूचित करें कि जिस वजह से उसे चक्कर आ रहे हैं, उसका इलाज हो सके। ऐसे चक्कर जो तेज़ बुख्ऱाा की वजह से आते हैं, गंभीर नहीं होते। आपको बच्चे का बुख्ऱाा ज्य़ादा तेज़ नहीं होने देना चाहिए। यह बपर्फ और क्रोसिन से नियंत्राित हो जाता है।

एक माँ के लिए, चाहे वह कितना भी ध्यान क्यों न दे, यह असम्भव है कि वह सिपर्फ मानवीय रीति से अपने बच्चे को हर एक नुक़सान, ख्त़ारे और बीमारी बचा सकेगी। लेकिन यीशु ने कहा, छोटे बच्चों की देखभाल के लिए स्वर्गदूत होते हैं ;मत्ती 18:10द्ध। इस बात से हम प्रोत्साहित होते हैं। इसलिए, जब हम अपने बच्चों के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ कर लेते हैं, उसके बाद हम यह भरोसा कर सकते हैं कि बाक़ी सब परमेश्वर पूरा करेगा।

अध्याय
दुर्घटनाएं व रोग-बचाव और इलाज

बच्चों को सब जानना, और जो वह देखते हैं उसे छूना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। उन्हें किसी ख्त़ारे की कोई जानकारी नहीं होती। इसलिए माँ होते हुए उन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी होती है।

अकस्मात्‌ और प्रथम उपचार

पहले डेढ़ साल तक ऐसी हर एक चीज़ एक बच्चे की पहुँच से दूर रखनी चाहिए जो उसे चोट पहुँचा सकती हो। इसके बाद उसे विभिन्न वस्तुएं जैसे कैंची, पैन्सिल आदि का उपयोग करना सिखाया जा सकता है।

जब आपका बच्चा रसोई, स्नानागार, या ज़मीन पर हो तो उसे अकेला न छोड़ें। जब तक वह एक साल का न हो जाए, तब तक उसके लिए सबसे सुरक्षित जगह उसका झूला या खेलने की जगह ही है। जब वह सो रहा हो, तब भी उसे घर में अकेला न छोड़ेंं।

किसी बीमारी के इलाज से अच्छी उसकी रोकथाम है। इसलिए इस बात का ख्स़ाा ख्य़ाल रखें कि सारी दवाइयाँ और ज़हरीली चीज़ें बच्चे की पहुँच से बाहर रहें। अगर कहीं कोई पिन या बटन आदि पड़े हैं, तो वे ज़रूर उसके मुँह में पहुँच जाएंगे। इसलिए ऐसी चीज़ें भी उससे दूर रखें। और यही वजह है कि बच्चों के लिए छोटे खिलौनों की बजाए बड़े खिलौनों से खेलना ज्य़ादा अच्छा है।

मामूली दुर्घटनाओं का इलाज तो घर में ही हो सकता है, लेकिन कुछ दुर्घटनाओं के बारे में पफौरन डॉक्टर को सूचित करना चाहिए। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:

  1. 1- अगर बच्चे ने कोई ध्राादार या नोकीली, या ज़हरीली चीज़ निगल ली है।
  2. 2- अगर उन्होंने अपनी नाक या कान में कुछ घुसा दिया है।
  3. 3- अगर वह बुरी तरह जल गया है।
  4. 4- अगर उसे किसी जानवर ने काट लिया है।
  5. 5- अगर वह बेहोश हो जाता या पीला पड़ जाता है।
  6. 6- अगर गिर जाने या सिर पर चोट लगने के बाद वह उल्टी करता है।
  7. 7- अगर किसी घाव में से ख्ऩाू बहना बन्द नहीं होता, या वह पक गया है और बच्चे को बुख्ऱाा चढ़ गया है।
  8. 8- अगर उसे मोच आ जाती है या उसकी हड्‌डी टूट जाती है।

अगर उन्होंने कोई दवाई या ज़हरीली चीज़ निगल ली है, तो सबसे पहला काम उसे उल्टी कराना है। उसे बहुत सा पानी पिलाएं और उसके हलक़ में अंगुली डालें। जब वह उल्टी कर दे तो कुछ दिन तक उसके खाने में सिपर्फ दूध्ा जैसी कुछ मुलायम चीज़ ही दें।

गिरने से हुए नीलेध्काले ध्ब्बााें का इलाज बपर्फ लगाने या घिसने से हो जाता है। कट जाने, खुजाने या किसी कीड़े आदि के काटने को साबुन और पानी से ध्ााे देना चाहिए और उस पर कुछ कीटाणु-नाशक मरहम लगा देना चाहिए। घाव को ढाँप कर रखें। ख्ऩाू का बहना घाव की जगह को ज़ोर से दबा कर रखने से रुक जाता है।

अगर बच्चे का घाव गहरा हो, ख्स़ाा तौर पर ऐसा जिसमें मिट्‌टी और गंदगी हो, तो उसे टैटनस से बचाने के लिए पफौरन टीका लगाना चाहिए। कुछ घावों में टाँके भी लगाने पड़ सकते हैं।

अगर बच्चे की आँख में ध्लाू चली गई हो, तो उसे मसलें नहीं, बल्कि आँखों को बहुत से पानी से ध्ााेएं। अगर आँखें पिफर भी लाल हों, तो उसमें कुछ कीटाणु-नाशक आँख की दवा डाल सकते हैं।

अगर एक बच्चे ने अपने गले में कुछ पफँसा लिया है, तो उसे उल्टा कर उसकी पीठ थपथपाएं। ऐसे मौक़े पर उसके हलक़ में अँगुली न डालें क्योंकि इससे वह वस्तु और नीचे उतर सकती है।

सामान्य रोग

पेट में कीड़े : भारत में यह बहुत ही सामान्य है। जब बच्चे के पेट में कीड़े ;पिन वर्म्ज़द्ध होते हैं तो उसके मलद्वार में और जाँघों के आसपास खुजली होती है। अगर उसके पेट में थोड़ा-थोड़ा दर्द रहता हो, उसे भूख न लगती हो, और उसका चेहराा पीला पड़ रहा हो, तो उसके मल की जाँच करनी चाहिए क्योंकि उसमें कीड़े हो सकते हैं। अगर कीड़े पाए जाएं, तो बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं और उसका इलाज कराएं। अगर अच्छी तरह सपफाई रखी जाए तो बच्चों को नियमित रूप से कीड़े की दवाई पिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

टौन्सिलाइटिस व एडेनॉइड्‌ज़ : अगर बच्चे के गले में कोई संक्रामक रोग हो गया है, वह मुँह से साँस ले रहा है, या उसका कान बह रहा है, तो उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए। विटामिन सी के नियमित सेवन से इससे बचा जा सकता है।

ऐलर्जी : बच्चे में अगर किसी तरह की एलर्जी के लक्षण नज़र आएं जैसे चर्म-रोग या साँस लेने में तकलीपफ, या अगर उस पर दमे का हमला हो, तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए। यह पता करने की कोशिश करें कि बच्चे को किन चीज़ों से ऐलर्जी है कि आप उनका परहेज़ कर सकें।

संक्रामक रोग

खसरा : इसमें बच्चे को तीन-चार दिन तक तेज़ बुख्ऱाा रहेगा, उसकी नाक बहती रहेगी और उसकी आँखें लाल हो जाएंगी। ऐसी अवस्था में बच्चा चिड़चिड़ा हो जाएगा और उसे तेज़ प्रकाश अच्छा नहीं लगेगा। उसे ऐसे कमरे में राहत मिलेगी जहाँ तेज़ प्रकाश नहीं होगा। इसकी खुजली चेहरे और गर्दन पर से शुरू होकर पूरे शरीर पर पफैल जाएगी। तीन-चार दिन बाद से इसका असर कम होना शुरू हो जाएगा और यह एक सप्ताह बाद पूरी तरह मिट जाएगी। ख्स़ारा से जुड़ी दूसरी जटिलताएं हैं न्यूमोनिया, ब्रौंकाइटिस, कान की तकलीपफ, और बहुत ही कम मामलों में एन्सिपफैलाइटिस ;मस्तिष्क में जलनध्सूजनद्ध हो सकता है। इनमें से किसी का भी ख्त़ारा नज़र आने पर पफौरन डॉक्टर को सूचित करना चाहिए।

जर्मन ख्स़ारा : इसका वेग सामान्य ख्स़ारा से कम होता है, और इससे शायद ही कभी किसी जटिलता का ख्त़ारा पैदा होता है। एक गर्भध्रााण की हुई माता को, ख्स़ाा तौर पर पहले तीन महीने में, जर्मन ख्स़ारा से बचना चाहिए क्योंकि इससे अजन्में बच्चे में अनेक गंभीर दोष पैदा हो सकते हैं।

कनपेड़ा ;मम्प्सद्ध : इसमें बच्चे को एक-दो दिन के लिए बुख्ऱाा और सिरदर्द रहता है, उसे भूख नहीं लगती और सारे शरीर में दर्द होता है। इसके बाद कान के पास एक या दोनों जबड़ों के पास सूजन नज़र आने लगती है। यह दो-तीन दिन तक बढ़ती रहेगी और पिफर बैठ जाएगी। ऐसा शायद ही कभी होता है कि इसमें कोई जटिलता पैदा हो। बड़ी उम्र के लोगों में इसमें अण्ड-ग्रन्थीध्अण्डाशय या अग्न्याशय ;पैन्क्रियसद्ध में जलन होती है, या एक प्रकार का मैनिन्जाइटिस हो जाता है। एक बच्चे को इससे बचाने के लिए इसका टीका लगवाया जा सकता है।

डिप्थीरिया और काली खाँसी : डिप्थीरिया में बच्चे को बुख्ऱाा होगा, उसके गले में जलन होगी, और उसके गले के अन्दर एक झिल्लीनुमा ध्ब्बाा बन जाएगा। काली खाँसी में, बच्चे को बुख्ऱाा होगा, और बहुत खाँसी के साथ साँस लेते समय हुंकार की आवाज़ होगी। बच्चा नीला भी पड़ सकता है।

पोलियोमायलैटिस : इसके सामान्य लक्षण बुख्ऱाा, सरदर्द और बीमार होने का अहसास होता है। बच्चे के पैर में दर्द होगा, और तब भी जब वह अपनी गर्दन झुकाएगा। जब ऐसा हो तो डॉक्टर को सूचित करें। अगर बच्चे को पोलियो का टीका लगा है तो इस रोग के होने की सम्भावना कम होगी। अगर यह एक महामारी के रूप में आसपास पफैला है, तो बच्चे को गामा ग्लॉब्यूलिन देने से कुछ सप्ताहों तक उसका आंशिक बचाव हो सकता है।

वैसे, आज, टीकाकारण अभियानों की वजह से ये रोग बहुत कम होते हैं।

चिकन-पॉक्स : इसमें बच्चे की भूख ख्त्म़ा हो जाती और उसे हल्का बुख्ऱाा हो जाता है। इसमें होने वाले ददोड़ों में खुजली होती है और वे पफोड़े बन जाते हैें। ये पफोड़े मुँह, सिर और शरीर पर पफैलते हैं और इन्हें पूरी तरह बाहर निकलने में तीन दिन लगते हैं। खुजली दूर करने के लिए कैलामाइन मरहम लगाना चाहिए। बच्चे को खुजली न करने दें क्योंकि इससे पफोड़े संक्रामक हो जाते हैं। अगर त्वचा में संक्रामण ;पफोड़ों में मवादद्ध हो जाए, तो डॉक्टर को सूचित करें।

पोषण सम्बंध्ताि रोग : अगर बच्चे का आहार सही है, उसे पर्याप्त विटामिप दिए जा रहे हैं तो सूखे के रोग से बचा जा सकता है। कुपोषण भारतीय बच्चों में पाया जाने वाला एक सामान्य रोग है लेकिन अगर बच्चे को अच्छा खाना खिलाया जाए तो इस रोग से बचा जा सकता है। एक बच्चे को नियमित रूप से मल्टी-विटामिन की ख्ऱाुाक़ देना अच्छा है।

आमवातिक ज्वर : यह अकसर गले की ख्ऱााबी या सर्दी-ज़ुक़ाम के दो-तीन सप्ताह बाद शुरू होता है। बच्चे के जोड़ों में दर्द होगा। जोड़ गर्म, सूजा हुआ, लाल और बहुत दर्द करने वाला होगा। दो-तीन दिन के बाद यह जोड़ सामान्य हो जाएगा और दूसरा प्रभावित हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, बच्चे को बुख्ऱाा, छाती में दर्द और साँस पफूलना हो सकता है। इसकी सूचना तुरन्त ही डॉक्टर को देनी चाहिए क्योंकि इसका प्रभाव हृदय पर भी हो सकता है। अगर बच्चे पर आमवातिक ज्वर के हमले बार-बार होते हैं, तो उसके हृदय को गंभीर नुक़सान हो सकता है। ऐसे मामले में, उसे डॉक्टर की निगरानी में रहते हुए बड़े हो जाने तक नियमित ऐन्टी-बायोटिक्स लेते रहना चाहिए।

ऐसा न हो कि जो कुछ कहा गया है उससे हममें रोगभ्रम पैदा हो जाए कि जब भी हमारा बच्चा मामूली सा भी बीमार पड़े, तो हम हर समय चिंता करने वाले बन जाएं। बच्चे बहुत सी शारीरिक बाध्ााओं का कापफी आसानी से पार कर लेते हैं। परमेश्वर उनकी विशेष रूप से देखभाल करता है इसलिए हमें उन्हें उसके सर्वसामर्थी हाथों में छोड़ देना चाहिए।

एक माँ के सामने आने वाली भावनात्मक समस्याएं

मैं अपनी बात उन भावनात्मक समस्याओं और फ्मूड स्विन्ग्ज़य् के बारे में कुछ शब्दों कहते हुए समाप्त करना चाहती हूँ जिनका सामना कुछ माताआंें को करना पड़ता है। इसके बहुत से कारण होते हैं।

अगर आप अध्ड़ाेावस्था में हैं तो इसकी वजह हॉर्मोनल हो सकती है।

कभी-कभी इसकी वजह थकान या घर के तनाव-दबाव या बच्चों की समस्याएं हो सकती हैं।

चाहे जो भी कारण हो, यह ध्यान रखें कि आप पर्याप्त आराम और भोजन लेती रहें। और घर से बाहर की ऐसे काम अपने ऊपर ने लें जिनकी ज़िम्मेदारी उठाना आपके लिए मुश्किल हो जाए। अपने खाने के अतिरिक्त आयरन, कैल्शियम और विटामिन भी लिया करें।

अगर यह समस्या बनी रहती है, तो आपको डॉक्टर की मदद लेनी पड़ सकती है।

हमारा स्वर्गीय पिता हमारी रचना को जानता है कि हम मिट्‌टी ही हैं। और वह हमारे देह की पिफक्र करता है। हमारी समस्या चाहे जो भी हो, उसकी कृपा हमारे लिए कापफी है कि हम उनमें से जयवंत होकर बाहर निकल सकें।

यह कितना अद्भुत है कि रोग और बीमारी से ग्रस्त इस संसार में हम जीवित परमेश्वर के साथ जुड़े रह सकते हैं। यह वास्तव में एक अकथनीय विशेषाध्काािर है।

अगर हमने हर परिस्थिति में परमेश्वर की स्तुति करना सीख लिया है, और ख्द़ाु को सारी कड़वाहट से मुक्त कर लिया है और अपनी सारी चिंता उस पर डाल दी है, तो हम अपने सामने आने वाले हर एक संकट पर जय पा सकते हैंं।

अंत में, हमेशा हमारे साथ रहने वाली परमेश्वर की इस अपरिवर्तनीय प्रतिज्ञा को याद करें - कि वह हमें न कभी छोड़ेगा और न कभी त्यागेगा ; इब्रा- 13:5,6द्ध।

अध्याय

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बच्चे के आने की तैयारी करना

जैसे ही एक नवविवाहित पत्नी को यह मालूम हो कि वह माँ बनने वाली है, तो उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए। गर्भ ध्रााण के सबसे पहले चिन्ह्‌ होते हैं: मासिक-र्ध्मा का बन्द हो जाना, उबकाई और उल्टी आना, बार-बार पेशाब होना, और वक्ष-स्थल में होने वाले बदलाव आदि।

बच्चे के जन्म की अपेक्षित तिथि पिछले मासिक र्ध्मा की तिथि से 9 महीना और सात दिन होती है। माता या पिता के शरीर-गठन में कुछ ऐसी बातें हो सकती हैं जिनका इलाज करना पड़ सकता है। माता-पिता की कुछ तकलीपफें शायद नज़र न आएं लेकिन बच्चे पर उनका बुरा असर हो सकता है। इनमें से कुछ को ठीक किया जा सकता है। इसलिए, अगर आपको कोई शंका हो, तो जाँच करा लेना अच्छा है।

बेशक, गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं है! लेकिन अगर आप तन्दरुस्ती और बीमारी के बीच में रहते हैं, तब गर्भावस्था से आपकी हालत ख्ऱााब हो सकती है। अच्छा पौष्टिक खाना और सापफ-सुथरी आदतें बहुत ज़रूरी हैं। और, इसके साथ-साथ हमारे मन का भी पोषण ज़रूरी है। परमेश्वर के वचन पर मनन करने से आपके मन की उलझनें दूर हो सकती हैं और आपका स्वास्थ्य अच्छा हो सकता है जिससे आपके अजन्मे बच्चे का स्वास्थ्य भी अच्छा होगा। कई सुबह ऐसी होंगी जिनमें आप बाइबल में ध्यान लगाने के लिए बहुत थकी हुई और बीमार महसूस कर सकती हैं। तब सिपर्फ एक पद के ऊपर मनन करें या रोज़ की रोटी की या आराध्नाा के गीतों की कोई अच्छी पुस्तक पढ़ें। आराध्नाा और प्रार्थना के इस समय में आपके साथ आप अपने पति को भी शामिल कर सकती हैं।

भोजन

आप के गर्भ में पल रहे बच्चे का पोषण उस खाने से होता है जो आप खाती हैं। इसलिए आपकी प्रतिदिन की ख्ऱाुाक़ में आम तौर पर निम्न वस्तुएं होनी चाहिए:

