नयी दाखमधु नयी दाखमधु की मशकों में

द्वारा लिखित :   जैक पूनन

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अध्याय 1
नयी दाखमधु नयी दाखमधु की मशकों में

प्रभु यीशु मसीह ने नये दाखरस को नये मशकों में रखने के लिए कहा (लूका ५:३७) नया दाखमधु स्वयंप्रभू यीशु ख्रीष्ट का जीवन है और नयी मशक कलीसिया है जिसे यीशु बनाते है ।

नया दाखमधु

काना के विवाह में जहाँ यीशु उपस्थित थे पूराना दाखमधु घट गया । पुराना दाखमधु मनुष्यों के प्रयास से बनाया जाता है जिसके लिए कई वर्षो का समय लगता है। परन्तु वह जरूरत पूरी नहीं कर सका यह पुरानी बाचा के अधीन जीवन का दृष्टांत है । पुराना दाखरस कम हो गया : और प्रभु तब तक रूके रहे जब तक कि पुराना दाखरस पूरा खत्म न हो जाए इससे पहले कि नया दाखमधु दे सके । प्रभु यहोवा यो कहता है ' लौट आने और शान्त रहने में तुम्हारा उध्दार हैं परंतु तुम कहते हो कि हम अपनी सहायता मिश्र देश से ले लेंगे (मानवीय सामर्थ) इसलिए तुम दुश्मनों के द्वारा भगाए जाओगे और प्रभु तुम्हारे लिए ठहरे हैं (कि तुम अपने प्रयास के अंत में आ जाओ) और उसके पास आ जाओ । ताकि वह अपना प्रेम तुम्हे दर्शा सके, यहोवा इसलिए विलम्ब करता है कि तुम पर अनुग्रह करे, और इसलिए ऊंचे पर उठेगा कि तुम पर दया करे । Šयों कि यहोवा न्यायी परमेश्वर है Šया ही धन्य है वे जो उस पर आशा लगाए रहते हैं (यशा ३०:१५-१८)

जब हमने जयवंत जीवन जीने की कोशिश की, कोशिश की कोशिश की और बार बार असफल हो गए यही वह पाठ है जो प्रभु हमे पढने की कोशिश कर रहे है कि ' तुम तब तक अपनी सामर्थ से असफल हो सकते हो जब तक तुम उस व्यवस्था के अधीन हो जो पाप से शासित है । अर्थात तुम्हे अपने बूते पर सफलता नही मिल सकती । परमेश्वर का प्रमुख कार्य हैं कि उनके प्रत्येक बच्चों मे से अहं की सामर्थ को संम्पूर्णत: नष्ट कर उाले । यीशु ख्रीष्ट पुरानी दाखरस के पूर्णरूप से समाप्त होने के लिए रूके रहे (काना के ब्याह में) इससे पहले कि वे आश्चर्य कर्म करें । अब वह रूके हुए है कि हमारी अपनी ताकत का भी अंत हो जाए । हमारी सभी असफलताएँ और हार का अर्थ है हमारे आपे का अंत हो जाना ताकि वह अपनी सामर्थ की सम्पूर्णता हम पर प्रगट कर सके Šयों कि ' मेरी सामर्थ निर्बलता में सिध्द होती है' (एक:१२:९) ऐसा प्रभु कहता है । उस पल जब हम परीक्षा में पडते है या अडकारा जाते है तब हम अपनी सामर्थ को देख सकते है । किसी तरह से हम अपनी प्रतिक्रिया को कडुवे शब्दों, क्रोध में आकर स्वयं को सही ठहराने में, दूसरों की आलोचना करके, दूसरों का न्याय करके, क्षमा न करने की हरकत, सांसारिक वस्तुआें को पकडने के प्रेम को, अपने अधिकार को लडकर प्राप्त करने के लिए अपनी ख्याति प्राप्त करने हेतु, बदला लेने की कोशिश आदि करके प्रगट करते है । ये और इसी तरह अन्य स्वभाव इस बात का प्रतीक है कि अब तक हम में हमारा स्वार्थ दृढता से भरा हुआ है। पुराना दाखमधु अब तक समाप्त नहीं हुआ हैं अभी खत्म होना बाकि है और यीशू मसीह हमारे बाजू में रूके हुए भी हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते हैं ।

जब हम प्रभु को अपने को तोडने की अनुमति दे दें, यदि हम अपने को नम्र करें और खुशी से अपने अधिकारों और ख्याति की मृत्यु को स्वीकार कर लें उतनी ही शीघ्रता से वह हमारे जीवन को नई वाचा के आधीन हे चलेगा । हमारे स्वार्थ और अहं को शून्यता में लाने के लिए ही प्रभु इन सब बातों को अर्थात परीक्षा की घडियों, मुश्किल परिस्थितियों, निराशाएँ, असफलताएँ दिल का दुखना आदि को मे से हमारी जिन्दगी को गुजरने देता है ।

इसी प्रकार परमेश्वर ने अय्युब से व्यवहार किया । अन्तत: अय्युब उस निचली स्थिति तक पहुँचा जहाँ 'देख मै तो तत्व हँू मै तुझे Šया उत्तर दूँ ? मैं अपनी उंगली दाँत तले दबाता हूँ मैंने कानो से तेरा समाचार सूना था परंतु अब मेरी आँखे तुझे देखती है। इसलिए मुझे अपने ऊपर घृणा आती है, और मै धूल और राख में पश्चाताप करता हॅूं (अय्युब ४०:४, ४२:५६)

यही तब होता है जब परमेश्वर अन्तत: हमे तोडता है और अपना प्रकाशन हमें देता हैं । वही मूसा जो पहले अपने को चालीस वर्ष की उम्र में योग्य समझता था जब परमेश्वर का दर्शन पाया तो टूट गया और कहा ' हे मेरे प्रभु, मैं बोलने में निपुण नहीं किसी और को भेज' (निर्ग ४:१०,१३)

यही बात बंडे भविष्यवŠता यशायाह के साथ घटित हुयी जब उसने परमेश्वर की महिमा को निहारा उसने कहा 'मैं नष्ट हुआ Šयों कि मेै अशुध्द होंठ वाला मनुष्य हूँ । (यशा ६:५) दानिएल को भी जब परमेश्वर ने दर्शन दिया तो उसने कहा कि उसकी शŠत जाती रही वह निम्न स्तर पर पहुँच गया (दानि १०:८)

आत्मा से भरे हुए चेले योहन्ना ने जो परमेश्वर के साथ ६५ वर्ष तक चला जब पतमुस के टापू पर यीशु को देखा तो एक मृत मनुष्य की तरह प्रभु के चरणों पर गिर पडा । (प्रका १:१७)

जिस किसी ने भी परमेशव्र की महिमा को देखा उसका यही अनुभव रहा उनका चेहरा भूमि पर , और मुॅह बन्द हो गया ।

जब परमेश्वर हमे ऐसी स्थिति मे लाता है तो वह एकदम हमे नयी दाखमधु देता है । नयी दाखमधु जो यीशु का जीवन पवित्र स्वभाव, नयी वाचा की पूर्व प्रसिध्द आशीषें जो यीशु के लोहू के द्वारा मुहर बंद कर दी गयीं ।

कितना अच्छा होगा कि हम इस स्थिति और जगह पर आएँ । अपने मुँह को भूमि की धूल में रखते हुए परमेश्वर के सम्मुख सदा रहें । Šयोंकि इस जीवन में उन्नति ज्योति से ज्योति की और महिमा से महिमा की ओर होती रहे । (नीति ४:१८ २ कु ३:१८)

योहन्ना कहता हैं रोशनी में चलते रहे (१ यो १:७) प्रकाश में कोई ठहराव नहीं पर चलते जाना हैं परमेश्वर के निकट और निकट गमन उस परमेश्वर के जिसमें जरा भी अंधकार नहीं । इस प्रकार चम के ऊपर चमक से हम रोशन होते है और अपने शरीर में छिपे उन गुप्त पापों के प्रति ज्यादा से ज्यादा सचेत होते जाते है । ऐसे पाप जिनके प्रति हमी पुराने दिनों में संचेत नहीं थे । और मसीह का लहू हमे इन सब पापों से शुध्द करता है।

अत: जैसे जैसे हम प्रभु के निकट जाते है वैसे वेैसे अपने देह के पापों के प्रति ज्यादा सजग होते जाते है और दूसरों के पापों के प्रति कम से कम आगे को हम किसी व्यभिचारणी के ऊपर पत्थर फेंकने की इच्छा नही रखते । Šयों कि प्रभु यीशु के सामने हम अपने शरीर के पापों के प्रति सजग रहते है और पुकार उठते है । ' हाय मैं अभागा मनुष्य' बनिस्बत यह कहने के ' हाय वह अभागी व्यभिचारणी स्त्री' (रोमि ७:२४) परमेश्वर के संम्मुख खडे हो कर भी आदम ने अपनी पत्नी पर उंगली उठाई (उत्पत्ति ३:१२) परंतु परमेश्वर ने उसे उसके स्वयं के पाप को दिखाया और यही काम परमेश्वर हमारे प्रति भी करेगा । और यही इस बात की परख होगी कि हम किसी सिध्दांत या धर्म को मानते हैं या परमेश्वर के मुख के सन्मुख रह कर जीवन बिताते हैं ।

Šया यह दाखमधु हमारी व्यŠतगत जिन्दगी हमारी वैवाहिक जिंदगी या हमारी सामाजिक जिंदगी से चुक गयी है यदि ऐसा है तो हमे परमेशव्र के मुख को ताकना है और इमानदारी से अपनी कमी को महसूस करना है । केवल प्रभु ही हमे नया दाखमधु दे सकता है । काना मं नया दाखमधु मनुष्य के प्रयास से उत्पन्न नहीं हुआ । यह परमेश्वर का अलौकिक कार्य था । और यहीं हमारे जिंदगी केसाथ हो सकता है । वय अपनी व्यवस्था हमारे ह्दय और दिमाग पर लिखेगा कि हम उसकी सिध्द इच्छा के अनुसार सोचे और करें (इबा ८:१०; फिलि २:१३) वह हमारे ह्दयों का खतना करेगा कि हम उससे प्रेम रखें और उसकी आज्ञाआें पर चलें । (व्यवि३०:६; येहे३६:२७) यह उसका वैसा ही कार्य होगा जैसा कि काना में नया दाखरस बनाना उसका काम था । यही अनुग्रह का अर्थ हैं । हम जीवन भर कोशिश कर के भी यीशु सरीखा जीवन नहीं उत्पन्न कर सकते । परंतु यदि हम 'मसीह की मृत्यु को अपने शरीर में धारण करते है अर्थात प्रति दिन अपना क्रूस उठाते है, अपने अहं को मारते हैं, अपनी स्वार्थी इच्छा अपने अधिकार और प्रसिध्दि का तिरिस्कार करते हैं तो परमेश्वर नया दाखमधु जो यीशु का जीवन है हम में उत्पन्न करने की प्रतिज्ञा उत्पन्न करता है (र कु ४:१०)

हमे हर समय यीशू की ओर देखते हुए और केवल उसी से अपनी तुलना करते हुए ये दौड दौडना है और तब ही हमारे ह्दय की यह सतत पुकार होगी 'हाय मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ ' Šयों कि जब हम पापों पर विजय प्राप्त जिन्दगी जीने लगेंगे तो भी हम सदैव सजग रहेंगे कि हम यीशु से कितने भिन्न हैं । जो अपनी तुलना दुसरे विश्वासियों के साथ करते है वे आत्मिक मूर्ख हैं । (र क १०:१२) Šयों कि यही आत्मक अहम का और अनेकों बुराईंयो का निश्चित मार्ग हैं । जब तक हमारी आँखे यीशु की और लगी रहें और सतत रूप से प्रभु से हम अपने को परखते रहे । हम आत्मिक अहंकार के जोखिम से बचे रहेंगे । पवित्रात्मा परमेश्वर के वचन के दर्पण में यीशु की महिमा को हमे दिखाता है और इसी तरह वह हमें प्रभु की समानता में ढालता हैं (२ कु ३:१८) पौलूस ने का कि उसका एक ही उद्देश्य जिसकी ओर वह बढते जाता हैं वह है परमेश्वर की बुलाहट यीशु के सदृष्य बनने की न कि खोए हुओं का धर्म परिवर्तन करने की (फिलि ३:१३,१४) और तब आगे उसने कहा 'हम जो अपने विवेक में, पापों पर विजयी जीवन जीने सिध्द हैं का भी यह मंतव्य होना चाहिए कि हम संपूर्ण सिध्दता की ओर बढते जाएँ और यीशू की पूर्ण समानता में बदल जाएँ ' (फिलि ३:१५) यही आत्मिक रूप से प्रौढ मसीही की पहचान हैं । परमेश्वर के प्रौढ मसीही की जिंदगी का इस उद्देश्य के अलावा परमेश्वर की सेवा करना प्रचार करना इत्यादि सब बातों का स्थान द्वितीय हैं ।

योहन्ना भी कहता है कि परमेश्वर के प्रकाश में चलने के द्वारा ही हम दूसरों से अच्छी संगति रख सकते है । (१यो १:७) न केवल परमेश्वर के साथ संगति परंतु अन्य विश्वासियों के साथ भी सिध्द एकता मे बंधना इसका कारण साफ है । जो व्यŠत परमेश्वर के प्रकाश में चलता है परमेश्वर के मुख को देखते हुए जीता है वय अपनी कमजोरियों को सदैव पहचानता है और इसलिए अपनी स्वयं परख करते हुये जीता है और दूसरों पर दोष लगाने के लिए उसके पास कुछ नहीं होता । अत: जो भाई इन रास्तों पर चलते है उनके बीच कोई झगडा नहीं होता और यही वह सकरा मार्ग है जिसे यीशु के अनुसार बहुत कम अपनाते है । (मत्ती ७:१४) न्याय परमेश्वर के घराने से पहले प्रारम्भ होगा । धार्मिकों के लिए भी Šयों कि परमेश्वर के घर में परमेश्वर अगम्य ज्योति में निवास करता हें (१ पत ४:१७, १८; १ तिनो ६:६) कौन भस्म करनेवाली आग के साथ रह सकता हैजो धर्म के अनुसार चलता है अपने प्रति सच्चाई का सामना करते हुए ।(यशा ३३:१४,१५)

लौदीकिया की कलीसिया के अगुवे का यही पाप था कि वह अपनी स्वत: के जीवन की परख करते हुए नहीं जिया । (अगुवा बनने पर इस प्रकार गलती में गिरना सरल हैं ) और इसलिए वह नहीं जान सका कि वह अभागा और तुच्छ है (प्रका ३:१७)

काश हम परमेश्वर का मुख देखते हुए सदैव ऐसा जिएँ कि हम सदैव टूटे मन से सतत स्वयं परख करते हुए पूकार सकें, ' हाय मैं कैसा अभागा मुनष्य हूँ' कि जब पवित्रता की पर पहुँचे तब भी हम ईमानदारी से कहे कि ' मैं सब विश्वासियों में छोटे से छोटा हूँ मैं सब से बडा पापी हूँ (इफी ३:८, १ तिमो १:१५) इस प्रकार दूसरे विश्वासी जो हमारी ही चाल चलते है उनके साथ हम संगति कर सकें और हमारी यह संगति क्रमश: बढते हुये पिता पुत्र की संगति के अनुरूप हो जाए । (योहन्ना १७:२१) यही वह नयी दाखमधु है जो यीशु हमे देना चाहता है ।

दाख की नयी मशके

बहुत पाठक जिन्होंने अब तक के संदेश को पढ कर खुश हुए, शायद दाखमधु की नयी मशकों को प्राप्त करने का मूल्य चुकाने को स्वीकार न करें । परंतु यीशु ने कहा ' नयी दाखमधु को, दाखमधु की नई मशकों मे रखना आवश्यक है' ( ५: ३८) और यही पर हमारी आज्ञाकारिता की परख हैं ।

नयी दाखमधु को प्राप्त करने के लिए हमारा संग्राम पाप के विरूध्द होता हैं, परंतु नयी मशकों को प्राप्त करने के लिए हमारा संग्राम उन धार्मिक रीतिरिवाजों के विरूध्द होता है जो परमेश्वर के वचन को नकारती है और बहुतों के लिए पाप से मुŠत होने की अपेक्षा इन रीति रिवाजों से मुŠत होना ज्यादा कठिन होता हैं परंतु बलपूर्वक प्राप्त करनेवाले मनुष्य के लिए ही परमेश्वर के राज्य को प्राप्त करना संभव हैं । (मत्ती ११:१२) ही धार्मिक रीतिरिवाज बिना बलपूर्वक संग्राम किए नहीं हटाए जा सकते ।

प्रभु यीशु मसीह इस लिए क्रूस पर नहीं चढाए गए कि उन्होंने पाप के विरूध्द प्रचार किया परंतु इसलिए कि उन्होंने धार्मिक रीति रिवाजों के विरूध्द प्रचार किया । वे रीति रिवाज जिन्होंने यहूदियों के बीच परमेश्वर के वचन का स्थान ले लिया था । (मर ७:११३) यीशु ने धार्मिक अगुवों की पाखंडता को उजागर किया उनके धार्मिक रीति रिवाजों के खोखले पन को बताया और उन व्यŠयों को जो धर्म के नाम पर पैसा बना रहे है । मंदिर से भगा दिया परमेश्वर के भवन को शुध्द करने के इसी उत्साह ने धार्मिक अगुवों को क्रोधित किया कि उसे क्रूस पर चढाएँ ।

इसी प्रकार यह नहीं दिखता कि नयी दाखमधु और मन के टूटेपन का प्रचार करने से लोग हमे भी क्रूसपर चढाने की माँग करें । परंतु यदि तुम यह ठान लो कि तुम नयी दाखमधु को नयी दाखमधु की मशको में डालने का संदेश दो कि यह परमेश्वर की आज्ञा है तो तुम मसीहियत के हर समुदाय के धार्मिक अगुवों के गुस्से का पात्र बनोगे।

यीशु ने Šकयों कहा कि नयी दाखमधु को दाखमधु की पुरानी मशको में नहीं रखा जा सकता ? कार ये है कि पूरानी मशके फैल और फैल नहीं सकती तथा फूट जायेंगी । पूरानी मशकें तब उपयोगी थी जब उनमे पुरानी दाखरस रखी गयी थी । परंतु नयी दाखरस को रखने में उनका कोई उपयोग नहीं हैं ।

पुरानी मशकें जो यहूदी धार्मिक प्रणाली की प्रतिछाया हैं में परमेश्वरने मूसा के माध्यम से पुरानी दाखमधु को रखने का निर्देश दिया, परंतु जब मसीह आया तो उसने नयी वाचा को प्रतिस्थापित किया एवं दाखमधु की नयी मशकों की आवश्यकता पडी । पुराने को जाना था । यीशु ने कहा कि पुराने को नये पैबन्द लगा कर नहीं सुधारा जा सकता। ऐसे में पहिरावा फट जायेगा । (लुका ५:३६)

हम सोच सकते हैं कि हमने पुरानी यहूदी मशकों से छुटकारा प्राप्त कर लिया है । अब हमारी मसीही कलीसिया मे हमारे पास नयी मशके हैं, परंतु यदि आप अपनी मसीही संगति का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें तो आप आश्चर्य चकित हो जाएँगे यह जानकर कि अभी भी पुरानी वाचा के कई गुण हम में है ।