  • स चावल, गेहँू या कोई और अनाज
  • स दो से चार गिलास दूध्ा
  • स अण्डे, माँस और मछली
  • स चना और दाल - अंकुरित दाल बहुत अच्छी रहती है
  • स दही
  • स सब्ज़ियाँ - पत्तेदार और बिना पत्ते वाली
  • स चर्बी और तेल
  • स ताज़े पफल और सूखे मेवे

शाकाहारी लोगों को माँस और मछली की जगह ज्य़ादा दही और दाल का सेवन करना चाहिए। चावल, गेहूँ और चर्बी वज़न बढ़ाने वाले होते हैं इसलिए उन्हें सीमित मात्राा में लेना चाहिए। आपके बच्चे की हड्‌िडयाँ और दाँत मज़बूत करने के लिए आपकी ख्ऱााेाक़ के साथ मल्टी-विटामिन्ज़, आयरन, और कैल्शियम भी लेने चाहिए। ज्य़ादा नमक और बाहर की तली हुई चीज़ों से परहेज़ करें।

गर्भावस्था के आरम्भिक महीनों में, आपके डाक्टर द्वारा लिखी गई आयरन, कैल्शियम और मैग्नीशियम की गोलियाँ ज़रूर खाएं, और छठे महीने के बाद टैटनस का टीका लगवाएं।

ताज़ी हवा

समयघ् पर आपके घुटन-भरे रसोई ;या दफ्रतरद्ध से बाहर निकल कर परमेश्वर की ताज़ी हवा में भी साँस लिया करें। इससे आप बड़ी ताज़गी महसूस करेंगी।

शाम के समय अपने पति के साथ टहलने के लिए निकल जाएं। इससे आप और आपके पति भी हल्के और तरोताज़ा महसूस करेंगे! चलते समय कमर को सीध्ाी रखने की कोशिश करें।

कसरत

शारीरिक कसरत से आपके पाचन में, सोने में, क़ब्ज़ से बचने में, और आपकी माँसपेशियों को एक स्वस्थ दशा में रहने में मदद मिलती है। इससे आपको समय पूरा होने पर बच्चे को जन्म देने में आसानी रहेगी। इसलिए अपने घर का काम करना न छोड़ें - हाँ, अपने आपको ज़रूरत से ज्य़ादा काम की थकान से बचाए रखना है। गहरी और लम्बी साँसें लेने वाली और छाती और पेट विकसित करने वाली कसरतें करना भी अच्छा है। कभी-कभी ज़मीन पर पालथी मार कर बैठना कूल्हे की माँसपेशियों के लिए अच्छा है। भारी चीज़ें उठाने से बचना है। झुकते समय अपने घुटने मोड़ें और अपनी पीठ सीध्ाी रखें।

सपफाई और आराम

आपको रोज़ नहाना चाहिए और अपने आपको पूरी तरह सापफ रखना चाहिए।

आपको रात की नींद में पूरा आराम करना चाहिए, और अगर हो सके, तो दिन में खाने के बाद भी एक घण्टा आराम कर लेना चाहिए। अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या में, बीच-बीच में रुक कर कोई पफल या दही की एक कटोरी ले खाना चाहिए। जिन कामों से आप बहुत जल्दी थकान महसूस करने लगती हैं, उनमें आपको कटौती कर देनी चाहिए।

आपके पति की भूमिका

गर्भावस्था का समय एक स्त्राी के लिए एक भावनात्मक दबाव का समय होता है। एक समझदार और संवेदनाशील पति अपनी पत्नी का जीवन सहज बना सकता है। इस कारण, आपको अपनी समस्याएं अपने पति के साथ बाँटनी चाहिए। यह याद रखें कि आप दोनों फ्जीवन की कृपा के संगी-वारिसय् हैं ;1 पत- 3:7द्ध। बहुत से पुरुष गर्भावस्था के चिकित्सात्मक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं के बारे में ज्य़ादा कुछ नहीं जानते। आप अपने पति को साथ लेकर डॉक्टर के पास जाया करें कि आपके पति को भी यह समझ आए कि उसे ऐसे समय में कैसी भूमिका निभानी है।

कुछ फ्वर्जित बातेंय्

  1. 1- थकान और मानसिक दबाव से बचें।
  2. 2- ऐसी परिस्थितियाँ तैयार न होने दें जिसमें अचानक दबाव बन जाए, या गिरने का ख्त़ारा हो, या भारी वज़न उठाना पड़े।
  3. 3- गर्भावस्था के पहले और अंतिम तीन महीनों में सड़क के ऐसे लम्बे सपफर से बचें जिसमें ज़ोर से झटके लगने का ख्त़ारा हो। यही अच्छा है कि कम-से-कम सपफर किया जाए। समयघ् पर अपने पैरों को ऊँचा उठा कर रखा करें।
  4. 4- पेट में क़ब्ज़ से बचें। बहुत से पफल और पानी का सेवन करें।
  5. 5- क़ब्ज़ दूर करने या नींद की कोई दवा डॉक्टर से पूछे बिना न लें।
  6. 6- पैरों में तकलीपफ देने वाले जूते-चप्पल और बहुत तंग कपड़े न पहनें।
  7. 7- गर्भावस्था में पतला होने की कोई कोशिश न करें।
  8. 8- ऐसे लोगों के नज़दीकी संपर्क में आने से बचें जिन्हें जर्मन मीज़ल्ज़ या कोई दूसरा संक्रामक रोग हुआ है। ऐक्स-रे करवाने से बचें, पिफर भी अगर किसी कारणवश ऐक्स-रे करना हो, तो यह सुनिश्चित करें कि आपका पेट एक लैड-स्क्रीन से ढँापा हुआ है।

प्रसव-पूर्व जाँच

आपको डॉक्टर के पास नियमित जाँच करानी चाहिए।

यह कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी जानकारी आपके डॉक्टर को तुरन्त दी जानी चाहिए:

  • स किसी भी समय होने वाला भूरे रंग का या रक्त का स्त्रााव्‌
  • स छठे महीने के बाद: तेज़ सिरदर्द, नज़र में ध्ाुँध्लाापन, पैरों में सूजन, पेशाब का कम हो जाना, वज़न का बहुत बढ़ जाना। सामान्य वजन का बढ़ना ;गर्भावस्था के तीसरे महीने के बाद, 1-5 से 2 किलो वज़न बढ़ना सामान्य हैद्ध, बच्चे के हिलने-डुलने में कमी, पेट में दर्द और उल्टी, पाँव या मुँह पर सूजन।

कुछ आसान इलाज

सुबह के जी-मचलाने के लिए: अपने सामान्य समय से आध्ाा घण्टा देर से उठें। एक कप पानी में एक-चौथाई चम्मच सोडियम बायकार्बोनेट डाल कर उससे कुल्ला करें, और एक गिलास नींबू पानी पीएं। चिकनाई वाला खाना न खाएं।

पैरों में दर्द के लिए: जहाँ तक हो सके, मुड़ने और नीचे झुकने से बचें, और अगर आप बैठ सकती हैं, तो खड़ी न रहें। रात को सोने से पहले अपने पैरों को आध्ाा घण्टा गर्म पानी में डुबाए रखने से भी राहत मिल सकती है।

नसों के उभर आने के लिए: बच्चे के जन्म के बाद यह स्वत: ठीक हो जाएंगी। एक आसान सा इलाज यह है कि अपनी पीठ के बल लेट जाएं और अपने पैर ऊँचे कर अपने तलुवे कुछ मिनटों के लिए दीवार से टिका कर रखें। यह दिन में कई बार किया जा सकता है। ज्य़ादा देर तक खड़े रहने से बचें। कभी-कभी इलैक्ट्रोक्रैप पट्‌िटयाँ भी लाभदायक हो सकती हैंं।

प्रसव का समय हो जाना

प्रसव का समय हो जाने के ये सामान्य लक्षण होते हैं: गर्भाशय का नियमित संकुचन जो एक पीड़ा के साथ पहले पीठ के निचले भाग में शुरू होकर आगे पेट की तरपफ आता है। योनी में से गुलाबी रंग का स्त्रााव्‌ भी नज़र आएगा। कभी-कभी एक तेज़ पानी की बौछार भी निकल सकती है। अगर रक्त-स्त्रााव्‌ हो तो आपको पफौरन अस्पताल जाना चाहिए।

अंत में

एक स्वस्थ बच्चे के जन्म की आशा रखें, और परमेश्वर में भरोसा रखें, क्योंकि बाइबल कहती है,

फ्स्त्राियाँ अगर संयम के साथ विश्वास, प्रेम व पवित्राता में बनी रहें, तो संतान उत्पन्न करने द्वारा सुरक्षित पार हो जाएंगीय् ;1 तीम- 2:15 - जे- बी- पिफलिप्सद्ध।

अध्याय 0
एक व्यक्तिगत पत्रा जिसे आपको ज़रूर पढ़ना चाहिए

प्यारी माताओं,

यह पुस्तक मैंने ख्स़ाा तौर पर उन सवालों के जवाब देने के लिए लिखी है जो पिछले सालों में बहुत सी माताएं मुझसे पूछती रही हैं। यह उनके लिए लिखी गई है जिन्हें आत्मिक मदद और प्रोत्साहन की ज़रूरत महसूस होती है।

तीस सालों से परमेश्वर के एक दास की पत्नी होने के लिए मुझे परमेश्वर की कृपा मिलती रही है। मेरे पति सुसमाचार का प्रचार करते हुए अकसर घर से दूर रहते थे। और मेरे पति द्वारा परमेश्वर के लिए किसी तरह का कोई समझौता न करने की वजह से, हमारा परिवार निरंतर शैतान का निशाना बना रहा। आज, हम यह गवाही दे सकते हैं कि शैतान के हर एक हमले पर जय पाई गई है, और यह सिपर्फ परमेश्वर की कृपा से हुआ है। मैं यह सिपर्फ आपको प्रोत्साहित करने के लिए ही कह रही हूँ कि आप यह विश्वास कर सको कि परमेश्वर आपके लिए भी यही करेगा।

परमेश्वर ने मुझे चार बेटों की माँ होने की भी कृपा प्रदान की हैऋ वे सब अब बड़े हो चुके हैं। परमेश्वर की दया से ही ऐसा हुआ है कि उन्होंने यीशु को अपने परमेश्वर और मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार किया है और आज वे परमेश्वर के पीछे चल रहे हैं।

मैं एक निष्णात की तरह नहीं लिख रही हूँ, बल्कि एक ऐसी स्त्राी की तरह जिसने संघर्ष किया है, निष्पफल हुई है, पिफर खड़ी हुई है, और दौड़ में आगे बढ़ी है - और यह पाया है कि जीवन की सभी मुश्किल जगहों में परमेश्वर वास्तव में फ्संकट के समय तत्पर सहायक हैय् ;भजन- 46:1द्ध।

एक चिकित्सक होते हुए, मैंने पुस्तक के अंत में कुछ व्यावहारिक सलाह भी दी है। अपने बच्चों के लिए जो सबसे बड़ा काम आप कर सकते हैं वह यही है कि आप उन्हें परमेश्वर के पास पहुँचाएं कि वे परमेश्वर यीशु मसीह को अपने व्यक्तिगत मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार कर सकें। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि आप अपने बच्चों के साथ अनन्त में जीवन बिताएंगी। जब बच्चे छोटे हों, आपको तभी उ(ार पाने में उनकी अगुवाई करनी चाहिए। जब वे बड़े हो जाते हैैं, तो हो सकता है कि पिफर वे जल्दी आपकी बात पर ध्यान न दें।

एक छोटा बच्चा रात के समय अपनी माँ को अपने पास चाहता है। इसलिए जब आप अपने बच्चे को बिस्तर में सुलाएं, तो उसके पास से हटने में जल्दबाज़ी न करें। उनमें से एक एक के साथ अलग अलग, या एक साथ सभी के बीच थोड़ा समय ज़रूर बिताएं।

उनसे परमेश्वर के बारे में बात करें। सोते समय बच्चों में आत्मिक बातों के प्रति सबसे ज्य़ादा दिलचस्पी होती है।

उदाहरण के तौर पर, उन्हें कोई ऐसा स्तुति गीत सुनाएं जैसे फ्कुछ भी नहीं कहने को मेरे पास, हे परमेश्वर के मेमने, मैं आता तेरे पास---।य् उन्हें पिफर कोई एक छोटी कहानी सुना दें, जैसे यीशु द्वारा सुनाया गया कोई दृष्टान्त, या फ्सोने के समय की कहानियों की पुस्तक ;बैडटाईम स्टोरीबुकद्धय् की कोई कहानी।

और पिफर उनके साथ कुछ इस तरह की प्रार्थना करें:

फ्प्यारे परमेश्वर यीशु, इस दिन के लिए ध्न्यावाद। आपने मुझे भोजन, स्वास्थ्य, प्रेम करने वाले माता-पिता और भाई-बहन, और बहुत सी वस्तुएं दी हैं। मेरे सब पापों को क्षमा करना और मेरे हृदय को उस लहू से ध्कााेर शु( करना जो आपने कलवरी की सूली पर मेरे लिए बहाया था। परमेश्वर, आप मेरे हृदय में आइए और आज से मुझे अपना बच्चा बनाइए। मेरी प्रार्थना सुनने के लिए ध्न्यावाद। आमीन।य्

ऐसे बच्चे जिनका पालन-पोषण परमेश्वर का भय मानने वाले घरों में होता है, वे ऐसी प्रार्थना बहुत बार कर सकते हैं। लेकिन ऐसे समयों में से एक समय ऐसा भी हो सकता है जिसमें प्रार्थना उनके दिल में से इस तरह से निकले जिसमें स्वयं उनकी ख्द़ाु की ज़रूरत रखी हो, और तब वे परमेश्वर से जुड़ जाएंगे। उसके बाद पिफर वे आपके ही बच्चे नहीं रहेंगे, बल्कि परमेश्वर के भी बच्चे बन जाएंगे। यह आपकी सबसे बड़ी ख्श़ाुी होगी।

डॉ- ऐनी ज़ैक पूनैन

अक्आपबर 1998

अध्याय 1
एक पहले दर्जे की माँ

फ्हे परमेश्वर, आप मुझे बचपन से ही सिखाता आया है, और मैं अब तक तेरे अद्भुत कार्यों का प्रचार करता हूँ। मेरे बुढ़ापे में भी, जब मेरे बाल पक जाएं, हे परमेश्वर मुझे त्याग न दे जब तक मैं इस पीढ़ी से ;मेरे बच्चों सेद्ध तेरी सामर्थ्य का वर्णन न कर दूँय् ;भजन- 71:17-18द्ध।

परमेश्वर के सम्मुख हम सभी माताओं की यह बड़ी ज़िम्मेदारी है कि जो कुछ परमेश्वर ने हमें सिखाया है, वह सब हम अपने बच्चों में आगे बढ़ा दें। ऐसा किए बिना हमें इस जगत में से नहीं जाना चाहिए। यह कोई ऐसी ज़िम्मेदारी नहीं है जिसे हम अपने बच्चों के बड़े होने तक स्थगित कर सकते हैं। जो भी अद्भुत काम परमेश्वर ने हमारे लिए किए हैं, हमें अपने बच्चों को उनके बारे में तभी से बताना शुरू कर देना चाहिए जब वे छोटे ही होते हैंं। तीमुथियुस की नानी लोइस ने परमेश्वर में अपना फ्निष्कपट विश्वासय् अपनी बेटी यूनीके में तभी आगे बढ़ा दिया होगा जब वह बहुत छोटी थी, और उन्होंने भी वह विश्वास अपने बेटे तीमुथियुस में तभी आगे बढ़ा दिया होगा जब वह बहुत छोटा था ;2 तीम- 1:5द्ध। इसका परिणाम यह हुआ कि तीमुथियुस बड़ा होकर परमेश्वर का एक उत्कुष्ट सेवक बना। इन दोनों विश्वासयोग्य माताओं ने, कलीसिया के लिए कितनी महान्‌ सेवकाई की थी!

बच्चों का सही पालन-पोषण करने का कोई जादूई तरीक़ा नहीं होता क्योंकि हर एक बच्चा दूसरे से अलग होता है। लेकिन आपको यह नहीं भूलना है कि यह परमेश्वर ही है जिसने आपके बच्चों की माँ होने के लिए आपको चुना है। यह परमेश्वर है जिसने इनमें से एक-एक बच्चे को आपके गर्भ में रचा है - और उन्होंने इनमें से हर एक को एक उद्देश्य से रचा है। परमेश्वर ने आपको इनकी माता नियुक्त किया है। इसलिए आपको अपनी इस परमेश्वर-प्रदत्त ज़िम्मेदारी को पूरी गंभीरता से निभाना है, और परमेश्वर के ख़्ाातिर और बच्चों की ख़्ाातिर सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार रहना है।

बच्चे हमें परमेश्वर का दिया हुआ उपहार हैं, और हम सिपर्फ उसकी शक्ति और उसकी बु( से ही उनका सही पालन-पोषण कर सकते हैं। हमारा यह विश्वास होना चाहिए कि परमेश्वर हमारे बच्चों के लिए अद्भुत काम करेंगे।

भजन 127:4 कहता है कि बच्चे ऐसे होते हैं जैसे एक वीर के हाथ में तीर। तीर शत्राु पर चलाने के लिए होते हैं। अगर हम परमेश्वर के लिए अपने बच्चों को सही तरह तैयार करें, तो हम अपने बच्चों द्वारा शैतान को लज्जित कर सकते हैं।

दूसरी तरपफ, अगर हम विश्वासयोग्य नहीं रहते तो हमारे बच्चे बड़े होकर शैतान की सेवा करने वाले बन जाएंगे क्योंकि प्राकृतिक रूप में सभी भ्रष्ट मानवीय स्वभाव इसी दिशा में जाते हैं। लेकिन अगर हम उन्हें परमेश्वर का आदर करना सिखाते हैं, और उन्हें परमेश्वर के वचन के सि(ान्तों के अनुसार निर्देशित करते हैं, तो वे परमेश्वर की सेना के सैनिकों के रूप में तैयार हो सकते हैं। यह एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है और हम इसे हल्के तौर पर कभी न लें।

भजन 127 आगे कहता है कि ऐसे बच्चों के माता-पिता जब पफाटक पर शत्राुओं से बातें करेंगे, तो उनके माता-पिता कभी लज्जित नहीं होंगे ;पद 5द्ध। बाइबल कहती है कि हमारे बच्चों के मुख द्वारा ही परमेश्वर अपने बैरियों को ख्त्म़ा करता है ;भजन- 8:2द्ध।

जब शैतान हमारे बच्चों के द्वारा लज्जित हो तो परमेश्वर के नाम की महिमा हो!