इन तीन उदरहरणे पर ध्यान दे, जब कि ऐसे बहुत से उदाहरण हैं ।

प्रथमत: यहुदियों का एक विशेष गोत्र (लेवी) था जो याजक हुआ करते थे और यही सब धार्मिक कार्य करते थे । सब यहूदी याजक नहीं बन सकते थे । नयी वाचा के अंतर्गत सब विश्वासी याजक है । (१ पत २:५ ; प्रका १:६) यह सत्य बहुत से विश्वासियों के द्वारा सिध्दांतत: माना जाता है पर वास्तव में बहुत कम इसका पालन करते हैं । प्राय: हर एक मसीही समुदाय में उनके याजक, या पास्टर या परमेश्वर के सेवक या पूर्णकालिक सेवक होते है जो बिलकुल पुराने की तरह ही हैं जो परमेश्वर के लोगों की अराधना में अगुवाई करते है । यही लेवी नये विश्वासियों को बाप्तिस्मा दे सकते है और रोटी तोड सकते है और यही लेवी परमेश्वर के लोगों के द्वारा दिए गए दशवांश के द्वारा पलते है । ये ही लेवी सभा में छाए रहते है और समूह सेवा के लिए कोई अवसर नही देते । एक ही व्यŠत का वर्चस्व पुरानी मशक का हिस्सा हैं । नयी वाचा के भीतर हरएक विश्वासी नयी दाखमधु पी सकता है अर्थात पवित्रात्मा के अभिषेक से आत्मा के वरदानों को प्राप्त कर सकता है । दो या तीन भविष्य वकता सभा को प्रारंम्भ कर सकते हैं । एक या दो अन्यान्य भााषा बोल सकते हैं (उसका अनुवाद करने पर) और प्रत्येक विश्वासी भविष्यवाणी करने के लिए स्वतंत्र है कि कलीसिया उन्नति पाए यही नयी मशके हैं (१ कु १४:२६-३१) नयी दाखमधु को १ कु १३ मे प्रेम पूर्ण जीवन के द्वारा व्यŠत किया है यही १ कु १२ और १४ में भी वर्णित हैं । परंतु कितने विश्वासी हैं जो परमेश्वर के नियम अनुसार कार्य होने देना चाहते है । खेद हैं बहुत कम । बहुत पुरानी मशकों से ही संतुष्ट है और वैतनिक लेवियों से ।

द्वितीय यहूदिया के भविष्यवŠता होते थे जिनका काम विभिन्न बातों में परमेश्वर की इच्छा जानना था Šयोंकि उनमें ही आत्मा रहती थी परंतु नयी वाचा में भविष्यवŠताआें के लिए बिलकुल अलब कार्य हैं मसीह की देह को संवारना । (इफी ४:११-१२) चूंकि सब विश्वासी पवित्रात्मा प्राप्त कर सकते है । उन्हे परमेश्वर की इच्छा जानने के लिए भविष्य वŠताआें के पास जाने की आवश्यकता नहीं हैं । (इब्रा ८:११; १ यो २:२७) परंतु आज भी कई विश्वासी पुरानी मशको में जी रहे हैं । वे परमेश्वर के भŠत के पास यह जानने के लिए जाते है कि उन्हें Šया करना चाहिए । किससे विवाह करना चाहिए, इत्यादि ।

तृतीय यहुदियो का एक बहुत बडा समदाय था जो बडे क्षेत्र में फैले हुए थे और यरूशलेम उनका केंद्रिय मुख्यालय था और महायाजक उनका अगुवा था । नयी वाचा में केवल यीशु ही हमारा महायाजक है और हमारा एकमात्र मुख्यालय परमेश्वर का सिंहासन हैं । यहुदियां के दीपकदान में मुख्य शाखा से निकली सात शाखाएँ थी । (निर्ग २५:३१,३२) यही पुरानी मशक थी ।

नयी वाचा मे हर एक स्थानिक कलीसिया में एक अलग दीपक दान है बिना किसी शाखा के प्रका १:१२, २० में हम देखते हैं एशिया माइनर को सात कलीसियायें सात दीपकदानो से प्रकट की गयी हैं जो यहुदी दीपक दान से अलग हैं । यीशु जो कलीसियाआें को सिर है इन दीपकदानों के मध्य विचरण करता हैं । उन समयों में उनका कोई पोप नहीं था न कोई नियंत्रक था न ही कोई अध्यक्ष । पृथ्वी की किसी कलीसिया में उनका कोई मुख्य अगुवा भी नहीं था जिसका मत अंतिम हो । हर एक स्थानीय कलीसिया स्थानीय अगुवे के द्वारा चलाई जाती थी । ये अगुवे अपने सिर्फ यीशु के प्रति उत्तरदायी थे। परंतु आज हम अपने चारो ओर ऐसे मसीहियों की भीड देखते हैं जो डिनोमिनेशनल प्रणाली (पुरानी मशकें) को मानते हैं । चाहे उनका नाम हो चाहे बेनाम हो । Šयों कि कई ऐसे समुदाए हैं जो अपने को डिनोमिनेशन नहीं मानते परंतु डिनोमिनेशन के हर गुणों को अपने में रखते हैं यह सब पुरानी मशकें हैं ।

परमेश्वर ने स्थानीय कलीसियाओ को नयी मशके बनाया है कि उनमे भ्रष्टाचार न फैले । यदि एयाि माईनर की सातों कलीसियाएँ एक दूसरे से शाखा के द्वारा जुडी रहती तो बालाम के भ्रष्ट सिध्दांत और निकुलाईयों के सिध्दांत तथा जजबेल की झूठी भविष्यवाणियों इन सातो कलीसियाओ मे फैल जाती चूंकि ये अलग अलग दीपदान थे, स्मुरना और फिलाडेलफिया की कलीसिया अपने को शुध्द रख सकीं । अत: यदि आप अपनी मंडली को शुध्द रखना चाहते है तो इन पुरानी मशकों से हुए छुटकारा प्राप्त करें ।

काश ! प्रभु हमारे देश में ऐसे लोगों को उठाए जो मनुष्यों के रीति रिवाज के विरूध्द बलवा पूर्वक आवाज उठा सके (मत्ती ११:१२) ऐसे लोग उठें जो हर स्थान में प्रभु की देह को स्थापित कर सकें ।

अध्याय 2
परमेश्वर मनुष्यों को चाहता हैं

परमेश्वर आज मनुष्यों को चाहता हैं -

  • मुनष्य जो उसके मुख के सामने खडे हो कर रोज उसकी आवाज सुने
  • मनुष्य जिनके ह्दय में केवल परमेश्वर के छोड किसी भी वस्तु या किसी भी व्यŠत की चाह न हो ।
  • मनुष्य जो परमेश्वर से ऐसा भय खाते हों कि वे पाप से अति घृणा करें और अपने हर काम में धार्मिकता और सच्चाई से लिपटे रहें ।
  • मनुष्य जो क्रोध, कामुकता से भरे विचारों पर विजय प्राप्त कर लिए हों और पापी विचार और मन रखने से बेहतर मर जाना श्रेष्ठ समझें ।
  • मनुष्य जो पवित्रात्मा से भरे हो, जो प्रेम में इतना जड पकडे हो कि किसी भी भडकावे में आ कर किसी दूसरे मनुष्य के प्रति बुराई का व्यवहार करने के लिए प्रेरित न हों ।
  • मनुष्य जो नम्रता में इतना जड पकडे हो कि वे इस ज्ञान के प्रति सजग हों, कि वे भŠतों में सबसे छोटे से भी छोटे है तथा मनुष्य को प्रशंसा उनकी आत्मिक उननति उनकी सेवा पर स्वर्गीय आशिष और अन्य कोई बात उन्हें नम्र होने से रोक न सके ।
  • मनुष्य जिन्हे परमेश्वर के वचन से यह जानने की समझ हो कि परमेश्वर का स्वभाव और उद्देश्य Šया है, और जो वचन के सामने थरथराएँ कि वे छोटी से छोटी आज्ञा को मानने का उल्लंघन न करें । और दूसरों को यही सिखाने में बेपरवाह न हो ।
  • मनुष्य जो परमेश्वर की सिध्द इच्छा का प्रचार करें और धार्मिक वेश्यावृत्ति तथा मनुष्यों के वे रीतिरिवाज जो शास्त्र सम्मत न हों को पूरी तरह उजागर करें ।
  • मनुष्य जिनके पास पवित्रात्मा का प्रकाशन हो कि ईश्वरत्व का गुप्त ज्ञान Šया है और कि यीशु मसीह शरीर में आया और शरीर मे आने के द्वारा एक नया और जीवित मार्ग खोल दिया ।
  • मनुष्य जो परिश्रमी और एकाग्र चित्त हो परंतु जिनमे हास्य का पूट भी हो और जो बच्चों के साथ खेलना जानते हों और प्रकृति में विद्यमान परमेश्वर के वरदानों का लुत्फ उठा सकें ।
  • मनुश्य जो साधू न हो परंतु जो अनुशासित जिंदगी जीते हो और परिश्रम से न डरते हो ।
  • मनुष्य जिन्हे खर्चीले पर्यटन और महंगे कपडों की चाह न हो । और जो अपना समय व्यर्थ की क्रियाआें मे न गँवाते हों तथा अपना पैसा आवश्यक खरीदी में न बरवाद करते हों ।
  • मनुष्य जिन्होंने लुभावने व्यंजनो की चाह पर काबू पाया हो जो संगीत या खेल या अन्य क्रियाआें के गुलाम न हों ।
  • मनुष्य जो परमेश्वर के द्वारा सफलता पूर्वक अनुशासित कर लिए गए हों कि दु:ख, शोषण, सताद, झूठा दोषारोपण, शारीरिक अस्वस्थता, आर्थिक कठिनाई तथा रेिश्तेदारों और धार्मिक अगुवों के विरोध की अग्नी का सामना कर सकें ।
  • मनुष्य जो दया से भरे हों जो बुरे से बुरे पापी के तथा बुरे विश्वासी से सहानुभूति रख सकें और उनसे आशा रख सकें ये जानते हुए कि पापियों में वे भी एक बडे पापी हैं ।
  • मनुष्य जो अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम के रक्षाकवच के घेरे में हो कि वे किसी बात की चिंता न करें तथा शैतान या बुरे व्यŠत या कठिन परिस्थितियों से न घबरावें ।
  • मनुष्य जो परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश कर चुके हो, और परमेश्वर के प्रभुत्वमय कार्यप्रणाली पर विश्वास करते हों कि सब बातों में उनके लिए वही श्रेष्ठ है और जो सब मनुष्यों के लिए, सब वस्तुआें के लिए और सब परिस्थितीयों के लिए सदैव परमेश्वर को धन्यवा दे सकें ।
  • मनुष्य जो कवेल परमेश्वर में ही आनंद प्राप्त करे और हर बुरी भावना पर विजय प्राप्त करें ।
  • मनुष्य जो जीवित विश्वास के धनी हैं जिन्हें अपने उपर और अपनी स्वभाविक योग्यताआें के ऊपर भरोसा न हो परंतु परमेश्वर पर ही पूरा भरोसा हो कि हर परिस्थिति में वह उनकी सहायता करेगा ।
  • मनुष्य जो अपने तर्को की अगाही पर जीनेवाले न हो, परंतु पवित्रात्मा के चलाए चलें ।
  • मनुष्य जो पवित्रात्मा के द्वारा सच्चा बाप्तिस्मा पाए हुए हों और जिन्हे मसीह से आग का भी बाप्तिस्मा प्राप्त हो ।
  • मनुष्य जो सतत रूप से आत्मा के अभिषे मे जीते हो और जिन्हें आत्मा के अलौकिक वरदान प्राप्त हो ।
  • मनुष्य जिन्हें यह प्रकाशन प्राप्त हो कि कलीसिया मसीह को देह हैं और जो इस कलीसिया के निर्माण में अपनी पूरी शŠत अपनी पूरी सम्पति और अपने आत्मिक वरदानों को लगा दें ।
  • मनुष्य जो पवित्रात्मा को सहायता से अपनी जीभ पर लगाम लगाना सीख ले कि अब उनकी जीभ स्वर्गीय वचनों से भरी रहें ।
  • मनुष्य जिन्होंने सब बातों का त्याग कर दिया हो, जो कि , धन या संसारिक वस्तुएँ या दूसरों से प्राप्त इनाम की चाह के प्रति आकर्षित न होते हो ।
  • मनुष्य जो अपनी सब संसारिक आवश्यकताआें के लिए ईश्वर पर उम्मीद रखते हों और जो अपने परिश्रम पर बडाई न करते हो तथा अपने वार्तालाप के या पत्रों के या रिपोर्ट के द्वारा अपनी जरूरतों को उद्‌घाटित न करते हों
  • मनुष्य जो ह्ठीला नहीं है परंतु नम्र है और जो आलोचनाआें को स्वीकार करते तथा बडे और बुध्दिमान भाईयों की सलाह अनुसा सुधार लाने की इच्छुक होते हैं ।
  • मनुष्य जिनमें शासन करने या दूसरों को सलाह देने की इच्छा नहीं होती यद्यपि सलाह मांगे जाने पर सलाह अवश्य देते हैं और जो अगुवे माने जाने की इच्छा नहीं रखते परंतु सबके सेवक कहलाना चाहते हैं ।
  • मनुष्य जो आसानी से घुलमिल जाते है और जो दूसरों को फायदा उठाने देते है और मुसीबत उठाने को भी तैय्यार रहते हैं ।
  • मनुष्य जो करोडपति और भिखारी में अन्तर नहीं रखते जो काले और गोरे में, बुध्दिमान और मुर्ख में, संस्कारित और जंगली में भी अन्तर नहीं रखते परंतु सबसे एकसमान व्यवहार करते है
  • मनुष्य जो प्रभु की उपासना और परमेश्वर की आज्ञा के पालन को कमजोर करने या ठण्डा करने हेतु अपनी पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, मित्रों को सलाह पर कभी प्रभावित होने नहीं देते ।
  • मनुष्य जो शैतान के द्वारा रखे गए प्रलोभनों, जैसे धन, प्रसिध्दी, और के द्वारा समझौता करने के लिए नहीं खरीदे जा सकते ।
  • मनुष्य जो यीशु के निडर गवाह होते है न तो वे किसी भी धार्मिक अधिकारी, संसारिक अधिकारियों से डरते है ।
  • मनुष्य जो इस दुनिया के किसी भी मनुष्य की खुशामद नहीं करते और जो केवल परमेश्वर को प्रसन्न रखने के लिए किसी भी मनुष्य के घृणा पात्र बन सकते हैं ।
  • मनुष्य जो अपनी मानवीय आवश्यकताआें और ऐशोआराम के बजाय परमेश्वर की इच्छा परमेश्वर की महिमा और परमेश्वर के राज्य को सदैव प्राथमिकता देते हैं ।
  • मनुष्य जो अपने तर्को या दूसरों के द्वारा नहीं दबाए जा सकते कि परमेश्वर के लिए व्यर्थ के कार्य करें । परंतु उनके जीवन में परमेश्वर द्वारा प्रकाशित उद्देश्य को पूरा करने में संतुष्ट होते हैं ।
  • मनुष्य जिनमें आत्मिक मसीही कार्य और शारीरिक कार्य के बीच अन्तर करने की आत्मा हो ।
  • मनुष्य जिसमें वस्तुआें को देखने की स्वर्गीय दृष्टि हो न की संसारिक ।
  • मनुष्य जो परमेश्वर के लिए परिश्रम करने हेतु दी गयी प्रसिध्दी और पदवी का इंकार कर सकें ।
  • मनुष्य जो लगातार प्रार्थना करना जानते हो और ये भी जानते हो कि जरूरत पडने पर उपवास और प्रार्थना की जाए ।
  • मनुष्य जिन्हों ने सीख लिया है कि उदारता पूर्वक, प्रसन्नता से गुप्त रीति से, एवं बुध्दिमानी से कैसे भेंट चढाई जाय ।
  • मनुष्य जो दूसरों के लिए सब कुछ बनना चाहे ताकि दूसरों को उध्दार हो सकें ।
  • मनुष्य जो दूसरों को केवल उध्दार कराने हेतु प्रेरित न करें परंतु उन्हें मसीह के चेले बनाए और उन्हें सिखाएँ कि सच Šया है और परमेश्वर की आज्ञाआें को मानना Šयों जरूरी हैं ।
  • मनुष्य जिनकी यह चाह हो कि हर स्थान मे परमेश्वर की सच्ची गवाही दी जाए ।
  • मनुष्य जिन्हें यह देखने की प्रज्जदलित इच्छा हो कि कलीसिया में मसीह महिमा मंडित हो ।
  • मनुष्य जो किसी भी बात में केवल अपना भला न चाहे ।
  • मनुष्य जिनमें आत्मिक अधिकार और आत्मिक प्रतिष्ठा हो ।
  • मनुष्य यदि जरूरत पडे तो अकेला ईश्वर के लिए खडा हो सके ।
  • प्राचीन चेलों और भविष्यवŠताआें की तरह पूर्णत: असमझौता वादी हो।

ईश्वर का कार्य वर्तमान मे पिछड रहा है Šयोंकि उपरोŠत मनुष्य बहुत कम संख्या में है । अपने ह्दय में विचार कीजिये कि आज की समझौता वादी मसीहियत में तथा पापी कुकर्मी पीढी के मध्य Šया हम परमेश्वर के लिए उपरोŠत मनुष्य हैं चूंकि परमेश्वर किसी का पक्षपात नहीं करता। तुम उपरोŠत मनुष्य हो सकते हो यदि तुम वैसा होना चाहो तो । चूंकि परमेश्वर हमारे जीवन की जागृत अवस्था में आज्ञाकारिता और जुज्ञारूपन चाहता है तो तुम उपरोŠत मनुष्य बन सकते हो यद्यपि तुम्हारे जीवन का जागृत क्षेत्र सीमित हो (इस क्षेत्र में वृध्दि होती जाएगी जैसे जैसे तुम परमेश्वर के प्रकाश में चलते जाओगे, सिध्दता में बढते जाओगे कोई बहाना नहीं कि तुम उपरोŠत मनुष्य नहीं बन सकते चूंकि हमारे शरीर में कोई अच्छी बात निवास नहीं करते । उपर्युŠत गुणों को प्राप्त करने के लिए हमे परमेश्वर के अनुग्रह को खोजना हैं । अतएव प्रतिदिन परमेश्वर के सामने गिडगिडाओ कि वह इन अंत के दिनो में तुम्हे उपरोŠत मनुष्य बनने का अनुग्रह प्रदान करें ।

अध्याय 3
परमेश्वर को महिलाआें की आवश्यकता हैं

परमेश्वर को आज ऐसी महिलाआें की आवश्यकता है जो अपनी जीवनी के द्वारा इमानदारी से उसकी उस महिमा को दिखा सकें जैसा मकसद परमेश्वर का की उत्पत्ति को

महत्ता पुरूष का सहायक होने में :

जब परमेश्वर ने को बनाया तो चाहा कि वह आदम की सही सहचरी बनें (उत्त २:१८) इस सहायक के कार्य का सही अर्थ प्रभू यीशू मसीह ने पवित्रात्मा का उदा दे कर बतलाया (याहन्ना १४:१६)

जिस प्रकार से पवित्रात्मा अदृश्य होकर शांतिपूर्वक पंरतु सामर्थ के साथ विश्वासियों की सहाय्यता करता है उसी प्रकार स्त्री का निर्माण पुरूष की सहायता के लिए हुआ । पवित्र आत्मा का कार्य जैसे परंदे के पीछे होता है वैसे महिला का कार्य हैं ।

परमेश्वर का वचन यह कहता है कि पुरूष उसी प्रकार महिला का सिर है जैसे पिता परमेश्वर प्रभू यीशू का । यीशू ने सदैव पिता की आदमिता मे कार्य किया । परमेश्वर से भय खाने वाली भी इसी प्रकार अपने पति के अधीन रहें । हवा की गलती ये थी कि अपना निर्णय लेने के पहले उसे अपने पति से सलाह नहीं ली इस लिए शैतान ने उसे बहकाया । (१ तिमो २:१४) परमेश्वर आज मसीही पत्नियो से यह चाहता है कि वे अपने पति के आधीन रहे जैसे यीशू अपने पिता परमेश्वर के प्रति और कलीसिया प्रभू यीशू के आधीन रहती हैं (रफी ५:२४)