जब हमारे बच्चों के साथ सब कुछ अच्छा हो रहा हो, तो हमें ध्यान देकर सारी महिमा परमेश्वर को ही देनी चाहिए। हमें यह कल्पना करते हुए उस महिमा को स्वयं के लिए नहीं ले लेना चाहिए कि हमारे बच्चे परमेश्वर के पीछे इसलिए चल रहे हैं क्योंकि हम इतनी विश्वासयोग्य माताएं रही हैं। हमारा घमण्ड सिपर्फ परमेश्वर में, और जो उन्होंने किया है सिपर्फ उसमें हो। हम अपने किसी विचारों में भी उस महिमा में से कुछ भी अपने लिए न लें। परमेश्वर ने अपने प्रेम की तुलना उस प्रेम से की है जो एक माँ का अपने बच्चे के लिए होता है ;यशा- 49:15द्ध, क्योंकि सारे स्त्राियों और पुरुषों का सृष्टिकर्ता होते हुए, परमेश्वर जानते हैं कि पृथ्वी पर माँ का प्यार ही उनके ईश्वरीय, बलिदानी और नि:स्वार्थ प्रेम जैसा है।

एक पुरानी कहावत है कि परमेश्वर ने माँ की रचना इसलिए की क्योंकि वे उसके द्वारा स्वयं को छोटे बच्चों पर प्रकट करना चाहते थे।

माताओं के रूप में हमारे सामने यह एक चुनौती रहती है कि हम अपने बच्चों के लिए घर को एक ऐसी दिलचस्प जगह बना दें कि पिफर उन्हें अपने घर के अलावा दूसरी कोई जगह अच्छी ही न लगे। वे जहाँ कहीं भी हों, वे वहाँ से हमेशा अपने घर लौटने की ही लालसा करें।

परमेश्वर बेहतर माताएं बनने में हमारी मदद करे कि जब हमारे बच्चे हमें देखें तो वे यह देख सकें कि परमेश्वर कैसे हैं, और जब हमारे घर को देखें तो यह देख सकें कि स्वर्ग कैसा है।

एक पहले दर्जे की माता बनना कितनी बड़ी चुनौती होती है!


फ्प्यारे परमेश्वर, मैं यह नहीं माँगती कि आप मुझे कोई बड़ा काम दें,

या कोई श्रेष्ठ बुलाहट या इसी तरह की कोई अद्भुत बात देंऋ

केवल, मेरे थामने के लिए एक छोटा सा हाथ मेरे हाथ में दें,

एक बच्चा दे जिसे मैं रास्ता दिखा सकूँ,

अनोखे, मध्राु मार्ग से होते हुए, तुझ तक पहुँचा सकूँऋ

एक छोटी सी आवाज़ दे जिसे मैं प्रार्थना करना सिखा सकूँ,

दो चमचमाती आँखें दे जिनसे मैं आपके मुख का दर्शन पा सकूँऋ

प्यारे परमेश्वर, जो ताज मेरे पहनने के लिए हो वह केवल यह हो:

कि मैं एक नन्हें से बच्चे को आपकी बातें सिखाने वाली बनूँ,

मैं यह नहीं चाहती कि मेरे साथ कभी ऐसा हो,

कि मैंं बु(मान, योग्य व महान्‌ लोगों के साथ खड़ी रहूँ

मेरी सिपर्फ यही दुआ है, कि हम हाथ में हाथ डाले हों

और, एक बच्चा और मैं, आपके द्वार में प्रवेश कर रहे होंय्

- ;लेखक - अज्ञातद्ध

अध्याय 2
हमारे विवेक को संवेदनशील बनाए रखना

अगर हमारे बच्चों को परमेश्वर के भय में बढ़ना है, तो माँ के रूप में जो एक ज़रूरी बात हममें होनी चाहिए, वह एक संवेदनशील हृदय है।

अगर किसी भी समय ऐसा होगा कि हम अपनी आत्मिक दशा से संतुष्ट हो जाते हैं, तो हमारा विवेक उदासीन हो जाएगा। शायद हमने वचन इतनी बार सुन लिया है कि अब हम उससे पूरी तरह परिचित हो चुके हैं। तब हमें उसमें से पवित्रा आत्मा की आवाज़ सुनाई नहीं देगी और हमारा विवेक भावशून्य हो जाएगा। जो सत्य हमें पहले उत्तेजित करते थे, वे अब ऐसा नहीं करते क्योंकि अब वे एक ऐसी छुरी की तरह बन गए हैं जिसकी ध्राा ख्त्म़ा हो चुकी है।

हम भौतिक ध्ना-संपत्ति से जुड़ जाने की वजह से भी अपने विवेक में संवेदनहीन हो सकते हैं। जब हम विषय-वस्तुओं में समृ( होने लगते हैं, तब हमारे विवेक का भावशून्य हो जाना ज्य़ादा आसान होता है। अमीर होने की बजाए जब हम ग़रीब होते हैैं, तब हमारे लिए यह आसान होता है कि हमें परमेश्वर की ज़रूरत महसूस हो। हमारे पति के वेतन में होने वाली मामूली सी वृ( भी हमें घमंड से भर सकती है। यीशु ने कहा कि एक सूई के छेद में से एक ऊँट का निकल जाना, एक ध्नावान के परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से ज्य़ादा आसान है। परमेश्वर ने एक बार एक कलीसिया के प्राचीन की भी इसी वजह से ताड़ना की क्योंकि उन्होंने ऐसी कल्पना की कि क्योंकि वह ध्नावान है इसलिए उसे किसी वस्तु की कमी नहीं है ;प्रका- 3:17द्ध। ध्ना एक बड़ा पफन्दा है। इसलिए जब हम आर्थिक रूप से समृ( हों तो हमें बहुत सचेत रहने की ज़रूरत होती है। अगर परमेश्वर ने ऐसा होने दिया है, तो ध्नावान होना ग़लत नहीं है। लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह हमें घमंड से न भर दें, और हमारे विवेक भावशून्य न हो जाएं। हमेशा ऐसी मनोदशा में रहना सब से अच्छा है जिसमें हम आत्मा में दीन रहते हैं।

एक माँ होते हुए हममें ईमानदारी का गुण होना बहुत ज़रूरी है जिसे हमारे बच्चे हममें हर समय देखते होंं। हमें अपने बच्चों के साथ ख्द़ाु सच्चाई से रहने द्वारा उन्हें सच्चाई सिखानी चाहिए। हमें अपने जीवनों में से हर तरह के झूठ और अहंकार को दूर करना चाहिए। अगर हम अपने बच्चों को झूठ बोलते और घमण्ड से भरी बातें बोलते हुए सुनें, तो सम्भव है कि यह उन्होंने हमसे ही सीखा हो! हम अपने बच्चों से ऐसा कोई वादा न करें जो हम जानते हैं कि हम पूरा नहीं कर सकेंगे। अगर हमारे वादे के पूरा न हो सकने की कोई ऐसी वजह होगी जिसे टाला नहीं जा सकता, तो बच्चे उस बात को समझेंगे, क्योंकि ऐसी परिस्थितियाँ बनती रहेंगी जिनमें हमें दूसरों की ख़्ाातिर अपनी ख्द़ाुी का इनकार करना पड़ेगा। लेकिन ऐसी किसी वजह के अलावा, हमें अपने बच्चों से किए सभी वादे पूरे करने चाहिए।

हमें ख्द़ाु को हर तरह के ढोंग ;फ्अभिनयय्द्ध से भी शु( करते रहने की ज़रूरत है। हमारे बच्चे यह देखें कि हम उनसे ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कहते जो हम ख्द़ाु नहीं करते। हमें परमेश्वर से कहना चाहिए कि वह हमें ऐसी बातें दिखाए जहाँ हम गिरते हैं, कि पिफर हम वहाँ से अपना मन पिफरा सकें। जब हमें अपने बच्चों में ही ढोंग-दिखावा नज़र आता है, परमेश्वर हमसे तब भी बात कर सकता है।

लालच एक और ऐसा घातक पाप है जिससे हमें अपने आपको सापफ़ रखना है। अगर हमारे बच्चे यह देखेंगे कि हम उन चीज़ों से संतुष्ट नहीं हैं जो परमेश्वर ने हमें देने के लिए चुनी हैं, तो वे भी लालच में पफँस जाएंगे। लड़कियाँ ;ख्स़ाा तौर परद्ध यह ध्यान रखती हैं कि उनकी माँ क्या ख्ऱाीदती है और क्या ख्ऱाीदना चाहती है।

अगर परमेश्वर चाहेगा कि हम कुछ ख्ऱाीदें, तो उसे ख्ऱाीदने के लिए वह हमें पैसा भी देगा। अगर वह ऐसा नहीं करता, तो यह उसका हमें बताने का तरीक़ा है कि हमें उस वस्तु की वास्तव में कोई ज़रूरत नहीं है। अगर हम उसे ख्ऱाीदने लायक़ भी होते, तो भी वह हमारे लिए अत्यावश्यक नहीं हो सकतीऋ ऐसी अवस्था में, उसका हमारे पास न होना ही अच्छा है।

एक अच्छा विवेक संसार की सारी अच्छी वस्तुओं सेे भी ज्य़ादा अच्छा है। जो सहज और सस्ते खिलौने हम अपने बच्चों के लिए ख्ऱाीदते हैं, वे उन्हीं से संतुष्ट होना सीख सकते हैं। वे अपने उन्हीं खिलौनों को और भी बेहतर बना सकते हैं। पिफर आगे जाकर, वे उन बच्चों से ज्य़ादा सृजनशील बच्चे बन जाएंगे जिनके ध्नावान माँ-बाप उन्हें बहुत महँगे खिलौने और खेल दिलाते हैं।

हमारे घर में हमें यह ध्यान भी रखना होगा कि किसी की पीठ पीछे हम उसकी बुराई न करें। मैंने कलीसिया में यह दु:खद बात देखी है कि किस तरह बच्चे दूसरे विश्वासियों से घृणा करते हैं क्योंकि उन्होंने अपने घरों में उन विश्वासियों के ख्ल़ाािपफ हल्की और बुरी बातें सुनी हैं। यह कितने दु:ख की बात है कि स्वयं माता-पिता ही अपने बच्चों में इस तरह ज़हर भरते और उन्हें नाश करते हैं! यीशु ने जब ऐसा कहा था कि जो इन छोटों में से किसी एक को भी ठोकर खिलाए, तो उसके फ्गले में चक्की का पाट लटका कर उसे समुद्र की गहराई में डुबा देना चाहिएय् ;मत्ती 18:6द्ध, तो यक़ीनन वह ऐसे माता-पिताओं के बारे में ही बात कर रहा होगा। इस मामले में माँ को ख्स़ाा ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि वही अपने बच्चों के साथ सबसे ज्य़ादा समय बिताती है।

जब एक माँ के हृदय में किसी के लिए कड़वाहट होती है, तो बच्चे उसे आसानी से भाँप लेते हैं। थोड़ा सा खट्‌टा दूध्ा या दही बर्तन में भरे दूध्ा को खट्‌टा कर सकता है। और खट्‌टेपन को कड़वेपन में बदलने में ज्य़ादा समय नहीं लगता। बाइबल हमें सचेत करती है कि बहुत से लोग हृदय में पनप रही एक कड़वी जड़ से भी भ्रष्ट हो सकते हैं। इसलिए जितनी जल्दी हो सके हमें ऐसे सारे बुरे मनोभावों से मुक्त होने की ज़रूरत है।

पृथ्वी के सबसे नज़दीकी रिश्तों में भी ग़लतपफहमियाँ पैदा हो सकती हैं। लेकिन हमें परमेश्वर की मदद से उनसे जल्द ही पीछा छुड़ा लेना चाहिए।

छोटे बच्चे भी अच्छे और बुरे, संगीत और शोर, व सामंजस्य और संघर्ष आदि में पफर्क़ करना जानते हैं। वे बोलना शुरू करने के बहुत पहले से ही इन बातों को समझने लगते हैं। इसलिए उन्हें दूषित न करने के प्रति हमें सचेत रहना होगा।

हमें ख्द़ाु को सारे पक्षपात से भी शु( करने की ज़रूरत है। हमें अपने बच्चों में भेदभाव नहीं करना चाहिए। सभी हमारे लिए बराबर और एक जैसे मूल्यवान हों। किसी बच्चे के साथ विशेष व्यवहार नहीं करना चाहिए।

एक और तरह का पाप जिससे हमें बचने की ज़रूरत है वह अपने बच्चों कीं सुन्दरता, व्यवहार, बु(मानी या किसी अन्य बात पर घमण्ड करना है। अगर हम अपने बच्चों के जीवन में उनकी किसी बात पर घमण्ड करेेंगे, तो हम उनका नाश करेंगे। हम जैसे ही घमंड करते हैं, तब लूसिपफर का स्वभाव हम पर अपना नियंत्राण ले लेता है। लूसिपफर एक सुन्दर स्वर्गदूत था, लेकिन जिस क्षण में उन्होंने घमंड किया था, उसी क्षण से वह शैतान बन गया था।

हमें भी इस बात में ध्यान रखना होगा कि अपने बच्चों का एक सही तरह से पालन-पोषण करने के पीछे हमारा इरादा अपनी स्वयं की महिमा न हो। अगर ऐसा होगा तो हमारे बच्चे जल्द ही इस बात को जान लेंगे और वह भी सिपर्फ दूसरों को प्रभावित करने के लिए अपने काम करने लगेंगे। हमें अपने बच्चों को सिपर्फ परमेश्वर की महिमा के लिए ही जीना सिखाना है।

इसलिए हम परमेश्वर से ऐसे जीवन के लिए कृपा माँगते रहें जिसमें लगातार मन-पिफराव और शरीर और आत्मा की सारी गंदगी दूर होती रहे ;2 कुरि- 7:1द्ध, कि हम अपने जीवनों के अंत तक अपने विवेक संवेदनशील बनाए रख सकेंं।

अध्याय 3
बच्चों को परमेश्वर के वचन और प्रार्थना की ज़रूरत होती है

परमेश्वर ने इस्राएलियों से कहा कि वे अपने बच्चों को उसके बारे में सिखाएं-घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते तथा उठते समय वे उनसे

उसके ही बारे में बातें किया करें ;व्य-वि- 6:7द्ध।

इससे हम यह सीखते हैं कि हर समय और हर एक अवसर पर हमें अपने बच्चों को आत्मिक सि(ान्त सिखाने हैं।

यह देख कर बहुत दु:ख होता कि आज मसीही घरों से आए बच्चे ऐसे काम कर रहे हैं जो कोई अविश्वासी भी नहीं करेगा! इसका क्या कारण है? क्या यह कि उनके माता-पिता ने उन्हें निष्पफल बना दिया है??? मुझे नहीं मालूम और मुझे किसी पर दोष भी नहीं लगाना है। इसकी बजाए, उनके माता-पिता के प्रति मेरी सुहानुभूति है और मैं उन्हें प्रोत्साहित करना चाहूँगी कि वे विश्वास करें कि परमेश्वर अब भी चमत्कार कर सकता है, और उनके बच्चों को बदल सकता है। लेकिन हमारे आसपास की सभी निष्पफलताओं को देखते हुए हमें अपने असपफलताओं सीखने चाहिए वर्ना हम भी वही ग़लतियाँ करेंगे, और हमारे बच्चों को पीड़ा भोगनी पड़ेगी।

हम अपने बच्चों को सिपर्फ परमेश्वर के वचन और प्रार्थना द्वारा ही बर्बादी से बचा सकते हैं। इसके अलावा दूसरा कोई तरीक़ा नहीं है।

अगर हमारे बच्चे पढ़ना भी न जानते हों, तो भी उन्हें बाल-चित्रा बाइबल ;चिल्ड्रैन्ज़ पिक्चर बाइबलद्ध में से पढ़ कर सुनाना एक अच्छी आदत है क्योंकि बाद में वे उसे ख्द़ाु पढ़ना चाहेंगे। पवित्रा शास्त्रा के वचनों को याद करना एक और अच्छी आदत है जो बच्चों में प्रोत्साहित करनी चाहिए। यह हमारे लिए भी बाइबल के कुछ वचनों को याद करने का एक अच्छा तरीक़ा बन सकता है!