लूसीकर के विद्रोह के द्वारा संसार में पाप आया । मसीह की अधीनता के द्वारा उध्दार आया । परमेश्वर पिता की आधीनता की आत्मा संसार में सबसे बडी शŠत है Šयों कि यह प्रभू यीशू की आत्मा हैं । इसी आत्मा ने हर विद्रोही आत्माआें पर क्रूस पर विजय प्राप्त की । जब पत्नीि अपने पति के आधीन होती है तो वह परमेश्वर के वचन के अधिकार के आधीन होती हैं । इस प्रकार संसार की महाशŠत का दोहन करती है यहाँ तक कि अविश्वासि पति भी इस शŠत के द्वारा जीते जाते हैं (१ पत ३:१२) यदि वह अपने सांसारिक जीवन में आधीनता की आत्मा दिखाती काल तक निवास करने के योग्य होती हैं । (प्रका ३:२१)

यहाँ भी शैतान स्त्री को धोखा देता है जैसा उसने स्वर्गदूतों को बहकाया वैसाही वह स्त्री मे विरोध का आत्मा उत्पन्न कर उसे बहकाता हैं । एक विद्रोही स्त्री अपने घर को रेगिस्तान से भी बंजर बना देती हैं । दूसरी तरफ एक सुयोग्य और आधीनता में रहने वाली पत्नी अपने पति को राजकीय मुकुट पहना कर अपने प्यार को महल मे बदलती हैं (नीति १२:४) तुम्हारा प्यार आत्मिक दृष्टि से महल बनेगा या रेगिस्तान इस बात पर निभैर है कि तुम किस प्रकार की पत्नी हो । आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर दीन और शांत आत्मा को चाहते हैं (१ पत ३:४)

(नीतिब ३१:१०-३१) एक सुयोग्य स्त्री के गुणों को दर्शाता हैं । उसका ह्दय, हाथ और जबान की तारीफ की गई हैं ।

परंतु उसकी शारीरिक सुन्दरता और नारी आकर्षण को व्यर्थ और धोखा देने वाला करार दिया गया हैं । Šया ही अच्छा होता कि नौजवान विवाह के लिए इन बातों का ख्याल रखें ।

एक अच्छी महिला वह है जिसके ह्दय में परमेश्वर का डर हो यही उसके सम्पूर्ण जीवन की नीव हैं । बताया गया है कि वह अपने हाथों से कपडों की मरम्मत करती, भोजन बनाति, पेड लगाति, गरीबों की सहायता करती। वह अपनी जीभ का इस्तेमाल सदा दया और बुध्दि से करती । चाहे वह सुन्दर न हो परंतु वह परमेश्वर का भय मानने वाली सख्त मेहनत करनेवाली और दयालू होती है, उसके शुध्द ह्दय खुरदुरे हाँथ और नम्र जुबान से परमेश्वर की महिमा होती हैं । जब कि सांसारिक स्त्रियों मे ह्दय कोमल हाँथ और खुरदरी जुबान पाई जाती है ।

पत्नी के नाते एक सुयोग्य महिला अपने पति की सच्ची सहायक होती हैं । वह अपने जीवन भर लगातार उसकी भलाई करती है अर्थात वह अपना पहला प्यार कभी नहीं छोडती । वह अपने पति के कार्य और बुलाहट के अनुसार अपने को ढालती है और घर मे किए गये अपने कार्य और खर्चे में दिखा कर कमाई को नष्ट नहीं होने देती । वह अपने पति को घर की जिम्मेदारी से मुŠत रखती है ताकि वह प्रभू की सेवा में लग सकें । उसका पति भी उसकी तारीफ करता है कि दुनिया की सबसे अच्छी स्त्रियों मे वह एक हैं ऐसी महिला का समाज में भी आदर होना चाहिए Šयोंकि उसने स्त्री के रूप में अपनी बुलाहट को समझा हैं ।

नये नियम से संतो की सेवकाई पर जोर दिया गया है कि अपने घरो में उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था की जाये । (१पत ४:९, रो १२:२३ ) उस पहुनाई को जिम्मेदारी प्रथमत: पत्नी पर हैं । नबी की पहुनाई कर वह नबी के पुरस्कार को प्राप्त करती हैं (मत्ती १०:४१) मसीह के छोटे से छोटे चेले की पहुनाई का भी यही इमाम हैं । इसी प्रकार प्रभू यीशू के नाम पर किसी बच्चे को ग्रहण करना मसीह का ग्रहण करने के तुल्य हैं (मत्ती १८:५) शुरू के मसीही जिनकी पहुनाई का वर्णन पॉल और पतरस ने किया हैं प्राय: गरीब थे । साधारण भोजन औ जमीन मे सोने की जगह संतो को मूहैय्या कराना ही उनसे अपेक्षा थी जब विश्वासी मनुष्य की प्रशंसा खोजते हैं तभी वे पहुनाई के लिए अच्छा भोजन और बढिया रहने का स्थान देना ही पहुनाई समझते हैं । १ ति ५:१० में संकेत है कि पहली शताब्दी मे गरीब विधवाआें ने भी अपने मे सन्तो की सेवा की ।

माता के रूप मे उसकी बुलाहट:

आदम ने अपनी पत्नी को हव्वा कहा Šयोंकि वह एक माता थी । पाप और इंसानी परम्पराआें ने स्त्री के विचारों को इस प्रकार से अंधकारमय कर दिया है कि वह अपने माता बनने के गौरव को नहीं पहचानती । बच्चे आजकल एक घटना बन गये है जब कि परमेश्वर ने उन्हे वरदान कहा हैं । (भजन १२७:३) बच्चो को कंटक (बाधा) कहा जाता हैं जब कि परमेश्वर उन्हे आशीष कहता हैं (भजन १२७:५, १२८:४) यह दिखाता है किस हद तक नामी इसाई अपने विचारों में परमेश्वर से अलग हो कर शैतान की तरफ चले गये ।

तिमोथी की माँ थुनिके काफी अलग थी उसने अपनी बुलाहट को पहचाना यद्यपि उसका पति अविश्वासी था परंतु उसने अपने विश्वास में कमी नहीं आने दी । वह एक सच्ची विश्वासनी स्त्री थी जो परमेश्वर के वचन को जानती थी जिसने उसे तिमोथी को सिखाया और अपने इस विश्वास को उसेन तिमोथी को सौंपा जब कि उनके चारों ओर अविश्वास की जहरीली विचारधारा बह रही थी । तिमोथी की माता ने उसे विश्वास की शुध्द हवा में सॉंस लेने दिया । तिमोथी ने अपनी माँ को प्राय: प्रार्थना करते, परमेश्वर की बडाई करते, भिन्न भिन्न स्थितियों मे परमेश्वर पर भरोसा रखते देखा । कभी माँ के मुह से शिकायत नही निकली, तो आश्चर्य नहीं कि तिमोथी एक अच्छा चेला बना और पौलूस का सहकर्मी । उसकी माता का परिश्रम फलदाई हुआ ।

यह बीसवी शताब्दी की माताओ के लिये चुनौती हैं । एक अच्छी माता हो कर सोलह से बीस वर्षो में तिमोथी की माता ने कलीसिया के लिये बह कर दिखाया के वह दुनिया भर में सौ वर्ष प्रचार करके भी नहीं कर पाती । वर्तमान समय में हम सुसन्ना वेसली के विषय सुनते है जो पन्द्रह बच्चों की माता थी । गरीबी का उसके घर में साम्राज्य था । उसके कुछ बच्च बचपन में ही मर गये परंतु उसने बचे हुये एक एक बच्चे को परमेश्वर के डर में शिक्षित किया । उनका एक बेटा जॉन वेसली परमेश्वर के हाथ में एक बडा पात्र बना । दुनिया के करोडो लोगों ने बीती दो शताब्दी में जॉन के परिश्रम और लेखनी के द्वारा आशीष पाई । सुसन्ना इसमे का एक छोटा हिस्सा भी नहीं कर पाती जो उसके पुत्र ने किया यदि सुसन्ना पूरी दुनिया में प्रचारक होकर जाती या पैसे के लिए अपने घर का तिरस्कार कर पैसा कमाने का कार्य करती ।

पौलूस तिमोथी को लिखता है कि यद्यपि स्त्रियाँ अगुवाई करने और शिक्षा देने की सेवा मे न लगे परंतु उनके लिए मातृत्व सेवा सबसे बडी है । वह दूसरी सेवा हैं । जिसके लिये परमेश्वर ने स्त्री को बुलाया हैं । तिमोथी ने अपने घर में इस सेवा के गौरव को देखा और यही अगुवा इफीसुस के लोगों को सिखाता है ।

मनुष्य जीवन के हर कार्य में स्ऋी से बाजी मार सकता है एक यह क्षेत्र है मातृत्व का जिसपे स्त्री विशिश्ठ है । यह दर्शाता है कि परमेश्वर ने स्त्री को Šयों सिरजा । वे माताएँ जिन्होंने पैसे के लिए बाहर जा कर काम किया, चाहे प्रचार किया की जिंदगी के अवसान मे यह अनुभव रहा कि उनके बच्चों ने किसी न किसी प्रकार दु:ख बिठाया जिसका वे अब पछतावा भी नहीं कर सकते यह आज के युवा पीढी की माताओ के लिए एक सबक है यदि माता अपने परिवार के आर्थिक सुधार के लिए कार्य मे जाती है तो वह परमेश्वर का अतिरिŠत अनुग्रह प्राप्त करती है परंतु जहाँ नौकरी विलासिता हो उच्च स्तर का जीवन हो तो उसे बुराई की फसल ही काटनी पडती हैं ।

Šयों कि परमेश्वर को बेवकूफ बुलाहट के गौरव के प्रति खुल जाएँ ।

प्रभु यीशु मसीह के गवाह बनने का गौरव :

जैसा हमने देखा एक महिला का मसीह के गवाह होने का अर्थ है पुरूष की सहाय्यक होना और अपने बच्चों की मातृत्व सेवा करना । परंतु परमेश्वर चाहता है कि वह अपने मुख से भी उसकी गवाही दे । परमेश्वर ने नये नियम के युगमें महिला को नहीं बुलाया कि वह चेला का, भविष्य का , प्रचार का, चखाही का, या शिक्षक का कार्य करें । पुरानी वाचा के अंतर्गत हन्ना जैसे भविष्य थी परंतु नये नियम में पेन्सिकुस्त के बाद जेजबेल को ही भविष्य बोला गया वह भी झूठी नबिया (प्रका २:२०) कोई भी महिला जो आज अपने को भविष्यवŠता या प्रचारक कहती है वह इजबेल का अनुसरण करती हैं । इस सत्य के प्रति कोई गुमराह न हो । सब परमेश्वर के सलियाहो को ऐसी इजबेलों का विरोध और भंडाफोड करना चाहिए (१ राजा २१:२०-२३) नये नियम में महिलाआें ने कमी कमी भविष्यवाणी की है जैसे फिलिप्युस की पुत्रियाँ परन्तु वे भविष्य द्वŠता नही थी Šयोंकि जब परमेश्वर ने पौलूस को संदेश देना चाहा जब कि वह फिलिप्युस के घर पर था तो उसने पचास मी दूर रहने वाले अगेबस भविष्यवŠता को बुलाया न कि फिलिप्युस की पुत्रियों से सलाह ली (प्रेरि २१:८-११) यीशु मसीह ने किसी महिला को अपनी चेलिन नहीं कहा Šयोंकि वह नहीं चाहता था कि महिला पुरूष पर अधिकार रखे यद्यपि उपरोŠत सेवाएँ महिलाआें के लिये खुली नहीं है तथापि वे अन्य तरीकों से भी प्रभू की गवाही दे सकती हैं ।

मरियम मगदलीनी पुनरूत्थान के बाद यीशू ख्रीष्ट की पहली गवाह थी । वह प्रचारक नहीं थी परंतु एक विश्वास योग्य गवाह थी जिसने बताया कि उसने Šया देखा और Šया अनुभव किया । हर एक महिला को पवित्रात्मा और आम का बाप्तिस्मा पाना जरूरी है ताकि वह ऐसी ही प्रभु की गवाह बन सके । भारतीय सभ्यता में स्त्रियों को प्रतिबंधित किया जात है कि वह पुरूष के मुँह से सुसमाचार सुनेअत: आत्मा से भरी महिलाएँ ही उनहें संदेश दे सकती हैं । (प्रतिबंधित स्त्रियों को ) हर एक प्रभु से डरनेवाली बहन की ये जिम्मेदारी है कि वह जिन रिश्तेदारो, मित्रों पडोसिया, कामकाजी महिलाआें इत्यादि के सम्पर्क में आती है उन्हे सुसमाचार सुनाये ।

नये नियम में शिक्षा है कि महिला कलीसिया में प्रार्थना करे और भविष्यवाणी करे बशर्ते कि उसका सिर ढका हो (१ Šलु ११:५) प्रार्थना करना ही वह प्रमुख सेवा है जिसमे सब बहने शामिल हो सकती है कि कलीसिया की उन्नति हो । परमेश्वर ऐसी महिलाआें की खोज मे है जो उसकी ध्येय की पूर्ति के लिए गुप्त मे प्रार्थना करें । महिलाएँ भविष्यवाणी भी कर सकती है प्रे २:१७,१८ मे स्पष्ट वर्तित है कि जब आत्मा की अरपूरी होती है तो पुरूष और महिलाएँ दोनो भविष्यवाणी करती है । नयी वाचा के अंतर्गत यह महिला के लिए प्रावधान है । वह चर्च अराधना मे विनयपूर्वक परमेश्वर के वचन को बाँट सकती है (१ति २:१२) बुजुर्ग महिलाएँ अपनी छोटी बहनो को परिवार चलाने के गुर सिखा सकती हैं (तितुस २:४,५) सब बहने छोटी या बडी को चर्च में सहाय्यता करने के वरदान की खोज में रहना चाहिए । ऐसी बहुत सी भŠत बहने प्राचीन कलीसिआओ मे थी । (रोम १६:१,२)

महिला का सिर ढांकना निम्न बातों को प्रगट करता हैं । (१Šलू ११:१-१६)

  1. पुरूष के गौरव को कलीसिया मे ढका होना चाहिए
  2. स्त्री का गौरव भी कलीसिया मे सिर ढांकने से है ।
  3. वह कि महिला पुरूष के अधिकार को मानती है । चाहे वह पति हो पिता हो या बुजुर्ग हो । सोलहवी आयत के अनुसार हर एक चर्च जो प्रभू की कलीसिया है महिला को सिर ढांकने के लिए विवश करें

महिला अपने पहिरावे के द्वारा भी प्रभू की योग्य गवाह बने । पवित्रात्मा मसीही महिलाआें के लिए तीन बातोंकी मनाही करता है । बालों की सजावट महंगे वस्त्र और गहने हर प्रभूसे डरने वाली बहन जो प्रभू के वचन का भय मानती है । इन तीन आज्ञाआें का सही पालन करेगी । (मत्ती ५:१९) महिलाआें को अपने पहिरावे मे सौम्य होना चाहिए (१ ति २:९,१०; १ पत ३:३)कपडे महिला के शरीर को ढांकने के लिए है न कि दिखाने के लिये । प्रभू से डरनेवाली महिलाएँ कभी अपने दर्जी को ये इजाजत नहीं देगी कि उनके कपडे सांसारिक स्त्रियों के फैशन मे काटे और सिले जावे । नीची पहनी गयी साडी शरीर को खुला दिखाते ब्लाऊज, रंगे ओठ और नाखून इजवेल का अनुसरण करने की निशानी है । न की मसीह के चेलिन का । (यशा ३:१६-२४)

चूंकि शैतान परमेश्वर के द्वारा महिला और पुरूष मे दिखाए गये भेद को नष्ट करना चाहता है, इसलिए बीसवी शताब्दी की महिलाएँ पुरुषों की तरह छोटे बाल रखती हैं जो प्रभू की दृष्टि में घिनौना है । (व्य वि २२:५) अधिकार जताने वाली पत्नियाँ और प्रचारक महिलाएँ मसीही महिलाआें को परमेश्वर और उसके वचन से दूर और दूर ले जा रही हैं ।

इन सब के बीच परमेश्वर ऐसी महिलाआें को चाहता है वचन के द्वारा निर्धारित सीमाआें के अन्तर्गत रहें और जो अपने जीवन भर स्त्रीत्व के सही गौरव को दिखाएँ । अत: निर्णय करिए कि तुम परमेश्वर के ह्दय के अनुसार बनोगी और अंत के दिनों में इस पापी युग से समझौता नहीं करोगी ।

परमेश्वर तुम्ह इसके लिए अनुग्रह देगा यदि तुम खुद ऐसा बनने की इच्छुक हो ।

अध्याय 4
धर्मकाण्ड या आत्मिकता?

पवित्र जीवन की खोज में एक मसीही एक बडे खतरे का सामना करता है कि वह अंत में कि वह धार्मिक दिखता है । परंतु आत्मिक नहीं होता । कच्चे विश्वासी धार्मिकता ही को प्राय: आत्मिकता समझनेकी भूल करते है । परंतु इन दोनो के बीच मे बडा अंतर है । प्रथम धार्मिकता मानवीय है और आत्मिकता दैवीय । व्यवस्था मनुष्य को धार्मिक बना सकती है पर आत्मिक नहीं । धार्मिकता ऊपर ऊपर दृष्टि गोचर होती है । परंतु आत्मिकता वास्तव में ह्दय की वस्तू हैं ।

परमेश्वर का वचन यह चेतावनी देता है जो ईश्वरत्व का भेष तो रखेंगे परंतु उसकी सामर्थ का इंकार करेंगे । दूसरे शब्दो में वे धार्मिक तो होंगे परंतु आत्मिक नही (२ ति ३:५) वे धार्मिकता का मेष रख समाआें में प्रार्थना करेंगे । गंज पवित्रशास्त्र पढेंगे । पूरी रात उपवास के साथ प्रार्थना करेंगे दशमांश देंगे, इत्यादि परंतु वे मनुष्यों से अपना आदर चाहेंगे स्वार्थी जीव जियेंगे, पैसे से प्यार करेंगे और गपशप में आनंद लेंगे इत्यादि । ऐसे ही मनुष्य धार्मिक होते है । परंतु आत्मिक नहीं । वे पवित्रता का भेष बिना सामर्थ के रखेंगे । यहाँ कुछ उदा है

यदि कोई आराधना में जाने के लिए इच्छुक है । बनिस्बत अपने जिस्म को क्रूस पर चढाने के वो धार्मिक है आत्मिक नहीं (गला ५:२४) यदि कोई रोज सुबह बाईबिल पढने में उत्साही है बनिस्बत पूरे दिन अपनी जबान पर लगाम लगाने के वह धार्मिक है आत्मिक नहीं । यदि कोई उपवास और प्रार्थना में ज्यादा उत्साही है, बनिस्बत पैसे के मोह से दूर रहने में या कोई प्रचार करने मे ज्यादा इच्छुक है । बनिस्बत व्यŠतगत पवित्रता को प्राप्त करने में वह धार्मिक हैं आत्मिक नहीं ।

ऊपर दर्शाई गई धार्मिक व्यŠत के क्रिया कलाप अच्छे है पर प्रश्न है प्राथमिकता का सही बातों को प्राथमिकता देना ही मनुष्य को आत्मिक बनाता हैं ।

धार्मिक व्यŠत अपने क्रिया कलापों को परमेश्वर के जन के आचरण को दिखाकर सिध्द करता है । परमेश्वर के जन के आचरण को उद्यृत कर के सही सिध्द करता है परन्तु आत्मिक व्यŠत ऐसी कोई कोशिश नहीं करता ।

धार्मिक व्यŠत मनुष्यों की टीका टिप्पणी पर ध्यान देता है, परंतु परमेश्वर के वचन पर नहीं । आत्मिक व्यŠत केवल परमेश्वर के वचन पर नहीं । आत्मिक व्यŠत केवल परमेश्वर के वचन पर नहीं आत्मिक व्यŠत केवल परमेश्वर की सराहना चाहता है । धार्मिक व्यŠत किसी वरिष्ठ भŠत द्वारा करी गयी प्रशंसा पर ध्यान लगाता है परंतु आत्मिक व्यŠत प्रभू यीशु मसीह की तरह लोगों की बडाई नहीं चाहता । (योहन्ना ५:३४) आत्मिक व्यŠत यह जानता है कि उसके अन्दर जो विकार है अन्य दूसरा व्यŠत नहीं जान सकता ।

धार्मिक व्यŠत परमेश्वर को प्रसन्न करने की कम से कम जरूरतो पर खुश रहता है इसलिए वह अपनी आमदनी का दस प्रतिशत हिसाब करके देता है । पुराने नियम में इसी भावना से इस्त्राइली कानी भेड और बीमार जानवरों की भेंट चढाते थे । (मलाकी १:८) संभव है यही भावना नये नियम की आज्ञाओं के प्रति हो । एक बहन अपने पति के अधीन रहने की आज्ञा का पालन या अराधना में अपने सिर ढंकने का पालन एेंसी ही भावना से करते है । पुरूष और महिला अपना संपूर्ण समर्पण करने के बजाए कम से कम आज्ञा पालन का विचार रखते है । इनके दिमाग में यह बात रहती है कि वे कितना कम से कम दुनियादारी से दूर रहें ये आत्मिक नहीं धार्मिक होते है ।

यीशू मसीह का विचार इससे एकदम भिन्न था । उसने कभी नहीं सोचा कि अपने पिता को खुश करने के लिए वह कम से कम कुर्बानी दे । इसके विपरीत उसने चाहा, कि वह अपना सर्वस्व पिता को दे दे । इसलिए उसने हर आज्ञा के पीछे छिपी भावना पर ध्यान दिया। इसलिए उसने जाना कि व्यभिचार से दूर रहना ही पर्याप्त नहीं परंतु ह्दय मे व्यभिचार की लालसा आना भी उतना ही बुरा हैं । उसने पहचाना कि क्रोध करना और हत्या करना एक ही समान है इसलिए उसने हर आज्ञा के पीछे छिपी आत्मा को समझा ।

एक दुल्हन जो अपने दूल्हे से अत्यंत प्यार करती है वह अपने साथी को कम से कम खुश करने का विचार नहीं रखती इसके अलावा वह सोचती है कि कैसे अधिकता से दिया जाए वही भावना मसीह की दुल्हन की भी होनी चाहिए । यही हम एक सेवक और एक दुल्हन के बीच का अंतर समझ सकते है जो व्यवस्था के अधीन है वह सेवक है । एक नौकर अपनी तनखा के लिए काम करने के कारण नपा तुला काम करता है वय घडी देख कर कार्य करता है । अतिरिŠत कार्य के लिए वह अतिरिŠत पैसा चाहता है परंतु एक पुत्र या पत्नी कितने भी समय तक सेवा करने को तैय्यार रहती है कोई पुरस्कार प्राप्त करने के लिए नहीं । परंतु मोहब्बत के वशीभूत हो कर। यही अंतर है धार्मिकता और आत्मिकता में ।

जो मन ये सोचता है कि मुझे प्रभु से Šया मिलेगा? वह धार्मिक है परंतु जो मन सोचता है कि मेरे जीवन से प्रभु की Šया सेवा हो सकती है? वह उसे आत्मिक बनाती है यही वह कारण है कि जब हमे एक मील जाने की आवश्यकता है । इम प्रसन्नता पूर्वक दो मील भी जा सकते है।

आदम ने अंजीर के पत्तो से अपने को ढांका । यह धार्मिकता का प्रतिक हैं परमेश्वरने आदम को जानवर की खाल से ढांका ये आत्मिकता का प्रतीक है । जब यीशु अंजीर के पेड के पास आया, तो फल का मौसम नही था । हम कह सकते है कि पुरानी वाचा आत्मा के फूल के लिए अनुकूल मौसम नहीं थी । व्यवस्था जिसमे मनुष्य को मे रखा मिटा दी गयी परमेश्वर ने इसे कुछ समय तक रखा कि मनुष्य अपनी आवश्यकता को जाने । व्यवस्था पवित्र करने का साधन नहीं बनाई गई इब्र ८:७ में लिखा है कि यह दोषपूर्ण प्रशासक थी । मनुष्य को आत्मिक बनने के लिए नयी वाचा के अंतर्गत आना जरूरी था ।

परमेश्वर ने व्यवस्था दी यह जानने के लिए कि Šया मनुष्य बाहरी धार्मिकता से ही खुश हागा या कुछ आधक की चाह रखेगा चूंकि बहुत से विश्वासी बाहरी धार्मिक से खुश रहते है वे मानो अपने को पत्ते से ढांकते है । सुसमाचार उध्दार के लिए परमेश्वर की सामर्थ है यह पत्तो को छिन्न भिन्न करती और शापित करती है और सच्ची पवित्रता प्रदान करती हैं ।

परंतु इस सुसमाचार को ग्रहण करने के लिए हमे वास्तविक पश्चाताप की जरूरत है । वास्तविकता का अर्थ जड से शुरू कर ऊपर जाना है । योहन्ना बाप्तिस्मा देनेवाला मन फिराओ का संदेश ले कर आया और कहा कि मसीह की कुलहाडी पेड की जड पर रखी हैं । हर एक पाप जड से प्रारम्भ होता है यदि हम पाप जो फल की तरह है के लिए पश्चाताप करें तो ये वास्तविक पश्चाताप नहीं उदा स्वरूप किसी की पीठ पीछे बुराई कना उस भाई के प्रति गलत विचार रखने से होता है । वास्तविक पश्चाताप इस गलत विचार से छुटकारा पाने में है न कि पीठ पीछे बुराई करने से अपने को रोकने में । बाहरी क्रिया को रोकना कैची से फलों को काटना हैं । यीशू मसीह कैंची ले कर नहीं वरन कुल्हाडा लेकर आये कि जड को काटें । इसीलिए जहाँ प्रभु केवल पत्तियों को देखता है वह आज भी पत्तियों को चाप देता है कि पेड को फलों से लदा हुआ देखे । इसी प्रकार कई पाप हमारे स्वार्थी पन और पैसो के मोह से पैदा होते है । आत्मिक मनुष्य वह है जो अपने अन्दर पाप की जड को पहचानता है और केवल फलों को काटने से संतुष्ट नहीं होता ।

धार्मिक व्यŠत सरलता से धोखा खा जाते है । एक पति जो है माह से अपनी पत्नी के प्रति बुरी भावना रखता है किन्तु अपने को नियंत्रित रखता है कि अपनी पत्नी को चोट पहुँचाने के लिए कुछ न कहे । परंतु एक दिन उस पर गुस्से से भडक उठता हैं अब यदि वह सोचता है कि उसने छै महने तक विजय प्राप्त की और एक क्षण के लिए ही तो पाप मे पडा तो अपने आप को धोखा देता है वह छै महने तक बारूद की छडो को इकठ्‌ठा करता रहा और अंत मे एक चिंगारी ने भयंकर विस्फोट पैदा कर दिया, वह इन पूरे समयों में पाप मे जी रहा था परंतु लम्बे समय तक वह दिखाई नही दिया । यह चिंगारी नही जिसने विस्फोट पैदा किया परंतु वह बारूद है जो छै महने तक जमा होता रहा ।

यदि दूसरों के प्रति व्यवहार में हम 'परमेश्वर के प्रेम' को दिखाने मे विजयी नही होते तो हम पाप करते है चाहे ऊपरी तौर से हम अच्छी गवाही देते रहें । अपनी ही जाँच में संतुष्ट होनावैसी ही मूर्खता है जैसा की संगीत न जानने वाले से अपनी संगीत की प्रतिभाको परखने बोलना ।

हमे पाप को 'पाप' कहने का (दम) होना चाहिए। क्रोध को अपने सही नाम 'हत्या' से ही जानना चाहिए (मत्ती ५:२१,२२) यदि हर एक पाप के लिए तुम यही प्रक्रिया नहीं अपनाते तो तुम जिन्दगी भर 'धार्मिक' ही बने रहोगे सही मायने मे आत्मिक नहीं रह चाहोगे । फरीसी अपने पुदिना जीरा धनिया का भी दशमांश देते थे वे अपनी खािवटी धार्मिकता से एक मिली मीटर भी नही खिसकना चाहते थे तोभी वे प्रेम दया और भलाई से कोसों दूर रहें । आज भी धार्मिक लोगों का यही हाल है । संभव है कि कोई दिखावटी धार्मिकता मे शत प्रतिशत नियम का पालन करे और तोभी प्रेम के पथ से विमुख हो जाए नयी वाचा की धार्मिकता का पथ प्रेम का पथ है और हमे सतर्क रहना है कि इस पथ से १ मि मी भी न हटें । यही आत्मिकता को पाना है ।

बहुत से लोग भŠत झूठे धर्म के द्वारा नरक मे जा रहे है । बनिस्बत संसारिकता के । इसलिए हमे धार्मिकता और आत्मिकता के बीच भेद करने में सतर्क होना चाहिए । हमारे कार्य यदि परमेश्वर के प्रति प्रेम से प्रेरित नहीं होते चाहे वे कितने इच्छे हो पात्र कर्मकीड है । ऐसे कार्य मृत कार्य कहलाते है Šयो कि इनके पीछे प्रेम की सामर्थ नहीं होती । हमे ऐसे मृत कार्यो के लिए पश्चाताप करना है ऐसे कार्य जो मसीह के प्रति हार्दिक भŠत से प्रेरित न हो ।(इब्रा ६:१; र Šलू ११:३)

परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम करता है न केवल पैसा परंतु आज्ञा पालन को पूरा करना भी । जब परमेश्वर की आज्ञा पालन करना बोझ बन जाए तो यह संकेत है कि हम आत्मिकता से भटक गये । नयी वाचा में वह सब जो हम परमेश्वर को देते है प्रेम से प्रसन्नता से और स्वप्रेरित होकर ही देना है अन्यथा हम पुरानी वाचा के नियमो का पालन करनेवाले और सेवक बन जाते है न कि पुत्र

यहुदा अपनी पत्री मे तीन लोगों को आत्मिक नहीं वरन्‌ धार्मिक बताता है कैंन, बालाम और कोरह (यहूदा ११) एक एक कर इन पर विचार करें ।

कैन नास्तिक व्यŠत नहीं था वह धार्मिक था और परमेश्वर को भेंट चढाने मे विश्वास करता था (उत्पत्ति ४:३) हाबिल भी ईश्वर को भेंट चढाता था परंतु कैन और हाबिल में और उनकी भेंट चढाने में वही अंतर था जो नर्क और स्वर्ग में है या धार्मिकता और आत्मिकता में है । कैन उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो पैसा सेवा समय इत्यादि की भेंट चढाते है । दूसरी जगह हाबिल ने अपने को ही वेदी पर पढा दिया जब उसने भेड के बच्चे को मार कर उसकी बली दी ।

धार्मिक व्यŠत भेंट दे सकते है । प्रार्थना कर सकते है और कई अच्छे कार्य कर सकते है परंतु अपने को वेदी पर बलि करने का मतलब नहीं समझते । वे सही दसवांश दे सकते है परंतु परीक्षा के समय अपनी सुदी को कुर्बान नहीं कर सकते । यही पुरानी वाचा और नयी वाचा का अंतर हैं । काई अपनी खुदी को बिना मारे पुरानी वाचा में प्रवेश कर सकता है परंतु नयी वाचा में नहीं । प्रभु यीशु दशवाँश की भेंट चढाने नहीं आया, परंतु अपने प्राण की भेंट चढायी जो परमेश्वर को प्रसन्न कर सकी कैन और हाबिल क्रमश: चौडे और सकरे मार्ग को दिखाते है । तुम बिना जिस्म को मारे सेवक तो बन सकते हो परंतु पत्र नही ।

आकाश से आग बरसा कर परमेश्वर ने हाबिल की भेंट को ग्रहण किया पर कैन की भेंट के साथ ऐसा नहीं हुआ । जब कोई व्यŠत लगातार अपने प्राण को नकारता है । तो स्वर्ग से उसके जीवन और सेवकाई पर आग गिरती है यही आत्मा और आग का वास्तविक बाप्तिस्मा है वह व्यŠत जो अच्छे कार्य करता है और जिसका जीवन भी अच्छा हो सकता है । परंतु उसके जीवन में स्वगृ की आग और अभिषेक का अभाव हो सकता है । शैतान का फर्जी बाप्तिस्मा जो भावनाआें को गुदगुदाता है कुडे की तरह है । जब कि जो लोग क्रूस का मार्ग अपनाते है उनपर मसीह आत्मा और आग से वास्तविक बाप्तिस्मा देता है ।

बालाम दूसरा धार्मिक व्यŠत का उदाहरण है वह एक प्रचारक था जो ईश्वर की सेवा करना चाहता था परंतु वह पैसा कमाने और दुनियाँ के बडे लोगों से मिलने का इच्छुक था । (गिनती २२) वह प्रभु के नाम से अपने लिए पैसा और आदर कमाना चाहता था । आज बालाम की तरह ही बहुत से झूठे नबी है जिनके सिध्दांत अक्षरक्ष: सही है । परंतु न समझ विश्वासी नहीं समझ पाते कि वे बालाम की आत्मा से प्रेरित है । यही वे है जिनके विषय पौलूस फिलि २:२१ मे कहता है कि ये केवल अपना भला चाहते है । चिरगमुन के चर्च में भी ऐसे लोग थे जो बालाम के सिध्दांत पर चलते थे (प्रका २:१४)

कारेह भी एक धार्मिक व्यŠत का उदा है वह लेवियों के याजकीय कुल का था (गिनती १६) परंतु वह अपनी इस दी गई सेवकाई से संतुष्ट था । वह मूसाही तरह बनना चाहता था यही लालच उसके नाश का कार बना । वह और उसके साथी विरोधी दातान और अलिराम और उनके कुटुम्ब के विषय शास्त्र मे लिखा है कि वे जीवित नरक में चले गये (गिनती १६:३२,३३) जिसको परमेश्वर ने चूना उसके आवाज उठाने को पाप को परमेश्वर ने गम्भीरता से लिया ।

कई प्राचीन और प्रचारक, पास्टर जो आज स्वत: नियुŠत है उनके विरूध्द आवाज उठाना उतना गम्भीर नहीं और कुछ समय जरूरी भी होता है, परंतु परमेश्वर के द्वारा नियुŠत सेवक के विरूध्द आवाज उठाना परमेश्वर के कडे न्याय को आमंत्रित करता है ।

चर्च में जो लोग अस्वस्थ लगाने में लगे रहते हैं वे कोरह के सदृष्य हैं ईश्वर का भय रखने वाले भाई के प्रति यदि सराहना और बडाई करना कठिन है तो यह कोरह की आत्मा को दर्शाता है और जब कोई उसका विरोध करता है तो वह कोरह की आत्मा से भरा हुआ है जो ऐसों का साथ देते है वे उन २५० विरोधियों के समान है । जिनका परमेश्वर ने न्याय किया ।

अंत के समय के लिए लिखा है कि लोग भŠत का मेष तो रखेंगे पर उसकी शŠत को नहीं मानेंगे । आत्मा भी यह चिताता है कि बहुत से मसीही परमेश्वर के सिखाएँ मार्ग से भटक जायेंगे और अन्य धार्मिक साधन जैसे विवाह न करना, कुछ प्रकार के भोजनों को बहिष्कार करना इत्यादि को अपना लेंगे ।

मनुष्य ने कई गलत कर्म काण्डो की इजाद कर ली है जैसे सार्वजनिक रूप से पापों का अंगीकार या बीमार होने पर दवा न लेना आदि आदि । ये सब शैतान के सिध्दांत है । जो मसीहीयों को सही भŠत से दूर रखने के लिए हैं । (१ ति ३:१६) से ४ का ५ तक)

सच्ची आत्मिकता प्रतिदिन अपने को क्रूस पर चढाना। अन्य तरीकें फर्जी हैं ।

अध्याय 5
नयी वाचा की आत्मा

पुराने नियम की बाइबिल में दस आज्ञा देने के ठीक बाद परमेश्वर ने इस्त्राइलियों को एक सुन्दर पध्दति दी जो नये और पुराने नियम के अन्तर को ठीक से दर्शाती है । निर्ग २१:१६ में हम एक इब्रानी दास के विषय पढते है जिसने छ: वर्षो तक सेवा दी Šयोंकि उसे यह सेवा करना दासत्व के कानून की मांग थी । परंतु आगे भी वह अपने स्वामी की सेवा करता रहा Šयों कि उसे स्वामी से लगाव था । यही नयी वाचा की आत्मा को दर्शाता है ।

छ: वर्षो तक सेवा करने की बाहयता थी सातवे वर्ष सब्त विश्राम होने के कारण वह दासत्व से मुŠत हो सकता था । परंतु जब परमेश्वर ने आदम को सृजा उसने पहले दिन आदम को विश्राम दिया बाकि छ: दिन के लिए काम । Šयों कि परमेश्वर के विश्राम का सातवाँ दिन आदम के जीवन का पहला दिन था । यह सिखाता है कि मनुष्य प्रभु के लिए जो सेवा करता है वह प्रभू से संगति और प्रेम से प्रेरित होता है । अन्यथा वह सेवा कानूनी और बेकार होती ।

यह सत्य कि हम नयी वाचा के युग में रहते हैं का अर्थ यह नहीं कि हम नीय वाचा की आत्मा में जीते हैं यह संभव है कि 'पाप पर विजय' के सुसमाचार को समझते हुये भी हम व्यवस्था के अंतर्गत जीवन बिताएँ । रोमि ७:१-६ में हम देखते है कि जो व्यŠत उध्दार पाया है वह व्यवस्था के दासत्व में रह सकता है ।

यह संभव है कि गलत उद्देश्यों को लेकर भी धार्मिक जीवन जिया जा सकता है । बहुत से व्यŠत व्यवस्था का पालन न्याय के डर से करते है । कुछ पुरस्कार पाने के लिए ये दोनो प्रेरणाएँ नयी वाचा के आत्मा के अनुकूल नहीं यह संभव है कि हम सब आज्ञाआें का पालन करें और प्रभु हमे डाँटे यह कहते हुए ' मुझे तेरे विरूध्द यह कहना है कि मुझ से प्रेम करने के कारण तुम आज्ञाआें का पालन नहीं करते जैसा पहले करते थे इसलिए पश्चाताप करो' जब प्रेरणा प्रेम न हो यह व्यवस्था के अन्तर्गत ये दोष नहीं । परन्तु नयी वाचा के भीतर यह इतना गंभीर मसला है कि इफिसुस के अगुवे को यह खतरा था कि उसका अभिषेक न हो जब तक वह पश्चाताप न करें ।

जब हम शरीर के संसारिकता की गंदगी को साफ करते है तब हम मनुष्यों के सामने अच्छी गवाही देते है । पर जब हम आत्मा की गन्दगी से शुध्द होते है तब परमेश्वर हमारी गवाही देता है यही पवित्रात्मा को पाना है । (२ कुर ७:१) हमारी पवित्र बातों मे भी दुष्टता है । दुष्टता का अर्थ है धार्मिकता प्राप्त करने के लिए हमारी गलत प्रेरणा है ।

इस अधर्म के नीचे लोगों से आदर प्राप्त करने की इच्छा ही गंभीर बुराई ही है । जब हम दूसरों से आदर चाहते है तो हम संसारिक जिन्दी को संवारना चाहते है । यही वह बुराई है जिसकी हमे जल्द खोज करना चाहिए अन्यथा ये हमारे नाश का कारण होगी ।

दस कुंवारियों के दृष्टांत में यह साफ है कि वे वेश्याएँ नही थी परंतु कुंवारी थी उन सबने अपने को जिस्म की अशुध्दता से बचाए रखा था । मनुष्यों के सामने उनकी अच्छी गवाही थी उनके दिये जल रहे थे और उनके अच्छे कामों को देख कर मनुष्य उनकी बडाई करते थे । परंतु मनुष्य ये नहीं जानते थे कि उनमें कुछ कुंवारियों का आन्तरिक जीवन ठीक नही है । परंतु ईश्वर जानता था कि उनमे से पाँच का आंतरिक जीवन सही नहीं है । ये पाँच व्यवस्था को पूरा करने वाली और मनुष्यां की गवाही से संतुष्ट थी । वे नही जानती थी कि स्वर्गारोहण के समय में वे छोड दी जायेगी । दुल्हे ने उनसे कहा ' मै तुम्हे नहीं जानता' उसने उन्हे दुष्टता के काम करनेवाले नही कहा । (मत्ती ७:२३ ) लोभी अपनी आंतरिक जिन्दगी में उन्होंने मसीह की आत्मा को प्राप्त नहीं किया मानो मसीह ने कहा तुम नयी वाचा के फरीसी हो ।