अगर हम अपने बच्चों से लगातार परमेश्वर और उसके वचन के बारे में बात करते रहेंगे, तो उनके साथ बातचीत का हमारा रास्ता खुला रहेगा। तब हम उनमें उन बुरी आदतों और शब्दों को जल्दी ही जान लेंगे जो उन्होंने स्कूल और अपने मित्रााें में से ग्रहण किए हैंऋ पिफर हम इन्हें त्यागने में उनकी मदद कर कर सकेंगे।

हमें अपने बच्चों को उन बातों से दूर रखना चाहिए जो पवित्रा शास्त्रा में प्रतिबंध्ताि हैं। उदाहरण के तौर पर, हमें अपने बच्चों को विर्ध्माी त्यौहारों में नहीं ले जाना चाहिए, और न ही उनमें ख्द़ाु भी जाना चाहिए। हमें अपने बच्चों को उनके मित्रााें के साथ विर्ध्माी त्यौहार नहीं मनाने देने चाहिए जैसे दीवाली पर दिए जलाना और बम-पटाख़्ो चलाना।

इसी तरह, जबकि हम जानते हैं कि परमेश्वर की नज़र में बच्चों को बपतिस्मा देना ग़लत है, तो हमें अपने बच्चों को ऐसे शिशु-जल संस्कार की विध्यााेिं में भाग नहीं लेने देना चाहिए, पिफर चाहे वे शिशु-जल संस्कार हमारे अपने सम्बंध्यााेिं के ही क्यों न हों। अगर मित्रााें और सम्बंध्यााेिं को नाराज़ करते हुए भी हम अपने बच्चों को यह नहीं सिखाएंगे कि उन्हें ऐसी हर एक बात से दूर रहना है जो अंध्काार की है, तो वे परमेश्वर और उसके वचन का आदर करते हुए आगे नहीं बढ़ सकेंगे। अगर हमें अपने सम्बंध्यााेिं से मित्राता का व्यवहार करना है, तो हम किसी अन्य दिन उनसे मिलने जा सकते हैं।

हमें अपने बच्चों को यह सिखाना है कि परमेश्वर की आज्ञाएं उनके लिए सब बातों में सबसे अच्छी हैं, इसलिए उन्हें आनन्द के साथ उन्हें मानना चाहिए। बच्चों को हमें यह सिखाना है कि पकड़े जाने या सज़ा के डर की वजह से नहीं, बल्कि प्रेम और आदर की वजह से उन्हें परमेश्वर के वचन से प्रेम और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना है।

प्रार्थना एक ऐसा कम्बल है जिससे हम अपने बच्चों को ढाँप सकते हैं। जैसे एक सर्दी की रात में हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे बच्चे अच्छी तरह ढँके हुए रहें, उसी तरह हमें यह देखना होगा कि वे इस ठण्डे संसार में भी हमारी प्रार्थनाओं द्वारा ढँके रहेें। वे जहाँ भी हों, चाहे स्कूल में या कहीं दूर, हम परमेश्वर से यह प्रार्थना करते रहें कि वह उन्हें शत्राु के उन पफन्दों से बचा कर रखे जो उन्होंने उनके लिए तैयार कर रखे हैंं।

हमें अपने पतियों के साथ जुड़ना चाहिए और अपने परमेश्वर की इस प्रतिज्ञा के अनुसार माँगना चाहिए:

फ्यदि तुम में से दो जन पुथ्वी पर किसी विनती के लिए एकमत हों, तो वह मेरे स्वर्गीय पिता की ओर से उनके लिए पूरी हो जाएगीय् ;मत 18:19द्ध।

हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, और अपने पतियों के साथ एकमत होना चाहिए, कि हमारे बच्चे नया जन्म पाएं और पूरे हृदय से परमेश्वर यीशु के शिष्य बन जाएं। हमें अपने और अपने पति के बीच ऐसा कुछ भी नहीं आने देना चाहिए जिससे शैतान को हमारे बच्चों पर हमला करने का मौक़ा मिल सके। हमें स्वयं को और अपने बच्चों को परमेश्वर की वेदी पर रोज़ अर्पित करने की ज़रूरत है।

एक परिवार के रूप में एक साथ प्रार्थना करना भी बहुत ज़रूरी है। सुबह के समय शायद यह सम्भव न हो सके क्योंकि वह बच्चों को स्कूल आदि भेजने की गहमा-गहमी का समय होता है। इसलिए बच्चों के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन और सुरक्षा की एक छोटी प्रार्थना पर्याप्त होनी चाहिए। इस समय हम किसी तात्कालिक ज़रूरत के लिए भी प्रार्थना कर सकते हैंं। लेकिन शाम के समय, खाने की मेज़ पर, पवित्रा शास्त्रा पढ़ने और साथ में प्रार्थना करने के लिए कुछ समय निकालना अच्छा है। हर एक बच्चे को प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। छुट्‌टी के दिन परमेश्वर के वचन में हम साथ मिलकर ज्य़ादा समय बिता सकते हैं।

एक दुष्ट संसार में सिपर्फ परमेश्वर ही हमारे बच्चों की रक्षा कर सकता है। इसलिए हमें सबसे बढ़कर परमेश्वर के वचन और प्रार्थना पर निर्भर रहना चाहिए। हमारे बच्चों के सामने जो भी समस्या आती हैं, उन पर परमेश्वर के वचन और प्रार्थना द्वारा जय पाई जा सकती है। जब हम अपने बच्चों को लेकर किसी मुश्किल का सामना करते हैं, और अगर हमने परमेश्वर की बात सुनने की आदत बना ली है, तो हर एक समस्या के हल के लिए वह हमें एक प्रतिज्ञा देगा। पिफर हम उस प्रतिज्ञा को थाम कर तब तक प्रार्थना करना जारी रख सकते हैं जब तक वह समस्या हल नहीं हो जाती।

हम जो माताएं हैं, हमें अपने बच्चों को सुरक्षा और प्रेम की अनुभूति होने देनी चाहिए। हमारे बच्चों को हममें एक ऐसा आश्रय और शरणस्थान मिलना चाहिए कि वे हमेशा उसकी ओर मुड़ सकें। बाद में, आने वाले वर्षों में उन्हें इससे परमेश्वर के प्रेम और देखभाल को ज्य़ादा अच्छी तरह समझने का मौक़ा मिलेगा। वास्तव में, यह हमारा एक महान्‌ सौभाग्य है - परमेश्वर के स्वभाव को अपने बच्चों के ऊपर प्रतिबिम्बित करना कि उनके नन्हें मन अनदेखे परमेश्वर को ज्य़ादा मज़बूती से थाम सकें।

बु(मान स्त्राी अपना घर बनाती है, परन्तु मूर्ख स्त्राी उसे अपने हाथों से उजाड़ देती है ;नीति- 14:1द्ध।

अध्याय 4
अपने बच्चों के साथ समय बिताना

जब हमारे बच्चे घर में हों, तब वे हमारी पहली प्राथमिकता होने चाहिए। हमें अपने बच्चों की देखभाल उनके दादा-दादी या सण्डे स्कूल की टीचर के हाथ में नहीं सौंप देनी चाहिए। परमेश्वर ने यह ज़िम्मेदारी सबसे पहले हम माताओं को सौंपी है क्योंकि हमने ही उन्हें संसार में जन्म दिया है और घर में उनके साथ सबसे ज्य़ादा समय बिताया है।

इसलिए अपने व्यवसाय या नौकरी के लिए, या अपने सम्बंध्यााेिं और मित्रााें के साथ ज़रूरत से ज्य़ादा मेलजोल, या किसी अन्य प्रकार की सामाजिक गतिविध्ाि की वजह से हम अपने बच्चों को कभी अनदेखा न करें।

जब मेरे बच्चे घर पर थे, तब मैंने उनकी ख़्ाातिर ज्य़ादातर सामाजिक कार्यक्रमों से बचकर रहना ही अच्छा समझा। अपनी ख्द़ाुी से किए इस इनकार का मुझे कभी अपफसोस नहीं हुआ क्योंकि जो समय मैंने वहाँ से बचाया, मैंने अपने बच्चों के जीवनों में उसका अच्छा निवेश किया।

लेकिन जब परमेश्वर ज़रूरतमन्द लोगों को मेरे घर में लाया, तब मैंने सब कुछ अलग हटा कर उनकी मदद करने में अपना सब कुछ दिया। और तब परमेश्वर ने मेरे बच्चों को संभाला।

अब जबकि मेरे चारों बेटे बड़े हो गए हैं और घर से दूर हैं, तो अब मेरे पास लोगों से मिलने और दूसरी सामाजिक गतिविध्यााेिं के लिए बहुत सा समय रहता है। इसलिए मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहूँगी कि सब बातों के लिए आप परमेश्वर के समय का इंतज़ार करें।

जब हमारा विवाह हो जाता है, तो हमारे पति, हमारे बच्चे और हमारे घर - इसी क्रम में, हमारे जीवनों में सबसे पहली प्राथमिकता होने चाहिए। अगर हम चाहते हैं कि हमारे वैवाहिक जीवन और हमारे घर में ख्श़ाुी हो और हमारे बच्चों की सही परवरिश हो, तो हमें बहुत सी बातों में बहुत से बलिदान करने पड़ेंगे। लेकिन अंतत: उसका परिणाम अच्छा ही आएगा।

अगर हम बाहर कुछ काम करेंगे - वह चाहे पार्ट टाईम काम ही क्यों न हो, तो हमारे लिए अपने बच्चों पर पूरा ध्यान दे पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। हम थके-हारे शाम को काम से लौटेंगे, और यह पाएंगे कि हम लौटकर, चिड़चिड़े हो जाते हैं और अपने बच्चों की छोटी-छोटी बातों से भी परेशान हो जाते हैं। तब घर में बहुत सी बातें बिगड़ सकती हैं। हम पाएंगे कि जब हमारे बच्चे अपनी माँ को अकसर एक ख्ऱााब मन-मिज़ाज में पाएंगे, तो वे भी ज्य़ादा शरारती और हठीले हो जाएंगे!!! माँ होना एक पूरे समय का काम है, ख्स़ाा तौर पर तब जब बच्चे छोटे होते हैं और स्कूल जाते हैं। इसलिए ऐेसे समय में हम अपने ऊपर इतनी ज़िम्मेदारियाँ न ले लें जिन्हें हम पूरा न कर सकें।

कलीसिया की सभाओं मे अपने बच्चों के साथ सहभागी होने की हमें हर सम्भव कोशिश करनी चाहिए। इस तरह, हम उनके सामने एक अच्छा नमूना रखते हैं। लेकिन अगर कभी ऐसा होता है कि हम बच्चों के बीमार होने की वजह से सभाओं में नहीं जा पाते तो हमें अपने अन्दर दोष की भावना को घर नहीं करने देना है। ऐसे समय में, हमारे बच्चों की एक ऐसी अनकही पुकार हो सकती, फ्माँ, मुझे छोड़ कर मत जाओ।य् जब बच्चे बीमार होते हैं, तो उन्हें सबसे ज्य़ादा अपनी माँ से मिलने वाले तसल्ली और आराम की ज़रूरत होती है। इसलिए, ऐसे समयों में, हमें उन्हें दूसरों के भरोसे पर अकेला नहीं छोड़ देना चाहिए। एक दिन, जबकि उन्हें यह पता भी नहीं होगा कि उनकी ख़्ाातिर आपने कितने बलिदान दिए हैं, तब वे हमें एक ख़्ाुशियों से भरा घर देने के लिए ध्न्यावाद देंगे। अगर हम बिस्तर में भी हों, तो भी हम अपने बच्चों के लिए एक अच्छी माँ साबित हो सकते हैं। शायद हमारा बहुत सी सभाओं में जाना नहीं हो पाएगा, लेकिन परमेश्वर के साथ हमारी संगति अटूट बनी रह सकती है। साम्यवादी देशों की जेलों में ऐसे बहुत से मसीही हैं जो किसी भी सभा कभी नहीं जा सकते। लेकिन वे ऐसे क़ीमती पत्थर हैं जिन्हें परमेश्वर तराश कर चमका रहा है - और एक दिन वह उन्हें सारे जगत के सामने पेश करेगा। हम माताएं भी परमेश्वर के लिए ऐसे ही क़ीमती पत्थर हो सकती हैं।

हमें अपने बच्चों से जुड़ी हर एक बात में दिलचस्पी लेनी चाहिए। अगर स्कूल में उनका कुछ कार्यक्रम है, या कोई खेल-कूद हो रहा है, तो हमें जाकर उन्हें उसमें भाग लेते हुए देखना चाहिए। ऐसे सब काम करते हुए हम अपने बच्चों का दिल जीत सकते हैं, क्योंकि वे यह देखेंगे कि हमें उन बातों में दिलचस्पी है जो वे करते हैं।

छुट्‌िटयों के दिनों मे, हम उनके साथ घर के अन्दर खेलने वाले खेल खेल सकते हैं और उनसे उन बातों पर चर्चा कर सकते हैं जिसमें सिपर्फ हमारी नहीं उनकी भी दिलचस्पी है। हम उनमें से एक एक से बात करनी चाहिए और जब वे हमसे बात करें तो हमें उनकी बात को ध्यान से सुनना चाहिए। पिफर, जब हम भी उनसे बात करेंगे तो वे हमारी बात पर ध्यान देंगे।

हमें उनकी पढ़ाई-लिखाई पर भी ध्यान देना है। अगर उन्हें कुछ समझ नहीं आता, तो उसके लिए उन्हें डाँटने से कोई पफायदा नहीं है। हमें उन विषयों को ख्द़ाु पढ़ कर समझने की कोशिश करनी चाहिए और पिफर उन्हें समझाना चाहिए। अगर यह हमसे नहीं हो सकता, तो उनकी मदद करने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की मदद लेनी चाहिए। जब हमारे बच्चों के पढ़ने का समय हो तब हमें अपने घर में लोगों के साथ मेल-मुलाक़ात का समय नहीं रखना चाहिए, और जब हमारे बच्चों को हमारी देखभाल की ज़रूरत हो, तो ऐसे समय में हमें अपने घर में अतिथियों के सत्कार में भी लगा हुआ नहीं होना चाहिए। अपने बच्चों को सिखाने में हमें बहुत से बलिदान करने पड़ेंगे, और अगर हम उनकी परवरिश सही तरह करना चाहते हैं तो निश्चित तौर पर हमें बहुत सी सामाजिक बातों में से अपनी ख्द़ाुी का इनकार करना पड़ेगा। लेकिन जब हमारे बच्चे बड़े हो जाएंगे, और हम उन्हें जीवन में अच्छा करता हुआ देखेंगे, तो हमें इन सारे बलिदानों पर अपफसोस नहीं होगा।

बहुत सी माताओं को अपने किशोर बच्चों के साथ तालमेल बनाने और उनकी समस्याओं में उनके साथ जुड़ने में बहुत मुश्किल होती है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि जब उनके बच्चे छोटे थे तब वे अपने काम और दोस्तों का मनोरंजन करने में इतनी व्यस्त थीं कि बच्चों के साथ रहने के लिए उनके पास समय ही नहीं था। अब पासा पलट गया है, और अब बच्चों के पास उनकी माताओं के साथ बिताने के लिए समय नहीं है!

हमें अपने बच्चों का भरोसा तभी जीत लेना चाहिए जब वे छोटे होते हैं। लेकिन अगर हम ऐसा करने में तब निष्पफल रहे हैं, तो कम-से-कम हमें अब इसके लिए परमेश्वर से माँगना चाहिए और ऐसा करने की कोशिश करनी चाहिए। कोशिश करने की शुरूआत में कभी देर नहीं होती। हम कभी आशा न छोड़ें।

हम यह कभी न भूलें कि बच्चे हमें दिया गया परमेश्वर का विशेष उपहार हैं, और वह हमारे हर एक बच्चे के बारे हमसे यह कहता है, फ्इस बच्चे को ले जाकर मेरे लिए दूध्ा पिलाया कर, और मैं तुझे इसकी मज़दूरी दूँगाय् ;निर्ग- 2:9द्ध।

हमारे बच्चे इस अहसास के साथ बड़े होने चाहिए कि वे हमारे लिए क़ीमती और मूल्यवान हैें। उन्हें परमेश्वर की भलाई का स्वाद सबसे पहले हम माताओं में से मिलना चाहिए। तब हमारे घर ऐसे बनेंगे जैसा परमेश्वर चाहता है, और इसमें परमेश्वर की महिमा होगी।

अध्याय 5
अपने बच्चों को नियम नहीं सि(ान्त सिखाना

माँ होते हुए हम अकसर ऐसा सोचते हैं कि हम अपने बच्चों को सुध्राा कर सही कैसे करें। लेकिन अगर हम थोड़ा परिश्रम करें, तो हम अपने बच्चों को बहुत सी बातों में अनावश्यक रूप से डाँटने-पफटकारने से बच सकते हैं।

हमें अपने बच्चों के लिए बहुत थोड़े से नियम बनाने चाहिए। अगर हम उनके लिए बहुत से नियम बना देंगे तो पिफर वे या तो बहुत विध्वाािदी बन जाएंगे या विद्रोही हो कर सारे नियमों को तोड़ने वाले बन जाएंगे। हमें उन्हें नियमों की जगह सि(ान्त सिखाने चाहिए। सहज निर्देश जटिल नियमों से ज्य़ादा अच्छे होते हैं।

बच्चों को सिखाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण सि(ान्त हैं माता-पिता का आज्ञापालन करना, ईमानदार होना, नि:स्वार्थी होना, बूढ़े लोगों का आदर करने वाले होना, और दूसरों के अध्काािरों के बारे में सोचने वाले होना। अगर वे इन सि(ान्तों का पालन करेंगे, तो उन्हें बहुत से नियमों का पालन नहीं करना पड़ेगा। बाद में, जब वे घर छोड़ कर जाएंगे, तो उनके पास ये सि(ान्त और मूल्य होंगे जो उनके जीवन भर उनका मार्गदर्शन करेंगे।

बाइबल यह प्रतिज्ञा करती है कि जो बच्चे अपने माता-पिता का आदर करते हैं, उनका भला होगा। इसलिए अगर हम चाहते ंहैं कि हमारे बच्चों का भला हो तो हमें उन्हें हमारा आदर करने वाला बनाना चाहिए। उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि वे सभी बड़ी उम्र के लोगों के साथ सम्मानपूर्वक बात करें।

घर की व्यावहारिक बातों में हमें अपने बच्चों को नि:स्वार्थी होना सिखाना चाहिए। हमें उन्हें सिखाना चाहिए कि वे अपने खिलौने और वे चीज़ें जो उन्हें पसन्द हैं, एक-दूसरे के साथ और घर में आने वालों के साथ बाँटें।

बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि वे दूसरों की चीज़ों की मर्यादा समझें और उन्हें कभी चोरी न करें। हमें उन्हें स्कूल से ऐसी कोई चीज़ घर में नहीं लाने देनी चाहिए जो उनकी नहीं है। अगर हमारे बच्चे हमें दूसरों से चीज़ें माँगते देखेंगे, और पिफर यह भी देखेंगे कि हम उन्हें समय से वापिस नहीं लौटाते हैं, तो वे भी ऐसा ही करने लगेंगे। बच्चे प्राकृतिक रूप से अच्छे गुणों वाले नहीं होतेऋ उन्हें अच्छे गुण सिखाने पड़ते हैं।