यह संभव है कि नये नियम की आज्ञाआें का पालन करते हुए थी । हम में प्रभु की आत्मा न दिखे उदा के लिये यदि किसी ने हमारा बुरा किया है तो हम उसके पास एक महंगी भेंट लेकर जा सकते है कि अपने प्रेम को प्रदर्शित करें परंतु जाते वŠत यह मौन स्वीकृति बनाए रखें 'जहाँ मं एक संत हँू जो तुम दुष्ट पापी से अच्छा व्यवहार करने आया हूँ ' ऐसी हालत में हमारी भेंट परमेश्वर की दृष्टि में यह खुशबूदार सुगंध नहीं होगी । (इफी ५:२)

दूसरी परिस्थिति पर ध्यान दें जब एक पत्नी अपने पति के प्रति क्रोधित है और पति चूपचाप बैठा सून रहा है तो तिसरा व्यŠत यह सोच सकता है कि पति संत है और पत्नी वापिनी । परंतु परमेश्वर के विचार बिलकुल एक हो सकते हैं Šयोंकि वह आत्माआें को परखता हैं । पति मुंह बंद कर सोच सकता है कि प्रभू मै आप का धन्यवाद करता हॅूं कि क्रोध पर आपने मुझे विजय दिलाई जब कि मेरी पत्नी मुझ पर क्रोधित है । हो सकता हैं कि उसको पत्नी परमेश्वर को ज्यादा ग्रहण हो बनिस्बत इस धार्मिक फरीसी पति के । ये सच है कि वेश्यायें और डाकू फरीसियों के पहले स्वगृ के राज्य में प्रवेश करेंगे । किसी पर क्रोध करना निश्चय ही मसीही को नहीं सोहता परंतु इसी तरह फरीसीबाद भी । अतएव हमे अपने मन को फरीसीवाद की आत्मा से शुध्द करना है और यही उध्दार का रास्ता है ।

उडाऊ पुत्र के दृष्टांत में बाप और बडे बेटे के रूप में हमे मसीह और एक फरीसी का व्यवहार दिखाया गया है । पिता खुश हुआ कि पश्चाताप कर उडाऊ पुत्र वापस आया यद्यपि उडाऊ पुत्र ने अपने पाप पर पूर्ण विजय प्राप्त नहीं की थी परंतु फरीसी की आत्मा रखने वाले बडे पुत्र ने अपने छोटे भाई को स्वीकार नहीं किया । बस चलता तो वह अपने छोटे भाई को कम से कम एक साल के लिये नौकरों की खोली में रखता । यह जांचने के लिए कि उसका पश्चाताप सच्चा हैं या नहीं ।

जिन लोगों ने हमे चोट पहुँचाई है उनके प्रति हमारे शरीरों की फरीसी आत्मा हमारे व्यवहार से प्रगट होती है । वे हम से क्षमा माँग ले परंतु उनके पश्चाताप को परखने के लिए हम उनको नौकरों की खोली में ही रखते है । प्रभु यीशु ने कहा है कि यदि बारह घंटो में हर दो दो घंटे बाद थी यदि कोई क्षमा मांगने आता रहे तो हमे उसके पश्चाताप पर शक न करते हुये क्षमा करना है (लूका १७:४) हमे उसकी कथन पर विश्वास करना है । यदि वह इमानदार न भी हो तो परमेश्वर इसका न्याय करेगा । हम केवल बाहरी रूप देखते है जब कि ईश्वर ह्दय को ।

न्याय के दिन हम पायेंगे कि महत्वपूर्ण यह है कि हमने कयों कोई कार्य किया बनिस्बत इसके कि हमने Šया किया ? (१ Šलू ४:५) बडे पुत्र ने कमी अपने पिता का आज्ञा उल्लंघन नही किया परंतु फिर भी वह पिता के घर के बाहर ही रहा Šयोंकी उसकी आत्मा तर्क की आत्मा थी । वह उन कुंवारियों के समान था जिनके दिये में तेल नहीं या उसका मकसद अंत में उजागर हो गया वह पुरस्कार के लिए सेवा कर रहा था जैसा कि उसने अपने पिता से कहा ।

इसी भावना के विरूध्द प्रभु यीशु ने पतरस से कहा जबा पतरस ने पूछा हमने तो सबकुछ त्याग दिया है । हमे Šया मिलेगा यीशु ने एक दृष्टांत में उत्तर दिया कि एक भूस्वामी ने पाँच प्रकार के नौकरों को मजदूरी में रखा चार तरह के लोगों से मजदूरी तय की गई पाँचवे प्रकार के मजदूरों से कुछ तय नहीं हुआ मत्ती २०:१-१७ पहले प्रकार के लोगों को एक दिनार देने की बात तय की थी परंतु ये चारों प्रकार के नौकर गुप्त में ये आशा रख रहे थे कि उन्हें अंतिम मजदूरों से अधिक मिलेगा । आज के मसीही भी यही आशा रखते है कि उन्हे स्वर्ग में मुकुट मिलेगा । वे प्रभू की दुल्हन बनेंगे यह आत्मिक इच्छा तो लगती है परन्तु यह सब पुरस्कार की आशा ही माना जायेगा और यही पुरानी वाचा की आत्मा हैं ।

व्यŠत जिस पुरस्कार की आशा रखता है वह यह है कि वह कैसे अधिक से अधिक परमेश्वर के प्रेमी और पवित्र स्वभाव प्राप्त करे । यही वह मुकुट है जो प्रभू लेकर आनेवाला है । (प्रका २२:१२)

ऊपर के दृष्टांत में नौकरों का पाँचवाँ समूह बिना किसी पुरस्कार की आशा से कार्य करने आया (मत्ती २०:७) मानो वे नयी वाचा की आत्मा से आये और उन्हे पहले पुरस्कृत किया गया (मत्ती २०:१६) मजदूरों का पहला समूह बडे भाई की तरह था, स्वधार्मिकता औ तर्क के आधार पर पुरस्कार प्राप्त करने की आशा लिये हुए ।

नयी वाचा में प्रभु यीशु ही हमारा उदाहरण है उसने पिता की आज्ञाआें को इसलिए नहीं माना कि उसे आदर और अनंत जीवन मिले, तथा इसलिए भी नहीं कि उसे दण्डित किया जायेगा । परंतु उसने क्रूस को इसलिए सहा Šयों कि पिता की उपस्थिति हो। उसके लिए असली खुशी थी । गतसेमनी मे उसने यह महसूस किया कि क्रूस मे तीन घंटे रह कर वह परमेश्वर से ज्यागा जायेगा इसलिए उसने बिनती की कि Šया कोई दूसरा उपाय नहीं ? दूसरा उपाय न होने से उसने पीडा को जानते हुये हमसे प्रेम करने के कारण हमारा सबसे बडा कर्जा चुकाया ।

परमेश्वर की संगति के लिये हमे तर्को से छुटकारा पाना है केवल एक ही रास्ता है जो २ Šलू ३:१८ में बताया गया है । इस पूरे अध्याय में पुरानी वाचा और नयी वाचा की तुलना करते हुये पॉल अंत में कहता है कि पवित्रात्मा आया कि परमेश्वर के वचन के दर्पण में प्रभु की महिमा को हम को दिखाए और उसी प्रतिरूप में हमे परिवर्तित करें।

पवित्रात्मा चाहता है कि पहले हम यह देखें कि प्रभु यीशु इस संसार में कैसा रहा । वह व्यवस्था के आधीन जन्मा परंतु इस व्यवस्था में उसने उन बारीकियों को पाया जो इस्त्रायली नहीं पा सकें । व्यवस्था है कि व्यभिचार न करना परंतु इसका वास्तविक अर्थ है कि स्त्री के प्रति लालसा भरी दृष्टि नहीं रखना । खून न करने से मतलब है कि ह्दय में किसी के प्रति क्रोध न रखना ।

प्रभु यीशु मसीह के पीछे हो लेने का अर्थ है शास्त्र का वैसेही मनन करना जैसे प्रभु ने किया ।

प्रभु यीशु ने जो वचन कहें वे आत्मा और जीवन है (योहन्ना६:६३) यही कारण है कि बहुतों ने उसे नहीं समझा और आज भी उसे नहीं समझते । परमेश्वर उन्हें ही प्रकाश देता है जो सत्य को चाहते है वह दूसरों को धोखा खाने देता है । यही अर्थ है (२ थिस २:१-१२) जब हम सत्य की चाह रख कर परमेश्वर के वचन पर मनन करते है तो हम वचन पर अक्षरक्ष चलने हेतु अपनी सहारना नहीं करते । परंतु यह खोजते है कि कैसे सही आत्मा से वचन को माना जावे ।

संभव है कि दस आज्ञाओ मे से नौ को तो व्यŠत पालन करता हुआ दिखे परंतु लोभ न करने की आज्ञा मन से संबंधित है । जिसे नहीं जाना जा सकता । इसीलिए पौलूस कहता है कि वह दोष रहित है परंतु उसने भी दसवी आज्ञा का पालन नहीं कर सकने की बात कहीं और इसलिए परमेश्वर उसे नयी वाचा की ओर ले गया ।

परमेश्वर ने दसवी आज्ञा दी कि मनुष्य की इमानदारी को परखे । जो लोग यह मानते है कि वे इस आज्ञा का पालन करने से चूक गये वे आगे ये सीखते है कि प्रभू यीशु मसीह और नया नियम हो जरूरी है (राला ३:२४) बाकि जो अपने पाप को छिपा रखते है वे पुरानी वाचा के अन्तर्गत ही बने रहते है । यही मुख्य कारण है कि आज मसाही पराजित है । वे अपनी आंतरिक पराजय को स्वीकार करने में ईमानदार नहीं । ़ वे मनुष्यों से प्राप्त आदर से संतुष्ट है । वे अपने स्वभाव की सच्चाई को नहीं जानना चाहते । परमेश्वर भी उन्हे धोखे मे रहने देता हैं ।

परमेश्वर की कभी ये इच्छा नहीं थी कि इन्सान नियम और कानून के दबाव मे जिये । व्यवस्था मनुष्य को जीवन देने के लिये नहीं दी गयी वरन इसलिए दी गयी कि मनुष्य अपनी समर्थता को जाने और इमानदारी की परख देें । इसलिए यीशु के आने के बाद व्यवस्था हटा दी गयी और नयी वाचा लाई गई । (इब्रा ८:७, ८, १३)

जब परमेश्वर ने आदम को अदन में रखा तो उससे कहा कि वह भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल को न खाए । दूसरे शब्दों में मनुष्य को भले और बुरे के ज्ञान की व्यवस्था में जीवन नहीं बिताना है अर्थात सब बुरी बातों का बहिष्कार करना और बस अच्छी बातों को सम्पन्न करना । यही वह बात है जहाँ सच्ची मसीहीयत फर्जी मसीहीयतसे भिन्न है और अन्य धर्मी से भी ।

परमेश्वर की मनसा थी कि मनुष्य जीवन के वृक्ष पर जिये अर्थात परमेश्वर की पवित्रात्मा के चलाए चले जो उसे बताएगा कि परमेश्वर को Šया पसन्द है और Šया नहीं (१Šलू ६:१२, १०:१३) भले और बुरे के ज्ञान से जीना व्यवस्था से जीना है । यह हमे केवल गुलामी की ओर ले जा सकता है ।

हम ऊपर से व्यवस्था का पालन कर सतही धार्मिक जीवन जी सकतें है परंतु हम अपने जीवन की कुप्पी में तेल तभी प्राप्त कर सकते है जब हम अपनी आत्मा की गंदगी को साफ करें ।

पौलूस जब इफीसियों के मसीहीयों को नये नियम की सच्चाई लिखता है तो वह जानता था कि वे इस प्रकाशन को नहीं समझेंगे, इसलिए वह प्रार्थना करता है कि पवित्रात्मा के द्वारा उनकी आँखे खोली जावें (इफी १:१७,१८)

और हमे भी अपने लिए यही प्रार्थना करने की आवश्यकता है ।

अध्याय 6
नयी वाचा -प्रभु यीशु के साथ सहभागिता

किसी ने परमेश्वर को कभी नहीं देखा, परंतु यीशु आया कि परमेश्वर को पिता की तरह प्रगट करें । (योहन्ना १:१८) प्रभु यीशु ने परमेश्वर के नाम को पिता शब्द से प्रगट किया । (यो १७:६) इसी नाम पर चेले अपनी सुरक्षा पाते थे (यो १७:११,१२)

पुराने धर्म के समय परमेश्वर मंदिर में मोटे परदे के पीछे निवास करता था । कोई सही तरह से नहीं जात पाता था कि वह कैसा है ? फरीसी उसे लोगों के सामने एक करूणारहित निष्ठुर शासक के रूप में प्रगट करते थे । यीशु आया और परदे को हटा दिया और दिखाया कि परमेश्वर प्रेमी पिता है जो हमारे अन्दर रहता है । परंतु शैतान परमेश्वर की गलत तस्वीर पेश करने के लिये सक्रिय रहा । कलीसिया की अब जिम्मेदारी है कि प्रभु यीशु की तरह परमेश्वर के प्रेमी पिता होने की सच्ची तस्वीर प्रगट करें । परमेश्वर को पिता जानकर ही हम नयी वाचा की अच्छाईयों को जान सकते है । परमेश्वर अति अनुग्रह कारी है (१ पत ५:१०)और अनुग्रह का अर्थ है 'जरूरत में सहायता करना' (इबा ४:१६) जिसका अर्थ है कि परमेश्वर सदा सहायता करनेवाला है । परमेश्वर शैतान का सामना करने के लिए सदैव हमारी ओर है । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह ने पवित्रात्मा को सहायक कहा । (योहन्ना १४:१६)

व्यवस्था मूसा के द्वारा आयी, जिसका उद्देश्य हमारे पापों को प्रगट करना और यह दिखाना था कि पाप के विरूध्द हम कितने असहाय है (गला ३:२४) व्यवस्था ने मनुष्य को विजयी होने में कोई सहायता नहीं की । इसीलिए व्यवस्था मनुष्य को आंतरिक शुध्दता नहीं दे सकी । परमेश्वर की सदा ये इच्छा है कि हम मन से शुध्द हों । प्रभु यीशु मसीह ने अच्छी नयी वाचा को स्थापित किया । अनुग्रह के अन्तर्गत परमेश्वर ने न केवल आज्ञा दी परंतु प्रभु यीशु का उदाहरण भी दिया और पवित्रात्मा का सहायक भी दिया कि हम आज्ञाआें का पालन भी कर सकें । यही नयी और पुरानी वाचा का अंतर हैं । शैतान ने बहुत से मसीही समुदायों को इस बात से उत्साहित होने से रोका है कि प्रभु यीशु हमारे साथ है और उसने शरीर में जन्म लिया । दूसरी तरफ पवित्रात्मा की सामर्थ प्राप्त करने से भी शैतान रोकता है कि पवित्रात्मा का बाप्तिस्मा नहीं होता । बहुत से लोगों ने फर्जी आत्मा का बाप्तिस्मा प्राप्त किया है । जो उन्हें अपनी लालसाआें से लडने के विरूध्द सामर्थ नहीं देता न ही शैतान का सामना करने की हिम्मत कितना बडा धोखे का काम शैतान ने किया हैं ।

व्यवस्था के अधीन मनुष्य परमेश्वर को खुश करना चाहता है परंतु असफल होता है, अनुग्रह के अपधीन परमेश्वर हमारे अन्दर कार्य करता है कि उसे खुश कर सकें । (फिलि २:१२,१३) जो परमेश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास करते है और असफल होते है । चाहे इमानदार भी हो व्यवस्था के ही अधीन है । उनमें से बहुत थके हुये और बोझ से दबे हुये है ऐसे ही लोगों को यीशु निमंत्रित करता है कि अपने भारी जुये के बदले उसका हलका जुआ ले लें (मत्ती ११:२८-३०) जुआ सहभागिता का चिन्ह है चाहे विवाह में या व्यापार में । यीशु हमे अपनी सहभागिता में बुलाता है । धन वह लगाता है। फायदा हम लेते हैं ।

यह वह विश्राम है जिसमें प्रवेश करने के लिए हमे उत्साहित किया गया है कि हम अपने कामों को बंद करे । (इब्रा ४:१०,११) हमारी खुद की जिन्दगी इतनी बलवान है कि हम अपने कामों का सहारा लेना सरलता से नहीं छोड सकते, इसलिए परमेश्वर ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करता है कि हम तोडे जायें । वह हमारी योजनाआें को हतोत्साहित करता है और हमारी आशाआें को टूटने की स्वीकृति देता है । हमारी योजनाये नष्ट हो जाती है और हम बार बार पाप में गिरते है । इस प्रकार परमेश्वर हमे सिखाता है कि हम अपने कार्यो का सहारा छोडे और उसके कार्यो को करें ।

पुराने नियम का विश्रामवार नयी वाचा के परमेश्वर के लोगों के विश्राम की तस्वीर हैं । (इब्रा ४:९,१०) इसके पहले कि हम अनंत मूल्य का भी कार्य करें । परमेश्वर को यह

जब परमेश्वर ने आदम को छठवे दिन रचा तब उसने आनेवाले दिन को विश्राम के दिन के रूप में पवित्र किया । यद्यपि यह क्रम मे सातवाँ दिन था परंतु आदम के लिए उसका पहला दिन था । व्यवस्था जो दोहजार पाँच सौ साल बाद आई ने कहा कि तू छ दिन तो काम करना वरन सातवे दिन विश्राम करना । परंतु आदम के लिए यह विश्राम और परमेश्वर से सहभागिता के लिए पहला दिन था फिर छे दिन कार्य के लिये थे । यही अनुग्रह हैं । अनुग्रह के अन्तर्गत विश्राम का दिन पहले आता हैं । इसके पहले कि हम परमेश्वर को सेवा करें हमे विश्राम में प्रवेश करना हैं । तब हमारी सांसारिक जिन्दगी के प्रत्येक दिन विश्रांम दिन हो सकते है । और यही परमेश्वर की हमारे लिये इच्छा हैं ।

जब फरीसियों ने प्रभु यीशु से पूछा कि मूसा ने Šयो व्यवस्था के अंतर्गत तालाक की स्वीकृति दी है तब यीशु ने उत्तर दिया कि जब तक मनुष्य का ह्दय कठोर था तब तक के लिये यह अस्थायी व्यवस्था रही (मत्ती १९:८) परंतु यीशु ने यह कहा कि प्रारंभ से यह परमेश्वर की सिध्द इच्छा नहीं थी । व्यवस्था की कई बातों को परमेश्वर ने स्वीकृति दी । परंतु यह उसकी सिध्द इच्छा नही थी । पर अब जब कि नयी वाचा पŠकी हो गयी है परमेश्वर चाहता है कि हम उसकी सिध्द इच्छा के अनुसार जीवन बितायें जैसा कि उसने प्रारंभ से मनुष्य के लिये चाहा । (मत्ती १९:८) इसलिए जैसा आदम के लिए वैसा हमारे लिये यह वह विश्राम है जिसे पहले आना है । जिंदगी को लगातार परमेश्वर के विश्राम मे जीना हैं ।

केवल जब हम इस विश्राम में प्रवेश करते है तब हम खुशीे से ये गवाही दे सकते है कि परमेशव्र की आज्ञाएँ बोझ नहीं है । (१ युहान्ना ५:३) जहाँ परमेश्वर की आज्ञाएँ बोझ समझी जाती है और यह समाचार कि हम अपने स्वत: का इन्कार करे और परमेश्वर की आज्ञाआें को माने, यदि बोझ समझा जाता है तो यह निश्चित है कि वह व्यŠत अभी भी यीशु के साथ जुए में नहीं जुता है । ़वह अभी भी व्यवस्था के अंतर्गत खुद का जुआ उठा कर परिश्रम कर रहा हैं ।

मंदिर के बाहरी भाग और पवित्रस्थान मे भी कई क्रियायें होती है परंतु परदे के पीछे अति पवित्रस्थान में कोई क्रिया नहीं होती केवल सहभागिता होती हैं । परमेश्वर की सेवा भी उसी सहभागिता से बहती हैं ।यही अंतर पुराने नियम की सेवा और नये नियम की सेवकाई में हैं । यह स्पष्टत: मार्था और मरियम के कार्यो के द्वारा प्रदर्शित हैं (लूका १०:३८-४२) संकेत के रूप मे ंमरियम को हम अति पवित्रस्थान अर्थात प्रभु के सहभागिता के विश्राम में पाते हैं । मार्था लगातार बिना विश्राम की सेवा में मानों बाहरी भाग में रहती थी । यीशु ने कहा ' मरियम ने जिस भाग को चुना सबके लिये वही अपेक्षित हैं'

परदा फट चुका है और हम निडर होकर अतिपवित्र स्थान में उपस्थित हो सकते है कि हम जीवन भर पिता परमेश्वर और उनके पूत्र यीशु की सहभागिता मे बने रहें काश हम यह देख सकें कि परमेश्वर मनुष्य से सर्वप्रथम यह चाहता है कि वह उसकी सहभागिता मे रहे न कि कोई सेवा पवित्रशास्त्र का वाचन, उपवास, प्रार्थना इत्यादि मे संलग्न हो ।

परमेश्वर ने आदम को अपने स्वरूप मे रचा इसलिए नहीं कि वह अदन की बारी के लिए बागवान चाहता था । परंतु इसलिए कि वह चाहता था कि कोई उसके साथ मे सहभागिता करें । परमेश्वर ने हमे पाप के कुंड से इसलिए नहीं बचाया कि हम उसकी सेवा करें पर इसलिए कि हम उसकी सहभागिता में रहें । इसी बात की न समझी के बहुत से विश्वासी आज मार्था के समान थके और बोझ से दबे है ।

९५ वर्ष की उम्र मे सुहन्ना ने पवित्रात्मा की प्रेरणा से एक पत्री लिखने की सोची जब कि वह,इसके पहले वह ६५ वर्ष तक परमेश्वर के साथ चला । उसकी पत्री का शीर्षक 'सहभागिता' था ।(१ योहन्ना १:३) उसने कलीसिया और उसके अगुवो को पहले का सा प्रेम को छोडते हुए देखा और जो अब मसीही क्रियाआें में सक्रिय तो थे परंतु वे परमेश्वर की दृष्टि मे मूर्दा थे । (प्रका ३:१) युहन्ना ने यह पाया कि बडी आवश्यकता मसीहियों को परमेश्वर पिता और उसके पुत्र की सहभागिता में ले जाना ही हैं ।

कई क्रियाआें के क्षेत्र में खुशी पायी जा सकती है । कुछ खेलकुद में, कुछ गाने में, कुछ अपने काम में, कुछ मसीही क्रियाआें में । परंतु सबसे अधिक पवित्र आनंद इस दूनिया में परमेश्वर की सहभागिता से ही मिलता हैं । (१ यु १:४) भजनकार कहता है तेरी उपस्थिति में ही आनंद की भरपूरी है (भजन ११:१६) यही वह आनंद या जिसने यीशु को प्रतिदिन अपना क्रूस उठाने की सामर्थ दी । प्रभू यीशु मसीह के लिए सबसे बहूमूल्य इनाम परमेश्वर की संगति थी । उसने इस दुनियाँ में इसकी अपेक्षा और किसी बात में अहमियत नहीं दी । यीशु यह जानता था कि जब वह तीन घंटे तक सहेगा तब क्रूस पर उसका परमेश्वर से संबंध विच्छेद हो गया (मत्ती २७:४७) परमेश्वर उन लम्हों मे उसे छोड देगा, और अनंत बगल से जिस संगति का आनंद उसने उठाया वह तीन घंटे के लिये टूट जायेगी । इस संगति विच्छेद से वह इतना अधिक डरा हुआ था कि गेतसमरी मे उसका पसीना लोहू की बूंद की तरह निकला । जिस प्याले को हटा लेने के लिए उसने प्रार्थना की थी वह यही है । परमेश्वर की संगति का टूट जाना ।

यदि हम उपरोŠत बातों को समझे और उसके द्वारा कायल हो तब हम जानेंगे कि कैसे हम बडी इलकी तरह परमेश्वर के पीछे हो लेन और गाने की बात कहते हैं । यीशु के पीछे चलना अर्थात परमेश्वर की संगति की वही मान देना जैसा कि उसने दिया । बाप तक हमारे लिए अति पापमय हा जाएगा । Šयोंकि यह परमेश्वर से हमारी संगति को तोडता हैं और तब दूसरे के प्रति प्रेमरहित व्यवहार को हम सहन नही करेंगे Šयोंकि पिता से यह हमारी संगति का तोड देगा ।

काश प्रभू हमे यह प्रकाशन दे कि हम यह जान सके कि सच्ची मसीहियत प्रेमी स्वर्गीय पिता के साथ अटूटसंगतिमय जीवन हैं ।

अध्याय 7
प्रभू यीशु -हमारे समान परीक्षा मे पडा

धार्मिक जीवन जीने का रहस्य प्रभु यीशु मसीह में है जो इस संसार मे मनुष्य बन कर रहा । हर प्रकार से वह हमारे समान परीक्षा मे पडा । परन्तु विचार में शब्दों में, कार्यो मे स्वभाव और उद्देश्यों में वह अन्य किसी भी तरह कभी पाप मे नहीं पडा (१ तिमो ३:१६ इब्रा ४:१५)

चूंकि केवल वे लोग जो धार्मिक जीवन जीते हैं वे दूसरों के साथ बिना लडाईझगडे के प्रभू की देह हो कर एक मत रहते हैं । दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते है कि कलीसिया प्रभु की देह तब है जब विश्वासी प्रभू यीशू को इस प्रकार प्रगट करते है यहीं वह सत्य हैं जिसे कलीसिया का थामना है (तिमो ३:१५,१६)

याकूब १:१४,१५ स्पष्ट करता है कि परीक्षा में पडना पाप नहीं है, हमारे मन को पाप करने के पहले परीक्षा को स्वीकृति देनी होती है । प्रभू यीशु भी परीक्षा मे पडा परन्तु उसके मन ने कभी भी परीक्षा को स्वीकृति नहीं दी, इसलिए उसने कभी पाप नहीं किया और उसने ह्दय को शुध्द रखा ।

यीशु पवित्रात्मा से उत्पन्न हुआ उसमे वह पुराना मनुष्यत्व नहीं था जो हम मे रहता हैं । हमारी देह पाप मरा है जब कि यीशु की नहीं । वह केवल हमारी पापमय देह के सदृश्य था । (रोमि : ८:३) हमे इस बात पर केवल विश्वास करना हैं । हर बिन्दु पर, हर परीक्षा में यीशु ने पिता की आज्ञा मानी जब कि आदम ने नहीं मानी ।

परमेश्वर का वचन यीशु मसीह के विषय कहता है,

' उसने आज्ञा मानना सीखा और सिध्द बना' (इब्रा ५:७:९)

शब्द सीखना शिक्षा प्राप्त करने से संबंधित है । अत: यीशु ने मनुष्य की तरह आज्ञा पालन प्राप्त करने की शिक्षा प्राप्त की । इस प्रकार वह पहलौठा बना, उसके पद चिन्होंपर चल कर हम भी परीक्षा में विजय प्राप्त करे और परमेश्वर की आज्ञा माने । (इब्रा ६:२०)

जब हम परीक्षा के विरूध्द संघर्ष करते है तब प्रभु यीशु हम से सहानुभूती रखता है Šयोंकि वह भी हमारे ही समान परीक्षा मे पडा । (इब्रा २:१८, ४:१५, १२:२-४)

यीशु मनुष्य हो कर शुध्द रहा और यह उसने पाप से लडाई कर प्राप्त किया और ये लडाई अंतहीन थी । प्रभु के जीवन काल में हर परीक्षा पर उसने वियज पायी ।

हम सब भी बहुत सालों से पाप मे रहें पर हमारी पापमय देह उस बŠसे के समान है जिसके अन्दर हमने जहरीले सर्प पाल रखें है । इन सर्पो के नाम है अशुध्दता, क्रोध, जलन, झगडे, कडुवाहट, पैसे का लोभ, स्वार्थ, अहं इत्यादि । जब भी हम परीक्षा में पडते हैं तब ये सर्प बŠसे के ऊपरी छिद्र से अपना मुंह निकालते हैं । अपने अविश्वासी काल में हमने इन्हें भरपेट खिलाया है इसलिए यह स्वास्थ्य और मजबूत हैं इनमें से कुछ पर हम ज्यादा मेहरबान रहे और इसलिए उन लालसाआें ने हमे मजबूती से जकड लिया हैं ।

अब जब कि हम मसीह की तरह इन पापों के प्रति भर गये तो हम अब दिव्य स्वभाव के भागी है । यद्यपि ये सर्प अभी भी हट्‌टे कट्‌टे है परंतु इनके प्रति हमारा स्वभाव बदल गया है । जैसा गला ५:२४ मे लिखा है । ' जो मसीह यीशु के है, उन्होंने शरीर को उसकी लालसाआें और अभिलाषाआें सहित क्रूस पर चढा दियाहैं' । पुराने दिनोंके विपरीत जब ये सर्प अपना सिर उठाते है तो हम इन्हें मार कर और उनका पोषण न कर उन्हे कमजोर बनाते जाते है । यदि हर परीक्षा में हम इमानदारी से इनके सिर पर घात करें और उनका पोषण न करें तो हम परीक्षा के खिंचाव को कम करते जाते हैं ।पुराने मनुष्यत्व को न तों एकदम गोली मारी जा सकती है न ही फॉसी पर लटकाया जा सकता है । उसे सूली पर ही लटकाया जा सकता है । सूली पर लटकाने से मृत्यु धीरें आती हैं पर निश्चित होती है । इसलिए जब हम परीक्षा में पडते है तो इसे आनंद की बात समझते हैं (याकुब १:२) Šयोंकि परीक्षा में पडना हमे यह मौका देता है कि उन सर्पो को मारे और कमजोर करें अन्य प्रकार से ये संभव नहीं हैं ।

कुविचारों की बात में यदि हमने इस सर्प को बीते वर्षो में पाल रखा हैं तो इसकी मौत भी निश्चित हैं Šयोंकि हम उपरोŠत प्रक्रिया के प्रति इमानदार है । परिणामस्वरूप हमारे स्वप्न और दर्शन शुध्द हो जाते हैं । बुरे स्वप्न आना अपवाद होगा । यदि अभी भी बुरे स्वप्नों की आवृत्ति बढती ळे तो एक बात का संकेत है कि हम उपरोŠत प्रतिक्रिया के प्रति ईमानदार नहीं हैं । बुरे स्वप्न अचेतन पाप कहलाते है और इसलिए इनके प्रति हमे अपने को दोषी नहीं मानना हैं । (रोमि ७: शु ८:१) १ योहन्ना १:७ बतलाता है यदि हम ज्योति में चलें तो मसीह का लोहू इन पापों से हमे शुध्द करता हैं ।

सच्ची ईमानदारी ही पूर्ण विजय प्राप्ती को लाती हैं । इस सच्ची इमानदारी का यह तकाजा है कि हम विपरीत लिंग सुन्दर चेहरे पर भी मोहित न हो । यद्यपि कोई यौन विचार इससे संबंधित न हो (जीति ६:२५)

चेतन अवस्था में जो हम सोचते है वह अवचेतन को प्रभावित करता है अत: परीक्षा के प्रति हमारी जो प्रतिक्रिया होती है वह महत्त्वपूर्ण हैं । यदि अचेतन को हम यह संदेश देते है कि हम पाप से घृणा करते हैं और यह कि हम परमेश्वर के मुरत को देखते हुये जी रहे हैं तो अचेतन भी शुध्दता की चाह करने लगता हैं । (भजन ५१:१) महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि लोग, मेरी शुध्दता के प्रति Šया सोचते हैं पर यह है कि में अपने अवचेतन जन को Šया संदेश देता हूँ । तुम्हारे स्वप्न ही इसका उत्तर देंगे ।

जो पूर्ण शुध्दता के खोज में नहीं है वे नही समझ सकते कि हम यहॉ Šया कह रहे हैं जो अपने बुरे सपनों को हलके से लेते हैं वे यह महसूस नहीं कर सकते कि यह चेतनमन के वैचारिक जीवन में खरे न उतरने का संकेत है वे इन बातों को अति अवास्तविक समझेंगे । Šयोंकि आत्मिक बाते प्राकृतिक मन के लिये मूर्खता हैं

सुसन्दश यह है कि चाहे हमारे विचार कितने भी मैले हो वे पूर्णतया शुध्द हो सकते है यदि हम वैसी चाल चले जैसा प्रभु यीशु चला । अति बलवान सर्प को भी पूर्ण इमानदारी के जरिये मृत्यु दी जा सकती हैं ।

यीशुने केवल उनको आमंत्रित किया जो बोझ से दबे हुये थे उसके पास आयें । अत: जब तुम बिमार हो और अपने हो हुए जीवन से थके हो तब तुम विजय प्राप्त करने के लिए प्रभु के पास आने के लायक है । कुछ मसीही अपने सम्प्रदाय में समझौते और संसारिकता को देख कर बिमार और थके हुए हैं पर यह विजय पाने की योग्यता नहीं है । केवल वे जो अपने खुद के जीवन से बिमार और थके हुये है उन्हें प्रभु के पास आने का निमंत्रण हैं ।

केवल वे जो विजय प्राप्त करने के प्यासे है । वे प्रभु के पास आ सकते है । (मत्ती ११:२८) युहनना ७:३७ जो अपने वैचारिक जीवन में चूंक के लिए रोते है और अपने गुप्त पापों के लिए दु:खी होते है वे परमेश्वर की सच्चाई की जल्द समझते है जब कि दूसरों के लिये ये ढकोसलापन है । परमेश्वर अपने गुप्त भेदों को उनपर प्रगट करता है जो उस से भय खाते है (भजन २५:१४) जिस विश्राम की प्रभु ने प्रतिज्ञा की वह पाप पर विजय प्राप्त करने की हैं।

इब्रा ४ मे इस विभाग को कनान देश पर अधिकार करने के तूल्य बताया गया हैं । दैत्याकार लोगों को एक एक कर के लम्बे समय के दौरान मारा गया (निर्ग ३३:२९) जो देख ईश्वर के लिए जीते गये उन में विश्राम और शांति आयी कनान के ये दैत्य हमारी शारीरिक लालसाआें के सदृष्य हैं । ये दैतय चेतन अवस्था में किये गये पाप को दर्शाते है जो दैत्य उस जमीन की गुफाओ में छिपे थे वे अवचेतन पाप के सदृष्य हैं ।

इब्रा ४ सब्त के विश्राम को बतलाता है जो परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए तैय्यार किया । छै दिन के परिश्रम के बाद वे परमेश्वर के इस विश्राम में प्रवेश कर सकते थें । छ: दिन तक अपने बलबूते पर संघर्ष करने के लिये परमेश्वर अनुमति देता हैं कि हम हर बार असफल हो और जब हम अपनी योग्यताआें पर विश्वास करना छोड देते हैं तब हम परमेश्वर के सब्त के विश्राम में प्रवेश करते हैं । वह जीवन पवित्रात्मा की सामर्थ से भरा हैं । स्वत: की कोशिश से हम अपने पापी ह्दय को पवित्र नहीं बना सकते, केवल पवित्र आत्मा ही यह कर सकता है कि वह हमे आत्म्कि स्वभाव का सहभागी बनाए । हमे सब्त के विश्राम मे अपने जीवन काल तक रह सकते है यदि हम विश्वासी रहें । यदि हम अविश्वासी हों तो हम संघर्षमय परिश्रम में लौट जाते है ।

यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है कि वह एक खास पाप के लिए जीवनभर संघर्ष करते रहें । परमेश्वर चाहताहै कि कनान के हर दैत्य मार डाले जावे । अपनी शारीरिक और आत्मिक उन्नति के हर पग में हमारी नयी नयी तरह से परीक्षा होती हैं । एक चार वर्ष का बच्चा क्रोध की परीक्षा मे पडता हैं न कि यौन परीक्षा में । यौन परीक्षा बाद में अर्थात किशोर अवस्था में आती हैं । परमेश्वर नहीं चाहता की सालो साल हम यौन परीक्षा में हार जाएँ । यह आशा रखते हुए कि कभी तो विजयी होंगे । पूरे लगन से एकदम विजय प्राप्त होती हैं ।

रोमियो ६ मे विजयी जीवन के इस क्रम को बताया गया है । यह जानते हुए कि हम मसीह के साथ क्रूस पर चढाए गये हम अपने आप को पाप के लिए मृत मानते है और अपने अंगो को परमेश्वर की धार्मिकता और आज्ञा पालन के लिए सौंपते हैं । इसका फल उत्तरोत्तर पवित्रता प्राप्त करना हैं । अंतिम फल अनंत जीवन जिसे आत्मिक स्वभाव भी कहा जा सकता हैं अत: हमारा अंतिम उद्देश्य इस आत्मिक स्वभाव को प्राप्त करना हैं परंतु ये तभी प्रारंभ होता है । जब हम मान लें कि हम यीशु के साथ क्रूस पर चढाए गए और आगे को पाप के प्रति मृत हैं ।

यीशु के जीवन मे यह कैसा था ? वह हमारे तरह परीक्षाआें मे पडा परंतु वह एकही परीखा से लगातार लडता नहीं रहा । वह हमारी तरह यौन परीक्षा में भी पडा होगा परंतु अपनी किशोर अवस्था में उसने इस पर जय पायी और इसलिए जब वह सुसमाचार प्रचार में लगा तो इस परीक्षा में नहीं पडा । स्त्रियों ने उसके पैर को पोछा, धोये परंतु वह परीक्षा में नहीं पडा । जो लोग इस क्षेत्र की परीक्षा से लडने के लिए इमानदार नहीं रहे। वे इस बात को नहीं समझ सकते ।

जब शैतान ने चालीस दिनों तक यीशु को कठिन परीक्षा में डाला तो वह अच्छी तरह जानता था कि पैसे और यौन के क्षेत्र में उसकी परीक्षा लेना बेकार है Šयोंकि यीशु ने पहले ही इस पर विजय प्राप्त कर ली थी । मे जो तीन परीक्षाएँ ली गयीं, उनकी पेची दगियों को हम तभी समझ सकते है जब हम यीशु की तरह जीवन बिते ।

परीक्षाआें पर विजय प्राप्त करने की शाला अन्य शालाएँ की तरह हम सब को किन्डर गार्डन से प्रारंभ करना होता हैं । प्रभु यीशु को भी प्रारंभिक परीक्षाआें का सामना करना पडा परंतु उसने किसी भी कक्षा में जरूरत से ज्यादा समय नहीं बिताया । जब वह ३३ वर्ष को उम्र में मरा तो वह कह सका 'पूरा हुआ' हर एक परीक्षाआें में वह विजयी हुआ । शाला की हर परीक्षा में उसने सफलता पायी । वह सिध्द बना । मनुष्य के रूप में उसकी शिक्षा पूरी हुयी ( इब्रा ५:८,९)

यह व्यŠत जो किडरगार्डन की परीक्षा में (यौने, कुविचार, क्रोध, झूठ बोलना आदि) में असफल रहता है । उसके लिए उन परीक्षाआें का सामना जिसे यीशु ने पीएचडी कक्षा में किया। असंभव और हंसी का पात्र बनता है यदि तुम इस लडाई के प्रति ईमानदार हो तभी इसे समझ सकते हों । (युहन्ना ७:१७) यदि इन परीक्षाआें के क्षणों मे तुम अविश्वासी रहे तो चाहे तुम कितनी भी पुस्तके पढ लो कितने भी टेप सुन लो, इस विषय को नही समझ सकते । परमेश्वर के रहस्यों को परमेश्वर के मुँह से बोल गए शब्दों के द्वारा ही समझा जा सकता हैं ।