बच्चों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे घर में हाथों से काम करना सीखें। लेकिन हमें एक ही बच्चे को एक ही तरह का काम नहीं देना चाहिए। हमें बच्चों के बीच सारे कामों को बाटते रहना चाहिए कि हर एक बच्चे को उसकी योग्यता के अनुसार काम करने का मौक़ा मिले। इस तरह हम सब के साथ निष्पक्ष रहेंगे। हमें अपने बच्चों को ऐसी आदत नहीं डालनी चाहिए कि वे घर का काम करने के लिए पैसे या ईनाम माँगने वाले बन जाएं। इस मामले में लोगों के अपने-अपने नज़रिए हैं। लेकिन इस तरीक़े में ख्त़ारा है। कभी-कभी तो यह ठीक हो सकता है, लेकिन वैसे हमें अपने बच्चों को यही सिखाना चाहिए कि घर में मदद करना सबके लिए - माता, पिता और बच्चों के लिए, एक सामान्य बात है। उन्हें ऐसा नहीं लगना चाहिए कि घर में मदद करने से वे हम पर कोई अहसान कर रहे हैं।

हमें अपने बच्चों को यह आज़ादी देनी चाहिए कि वे जो बोलना चाहें वह बोल सकें और किसी भी समय हमसे किसी भी विषय पर बात कर सकें। हाँ, उन्हें अभद्र या मुँहज़ोर होने की अनुमति हर्गिज़ नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन अगर हम उन्हें हमारे साथ सहज होने देंगे, तो हम जल्द ही उन बातों को जान सकेंगे जो उन्हें परेशान कर रही हैं। पिफर जब वे अकेले और चुपचाप रहने लगेंगे, तो हम जान लेंगे कि कुछ गड़बड़ है। हमें उनका भरोसा जीतना चाहिए औैर ऐसा होना चाहिए कि वे हमें अपना सब से नज़दीकी मित्रा समझें।

हमारे बच्चे इस बात की हमेशा क़द्र करेंगे कि हमने उनकी देखभाल करते हुए उन्हें दोषी नहीं ठहराया है, बल्कि हमेशा उनकी मदद की है। इसलिए, अगर हम उनके साथ संगति करने के लिए समय निकालेंगे, तो उन्हें सुध्रााने की उतनी ही कम ज़रूरत पड़ेगी। जो बलिदान हम उनके लिए करते हैं, और उन पर पूरा ध्यान देते हैं, और जब वे ये देखेंगे तो हमारे प्रति उनके व्यवहार में एक ऊष्मा भर जाएगी। सालों बाद, जब वे अपने जीवन में तनाव व दबाव की परिस्थितियों का सामना करेंगे, तो वे मुड़ कर उन परिस्थितियों को देख पाएंगे जब हम माताओं में विश्वास था और हमने अपना विश्वास खोया नहीं था--- और यह कि कैसे परमेश्वर ने हमें उस परीक्षा में जयवंत किया था। उनका विश्वास भी इसी तरह बनेगा।

अगर हमारे घर में सेवक हैं, तो यह ज़रूरी है कि हम अपने बच्चों को कभी उनके साथ अभद्र व्यवहार न करने देंं। अगर हम अपने बच्चे से एक बार भी एक सेवक से क्षमा माँगने केे लिए कहेंगे, तो उसके बुरे व्यवहार को ठीक करने के लिए वह कापफी होगा। हमारे बच्चों को हमें यह सिखाना होगा कि हमारे घर में मदद करने वाले सेवकों को वे ध्न्यावाद दिया करें। अगर हमारे बच्चे कुछ पैसा कमाते हैं, या अगर उनके स्कूल में से उन्हें कुछ नक़दी पुरस्कार मिलता है, तो हमें उन्हें उस पैसे में से सेवकों के लिए कुछ लाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि उनके प्रति वे अपना आभार व्यक्त कर सकें। हमारे लिए काम करने वाले किसी व्यक्ति को अगर हमारे बच्चे नीची नज़र से देखें, तो हमें इसे एक बहुत गंभीर बात समझनी चाहिए। सेवकों के दुर्भाग्यपूर्ण हालात की वजह से उनका सामाजिक स्तर नीचा हो सकता है, लेकिन उनका रचने वाला उनकी देखभाल करता है, और अगर हमारे बच्चे उन्हें नीची नज़र से देखेंगे, तो परमेश्वर हम माता-पिताओं को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराएगा। अगर हमारे बच्चे सामाजिक रूप से नीचे लोगों से अपने आपको श्रेष्ठ समझेंगे, तो आगे जाकर यह बात उनका नाश करेगी। सबसे क्षमा माँगना मुश्किल होगा, इसलिए यही अच्छा है कि हम माताएं एक अच्छा उदाहरण बनें।

हमारे पतियों के साथ हमारा एक होना बहुत ज़रूरी है। इससे हमें अपने बच्चों के साथ व्यवहार करने के लिए आत्मिक अध्काािर मिलेगा। अगर हमारे पतियों के साथ हमारे मतभेद हैं, तो हमें जल्दी से जल्दी उन्हेें दूर करने की अपंनी पूरी कोशिश करनी चाहिए। यह हमें परमेश्वर की महिमा के लिए करना चाहिए। लेकिन यह हमारे बच्चों के लिए भी अच्छा है। अगर हम अपने पतियों के अध्नाी नहीं होते, तो हम अपने बच्चों से भी हमारे अध्नाी होने की अपेक्षा नहीं कर सकते। एक अध्नाी न होने वाली पत्नी की वजह से विद्रोह की आत्मा आसानी से घर में प्रवेश कर सकती और पिफर उसमें से यह संक्रामक रोग आसानी से बच्चों को भी लग सकता है! हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पतियों का और हमारा एक ही सामान्य लक्ष्य है: हमारे बच्चों की भलाई।

हमें लोगों के बीच में अपने बच्चों की ज्य़ादा बड़ाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे उनमें गर्व भर सकता है। वे यह सोच सकते हैं कि हम उनकी चापलूसी कर रहे हैं या हम बढ़ा-चढ़ा कर बोल रहे हैं। लेकिन बच्चों को लोगों के सामने और अकेले में भी प्रोत्साहित करना अच्छा है। मगर हमें इसमें बहुत सचेत रहने की ज़रूरत है क्योंकि सबके सामने एक बच्चे की प्रशंसा करने से दूसरे बच्चों में ईर्ष्या भर सकती है, और बच्चों में एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य का भाव पैदा हो सकता है। और यह भी हो सकता है कि ऐसी प्रशंसा से उस बच्चे का व्यवहार स्व-धर्मिकता हो जाए।

हमारा घर स्वर्ग का पहले ही से मिल जाने वाला स्वाद होना चाहिए। हमें अपने बच्चों को एक ऐसा घर देना चाहिए जो फ्पृथ्वी पर स्वर्गय् जैसा हो - एक ऐसी जगह जहाँ हमारे बच्चे उन सभी लड़ाइयों, संघर्षों और परीक्षाओं से जूझने के बाद विश्राम पा सकें जिनका सामना उन्हें संसार में करना पड़ता है।

अध्याय 6
अपने बच्चों को अनुशासन भरी आदतें सिखाना

यह एक अच्छी बात है कि हम अपने बच्चों को अनुशासन सिखाएं - उनकी खाने-पीने की आदतों में अनुशासन, उनके पढ़ने-लिखने में अनुशासन, और उनके खेल-कूद में भी अनुशासन। उनकी छुट्‌िटयों के दौरान भी उनके लिए थोड़ी पढ़ाई और पवित्रा शास्त्रा की बातों को याद करते रहना अच्छा है।

अगर हम अपने बच्चों को उनकी छोटी उम्र में ही उनकी चीज़ों की ख्द़ाु ही देखभाल करना, चीज़ों को सही तरीक़े रखना, समय से उठना, और समय पर खाना आदि सिखा दें तो हमारी ज़िन्दगी कापफी आसान हो जाएगी। थोड़े बड़े बच्चों को उनके अन्दर के कपड़े ध्नााेेा और थोड़ा भारी काम करना भी सिखाया जा सकता है जिससे वे अपनी माँ को मामूली न समझने लगें। उन्हें यह सब सीखने में थोड़ा समय लग सकता है। लेकिन एक बार सीख लेने के बाद, ये आदतें जीवन भर उनके काम आती रहेेंगी।

हमारे बच्चों को परमेश्वर का आदर करना और उसे जीवन में पहला स्थान देना सिखाना भी ज़रूरी है। इसका एक तरीक़ा तो यह है कि जब वे छोटे ही होते हैं, तब उनके साथ कलीसिया की सभाओं में नियमित और समय पर पहुँचा जाए। मैंने ख्द़ाु अपने बच्चों में देखा है कि जब वे अगले दिन परीक्षाएं होने के बावजूद रविवार की साप्ताहिक सभाओं में हाज़िर रहे, तो कैसे उन्होंने अपनी परीक्षाओं में परमेश्वर की मदद पाने का अनुभव किया। परमेश्वर उनका आदर करता है जो उसका आदर करते हैं।

सभाओं में बच्चों को ख्म़ाााेशी से बैठना सिखाना चाहिए। यह सिखाने द्वारा हम उन्हें परमेश्वर का आदर करना सिखा रहे होंंगे क्योंकि ऐसा करते हुए वे उन लोगों का ध्यान भंग नहीं करेंगे जो ध्यानपूर्वक सुन रहे होंंगे। सभा के दौरान हम छोटे बच्चों को कहानी की किताब या रंग भरने की कोई पुस्तक दे सकते हैंं। जब वे थोड़े बड़े होकर अपनी अलग जगह में बैठने वाले हो जाएं, हमें तब भी उन पर नज़र रखनी चाहिए कि वे किसी तरह की कोई बदतमीज़ी न करें। अगर हम उन्हें अभद्र व्यवहार करता पाएं, तो सभा से घर लौटने के बाद हमें उन्हें परमेश्वर का सम्मान करने के महत्व के बारे में चेतावनी देनी चाहिए।

अगर बच्चे इतने बड़े हैं कि वे प्रचार पर ध्यान दे सकते हैं, तो सभाओं के बीच में उन्हें कहानियों की पुस्तकें नहीं देनी चाहिए। अगर वे अपनी कक्षाओं में अपने शिक्षकों की बातों पर तीन-चार घण्टे तक ध्यान दे सकते हैं, तो वे एक सभा में दो घण्टे तक भी ज़रूर ध्यान दे सकते हैं। हम यह नहीं चाहेंगे कि जब उनके शिक्षक उन्हें कुछ समझा रहे हों तो वे कोई कहानी की किताब लेकर बैठ जाएं। तो सभाओं में भी वे ऐसे करते हुए नहीं पाए जाने चाहिए!

हमें बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि जो खाना और कपड़ा उन्हें मिलता है वे उससे संतुष्ट रहें और वे भौतिक वस्तुओं की बर्बादी करने वाले भी न बनें।

पढ़ाई-लिखाई में भी अनुशासन बहुत महत्वपूर्ण होता है। हमें अपने बच्चे के साथ बैठना पड़ सकता है, ख्स़ाा तौर पर जब वे छोटे होते हैं, और हमें उनके साथ उनकी पढ़ाई का अवलोकन करना पड़ सकता है कि जब वे अपनी कक्षा में जाएं तो उनमें एक भरोसा हो। लेकिन हम यह भी नहीं चाहते कि वे पढ़ाई को अपना इष्टदेव बना लें। लेकिन अगर वे आलसी हो जाएंगे और अपने स्कूल की पढ़ाई ठीक ढंग से नहीं करेंगे, तो निश्चित तौर पर उसमें परमेश्वर को कोई महिमा नहीं मिलेगी। यह हो सकता है कि हमारे बच्चे बहुत बु(मान न हों। लेकिन हम उन्हें यह सिखा सकते हैं कि वे परिश्रम करने वाले बन सकें।

अध्याय 7
अपने बच्चों को अनुशासित करना

फ्बच्चे को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिस पर उसे चलना है, और वह बुढ़ापे में भी उससे नहीं हटेगाय् ;नीति- 22:6 -टी-एल-बी-द्ध।

फ्जब तक आशा है अपने पुत्रा की ताड़ना कर। अगर आप ऐसा नहीं करता तो आप उसका जीवन बर्बाद करेगाय् ;नीति- 19:18 -टी-एल-बी-द्ध।

फ्बच्चे के हृदय में तो मूढ़ता की गाँठ लगी रहती है। अनुशासन की छड़ी उसे खोल कर दूर कर देती हैय् ;नीति- 22:15 -टी-एल-बी-द्ध।

फ्बच्चे को ताड़ना देने से न रुकनाऋ यदि आप उसे छड़ी से पीटे तो वह मर नहीं जाएगा। आप उसे छड़ी से पीट कर उसका प्राण अध्लााेेक से बचा लेगाय् ;नीति- 23:13,14 -टी-एल-बी-द्ध।

फ्अपने पुत्रा की ताड़ना कर और उससे तुझे सुख मिलेगाय्

;नीति- 29:17 - टी-एल-बी-द्ध।

जब बात हमारे बच्चों को सुध्रााने और अनुशासित करने की होती है, तो हमें बहुत बु( और कृपा की ज़रूरत होती है। हमें उन्हें इसी तरह से ताड़ना देनी चाहिए जैसे परमेश्वर हमारी ताड़ना करता है - उनकी अनन्त भलाई चाहते हुए, प्रेम और संवेदना के साथ। हमें अपने बच्चों को अनुशासित करने का सारा काम अपने पतियों के हाथ में नहीं छोड़ देना चाहिए। कक्षा की एक कमज़ोर शिक्षिका अवज्ञा करने वाले बच्चे को सज़ा के लिए हमेशा ही प्रध्नाााचार्य के पास भेजेगी। और बच्चे ऐसी शिक्षिका का, या ऐसी माता का सम्मान नहीं करेंगे। अगर हम अपने बच्चों को कभी अनुशासित नहीं करेेंगे, तो वे हमें कमज़ोर समझ लेंगे, और पिफर जल्दी ही हम उन पर से अपना सारा अध्काािर खो देंगे।

हमें यह भी पता होना चाहिए कि हमें अपने बच्चों में कौन सी बातों को दण्डित करना है और कौन सी बातों को अनदेखा करना है।

एक बुनियादी सि(ान्त जो हमें अपने मन में याद रखना है वह यही है कि उनका चरित्रा किसी भी तरह के भौतिक नुक़सान से ज्य़ादा बड़ा है। स्वयं हमारे अन्दर अनन्त के मूल्यों की एक सही समझ होनी चाहिए। अगर हमारे बच्चे हमारे साथ अभद्र व्यवहार करते हैं ;या किसी दूसरे के साथ भीद्ध, या जानबूझ कर झूठ बोलते हैं, तो हमें इसे ग़लती को काँच की कोई महँगी चीज़ के टूट जाने से ज्य़ादा गंभीर मामला समझना चाहिए।

अपने बच्चों को अनुशासित करते समय हमें अपने आपको सारे क्रोध्ा, अध्राीता, और चिड़चिड़ेपन से शु( कर लेना चाहिए। हमें कभी क्रोध्ा से भर कर उन्हें सज़ा नहीं देनी चाहिए। मुझे यक़ीन है कि हम सभी बीते समय में इस बात में नाकाम रहे हैं। लेकिन हम मन पिफरा कर भविष्य में अपने बच्चों को प्रेम से सुध्रााने के लिए परमेश्वर से कृपा माँग सकते हैं।

हमें अपने बच्चों को सज़ा के तौर पर कभी कोई भारी-भरकम काम करने के लिए नहीं देना चाहिए। उन्हें काम एक सज़ा के तौर पर नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी मान कर सीखना है। इसी तरह, चॉकलेट या आइसक्रीम जैसी किसी चीज़ के अलावा, हमें सज़ा के तौर पर उन्हें भूखा नहीं रखना चाहिएऋ बच्चों को सही तरह बढ़ने के लिए पौष्टिक भोजन की ज़रूरत होती है।

अगर हम अपने बच्चों को यह चेतावनी देते हैं कि अगर वे किसी ख्स़ाा बात में आज्ञा न मानेंगे तो हम उन्हें सज़ा देंगे, तो हमें ऐसा ज़रूर करना चाहिएऋ वर्ना बच्चे यह सोचेंगे कि हम उन्हें खोखली ध्माकियाँ ही देते हैं, और हमारे शब्दों के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं रहेगा। लेकिन अगर हम यह देखें कि वे कम सज़ा के हक़दार हैं, तो हम उन्हें दिए जाने वाले दण्ड को कम कर सकते हैं। अगर हम यह देखें कि हमारे बच्चे अपने किए पर शर्मिन्दा हैं, तो हम उनके प्रस्तावित दण्ड को रद्द भी कर सकते हैं। स्वयं परमेश्वर भी नीनवे पर दयावंत हुए थे, और उनके मन पिफराव को देखकर परमेश्वर ने उनके लिए प्रस्तावित दण्ड को रद्द कर दिया था ;योना 3द्ध। परमेश्वर हमारे साथ कठोरता से और नम्रता से व्यवहार करते हैं, और अपने बच्चों के साथ हमें भी ऐसा ही करना चाहिए।

बच्चों को सज़ा देने के लिए सिपर्फ छड़ी या चाबुक का ही इस्तेमाल करना ज़रूरी नहीं होता। हम उनके खेलने पर भी पाबन्दी लगा सकते हैं या उनके बिस्तर में उन्हें चुपचाप लेटे रहने के लिए कह सकते हैं। जब उन्होंने कुछ ग़लत किया होता है तो इस तरह भी उनके हृदय से बात हो सकती है।

हमें कभी भी निर्दयी होकर अपने बच्चों को सज़ा नहीं देनी चाहिए। हमें उनके मुख पर नहीं मारना चाहिए और न ही उन्हें कोई चोट पहुँचानी चाहिए। मुख प्यार से थपथपाने के लिए होते हैं, थप्पड़ मारने के लिए नहीं होते। बच्चों को मारने के लिए हमें अपने हाथों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। जब हम उन्हें सज़ा दें तो जैसा बाइबल में लिखा है, हम छड़ी का इस्तेमाल करें ;नीति- 23:13,14द्ध। हमारे हाथ बच्चों को सहलाने के लिए, और उन पर अपना प्रेम प्रकट करने के लिए होते हैंं।