कई लोग सिखाते है कि यद्यपि यीशु ने पाप में नहीं पडा । परंतु वह पापमय देह में आया और उसकी देह में पाप था यह गलत शिक्षा हैं । पापमय देह के साथ काई भी परमेश्वर के सामने खडा नहीं रह सकता Šयोंकि परमेश्वर इतना पवित्र है कि वह पाप को देख नहीं सकता । यदि यीशु की देह में पाप होता तो पृथ्वी के जीवन के एक भी दिन वह परमेश्वर की संगति में नहीं रह सकतायही इस बात का प्रमाण है कि देह निष्पाप थी । यही कारण है कि यद्यपि हमारी देह में पाप हैं हम परमेश्वर से इसलिऐ संगति कर पाते है जब हम प्रभू यीशु की धार्मिकता को ओढ लेते हैं

कुछ दूसरे यह सिखाते है कि यीशु ने अवचेतन में पाप किया होगा, यह भी गलत विश्वास हैं । पुरानी वाचा के अंतर्गत अवचेतन पाप के प्रति मनुष्य जब जानकार होता था उसे बली चढाकर दोषमुŠत किया जाता था,उसके लिए बली चढायी जाती थी ।(लैव्य ४:२, १३, २७,२८) तो अवचेतन पाप की भी दोषमुŠत थी । नयी वाचा के अंतर्गत अवचेतन पापों से शुध्दि भी उसी वŠत यीशु के लोहू से होती हैं (१ युहन्ना १:७)

अचेतन पाप तब पैदा होता है जब हम बहुत वर्षो तक स्वार्थ और अहं में जीते हैं

यीशु एक क्षण भी इस प्रकार नही जिया । यीशु की चेतन अवस्था या अचेतन अवस्था की जिन्दगी में कोई पाप नहीं पाया गया ।

हम मे अचेतन पाप पाया जाता है Šयोंकि हमारे भूतकाल के कार्यो के कारण हमारी आत्मा में स्वार्थ राज्य करता है परंतु अब पवित्रात्मा हमारी इस विकृत आत्मा को सही बनाती हैं ।

उन्हें जिन्होंने पाप पर विजय प्राप्त की है उन्हे इस मामले में होशियार और इमानदार होना चाहिए । विजय प्राप्त कई ऐसे लोग है जो अपने व्यवहार और बोली की कई गलतियों को शरीर के कार्य कहते हैं परंतु यदि वे आकलन करें तो पाएँगे इसके पीछे दुर्भावना और स्वार्थ हैं । शैतान उन्हें बहकाता है Šयोंकि वे अपने सवत: की सच्चाई से अनिभिज्ञ रहते हैं । रथिस २:१० यद्यपि वे बाहरी रूप से धार्मि दिखते हैं और कलीसिया मे अच्छी गवाही देते है लेकिन उनकी जिन्दगी से प्रकाश प्रज्वलित नही होता । Šयोंकि वे सदैव अपने कार्यो का बहाना ढूंढ लेते हैं (नीति ४:१२) हमे टूटे मन और ईमानदारी की जिन्दगी बिताना है अन्यथा हमारा भी यही हश्र होगा ।

परमेश्वर की मांग यह नही है कि हम यीशु के समान हो जाएँ वह जानता है कि यह असंभव है । प्रभू जब आएगा तब हम उसके समान होंगे । आज परमेश्वर की मांग है कि हम यीशु की तरह चले (तुलना करें । युहन्ना २:६ से ३:२) चलना एक चेतन क्रिया है और चेतन जीवन मे ही हम यीशु के पीछे चल सकते हैं ।

सुसमाचार यह हैं कि यीशु मनुष्य बन कर हर क्षेत्र की परीक्षाआें पर विजयी हुआ अतएव हम भी ऐसा कर सकते है (प्रका वा ३:२१)

इस महान सुसमाचार के लिए ईश्वर का धन्यवाद ।

अध्याय 8
सच्ची आत्मिकता - परमेश्वर की चाहत को खोजना

मुझे डर है कि जैसे साँप ने चतुराई से हवा को बहकाया था । लोग जो यीशु की सरलता और शुध्दता से अराधना करते है उनके मन को भी वह बहका न दें । Šयोंकि शैतान प्रकाश में स्वर्गदूत का रूप धारण करता है और उसके सेवक धार्मिकता का (२ Šलू ।। : ३,१४, १५)

इसरायल धर्म की व्यवस्था पर चलते हुऐ भी व्यवस्था को पूरी न कर सके (रोमि ११:३१)

इस््रयााल मे फरीसी भी धार्मिकता के पीछे चलते हुए भी शैतान के द्वारा बहका दिए गये । यह हमारे लिए अभिमान की बात होगी कि हम सोंचे कि हम धोखा नहीं खा सकते । इस धोखेक से हमारी सुरक्षा तभी हो सकती है जब हम प्रकाश में चलें और परमेश्वर के वचन की सच्चाई से प्यार करें और यीशु मसीह के जीवन पर ध्यान करें । (रथिस २:१०,११)

अकेली ईमानदारी इस धोखे से हमे बचा नहींसकती यदि हम परमेश्वर के वचन को अपना मार्गदर्शक नहीं बनाते । पतरस ईमानदार था परंतु उसने शैतान की ओर से मुंह खोल कर यीशु मसीह को गलत सलाह दी । (मत्ती १६:२१-२३) जब यीशु ने पहली बार क्रूस के विषय बतलाया तो वे नहीं समझ सके कि यही परमेश्वर की मनसा हैं । वे पुराने नियम के इस समाचार से वाकिफ थे जिसमे परमेश्वर के लोंगो को यह सांतवना दी गयी है कि उन्हें सम्पति, स्वास्थ्य, कई बच्चे और अन्य पार्थिव आशीषें प्राप्त होगी । दु:ख उठाना या मरना पुराने नियम के समाचार के विपरीत था ।

पुराना नियम में व्यŠतगत आशीषों और पार्थिव संपत्ति को प्राप्त करना उसके केन्द्र में था । नया नियम का समाचार परमेश्वर के उद्देश्य पूर्ति और आत्मिक चीजों में केन्द्रीत हैं । जब युहन्ना बाप्तिस्मा देनेवाला आया कि मार्ग तैय्यार करे तो उसका संदेश था कि पश्चाताप करों Šयों कि स्वर्ग का राज्य निकट हैं । मत्ती ३:२ मर १:१४, १५) यीशु ने कहा युहन्ना बाप्तिस्मा देनेवाले के बाद स्वर्ग का राज्य और परमेश्वर का प्रचार हो रहा हैं (मत्ती ११:१२ लूका १६:१६) परंतु उसने यह भी कहा, मनुष्यों को लडकर इसमे प्रवेश पाना होगा । शरीर के प्रति प्यार, संसारिक सुख, आदर, राहलियत, धन इत्यादि हमारे शरीर में गहराई में समा गये इसलिए हमे इनसे लडकर छुटकारा पाना है ताकि परमेश्वर के राज्य को प्राप्त कर सकें ।

जब पतरस ने यीशु को सहुलियत वाला रास्ता सुझाया, तो यीशु ने उसे डाँट कर कहा, (मत्ती १६:२३) ' हे शैतान मेरे सामने से दूर हो । तू मेरे लिए ठोकर का कारण है Šयों कि तू परमेश्वर की नहीं मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है' । जब हम अपने भले की सोचते है तो हम परमेश्वर के राज्य के लिए ठोकर का कारण बनते है और तब शैतान हमे भटका देता ।

उध्दार पाने का मर्म यह है कि हम अपनी ही इच्छा पूरी करने से बचाए जाएँ । लूसीफर ने अपने स्वयंपर ध्यान दिया और विश्व में पाप आया । यीशु ने अपने लिए नहीं सोचा और उध्दार को लाया । वह धार्मिकता जिसमे मनुष्य अपने स्वयं पर ध्यान देता है तो वह फर्जी धार्मिकता हैं । यद्यपि हम यही धार्मिकता कई समुदाय में देखते है जो पवित्रता का दावा करते हैं । मनुष्य वास्तव में एक व्यवसायिक प्राणी है जो कम से कम मेहनत से स्वर्ग की अच्छी से अच्छी बाते पा लेना चाहता है और इसलिए सहुलियत का धर्म सिध्दांत की खोज करता हैं । उसके आराम और भलाई में दाखल न हो ।

यह संभव है कि कोई क्रोध, यौन, पाप, कटुता, पर विजय प्राप्त कर ले तो भी अपने भलाई की खोज करेगा । अर्थात अपने सुख सहुलियत एवं अपनी पत्नि के सुख सहुलियत पर ध्यान दें । कुर ७:३३ मे लिखा है ' परन्तु विवाहित मनुष्य संसार की बातों की चिंता में रहता है कि अपनी पत्नि को किस रीति से प्रसन्न रखे' इसके सिवाय वह कलीसिया में आदर पाने और अपने कार्य क्षेत्र मेें अपना उन्नति की चाह रखता हैं ।

यह संभव है कि विश्वास मे रहा जाये और परमेशव्रत्व के रहस्य को समझा जाए । परंतु फिर भी बुराई के रहस्य को न समझ पाएँ ।

बुराई का रहस्य यह है अपने स्वत: की भलाई की चाह रखना यह हमारे शरीर की सबसे ज्यादा धोखा देने वाली इच्छा है । कोई अपने को सबही पापों पर विजय प्राप्त कर आत्मिक मान सकता हैं । जब कि उसके निष्कर्ष और कार्यो में उसको 'स्वयं' प्रबल होता हैं । यही शैतान का वह धोखा है जो धार्मिकता का सेवक बन कर करता है और यही बुराई का रहस्य हैं ।

हमारे जमाने में पवित्रशास्त्र के ज्ञान की कमी नहीं हैं । वास्तव में कई बुध्दिमान लोग नयी वाचा के सिध्दांतो को पौलूस की अपेक्षा ज्यादा अच्छी तरह से पेश करने का दावा करते हैं । तो भी यह दिखता है कि उनकी जिंदगी पौलूस से कोसों दूर रहती हैं जब कि पौलूस स्वयं की खोज से मुŠत हो गया था ।

वह एक बात जो ईश्वर के भŠत की पहचान बतलाती है वह यह नहीं कि उसका सिध्दांत Šया है ? पर यह कि वह अपने स्व: की खोज में नही रहता । फिलि २:१९-२१ मे पौलुस कहता है कि उसके कुछ सहयोगी अपने खुदी की खोज में लगे रहे इसलिए वह उन्हें फिलिप्पी नहीं भेज सकता । तिमोथी जब कि एक अच्छा अपवाद था । पॉल के सहयोगी के सिध्दांत बिलकुल सही थे फिर भी उन्होंने खुदी की खोज की । पौलूस उनकी धार्मिकता में गिरावट को देख सका । आज भी यही स्थिति हैं ।

परमेश्वर के अनेक बडे सच्चे सिपाहियों में मसीही इतिहास के दौरान जो एक चीज समान हैं । वह यह है कि उन्होंने अपने स्वत: को अहमियत नहीं दी । उनमें से कुछ मे सत्य की सही जानकारी न भी हो जो आज हम में है परंतु उनके जमाने में जो भी प्रकाश उन्हें प्राप्त हुआ उसके आधार पर उनकी आत्मिकता यह थी कि स्वार्थ रहित हो कर उन्होंने परमेश्वर के राज्य को खोजा ।

यदि आज हमारे पास पवित्र शास्त्र की सच्चाईयाँ के प्रति ज्यादा प्रकाश है तो हम से ज्यादा लेखा भी लिया जायेगा । अत: हम खतरे में है यदि हम सोचते है कि हमारी धार्मिकता, क्रोध, यौन पाप, इत्यादि पर विजय पाने में ही हैं । दूसरे धमा] के उपासकों ने भी इन पापों पर विजय प्राप्त की हैं । एक कोई उसे क्रोधित कर सके । यह यीशु की धार्मिकता नहीं हैं । यह केवल अपने को वश में करना हैं । कई साधू भी यह दावा करते है कि उन्हें पार्थिव चीजों से कोई लगाव नहीं है वे कई विश्वासियों को भी शर्मिंदा कर सकते हैं ।

हम शरीर के इन सब पापों को उन पलश्तियों में देख सकते है जो अपने कप्तान गोलियत के साथ इस्राएलियों के विरूध्द खडे थे । गोलियत खूद भी अपने स्वत: की खोज करनेवाला व्यŠत था । जब दाउद ने गोलियत को मारा तो सब पलश्ती भाग गये (१ सामु १७:५१) यही रहस्य हैं । स्वत: की खोज करनेवाले 'दैत्य को मारना प्रमुख है यदि हम सही विजय जीतना चाहते है तो । अन्य पापों पर स्वत: विजय प्राप्त हो जायेगी ।

यीशु आया कि पेड की जड पर कुल्हाडी रखे । पेड के फल कई है झूठ बोलना, चोरी करना, लालच, क्रोध कटुता इत्यादि । इनकी जड है 'स्वत: की खोज' जिस पर कुल्हाडी पडना अवश्य है अन्यथा हम धोखे में रहेंगे ।

यह सोचना संमत है कि हम पवित्रता मे तल रहे हैं । यह जानकर कि हम कभी क्रोधित नहीं होते और हम कुछ धार्मिक भाषा में बोलते है । परंतु फिर भी हम अपने मन समय और उर्जा को अपने घर के लिए पार्थिव चीजें इकट्‌टा करने में लगाते है ताकि हमारी पत्नी खुश रहे । हमारे बच्चे खुश रहें और हम एक सुखमय मत्यय दर्जे का जीवन बिता सकें । इस प्रकार जी कर सोचना कि हम पवित्रता की उँचाईयाँ प्राप्त कर रहें है । एक धोखा है ।

पौलुस को डर था कि कुरून्थ के लोग यीशु की उपासना से भटक न जाएँ । हमारे लिए भी खतरा है कि पत्नी के प्रति हमारा लगाव, यीशु के लगाव से ज्यादा न हो । पहली आज्ञा यह नहीं है कि अपने पडोसी से अपने समान प्रेम रखे परंतु यह है कि अपने परमेश्वर को अपने सारे ह्दय, आत्मा, बल और बुध्दि से प्रेम करों । जब हम परमेश्वर से प्यार करेंगे तो अपने पडोसी से भी प्यार करेंगे ।

मसीही जो धार्मिकता की खोज में है एक झूलते हुए पेंडुलम के समान है जो एक सिरे पर पहुँच कर अपनी गलती महसूस कर दूसरे सिरे पर पहुँच जाता हैं । सकरे मार्ग की ये दो पहाडियाँ हैं । शैतान चाहता है किसी भी इन पहाडियों पर हम गिर जाएँ ।

परंतु हम पवित्रात्मा की सेवकाई के लिए परमेश्वर का धन्यवाद देते है । यदि हम परमेश्वर के मार्ग से भटक जाते तो हमे एक आवाज सुनाई देती है 'नही' रास्ता यह है । 'इसपर चलो' (यशा ३०:२१) कलीसिया में भविष्यवाणी की सेवकाई का यही उद्देश्य है कि आवाज हमे सुनाई दे जो हमे सकरे मार्ग के मध्य में रखें । यह सेवकाई और परमेश्वर का वचन जरिया है जो जीवन के सकरे पथ के मध्य मे हमे रखता हैं ।

अपने घरेलु जीवन का तिरिस्कार कर बाहरी क्रियाआें मे लगने की गलती स्वीकार करने के बाद हम दूसरी अति में पहुँच जाते है कि हमारी मसीहियत अपनी पत्नि अपने बच्चों और अमसीहियों जो हमारी भाषा बोलते हो उनसे प्यार करने लगे । हमे अवश्य अपने परिवार अपने चर्च सदस्यों से प्रेम करना है और साथ में अपने व्यŠतगत पापों पर विजय प्राप्त करना हैं । परंतु हमारी यीशु के प्रति भŠत उसके राज्य की खोज में (चाहे कितना भी व्यŠतगत बलिदान देना हो) प्रकट होना चाहिए । आंतरिक शुध्दि व बाहय बलिदान एक दूसरे से अलग नहीं Šयोंं कि प्रभु यीशु के जीवन में दोनो थे ।

प्रेरित पौलुस तरसुस में एक मसीही व्यवसायी के रूप में सुखमय मसीही जीवन पवित्र जीवन जी सकता था परंतु उसने ऐसा नहीं किया । मसीह के प्रति भŠत ने उसे प्रेरित किया कि वह अपने प्रभू को सब कुछ अर्पण कर दे ।

आज से दो सौ वर्ष दो मोरेवियन भाईयों को वेस्ट इन्डीज के द्वीप मे गुलामों की बस्ती का पता चला । तो वे भी अपने को गुलामों की तरह उनके बीच पहुँच गए कि उन्हे सुसमाचार का संदेश दे । अन्य दो लोगों ने आफ्रिका में कोढियों की बस्ती के विषय सुना कि वहाँ किसी को प्रवेश नहीं दिया जाता न ही बाहर आने दिया जाता । इस डर से कि बिमारी अन्यत्र न फेैले । वे स्वेच्छा से पूरी जिन्दगी बिताने उस कॉलनी में गये कि उन लोगों पर यीशु को प्रगट कर सकें ।

मै इन उपरोŠत लोगों के सिध्दांत की बारीकियाँ नहीं जानता परंतु इतना निश्चित है कि उन्हों ने अपने स्वत: का इंकार कर खुद को प्रभु को सौंप दिया और अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया ।

हमारे छोटे छोटे स्वइकर इन लोगों के कार्य के आगे नगण्य है । अनंत जीवन में जब हम उनसे मिलेंगे तो पाएँगे कि ऐसे ही पुरूष स्त्रियों से मिल कर प्रभु की दुल्हन बनी हैं । ये वे लोग है जिनका स्वभाव यीशु की तरह है अपने 'स्वयं' का इन्कार करना । सिध्दांतो की जानकारी हमे प्रभु की दुल्हन नहीं बनाती । या तो ऐसा जीवन जीना है जो प्रभु की चाहत को प्राथमिकता दे न कि अपने अपनी स्वत: की चाहत ।

उपरोŠत महानुभावों की तुलना में हमारी जिंदगी और परिश्रम यह कितने बडे अहंमकी बात है, हमारा जीवन और परिश्रम कितना उथला है । कितने बडे अहम्‌ की बात है । हमारा यह सोचना हम इन मनुष्यों से अधिक अच्छा प्रभु यीशु के अनुयायी हैं । केवल इसलिए कि हम अधिक सच्चाई के ज्ञात है । परमेश्वर की सेवा करने में हमने कितना खोया है । निम्न बातों मे पैसा, आराम , सहुलियत, स्वास्थ्य, शायद बहुत कम या नही के बराबर । ये बाते हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम नम्र बने । शायद हमने सरलता से समर्पित जीवन जीने में सरलता से मुॅह मोडा हैं ।

हर एक मसीही जो अंग्रेजी समझता है उन्हे निम्न लोगों की आत्म कथा पढ कर चुनौती प्राप्त करना चाहिए । ये मनुष्य है हडसन टेलर, सीटी स्टॅण्ड, डेविड ब्रेनर्ड, विलियम कैरी, विलियम बूथ, जिम एलियर इत्यादि । पवित्रात्मा हमारे विश्वास को बढाने के लिए इब्रा ।। और २क्रूर ।। मे कई लोगों का उदाहरण पेश करते है । और आज के महानुभवों का उदाहरण भी हमे चुनौती देता है कि हमे अपनी आत्मकेन्द्रित, घरानाकेंन्द्रित आराम तलब जीवन पार्थिव मसीहियत को छोडकर यीशु की भŠत की जिंदगी जिएँ ।