जब हमारे बच्चे किशोरावस्था ;तेरह साल से ऊपर की उम्रद्ध में पहुँच जाते हैं, तब हमें उन्हें शारीरिक दण्ड देने से बचना चाहिए। अगर हमने 1 से 13 साल की उम्र के बीच में उन्हें अनुशासित किया है, तो आम तौर पर हमें उन्हें बाद में शारीरिक रूप में अनुशासित करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए, जब वे छोटे होते हैं, तो हमें उन सालों का इस्तेमाल उन्हें अनुशासित करने और ईश्वरीय तौर-तरीक़े सिखाने के लिए कर लेना चाहिए।

हमें अपने बच्चों को कभी दूसरों के सामने अनुशासित नहीं करना चाहिए क्योंकि यह सार्वजनिक तौर पर उन्हें लज्जित करना होगाऋ इससे उनकी सज़ा दोगुनी हो जाएगी। हमें हर समय उनकी मर्यादा रखनी चाहिए। हम उनकी निष्पफलताओं के लिए उन्हें अकेले में सज़ा दे सकते हैं। लेकिन आज्ञा उल्लंघन और अभद्र व्यवहार के साथ हमेशा ही तुरन्त व्यवहार होना चाहिए। अगर इन मामलों में उन्हें अनुशासित करने में हम नाकाम रहेंगे तो वे पिफर इतनी ख्त़ारनाक हद तक जा पहुँचेंगे कि बड़े होते-होते तो वे पूरे बर्बादी के रास्ते पर ही चल पड़ेंगे। और तब उन्हें सुध्रााने में बहुत देर हो जाएगी। कुछ माता-पिता अपने बच्चों को सार्वजनिक रूप से सिपर्फ इसलिए सज़ा देते हैंं क्योंकि वे दूसरों को यह दिखाना चाहते हैं कि वे अपने बच्चों को कितने अनुशासन में रखते हैं। यह मनुष्यों से आदर पाने की बात है और परमेश्वर की नज़र में दुष्टता है।

बच्चों को अनुशासित करने में माता व पिता दोनों एकमत होने चाहिए। जब पिता बच्चों को अनुशासित कर रहे हों, और हम माताएं बच्चों का पक्ष लेने वाले बनेंगे, तो अंतत: हम ही अपने बच्चों की बर्बादी की वजह बन सकते हैं।

बच्चों को अनुशासित करने के बाद, हमें उन्हें यह आश्वासन देना चाहिए कि उन्हें क्षमा कर दिया गया है। हमें उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि उनकी ग़लतियों को कैसे सुध्रााा जा सकता है। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम उनकी ग़लतियों को उन्हें बार-बार याद न दिलाएं। कुछ माताएं ऐसा करती हैं और इससे उनके बच्चों में झुंझलाहट बढ़ती है। ऐसे भी समय होते हैं जब हमें अपने बच्चों को पुरस्कृत करना चाहिए। जब हम किसी बात में अपनी ख्द़ाुी से इनकार करते हैं तो स्वयं परमेश्वर हमें पुरस्कृत करता है। जब अब्राहम ने अपनी ख्द़ाुी से इनकार किया और लूत को यह मौक़ा दिया कि पहले वह अपनी पसन्द की भूमि चुन ले ;उत- 13द्ध, तो परमेश्वर ने तुरन्त अब्राहम को आशिष दी। इसी तरह, जब हमारे बच्चे कुछ भला करते हैं और किसी बात में अपनी ख्द़ाुी से इनकार करते हैं तो उन्हें पुरस्कृत करना अच्छा है। हम उनके जन्मदिन पर, या जब वे बीमार होते हैं, या अस्पताल में भर्ती होते हैं, तब हम उन्हें कुछ उपहार दे सकते हैं।

ऐसे भी समय होते हैं जब हम अपने बच्चों को ज़रूरत से ज्य़ादा सज़ा देने की वजह से लज्जित होते हैं, तो हम उसकी भरपाई करने के लिए भी उन्हें कुछ उपहार दे सकते हैं। लेकिन यह कभी-कभी ही अच्छा है। अगर यह एक आदत बन जाएगी तो पिफर हम यही पाएंगे कि हमारे बच्चों की नज़र में सज़ा की कोई क़ीमत नहीं रह गई है। इसकी बजाए यह अच्छा है कि उन्हें बाद में, उनके द्वारा किए गए किसी अच्छे काम के समय, उन्हें कोई उपहार दे दिया जाए।

जब हमारे बच्चों के मामलों में मुश्किलें पैदा होने लगती हैं, तो उस आनन्द, विस्मय और परमेश्वर के प्रति उस आभार की अनुभूति खो देना आसान होता है जो हमने उस समय महसूस की थी जब हमारे बच्चे का जन्म हुआ था। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक बच्चे को जन्म देना एक अनमोल विशेषाध्काािर है। ऐसी बहुत सी पत्नियाँ हैं जिन्हें यह यह विशेषाध्काािर नहीं मिला है और जो एक बच्चा पाने के लिए संसार में कुछ भी करने के लिए तैयार हैं।

इसलिए हममें यह दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि हम अपना हाथ हल पर से नहीं हटाएंगीऋ और हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे घरों में सब कुछ सुंदर ढंग से चल रहा हो। अगर हम परमेश्वर के साथ समय बिताएंगे और उसके साथ नज़दीकी से चलेंगे, तो वह हमें नया बल देगा और हमें आत्मिक रीति से तरोताज़ा रखेगा।

अध्याय 8
अपने बच्चों को प्रोत्साहित करना

माँ के रूप में, मेरा मानना है कि अपने बच्चों के लिए जो सबसे बड़ा काम हम कर सकती हैं, वह उन्हें प्रोत्साहित करने का काम है। लेकिन यह कितने अपफसोस की बात है कि कितने घरों में यह नहीं होता है।

हम देखते हैं कि कितने बच्चे माता-पिता के शोषण, प्रेम की कमी और संगति के अभाव से अपने व्यक्तित्वों में कितने विकृत और ग़लत रूप वाले बन जाते हैं। एक ऐसे घर में बढ़ने वाला बच्चा जिसमें उसे प्रोत्साहित ही नहीं किया गया है, पर एक ऐसे पौध्ो की तरह है जो एक बड़ी चट्‌टान के नीचे अंकुरित हुआ है और जिसे कभी सूर्य की रौशनी ही नहीं मिली है।

एक प्रतिभाशाली बच्चे की प्रशंसा करना, या ऐसे बच्चे को प्रोत्साहित करना आसान होता है जो पढ़ाई या खेलकूद में अच्छा करता है। लेकिन प्रोत्साहन की सबसे ज्य़ादा ज़रूरत एक कमज़ोर बच्चे को होती है। हमें ऐसे बच्चे की ज़रूरत को महसूस करना चाहिए जो अपने भीतर-ही-भीतर दर्द भोग रहा है लेकिन अपनी दर्द को व्यक्त नहीं कर रहा है। एक संवेदनशील माँ उसकी भावनाआंे को इतनी ही आसानी से पढ़ लेगी जितनी आसानी से एक थर्मोमीटर बुख्ऱाा पढ़ लेता है!

एक बच्चा जब ख्द़ाु को हीन समझने लगता है और वह सब हासिल नहीं कर पाता जो उसके बड़े बहन-भाइयों ने किया है, तो वह अपने दोस्तों द्वारा अस्वीकृत महसूस करने लगता है और उसे ऐसा लगता है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं है। तब क्या हम उसे प्रोत्साहित करने की बजाए उसे डाँट-डपट कर उसके तनाव को और ज्य़ादा नहीं बढ़ा देते?

हम अपने आपको इस बात से परख सकते हैं कि हम अपने बच्चों के साथ कितनी बार फ्नहींय् शब्द का प्रयोग करते हैं। हम अपने बच्चों को सिपर्फ वही न कहें जो उन्हें नहीं करना है, बल्कि वह भी कहें जो उन्हें करना है।

शायद आपको ऐसा लगता है कि आपका कोई बच्चा आपकी योजना के बिना ही पैदा हो गयाध्गई है। क्या आपने अपने आपसे या किसी और से कभी ये शब्द कहे हैं, फ्ये बच्चा अकस्मात्‌ हो गया है।य् यह बात परमेश्वर के वचन के कितनी विपरीत है जो कहता है कि फ्बच्चे परमेश्वर का दिया हुआ दान हैंय् ;भजन- 127:3द्ध। हमें हर एक बच्चे की क़ीमत परमेश्वर के दिए हुए दान के रूप में ही करनी चाहिए। चाहे हमने बच्चे की अपेक्षा न की हो, लेकिन परमेश्वर कोई ग़लती नहीं करता।

हमें अपने बच्चों की निष्पफलताओं को सबके सामने ज़ाहिर नहीं करना चाहिए और न ही लोगों के सामने उन्हें नीचा गिराना चाहिए। हमारे बच्चों को यह पता होना चाहिए कि उनके पीठ पीछे भी हम उनके प्रति वपफादार रहेंगे।

हमें अपने बड़े बच्चों को यह भी सिखाना चाहिए कि वे अपने छोटे भाई-बहनों को स्वीकार करें और सिपर्फ इस वजह से ही उनसे ईर्ष्या न करें क्योंकि हम छोटे बच्चों के साथ ज्य़ादा समय बिताते हैं। कई बार, जब घर में एक नए बच्चे का जन्म होता है और सबका ध्यान उस पर लगा होता है तो यह बात एक समस्या बन जाती है। लेकिन परमेश्वर की मदद से, हम अपने बच्चों को यह दिखा सकते हैं कि हमारे लिए वे सभी एक जैसे मूल्यवान हैं।

जब एक बच्चा असपफल होता है तो हम ख्द़ाु उसके प्रति कितनी बार संवेदनशील होने में असपफल रहते हैं। अगर एक बच्चा पीछे लौट गया है और पाप में पड़ गया है, तब भी एक माँ अपनी प्यार भरी देखभाल और प्रार्थना द्वारा ऐसी एक खोई हुई भेड़ को वापिस उसके उ(ारकर्ता के पास लौटा सकती है।

जब एक बच्चा निष्पफल हो जाता है, तो यह उसे डाँटने का समय नहीं होता। जिनके पास बु( नहीं है, परमेश्वर उन्हें डाँटता नहीं है ;याक- 1:5द्ध। बेहतर माताएं बनने के लिए स्वयं हमें कितनी बु( की ज़रूरत है और परमेश्वर पिफर भी हमें नहीं डाँटता!

संसार में पीछे गिर चुके बहुत से बच्चों की माताओं की विश्वास भरी प्रार्थनाओं से वे बच्चे परमेश्वर के पास लौट आए हैं। इसलिए हमें बिना डगमगाए परमेश्वर की प्रतिज्ञााओं को थामें रहना है।

जब हम अपने बच्चों के साथ समय बिताएंगे, तो हम पाएंगे कि अगर हम उनके साथ कोई मामूली काम भी कर रहे हैं, तब भी वे हमारे साथ अपनी समस्याएं बाँटने लगेंगे। और तब हम उन्हें इस बात में प्रोत्साहित कर सकते हैं कि जिन समस्याओं का वे सामना कर रहे हैं, वे उनसे हारें नहीं, बल्कि उन पर जयवंत हों।

जब हमारे बच्चे बड़े होने लगते हैं तो हमें उनके साथ परिपक्व व्यस्क लोगों की तरह व्यवहार करना चाहिए और जिस आदर के वे योग्य हैं, उन्हें वे आदर देना चाहिए। हम उनके साथ ऐसे बच्चों जैसा व्यवहार न करें जैसे वे बचपन में थे। तब हम पाएंगे कि वे हमारे मित्रा बन गए हैं, और पिफर वे हमसे दूरी बना कर नहीं रहेंगे।

जब हमारे बच्चे बढ़ रहे होते हैं, तब हमारे पास ऐसे बहुत से मौक़े आते हैं जिनमें हम यह साबित कर सकते हैं कि वचन की प्रतिज्ञाएं हमारे लिए सच्ची हैं। अगर हम अपने बच्चों को दिन-प्रतिदिन परमेश्वर के हाथों में सौंपते रहेंगे, और परमेश्वर पर निर्भर रह कर अपना जीवन बिताएंगे, तो परमेश्वर के प्रावध्नाा में हमारे लिए रखी देखभाल हमारे लिए एक जीवित सच्चाई बन जाएगी। बच्चों का पालन-पोषण हमारे लिए भी आत्मिक रूप से परिपक्व होने का एक बड़ा माध्यम बन सकता है। और यह बात पिफर हमारे बच्चों के आत्मिक जीवन को भी प्रभावित करेगी। परमेश्वर हममें से हर एक की मदद करे कि हम विश्वासयोग्य रह सकें।

फ्जब बच्चे आलोचना में पलते हैं, तो वे दोष लगाना सीखते हैं

जब बच्चे द्वेष में पलते हैं, तो वे लड़ाई करना सीखते हैं,

जब बच्चे उपहास में पलते हैं, तो वे शर्मीले होना सीखते हैं,

जब बच्चे लज्जा में पलते हैं, तो वे दोषी महसूस करना सीखते हैं,

जब बच्चे सहनशीलता में पलते हैं, तो वे ध्राीज रखना सीखते हैं,

जब बच्चे प्रोत्साहन में पलते हैं, तो वे आत्मविश्वासी होना सीखते हैं,

जब बच्चे सुरक्षा में पलते हैं, तो वे विश्वास करना सीखते हैं,

जब बच्चे निष्कपटता में पलते हैं, तो वे न्यायपूर्ण होना सीखते हैं,

जब बच्चे प्रशंसा में पलते हैं, तो वे सराहना करना सीखते हैं,

जब बच्चे समर्थन में पलते हैं, तो वे स्वयं को स्वीकार करना सीखते हैं,

जब बच्चे मित्राता में पलते हैं, तो वे प्रेम करना सीखते हैं।य्

अध्याय 9
मेरे साथ र्ध्यौ रखें

फ्'मेरे साथ र्ध्यौ रख', उसका संगी दास गिर कर

भीख मांगने लगाय् ;मत्ती 18:29द्ध।

यही वह अनकही पुकार है जो पत्नियों और माताओं के तौर पर हमारे पास उनके अन्दर से आती रहती है जिनके साथ हम रोज़ व्यवहार करते हैं। लेकिन इस आवाज़ को सुनने के लिए हमें अपनी आत्माओं में बहुत संवेदनशील होना चाहिए, क्योंकि यह पुकार अनकही होती है।

ऐसा हो सकता है कि हमारे बच्चे वह सीखने में ध्माीे हों जो हम उन्हें बार-बार सिखाने की कोशिश करते रहे हैं, और हम उनके साथ अध्राी हो जाने की बड़ी परीक्षा में पड़ गए हैं। अगर हम सिपर्फ उनकी यह अनकही पुकार सुन लें, फ्मेरे साथ र्ध्यौ रखें, मैं अपनी पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि सब कुछ सही हो जाए,य् तो हमारे लिए यह आसान हो जाएगा कि हम उनकी तरपफ से चिड़चिड़े हो जाने की परीक्षा पर जय पा सकेंं।

शायद हमारे घर में काम करने वाली कोई सेविका थोड़ी बेढंगी है, और ऐसी सापफ-सुथरी नहीं है जैसी हम चाहते हैं, और हम उसके साथ कठोरता से व्यवहार करने की परीक्षा में पड़ गए हैं। लेकिन उसकी अनकही पुकार यही होगी, फ्मेरे साथ र्ध्यौ रखें। मुझे एक मौक़ा और दें और मैं सुध्रा जाऊँगीय् - आंैर इस तरह, हमें ज्य़ादा कोमल होने का एक मौक़ा और मिल जाता है।

या यह हो सकता है कि हमारे माता-पिता, जो बूढ़े और कमज़ोर हैं, अब हम पर निर्भर हो गए हैं। उनकी भी यही कमज़ोर और अनकही पुकार होगी, फ्मेरे साथ र्ध्यौ रखो। मैं तुम्हें परेशान करना नहीं चाहता, लेकिन मुझे अभी तुम्हारी मदद की ज़रूरत है।य् अगर हम उनकी भावनाओं के प्रति संवेदनशील होंगे, तो हम उनका आत्म-सम्मान मिटाए बिना, और उन्हें उनकी निर्भरता का अहसास कराए बिना, उनकी पुकार सुनेंगे और उनकी मदद करेंगे।

शायद कलीसिया मेंं हमारी साथी बहनों का व्यवहार हमारे लिए एक परीक्षा बन जाता है। उनकी भी यही अनकही पुकार होती है, फ्मेरे साथ ध्राीज रखें। मुझमें अभी बु( की बहुत कमी है।य् तब हमें यह अहसास होता है कि वे भी, हमारी तरह ही, सि(ता की तरपफ बढ़ने की कोशिश कर रही हैं।

ऐसी परिस्थितियों में, हम यह पाएंगे कि हमारी शारीरिक सोच का झुकाव भी उस निर्दयी सेवक की तरह ही है। पिफर भी वही समय वे समय होते हैं जब हमें पिफर से यह याद करने की ज़रूरत होती है कि परमेश्वर ने हमें कितना क्षमा किया है, और कैसे दूसरों ने भी हमारी कमियों और कमज़ोरियों को र्ध्यौ से सहा है।

इसलिए हमारे आत्मिक कान हर समय र्ध्यौ रखने कि उस पुकार को सुनने के लिए तैयार रहने चाहिए जो हमारे संगी दासों - जवानों और बूढ़ों दोनों के पास से, हमारे पास आती रहती है।

फ्पर ध्राीज को अपना पूरा काम करने दो कि तुम पूर्ण तथा सि( हो जाओ, जिससे कि तुम में किसी बात की कमी न रहेय् ;याक- 1:4द्ध।

अध्याय 10
पवित्रा-आत्मा से भरपूर एक सहायक

आवश्यकता के समय में पवित्रा-आत्मा हमारा सहायक है ;यूहन्ना 14:16द्ध।

एक पत्नी जो पवित्रा आत्मा से भरी है, स्वाभाविक रूप से आत्मा के इस गुण से भरपूर होगी, और अपने पति की आवश्यकता की घड़ी में उसकी मददगार साबित होगीं। परमेश्वर ने हव्वा को आदम के लिए एक ऐसी ही सहायक होने के लिए रचा था।

एक अच्छी सहायक वही है जो जल्दी ही अपने पति की असहायता और आवश्यकता को देख लेती है, और पिफर उतनी ही जल्दी आगे बढ़ कर उसे पूरा भी करती है। अगर आपके पति मज़बूत हैं, तब भी जीवन के संघर्षों में ऐसे समय आएंगे जब उन्हें यह ज़रूरत महसूस होगी कि कोई उनके साथ खड़ा रहे।

वह एक आशिषित स्त्राी है जो अपने पति की ऐसी सहायक बनती है।

लेकिन यह एक दु:खद बात है कि ज्य़ादातर पत्नियाँ अपनी ही पीड़ाओं और परीक्षाओं में इस तरह से घिरी रहती हैं कि वे हमेशा ख्द़ाु ही उनके पतियों के पास से दिलासा, सान्त्वना और लाड़-प्यार चाहती हैं। इस तरह, वे कभी अपने आपसे ही आज़ाद नहीं हो पातीं कि वे अपने पतियों की कुछ मदद कर सकें।

कुछ मामलों मेंं, इसकी वजह यह भी हो सकती है कि उन पत्नियों ने अपने ऊपर बहुत सी ऐसी ज़िम्मेदारियाँ ले ली थीं जो ज़रूरी नहीं थीं और बाद में जिनका बोझ उठाना मुश्किल हो गया था।

हमें अपनी सीमाओं को जानना ज़रूरी है कि हम सिपर्फ उतना ही काम अपने हाथ में लें जिसे हम पूरा कर सकते हैं।

हम अपने पतियों की ही मदद करें यह कापफी नहीं है। माँ होते हुए, परमेश्वर ने हमें अपने बच्चों की भी मदद करने के लिए बुलाया हुआ है। जब हमारे बच्चे किसी क्षेत्रा में निरुत्साहित हो जाते हैं, या जब वे पाप करते हैं और हमें अपने आचरण से निराश करते हैं, या जब वे हमारी अपेक्षा के स्तर तक नहीं पहुँच पाते, तब हमारा मनोभाव क्या होता है?

लड़की-बच्चे चीन के नदियों में पफेंक दी जाती हैं, और भारत में कूड़े के ढेरों और मन्दिरों में डाल दी जाती हैं क्योंकि वे पुत्रा की चाह रखने वाली अपनी माताओं के लिए एक बड़ी निराशा होती हैं। जब हमारा कोई बच्चा हमें किसी बात में निराश करता है, तो क्या हम भी ऐसी ही माताआंे जैसे बन जाते हैं?

एक बच्चा जो निष्पफल हुआ है, या जो ख्द़ाु को दूसरों की तुलना में तुच्छ समझता है, उसे ज्य़ादा प्रेम, संवेदना, समझे जाने और देखभाल की ज़रूरत है, उसके साथ ज्य़ादा समय बिताने और ज्य़ादा प्रार्थना करने की ज़रूरत है - यह नहीं कि उसे नदी में पफेंक दिया जाए!

हमारा विश्वास यह होना चाहिए कि वह स्वामी जो कुम्हार है, जगत के सबसे टूटे हुए पात्रा को भी जोड़ कर एक ऐसा उपयोगी पात्रा बना सकता है जो उसके लिए उपयोगी हो सके।

वह हमारे सबसे हठीले बच्चे की कठोरता को दूर कर उसे अपनी महिमा का पात्रा बना सकता है। पवित्रा आत्मा, जो सहायक है, इसलिए आया है कि हमारे उन बच्चों को जो इस जगत में असपफल हैं, उन्हें ईश्वरीय सपफलताएं बना दे। और हम माताओं की यह बुलाहट है कि हम अपने बच्चों को इस बात पर विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करें।

या एक दूसरा उदाहरण लें: जब पिता को एक बच्चे को कठोरता से अनुशासित करना पड़ा हो, तो ऐसे समय में हमें उस बच्चे को इस तरह की फ्तसल्लीय् देते हुए बिगाड़ना नहीं चाहिए जिसमें उसे ऐसा लगे कि उसके पिता ने उसके साथ कुछ ज्य़ादा ही कठोरता से व्यवहार किया है। कुछ माताएं तो इस हद तक भी जा सकती हैं कि वे रिबका की तरह, अपने बच्चों को उनके पिता को ध्खााेा देने के लिए भी उकसा सकती हैं। याकूब के बारे में बात करते समय, अकसर उसे ध्खााेा देने वाला कहा जाता है। लेकिन उसे ध्खााेा देने की बात सिखाने वाला कौन था? एक नासमझ माँ जो अपने पति के साथ एक नहीं थी। ये बातें हमें सिखाने के लिए लिखी गई हैं।

स्त्राियों के रूप में, हमारे अन्दर भावनात्मक ऊर्जा का एक बड़ा ख्ज़़ााना छिपा हुआ है। अपने पतियों को सता कर अपने लिए कुछ-कुछ काम कराने की बजाए, हम ऐसा क्यों न करें कि इस ऊर्जा को अपने बच्चों के बोझ और उनकी मुश्किलें उठाने में र्ख्च़ा करें, क्योंकि बच्चों की भी अपनी मुश्किलें हैं और वे उन्हें उठा पाने के लिए अभी छोटे हैं। उन्हें किसी की मदद की ज़रूरत होती है।

हमारा यु( एक ऐसे शत्राु से है जो हमारे घरों, हमारे बच्चों, और हमारे परिवारों को ख्त्म़ा करने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ है। हमें यह मैदान नहीं छोड़ना है, और जब तक हमारे परिवार का हर एक सदस्य परमेश्वर के राज्य में सुरक्षित नहीं हो जाता, हमें अपने असली शत्राु पर से नज़र भी नहीं हटानी है। पवित्रा आत्मा हमारी तरपफ से मध्यस्थ होता है, और सहायकों के रूप में हमें अपने पतियों व बच्चों के लिए प्रार्थना करनी है।

हम इस संघर्ष की तुलना रस्सा-खींचने के खेल से कर सकते हैं जिसमें अंध्काार की शक्तियाँ हमारे पतियों व बच्चों के ख्ल़ाािपफ रस्सा खींच रही हैं। हम किस तरपफ हैं - अपने पतियों और बच्चों के साथ हैं ;उनके लिए प्रार्थना करते और उन्हें प्रोत्साहित करते हुएद्ध, या ;उन्हें सताते और डाँटते-पफटकारते हुएद्ध उनके ख्ल़ाािपफ़ हैं?

इस संघर्ष में हमें कभी निराश होने की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि पवित्रा आत्मा बल देने के लिए हर समय हमारे साथ है, परमेश्वर की सारी प्रतिज्ञाएं हमारा सहारा हैं, और हमें प्रोत्साहित करने के लिए साक्षियों का एक बड़ा बादल है। हममें से हर एक स्त्राी वैसी सहायक बन सकती है जैसी सहायक परमेश्वर हमें बनाना चाहता है।

अंतिम दिन में, जब हमारे पति और बच्चे जीवित होकर हमें ध्न्या कहेंगे, तब हमारे सभी वर्तमान आत्म-त्याग और दर्द बहुत मामूली नज़र आएंगे, क्योंंकि हमने सहायक होने का अपना काम पूरी विश्वासयोग्यता से किया है।

अध्याय 11
यीशु के चरणों में बैठना

फ्मरियम ज़मीन पर बैठी थी, और जब यीशु बोल रहा था, तो वह सुन रही थी। लेकिन मार्था भीरू प्रवृत्ति की थीऋ उसे खाने-पीने के उस बड़े इंतज़ाम की चिंता हो रही थी जिसमें वह व्यस्त थी। वह यीशु के पास आकर बोली, 'क्या तुझे यह अनुचित नहीं लगता कि मैं काम में लगी हूँ और मेरी बहन यहाँ बैठी है? उससे कह कि वह आकर मेरी मदद करे।' लेकिन परमेश्वर ने कहा, 'मार्था, आप इन मामूली बातों के लिए कितनी परेशान हो रही है! वास्तव में एक ही बात ज़रूरी है, और मरियम ने यह जान लिया है कि वह क्या है, और यह मैं उससे नहीं ले सकताय्

;लूका 10:38-42द्ध।

मार्था घर में बड़ी मेहनत से काम कर रही थी। परमेश्वर से प्रेम करने वाली एक बहन के लिए इससे बढ़ कर संतोष की क्या बात हो सकती है कि वह अपने प्रिय स्वामी और उसके शिष्यों के लिए बढ़िया भोजन तैयार करे? जो काम वह प्रेमपूर्वक कर रही थी, वह उसके लिए तब एक भारी और असहनीय बोझ बन गया जब उन्होंने यह देखा कि उसकी बहन क्या कर रही थी। मरियम सिपर्फ उसकी कोई मदद नहीं कर रही थी - जो सतही तौर पर एक स्वार्थपूर्ण बात थी - लेकिन वह परमेश्वर की उपस्थिति में बहुत ख्श़ाु भी नज़र आ रही थी। और परमेश्वर भी उसके साथ ख्श़ाु नज़र आ रहे थे। मार्था के मनोभाव में काइन के उस मनोभाव की झलक नज़र आ रही थी जो उसमें अपने छोटे भाई के प्रति था। जब एक बहन अपने ही घर में काम के बोझ से दबी हो, तो घर के दूसरे लोगों को काम के बोझ से मुक्त रह कर परमेश्वर में आनन्द मनाते हुए देख पाना उसके लिए आसान नहीं होगा।

क्या हम मार्था की तरह भीरू प्रवृत्ति की हैं? मार्था एक कमज़ोर पात्रा थी। हम सभी बहनें भी कमज़ोर हैं। मार्था थकी हुई भी थी। लेकिन यह सारी बातें उसकी उस आत्मा को न्यायोचित नहीं ठहरा सकती थीं जो शिकायत कर रही थी, दूसरों का न्याय कर रही थी, तुलना कर रही थी, ईर्ष्या कर रही थी और अपने आपको दया का पात्रा बना रही थी।

जब हम थक जाएं, तब हमें परमेश्वर के पास जाना चाहिए जो हमें यह कहते हुए बुलाता है,

फ्हे सब थके और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें आराम दूँगा। मेरा जुआ अपने ऊपर उठा लो और मुझसे सीखो, क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ, और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। क्योंकि मेरा जुआ सहज और मेरा बोझ आसान हैय् ;मत्ती 11:28-30 - टी-एल-बी-द्ध।

हमारे सारे काम के बीच, हम यह अंगीकार करते हुए परमेश्वर के सम्मुख बने रह सकते हैं कि वह अपने सिंहासन पर विराजमान है, और इस बात में पूरी तरह से आश्वस्त रह सकते हैं वह हमारे हर एक बोझ और समस्या को जानता है। इससे हम अपने काम को एक शान्त हृदय और ऐसी मुक्त आत्मा में होकर कर सकेंगे जिसमें हम सिपर्फ दूसरों से प्रेम करने और उन्हें आशिष देने वाले ही नहीं, बल्कि ऐसे बन जाएंगे जिनका जीवन ऐसा आरामदायक नज़र आएगा कि वे जब चाहे और जहाँ चाहे आ-जा सकते हैं।

यीशु ने मार्था से कहा, फ्सिपर्फ एक ही बात ज़रूरी है, और मरियम ने यह जान लिया है कि वह क्या है।य्

यह एक तसल्ली की बात है कि हमें मार्था या मरियम होने के बीच चुनाव नहीं करना है। हम दोनों हो सकते हैं। हम यह पढ़ते हैं कि जब लाज़र को मृतकों में से जिलाया गया, तब उसी घर में पिफर से एक भोज का आयोजन हुआ था और वहाँ फ्मार्था सेवा कर रही थीय् ;यूह-12:2द्ध, और मरियम पिफर से परमेश्वर के चरणों में बैठी थी। लेकिन इस बाद मार्था ने कोई शिकायत नहीं की। वह ख्श़ाु थी क्योंकि उन्होंने अपनी सेवा की बीच ख्श़ाु रहना सीख लिया था।

उन्होंने शायद रसोई में काम करते हुए भी फ्परमेश्वर के चरणों में बैठनाय् सीख लिया था। हम भी, जो अपने घर के कामों में व्यस्त रहते हैं, अपने पृथ्वी के कामों के बीच भी इस आनन्द की परिपूर्णता का अनुभव कर सकते हैं। हम अपने परिवार के लिए ज़रूरी काम करते हुए भी परमेश्वर के चरणों में बैठ सकते हैं। यह हमारा काम नहींं बल्कि एक शिकायत और ईर्ष्या करने वाली आत्मा में से आने वाली अशांति है जो हमें परमेश्वर के चरणों में बैठने से रोकती है। सारी पृथ्वी परमेश्वर के चरणों की चौकी है, इसलिए हम कहीं भी उसके चरणों में बैठ सकते हैं।

फ्मैं अपने परमेश्वर के सम्मुख अपने मन में ऐसे ही शान्त हूँ जैसे अपनी माँ की गोद में एक दूध्ा छुड़ाया हुआ बच्चाय् ;भजन- 131:2 - टी-एल-बी-द्ध। एक दूध्ा छुड़ाया हुआ बच्चा, अपनी माँ की गोद में किसी बेचैनी और स्वार्थी लालसा बिना, पूरी तरह से निश्चिंत पड़ा रहता है। हम भी ऐसे ही हो सकते हैं, क्योंकि जब हम परमेश्वर में बने रहते हैं, तो हम यह पाएंगे कि हमारे सारे घरेलू कामकाज के बीच भी वह हमारे साथ है।

फ्उसके मन्दिर में बिताया एक दिन ;अगर परमेश्वर ने मेरे लिए वही जगह ठहराई है, तो मेरा घर ही उसका पवित्रा मन्दिर हैद्ध, किसी दूसरी जगह पर बिताए हज़ार दिनों से अच्छा है! मेरे लिए परमेश्वर के भवन का द्वारपाल ;या एक व्यस्त पत्नी और माँद्ध होना, महलों में ;चैन और आराम - मेरे जीवन के लिए उसकी इच्छा से बाहरद्ध होने से भी अच्छा है---य् क्योंकि परमेश्वर कृपा और महिमा देता है। जो खरी चाल चलते हैं, उनसे वह कोई अच्छी वस्तु न रख छोड़ेगाय् ;भजन- 84:10,11 - टी-एल-बी-द्ध - पिफर चाहे वह खरी चाल चलना हो, मेरे घर में देर तक काम करना हो, या बीमार बच्चों की देखभाल में देर तक जागना भी क्यों न हो।

परमेश्वर ने हमसे कहा है, फ्मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ। मैं न तुम्हें कभी छोड़ूँगा और न कभी त्यागूँगा।य्

यह वह ख्श़ाुख्ब़ारी है जो हमारा परमेश्वर नई वाचा में हम बहनों के लिए लाया है: हम चाहे जो कुछ भी कर रही हों, वह सदा हमारे साथ है। इसलिए हम उससे हमेशा मिल सकते हैं, हमारे घरों में भी।

हम इस पृथ्वी पर अब और कुछ नहीं बस स्वयं हमारे परमेश्वर की उपस्थिति चाहते हैं ;भजन- 73:25द्ध। मैडम गूयोन ने बहुत अच्छी तरह कहा है:


फ्हम एक जगह ढूँढते, व एक जगह से भागते हैं,

पिफर भी हमारे जीव कहीं चैन नहीं पाते हैं

लेकिन जब मेरा परमेश्वर मुझे राह दिखाता है,

तो मरना या जीना, दोनों एक हो जाता है,

जहाँ परमेश्वर नहीं है, क्या मैं ऐसी जगह में हो सकती हूँ?

जब यह ख्य़ाल आता है, मैं डर से काँप उठती हूँ,

दूर तक देखने पर भी, ऐसी जगह नज़र नहीं आती

परमेश्वर मौजूद है सब जगह, ये तसल्ली मुझे है मिल जाती।य्

पुरानी वाचा के संतों ने पुकार कर कहा, फ्जैसे हरिणी नदी के जल के लिए हाँपफती है, वैसे ही हे परमेश्वर, मैं तेरे लिए हाँपफता हूँ। मैं परमेश्वर के लिए, हाँ, जीवित परमेश्वर के लिए प्यासा हूँ। मैं कब जाकर परमेश्वर के सम्मुख खड़ा हो पाऊँगा?य् ;भजन- 42:1-2द्ध। लेकिन आज, हम परमेश्वर को अपने साथ खड़ा पाते हैं - हमारे अपने घर में। यह कितनी आशिष भरी बात है!

अध्याय 12
परमेश्वर की ध्माीी आवाज़

फ्मैं परमेश्वर के सामने शांत खड़ा रह कर आस लगाए रहता हूँ--- पिफर मुझे डर से बेचैन होने की क्या ज़रूरत है?य् ;भजन- 62:1-2 टी-एल-बी-द्ध।

क्या हम कभी निराश नहीं हुए हैं?

क्या हमने कभी किसी मुश्किल हालात से डर कर भाग जाना नहीं चाहा है?

महान्‌ नबी एलिÕयाह के साथ भी एक बार ऐसा ही हुआ था। जब इस्राएल में सारे लोग पीछे हट रहे थे, तब वह अकेला परमेश्वर के लिए खड़ा रहा था ;1 रा- 18द्ध। लेकिन उस महान्‌ जय के बाद, वह अपनी जगह छोड़ कर भाग गया था। वह 500 किलोमीटर भागा, और अंतत: उन्होंने ख्द़ाु को होरेब पर्वत पर भूकम्प, आपपफान और आग के बीच पाया ;1 रा- 19द्ध

लेकिन इन सबसे बड़ा तूपफान उसके अपने हृदय में था।

लेकिन उस पर्वत पर एलिÕयाह अकेला नहीं था। जैसे परमेश्वर उसके साथ तब भी थे जब वह कर्मेल पर्वत पर परमेश्वर की ओर से खड़ा हुआ था, वैसे ही परमेश्वर उसके साथ अब भी थे जब वह भय और निराशा में भाग रहा था।

माँ होते हुए, हम कभी-कभी ख्द़ाु को ऐसे हालात में पा सकते हैं जब हमारे हृदयों में भी आपपफान उठ रहे होते हैं और हम भी कहीं भाग जाना चाहते हैं। लेकिन हमारा स्वर्गीय पिता तरस से इतना भरपूर है कि वह हमारे साथ खड़ा रहता है, हमसे कोमलता से बात करता है, और चाहे हम एलिÕयाह की तरह जीवन से तंग भी आ गए होंगे, तो भी वह हमें प्रोत्साहित करता है।

ऐसे समयों में हमें आत्म-दया की आपपफानी आवाज़ों को सुनने से इनकार कर देना चाहिए क्योंकि वे हमें ऐसे काम करने और ऐसी बातें बोलने की तरपफ ले जाएंगी, जिनके लिए हमें बाद में पछताना पड़ेगा। इसकी बजाए हम वह करें जो निराशा की अवस्था में एलिÕयाह ने किया था: एक फ्ध्माीी आवाज़य् को सुनना ;1 रा- 19:12 टी-एल-बी-द्ध। आपपफान और भूकम्प के ऊपर परमेश्वर मौजूद है जो पापियों का मित्रा है, जो हमारी हर एक कमज़ोरी को जानते हैं, और जो हमसे बात करना चाहते हैं। उसकी ध्माीी आवाज़ ही हमारे जीव में तसल्ली पहुँचा सकती है। सारे आपपफान शांत हो जाएंगे, और हमारे हृदयों में शांति का राज आ जाएगा।

दाऊद ने कहा, फ्मैं तेरे आत्मा से भाग कर कहाँ जाऊँ? या तेरी उपस्थिति से कहाँ भागँू? अगर मैं समुद्र के छोर पर जा बसूँ, तो वहाँ भी तेरा हाथ मेरी अगुवाई करेगा --- यह जानना कितना मूल्यवान है परमेश्वर, कि आप हर समय मेरे बारे में सोचता रहता है, और सुबह जब मैं जागता हूँ तब भी आप मेरे बारे में सोच रहा होता हैय् ;भजन- 139:7,9,10,17,18 - टी-एल-बी-द्ध।

फ्तुम्हें शांति मिले। डरो मत, मैँ हूँ,य् यीशु ने यह बात उसी समुद्र और लहरों पर चलते हुए, जिनसे वे डर रहे थे, कोमलता से अपने शिष्यों से कही। उसी समय समुद्र शांत हो गया। और वह आज भी वही है - हमारे जीवन के ऐसे हर एक तूपफान को शान्त करने वाला जो तूपफान हममें डर और निराशा पैदा करते हैं। फ्तेरी नम्रता मुझे महान्‌ बनाती हैय् ;भजन- 18:35द्ध

क्या हमें दूसरे लोगों के द्वेष का सामना करना पड़ता है? तो उसके बारे में सोचें जिसने अपने विरु( पापियों के विरोध्ा और बैर को सहा ;इब्र- 12:3द्ध

अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से जो शत्राुता हमें सहनी पड़ती है, वह इस बात का संकेत होती है कि हम सही रास्ते पर हैं। उस रास्ते पर, हम अपने से पहले जाने वाले यीशु को देखते हैं - उन्होंने भी द्वेष सहा, लेकिन वह आत्म-दया, आलोचना, और शिकायतों के आगे हारा नहीं बल्कि उन्होंने भलाई से बुराई को जीत लिया। जब उन्होंने पीड़ा सही, तो उन्होंने ध्माकी नहीं दी, बल्कि अपने दोष लगाने वाले को क्षमा किया और आशिष दी। उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता की ध्माीी आवाज़ को सुना और अपना मुकद्दमा परमेश्वर के हाथों में सौंप दिया।

हमारा पिता, जो सबके द्वारा कही और की जाने वाली हर एक बात को देखता है, एक दिन वह सबका न्याय ध्ाार्मिकता से करेंगे, और उसमें कोई पक्षपात नहीं होगा क्योंकि वह हर एक परिस्थिति की पूरी सच्चाई जानते हैं।

अगर हम वह करें जो यीशु हमें करने के लिए कहते हैं, तो हम आत्म-दया की हर एक भावना पर प्रबल हो सकेंगे, और इस बात में ख्श़ाुी मना सकेंगे कि हम उसकी पीड़ाओं में सहभागी हुए हैं। तब हम भी सारे अपशब्दों, बदनामी, आरोपों, माँगों, आत्म-रक्षा, ख्द़ाु को सही ठहराने की बातें और आत्म-दया के बीच अपनी दौड़ पूरी कर सकेंगे।

इसलिए हम ऐसा होने दें कि परमेश्वर हमारे ऐसे ख्द़ाुी के जीवन को इस तरह की अग्निमय परीक्षाओं द्वारा ख्त्म़ा कर सके। हमारी ख्द़ाुी की इस मौत में से परमेश्वर की महिमा के लिए पुनरुत्थान की सामर्थ्य से भरी एक सुगन्ध्ा उठेगी। और हम उसे यह कहता हुआ सुनेंगे, फ्आप मेरी प्रिय बेटी है, जिससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।य् स्वीकृति का यह शब्द हमारा सबसे बड़ा पुरस्कार होगा। इसलिए हमारे हृदयों में हर समय ख्म़ाााेशी का राज रहे क्योंकि यह परमेश्वर का मन्दिर है। फ्परन्तु यहोवा तो अपने पवित्रा मन्दिर में है, समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहेय् ;हब- 2:20ऋ ज़क- 2:13द्ध

जब उकसाए जाने के समय भी हम ऐसी निश्चलता और शान्ति बनाए रहेंगे, तो हम वास्तव में परमेश्वर की सच्ची सेविका साबित होंगे जिसने पिलातुस से कहा था, फ्मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। अगर मेरा राज्य इस संसार का होता, तो मेरे सेवक यु( करतेय् ;यूहन्ना 18:36द्ध

यीशु राजा है। सारे पार्थिव पिलातुस और उनके सेनाएं परमेश्वर के दास हैं। और वह जिसने सदियों पहले अपने लोगों के लिए फ्श्राप को आशिष में बदल दिया था,य् आज भी हमारे लिए यही कर सकता है ;व्य- 23:5द्ध

परमेश्वर हमें बुलाता है कि:

फ्शान्त हो जाओ ;विश्राम करो, अपना ज़ोर न चलाओ, छोड़ दोद्ध - और जान लो कि मैं ही परमेश्वर हूँय् ;भजन- 46:10द्ध

हाँ, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अध्काािर अब भी उसके ही हाथ में है। वह हमारा सृष्टिकर्ता, छुड़ाने वाला, स्वामी, और परमेश्वर है। वह जो कुछ हमारे जीवन की ओर आने देता है वह पहला कुरिन्थियों 10:13 और रोमियों 8:28 में से दो बार छन कर आता है, इसलिए हम हर समय शांति में बने रह सकते हैं।

यु( के बीच में, जब भट्‌ठे की आग सबसे तेज़ होगी, तब हमें उसकी ध्माीी आवाज़ यह कहती सुनाई देेगी:

फ्मेरी कृपा, इस परिस्थिति में भी तेरे लिए कापफी है। जो आप सह नहीं सकता, उससे ज्य़ादा परीक्षा और प्रलोभन में मैं तुझे नहीं पड़ने दूँगा। जो कुछ भी तेरे साथ हो रहा है, मैं ऐसा होने दूँगा कि वह सब मिलकर तेरा भला ही करे - तुझे ज्य़ादा से ज्य़ादा मेरी समानता में बदले।य्

हाँ, हममें से सबसे कमज़ोर बहन भी जयवंत होकर सामने आ सकती है।


फ्तेरी ओस की बूँदें ख्म़ाााेशी से गिरती रहें,

हमारी कोशिशों के सारे ज़ोर ख्त्म़ा होते रहें,

हमारे जीव में से सारा तनाव व दबाव दूर हो,

पिफर हमारे नियमित किए गए जीवनों में ऐसा हो

कि उनमें तेरी शांति के सौन्दर्य का अंगीकार हो।य्

अध्याय 13
लूत की पत्नी को याद करें

अपने समय के सबसे सम्पन्न्‌ नगरों में से एक नगर के खण्डरों के बाहर एक स्त्राी की नमक की प्रतिमा सभी समयकालों की स्त्राियों के लिए एक संदेश देती है।

परमेश्वर के ये शब्द, फ्लूत की पत्नी को याद करोय् ;लूका 17:32द्ध, हम सबके लिए एक चेतावनी हैं।

जब लूत की पत्नी ने पीछे मुड़ कर देखा था, तो वह एक ऐसी जीवन-शैली का अंतिम काम था, जिससे उन्होंने अपने परिवार को पहले ही बर्बाद कर दिया था। उसका पति फ्एक सही व्यक्ति था जो उसके आसपास ;सोदोम मेंद्ध होने वाले कुकर्मों के कारण अपनी सच्ची आत्मा में दिन प्रतिदिन व्यथित होता थाय् ;2 पत- 2:7,8 - वाए-एल-बी-द्ध। लेकिन वह स्त्राी सोदोम के बारे में अपने पति की तरह महसूस नहीं करती थी। और यही इस परिवार की त्राासदी थी।

उसमें परमेश्वर का कोई भय न था इसलिए वह अपनी बेटियों को भी परमेश्वर का भय मानना नहीं सिखा सकी थी। जब उसकी बेटियाँ बड़ी हो रही थीं, शायद तब वह अपने सामाजिक जीवन में बहुत व्यस्त रही होगी।

वह एक प्रतिष्ठित व्यापारी की पत्नी थी और उसे यह गर्व था कि उसकी बेटियों को सोदोम के समाज में स्वीकार कर लिया गया था। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने अपने पति की सभी आपत्तियों को अस्वीकार करते हुए अपनी बेटियों को सोदोम की शैलियों और वेशभूषाओं को अपनाने दिया होगा, और बाद में सोदोम के ही दो छैल-छबीले युवाओं से उनका विवाह भी कर दिया था। इस तरह उन्होंने अपनी बेटियों को बर्बाद किया था।

हम माताओं के पास उस चार हज़ार साल पुराने नमक के खम्भे से एक चेतावनी आ रही है: अपने बच्चों के साथ समय बिताओ। लूत की पत्नी को याद करो।

लूत की पत्नी का ध्ना उसकी भौतिक वस्तुएं थीं, इसलिए उसका मन भी उनमें ही लगा था। हम माताएं क्योंकि अपने घर में इतनी सारी भौतिक वस्तुओं से काम लेती रहती हैं, कि पिफर हम सहज ही खाने, कपड़े और घर की चीज़ों को बहुत मूल्यवान समझने लगती हैं।

इसलिए उस नमक के खम्भे में से हमें एक और चेतावनी मिलती है: वे चीज़ें जो नज़र आती हैं, वे पार्थिव हैं और मिट जाने वाली हैं। लूत की पत्नी को याद करो।

लूत की पत्नी के लिए शायद सोदोम के अपने सांसारिक मित्रााें से जुदा होना बहुत मुश्किल हो रहा था। बहुत सी बहनें परमेश्वर के किसी काम की नहीं होतीं क्योंकि उनके सबसे अच्छे मित्रा उनके सांसारिक सम्बंध्ाी और पड़ौसी होते हैं और वे अपना ज्य़ादातर समय उनके साथ व्यर्थ बातचीत करने में गवाँ देती हैं।

ऐसी बहनों के लिए भी चेतावनी का यही शब्द है: बुरी संगति परमेश्वर में आपकी साक्षी को ख्त्म़ा कर देगी। लूत की पत्नी को याद करो।

शायद बीते समय की हमारी किसी असपफलता का बोझ हमें दबा रहा हो, या वह किसी प्रियजन द्वारा दिया गया दु:ख या ध्खााेा है जिसे हम भुला न पा रहे हों। या वह कोई ऐसा दर्द या तकलीपफ भी हो सकती है जिसे दूसरों को सुना कर हमें उनकी हमदर्दी हासिल करने से ख्श़ाुी मिल रही हो।

वह चाहे जो भी हो, पीछे मुड़ कर देखना हमेशा ख्त़ारनाक होता है। जबकि ऐसा हो सकता था कि हम कलीसिया में एक स्तम्भ होते, लेकिन वह एक ही बात हमारी सारी आत्मिक उन्नति को रोक कर हमें नमक का खम्भा बना देती है। ;हाँ, परमेश्वर का वचन हमें यह बताता है कि अगर बहनें पाप पर जय पाएं तो वे भी कलीसिया में एक स्तम्भ बन सकती हैं ;प्रका- 3:12द्ध

इसलिए, हम चेतावनी पर ध्यान दें: बीते समय को भूल जाएंं। उस पर बहुत सोच-विचार न करें। लूत की पत्नी को याद करें।

फ्अपनी जान बचा कर भागो! पीछे मुड़कर न देखना। उन पहाड़ों में भाग जाओ, कहीं ऐसा न हो कि तुम भी नाश हो जाओय् ;उत- 19:17द्ध। स्वर्ग से आज हमारे लिए यह बुलाहट आती है। हम बीते समय में नहीं, बल्कि हर समय परमेश्वर के साथ पहाड़ी चोटी पर रहें। और हम इस पृथ्वी की उन वस्तुओं पर से अपनी मज़बूत पकड़ को छोड़ दें जो वैसे भी एक दिन हम पीछे छोड़ चले जाने वाले हैं।

लूत की पत्नी को याद करें।

अध्याय 14
आशा का एक द्वार

फ्मैंने उसे मन पिफराने का मौक़ा दिया है--य् ;प्रका- 2:21द्ध

जब हम ये शब्द पढ़ते हैं, तो क्या इनमेें हम पृथ्वी के किसी पिता को इस तरह उसकी बेटी को ध्माकाते हुए पाते हैं कि अगर वह अपना मन नहीं पिफराएगी तो उसके बुरे परिणाम भुगतेगी?

नहीं, ऐसा नहीं है। यह स्वर्गीय पिता की आवाज़ है जो अपनी बेटी से प्रेम करता है और उसके लिए आशा का द्वार खोल रहा है, और उसकी गलतियों को सुध्रााने का तरीक़ा बता रहा है। वह चाहता है कि वह मन पिफराए, इसलिए वह उसे समय देता है।

हम पिता को यह कहता सुनते हैं:

फ्मैं उससे प्रेम से बातें करूँगा, और उसकी दु:खों की घाटी को आशा के द्वार में बदल दूँगाय् ;हो- 2:15 - टी-एल-बी-द्ध।

एक अन्य फ्स्त्राीय् - हव्वा के बारे में सोचें। निश्चय ही, परमेश्वर ने उसके आज्ञा उल्लंघन के लिए उसे दण्ड दिया। लेकिन दण्डाज्ञा के शब्दों में से ही उसके लिए आशा का द्वार भी खोला - उसके पाप की क्षमा का द्वार, एक ऐसे महिमामय दिन की आशा जब उसका वंश शत्राु के सिर को कुचलेगा। भरमाने वाले से निबट लिया जाएगा और उसकी संतानों को पिफर भी परमेश्वर के राज्य का उत्तराध्काािरी होने की आशा रहेगी।

और भी फ्स्त्राियोंय् के बारे में सोचें - इस्राएल और यहूदा की वे अहंकारी बेटियाँ जो मूर्तियों की पूजा में लगी थीं। उन नबियों द्वारा बार-बार चेतावनियाँ दिए जाने के बावजूद जिन्हें परमेश्वर ने अपने प्रेम और दया में भेजा, उन्होंने अपने हृदयों को कठोर कर लिया और परमेश्वर के सारे आग्रहों को ठुकराया। इसलिए उन्हें बन्दी बनाकर ले जाया गया और उन्हें तितर-बितर कर दिया गया। पिफर भी, उनकी दण्डाज्ञा में ही परमेश्वर ने उनके लिए आशा का द्वार भी खोला, और भविष्य में उन्हें पुन:स्थापित करने की प्रतिज्ञा भी दी ;यिर्म-29:11द्ध। जैसा ऱ्डैरिक पफेबर ने कहा है:


फ्हमारे दर्द का अहसास जहाँ सबसे ज्य़ादा है,

स्वर्ग के अलावा ऐसी दूसरी कौन सी जगह है,

ऐसी दूसरी जगह और कहाँ हो सकती है,

जहाँ हमारी नाकामियों की सज़ा मापफ हो सकती है।य्

इसलिए, जो समय हमें अभी दिया गया है, इसे हमें परमेश्वर का ठट्‌ठा उड़ाने वाली और उसके नबियों से घृणा करने वाली उस फ्झूठी नबियाय् ईज़ेबेल की तरह दुष्ट बनने के लिए नहीं, बल्कि अपने मन पिफराने के लिए इस्तेमाल करना है। उसके लिए तो परमेश्वर को यह कहना पड़ा था, फ्वह मन पिफराना नहीं चाहतीय् ;प्रका- 2:21द्ध

इसकी बजाए, हम मन पिफराने वाली उस स्त्राी की तरह हों जिसके बारे में परमेश्वर ने कहा, फ्इसके पाप जो बहुत थे, क्षमा कर दिए गए हैं, क्योंकि इसने बहुत अध्काि प्रेम किया हैय् ;लूका 7:47द्ध

परमेश्वर ने हम सबके लिए एक फ्आशा का द्वारय् खोला हुआ है - उन पत्नियों और माताओं के लिए भी जो सबसे ज्य़ादा निष्पफल हुई हैं और जिन्होंने अपने जीवनों को बर्बाद कर लिया है! अगर आप सिपर्फ परमेश्वर पर भरोसा करें, तो वह अब भी आपके जीवनों के लिए उसकी बनाई हुई योजना को पूरा कर सकता है। हमारे परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। सिपर्फ उसमें भरोसा रखें। जो उसमें भरोसा रखते हैं, वे कभी निराश नहीं होंगे। जैसे मेरे पति अकसर कहते हैं,

फ्शैतान के ख्ल़ाािपफ परमेश्वर हमेशा हमारे साथ है।य्

हालेलुÕयाह! आमीन!