यीशु मसीह के समय में कुछ लोग धर्म के नाम पर भेड और कबूतरों को पैसो के बदले मंदिर में बेंचते थे । यीशु ने उन्हें भगा दिया । ईश्वरत्व उनके लिये फायदे का जरिया बन गया । जब कभी हमारे लिए भी ईश्वरत्व नाम का जरिया बन जाता है जैसे पैसा कमाना, आराम, सुस्ती इत्यादि तो हमे यह निश्चित हो जाना चाहिए कि हम गलत पथ पर है । यद्यपि हम मन मे सोंचे कि हम धार्मिकता का पीछा कर रहे है । प्रभु यीशु के लिए ईश्वरत्व का अर्थ उन सब चीजों का त्याग करना है जिसे संसार बहमूल्य समझता है । यदि हम संपूर्ण ह्दय से प्रभु की राह चले तो हमे भी त्याग करना पडेगा (मत्ती १९:२९)

यीशु ने कहा कि बहमूल्य मोती प्राप्त करने के लिए हमे अपना सब कुछ देना पडेगा (मत्ती १३:४६ लूका १४:३३) यीशु को प्राप्त करने के लिए पौलूस ने भी अपना सब कुछ दिया (फिलि ३:८) यदि बिना इस त्याग के हम प्रभु को प्राप्त करने में सफल हो गये हैं । तो अवश्य ही यह कोई दूसरा मसीह हैं । कुरन्थ के मसीहियाँ के लिए पौलूस को यही डर था कहीं वे दूसरे मसीह को प्राप्त न कर ले जो उनका सब कुछ त्यागने की मांग नहीं करता (२Šलू ११:४) हम भी अपने को धोखा दे सकते है इस त्यागने की ऐसी धामिक परिभाषा करके जिसमें हमे वास्तव में कुछ भी त्यागना न पडे यदि हम इस मामले में सच्चाई का सामना नहीं कर सकते तो हम धोखे की आत्मा के द्वारा बहकाए जा सकते है । परमेश्वर स्वयं ही हमे बहकने के लिए छोड देगा ।

केवल परमेश्वर के भŠतों की सराहना करना ही हमे आत्मिक नहीं बनाता । बहुत से लोग यीशु की सराहना करते थे परन्तु वे आत्मिक नहीं बने । बहुत से लोग उस पर विश्वास भी करते है पर यीशु उन्हें नहीं जानता है । (युहन्ना २:२४, २५) Šयों कि वह जानता है कि किसका ह्दय शुध्द है वह यह बात आज भी जानता है।

हम यहाँ वहाँ छीटे फ्लश्तियों को मारकर बडाई न मारें जब कि गोलियत सीधा ऊँचा खडा हुआ हैं । हमारे गोफन के पत्थर का निशाना इस दैत्य की ओर होना चाहिए । जो हमारी सदा की खुशी खोजने का दैत्य ळे । सही विजय के लिए इसी का सिर कलम करना अवश्य है ।(युहन्ना १२:२५)

यदि हम प्रकाश में चले और उस आत्मकेंद्रिता को पहचाने जो हमारे बहुत से कार्य और फैसलों को बिगडते है तथा अपनी परख इन क्षेत्रों में बेरहमी से करें तो धीरे धीरे हम पायेंगे कि यह दैत्य मारा जायेगा ।

कलीसिया के निर्माण के विषय बतलाने के बाद यीशु ने पतरस से कहा कि वह शैतान के विचार सुझा रहा है । वह कलीसिया जिसमें नरक फाटक भी प्रबल न होंगे, ऐसे लोगों से मिल कर बनी है जो आत्मकेन्द्रित नहीं है । वह उनके द्वारा नहीं बनी जिन्हों ने सिध्दांतों को मात्र दिमागी तरीकें से मान लिया है और कुछ छीटे फ्लश्तियों को मार गिराया हैं ।

अध्याय 9
पवित्रीकरण एवं संगति (सहभागिता)

सहभागिता नयी वाचा का शब्द है । संसार मे रहते हुए प्रभु यीशु मसीह की अपने पिता से जो सहभागिता थी उससे यह संबंधित हैं । प्रभु यीशु की प्रार्थना थी यही सहभागिता उनके चेलों के बीच में भी हो ।

पुरानी वाचा के अर्न्तगत यद्यपि की लोग पवित्रता की उँचाईयो तक पहुँचते थे परन्तु उनके बीच आपस में सहभागिता होती थी । पुरानी व्यवस्था के निम्न लोग पवित्र लोग थे सूमसा एलिय्याह, दानिएल, युहन्ना बाप्तिस्मा देनेवाला इत्यादि । इनकी पवित्रता आज के विश्वासियों को पवित्रता से ऊपर थी यही कारण है कि इन विश्वासियों ने नयी वाचा मे प्रवेश नहीं किया ।

नयी वाचा यीशु के चेलों को आंतरिक पवित्रता की ओर ले जाती है इस से वे एक दूसरे की सहभागिता प्राप्त करते हैं । इब्रा ११: जब हम विश्वास के बडे लोगों के विषय में पढते हैं तो हम पाते है कि ये एकांतवासी व्यŠत थे पुराने समय मे ऐसा ही था । परंतु नये नियम मे हम यीशु को चेलों को दो दो कर के प्रचार के लिए भेजने का वर्णन पाते हैं यीशु इसलिये नहीं आया कि हमे केवल आंतरिक पवित्रता दे परन्तु आपस की संगति में भी जोडे ।

यदि एक विश्वासी पाप पर विजय प्राप्त कर लेता है परंतु दूसरों को संगति में नही रहता तो उसके पवित्रीकरण में बडी कमी है, बिना संगति के पवित्रता एक धोखा हैं । बहुत से लोग जो संसार में घूमकर पवित्रता का प्रचार करते हैं परंतु एकांत प्रिय है ऐसे प्रचारक अभी भी पुरानी वाचा के अधीनता में हैं ।

परंतु पहली शताब्दी में प्रभु के चेलों का यह हाल नहीं था । हम पढते है कि पेत्तिकुस्त के दूसरे ही दिन पतरस और योहन एक साथ जाते हैं । पतरस लंगडे मनुष्य को दोनों की ओर देखने कहता हैं (प्रेरितो के काम ३:४) पतरस और योहन्ना एकबंध में बंध कर काम करते हैं । पेन्तिकुस्त के दिन यद्यपि वह पतरस था जिसने प्रचार किया परन्तु वह ग्यारहो के साथ खडा था ।(प्रेरितो के काम २:१४)

पतरस और योहन एक ही स्वभाव के मनुष्य नहीं थे । पतरस जल्दबाज और फुर्तिला था । जल्दबाजी मे ही उसने प्रभु का इंकार न करने की कसम खाई, जल्दी से गलील झील में कूद गया जब उसने प्रभु को किनारे देखा इत्यादि । (योहन्ना २१) जब कि योहन्ना शान्त और स्वर्गीय दर्शन देखनेवाला था । चर्च में ऐसे ही लोगों की ईश्वर साथ मिलाता हैं ताकि वे विभिन्नता मे एकता का प्रदर्शन कर सकें । यह ज्यादा अच्छा हैं बनिस्बत इसके कि दो समान विचार वाले आपस मे मिले ।

प्रेरितो के काम १३:२ मे हम पढते है कि अंतक्रिया की कलीसिया के अगुवे उपवास और आराधना से ईश्वर की इच्छा जानना चाहते थे, पवित्रात्मा ने उनसे कहा कि शाउल और बर्नबास को उसकी सेवा के लिये अलग किया जाए । इस नयी वाचा के युग में व्यŠतगत सेवा का स्थान नहीं था ।

यहाँ भी पवित्रात्मा ने दो अलग लोगों को चुना । पौलुस समझौता न करनेवाला और अनमने ह्दय से कार्य करनेवालो को सहन नहीं करनेवाला था । जब पौलुस और बर्नबास के बीच मरकुस को ले जाने की बात हुयी तो पौलुस मरकुस को साथ नहीं रखना चाहता था Šयों कि पहली यात्रा में बीच मे ही उसने उनका साथ छोड दिया था जब कि बर्नबास मरकुस को एक और मौका देना चाहता था । पौलुस और बर्नबास अपनी बातों में इस तरह अडे रहे कि उनके बीच अलगाव हो गया । अपनी आत्मिक उन्नति में वो यहाँ तक नहीं पहुॅंच पाये कि वे आपस में समझौता कर झूक जायें । (याकुब ३:१७)

चेले बने बनाये भŠत नहीं थे उन्हें भी सब की तरह उन्नति करना था और थोडा थोडा करके प्रकाश प्राप्त करना था । २ तिमोथी ४:११ से स्पष्ट है कि बाद में पौलुस बर्नबास और मरकुस आपस की संगति मे जुउ गये थे ।

पवित्रात्मा ने पौलुस और बर्नबास दोनों को साथ बुलाया परंतु फिर भी वे एकदूसरे के साथ चलना नहीं जानते थे यही स्थिति आज के विश्वासियों की भी हैं। अपरिपŠव लोगों के बीच यह बात सहनीय है परंतु Šया कहा जाये यदि यही स्थिति दस दस वर्ष पुराने विश्वासियों के बीच हो, यह दु:खदायी हैं ।

पौलुस सच्चाई को महत्व देता था । बर्नबास अनुग्रह को । साथ रह कर वे बहुत कुछ प्राप्त कर सकते थे । इसीलिये पवित्रात्मा ने उन्हें साथ बुलाया था । यदि कलीसिया में जवान पौलुस की तरह ही सेवा की जाए तो पौलुस के सिवाय और कोई नहीं रह पायेगा । और यदि बर्नबास की तरह सेवा की जाए तो बिना रीढ के समझौतावादी ही बचे रहेंगे । पर दोनो के साथ रहने से एक सच्ची कलीसिया का निर्माण होगा । शैतान ने इसीलिए उन्हें अलग रखा । परमेश्वर का धन्यवाद हो कि बाद में वे आपस में मिल गये । (प्रेरितो १५)

जब बर्नबास ने पौलुस को छोड दिया तो पवित्रात्मा ने पौलुस को एक नया सहाय्यक तिमोथी के रूप मे दिया । आत्मा नहीं चाहता था कि पौलुस अकेला काम करें । तिमोथी एक शर्मीला और अर्न्नमुखी व्यŠतत्व का जवान था । ये दोनो प्रभु के प्रति समान रूप से समर्पित थो तौमी पौलुस अन्य सहायकों के सिवाय तिमोथी की आधक सराहना करता हैं । उनके अलग व्यŠतत्व के बावजूद उनके बीच धन्य सहभागिता थी अंत मे पवित्रात्मा ने पौलुस से वह काम करवाया जिसकी उसे पौलुस से अपेक्षा थी ।

दूसरे की सेवा का अनुसरण करना एक गलती है Šयों कि इससे खुद की सेवा में बाधा उत्पन्न होती है, बहुत से जवान जो परमेश्वर के भŠतो की सेवा की बडाई करने के कारण उनकी सेवा की नकल करना चाहते है और इसलिए संसारिकता में डूब जाते हैं इब्रा ११:२९ मे हमे बताया गया है कि जब इस्त्राएलियों ने बिना कठिनाई के लाल समुद्र को पार किया तो मिसरी उसमें डूब मरे Šयों कि उन्होंने इस्त्राएलियों की नकल करना चाहा । यह उनके लिए चेतावनी हैं जो दूसरों की सेवा की नकल करना चाहते हैं ।

कुछ उदाहरणों पर ध्यान दें बहुत कम यिर्मयाह के समान सेवा के लिए बुलाए जाते है कि उखाडे, तोडे, बरबाद करें और उलट दे (यिर्मयाह १:१०) जिसे इस तरह की बुलाहट नहीं है यदि वह यिर्मयाह की नकल करे तो परमेश्वर द्वारा प्राप्त सेवा को केवल वह नष्ट करेगा और अपनी आत्मा की भी हानि उठावेगा । इसी प्रकार हम से चितायो गया है कि हम शिक्षक न बनें (याकूब ३:१) जिन्हें विशेषत: शिक्षक होने के लिए बुलाया गया है वह अपनी सेवा को विजयपूर्वक पूरा करें । अन्य यदि नकल करें तो वे खुद डूबेंगे और दूसरों को भी भ्रम मे डुबा देंगे ।

नयी वाचा का अर्थ लोगों को प्रभु की कलीसिया में खींचना हैं । पुरानी वाचा में ऐसी कलीसिया नहीं थी Šयोंकि पवित्र आत्मा तब मनुष्यों मे निवास नहीं करता था इस लिए दो लोग संगति में नहीं आ पाते थे । पुरानी वाचा के अन्तर्गत लोग अपने व्यवहार मे मानव थे और संगति में आना मुश्किल था । नयी वाचा मे हमारा व्यवहार दैवीय होता है और हम दैवीय स्वभाव के भागी होते है, सहभागिता संभव होती है और कलीसिया का निर्माण होता है ।

आज के युग में रहने वाले लोगों में यदि आपस मे सहभागिता नहीं है तो निश्चय है कि वे अभी भी शारीरिक बच्चे और मानव मात्र हैं । कुरन्थ के मसीहियो को पौलुस ने भी झिडका 'तुम अभी भी शारीरिक हो Šया तुम अभी भी अविश्वासियों की तरह नहीं चलतें (१ क्रुर ३:३) जब मनुष्य शारीरिक होते है तो वे अपने ही समान लोगों की संगति ढूंढते हैं मलयाली मिल कर अपना चर्च बनाते हैं, एंग्लो इंडियन्स अपना और तमिलियन अपना । ये Šलब है न कि प्रभु की कलीसिया ।

परमेश्वर ने जिस कलीसिया की योजना बनाई है उसमें उसने विभिन्न समुदायों, विभिन्न देशों, विभिन्न स्वभाव, बुध्दि सामर्थ, सामाजिक और आर्थक विषमताओ के लोग शामिल हैं ताकि संगति से एक दूसरे की बुराईयों दूर हो सकें । इस प्रकार पवित्रता और संगति मे एक साथ उन्नति हो सकें ।

इब्रा १२:४ में कहा गया है कि हम सब मनुष्यों के साथ मेल से रहें और तैय्यार रहें, नयी वाचा मे थे दो बाते अलग नहीं हो सकती ये हमारे दो पैर की तरह है । हम चलने के लिए एक पैर बढाते है तो दूसरे कदम के लिये हमे दूसरा पैर बढाना पडता हैं । प्राय: देखने मे आता है कि विश्वासी पवित्रता के संदेश से प्रभावित होते है परंतु आपसी सहभागिता के प्रति उतने चिंतित नहीं यह एक पैर के लंगडे है ये पवित्रता के एक पैर से लंगडा कर चलते हैं । वे अपने को विचार, और कार्य एवं प्रेरणा की अशुध्दता से शुध्द करने के इच्छुक नहीं होते, ध्यान नहीं देते । हम कह सकते है कि पवित्रता के प्रति यह उनका स्वार्थी प्रयास होता है जो उन्हे गलत स्थान पर पहुँचा सकता हैं । Šयोंकि बिना सहभागिता के पवित्रता नकली है हमे यह नहीं भूलना चाहिए ।

इसी प्रकार इसके विपरीत लोग सहभागिता को तो खोजते है पर अपनी व्यŠतगत जिंदगी में पवित्रता को स्थान नहीं देते । बिना पवित्रता के यह सहभागिता भी नकली हैं ।

सही तरह चलने के लिये हमारे दोनो पैर मजबूत होना चाहिए । इसके लिए हमे परमेश्वर के प्रकाश को प्राप्त करने की याचना करना चाहिए कि हम अपने को सही तरह जाँच सकें।

जैसे प्रभु की अपने पिता से सहभागिता थी उसमे आत्मा में एकता थी । पिता ने पुत्र को भेजा, पुत्र ने शरीर धारण कर हमारे पापों के लिए जान दी । पवित्रात्मा अब हम में कार्य करता है कि हम पुत्र के समान बने । इन सेवाआें में कोई उलझन नहीं है परंतु तीनों एकदम एक हैं । यही कलीसिया में होना चाहिये।

परमेश्वर ने अपनी प्रभुता में कलीसिया के हरएक सदस्य को विशेष सेवकाई दी हैं । (क्रुर १२:७८) हम कह सकते है कि परमेश्वर ने प्रत्येक सदस्य के चारों ओर एक गोला खींच दिया है कुछ में यह गोला बडा और कुछ मे छोटा है (मत्ती २५:१५) अपने गोले के अन्दर ही हमे परमेश्वर को खोजना हैं (प्रेरतो १% २६२७) अपने गोले के बाद दूसरो के मामले में दखल दे कर हम अपने को ही नष्ट करते है पतरस भी कहता है । दूसरो के मामे मे दखल देने के बजाय हम अपने को जाँचे और अपने शरीर में कष्ट झेलें (१ पत ४:१५१७)

उदाहरण स्वरूप कोई माई अपने बच्चे को कैसे पालता है, अपना पैसा कैसे खर्च करता हैं यह हमारा कार्य नहीं परन्तु हमारी परिघि के बाहर हैं । परमेश्वर ने दूसरे की परिघ के अन्दर हमे अधिकार नहीं दिया इसलिए हम अपनी ही जाँच करे (१ ति ४: १६)

जब हम संसार के थे हमने अपने चारों ओर बहुत लोगों और बहुत वस्तुओ के प्रति विचारों का बडा घेरा बना लिया था परंतु अब हमे उस घेरे के अंदर रहने के प्रति सतर्क रहना चाहिए जो परमेश्वर ने हमारे चारों ओर घेरा हैं । बहुत मामलों मे इस घेरे मे केवल हम ही हैं । यदि आप बालक हे तो इस घेरे में आप का घराना भी आ जाता है । यदि आप चर्च मे अगुने है तो चर्च के सदस्य भी इस घेरे मे आ जाते हैं। अन्य मामलों मे हर व्यŠत को अपना ही न्याय करना चाहिए ।

जब हम अपने घेरे के बाहर जाते है तो सहभागिता नष्ट होती है और पवित्रता मे रूकावट आती है ।

हमे आज्ञा है कि हम प्रभु के भय में एक दूसरे के अधीन रहें (इफी ५:२१) इसका यह अर्थ हुआ कि प्रभु का भय हमे दूसरों के घेरों क अतिक्रमण करने से रोकता हैं ।

जिज्ञासा बुरी है और यह विश्वासियों के जीवन का अज्ञात पाप हैं । बच्चे प्राय: जिज्ञासु होते है और दूसरे की बातें बडे ध्यान से सुनते हैं । अब हम परिपŠव मनुष्य हो गये तो बच्चों की बाते छोड दी । (१ क्रुर १३:११) जो बडे लोग इस बुरी आदत को नहीं छोड पाते वे गप्प बाजी की बुरी आदत में पड जाते हैं विशेष कर बुढी स्त्रियाँ (१ तिमो ४:७) शैतान भी नग्न शरीर को देखने की जिज्ञासा को फोनोग्राफी के द्वारा बढाता हैं ।

यीशु भी हमारे समान जिज्ञासा की परीखा मे पडा परन्तु उसने कठोरता से उस हद के बाहर जाने का इंकार किया जो पिता ने खींचा था । इसीलिए उसने पृथ्वी के अपने ३३ १/२ वर्ष के जीवन मे कमी पाप नहीं किया । हम समझ सकते है कि यीशु की यह कितनी बडी विजय थी । किसकी किससे शादी हो रही हैं, किसका बच्चा होने वाला है इत्यादि की जिज्ञासा मे पडना बुरे लोगों के जीवन की दिनचर्या है ।

कुछ अगुवे पति और पालक अपने अधीनस्त पर रोब दिखा कर अपने हद के बाहर जाते है । हमे अपने बच्चों को डराना नहीं चाहिए । अपनी पत्नी और अपने चर्च के सदस्यों पर दबाव नहीं डालना चाहिए । इलीहू के ये शब्द सटीक हैं (अय्युब ३३:७)

पति अपनी पत्नी पर अधिकार जमा कर उसके व्यŠतत्व को चूर कर सकता है । यह मूर्खता हैं । परमेश्वर ने पति पत्नी को एक दूसरे से अलग बनाया है कि वे एक दूसरे की सहायता करें । यदि पति अपनी पत्नी के विचार को भी देखे तो दोनो की समझ बढ सकती हैं ।

यही बात भाईभाई और बहनबहन के बीच भी लागू होती है जो परमेश्वर के प्रकाश मे चलते है वे अपने दोनो पैरों का उपयोग करते है । वे अपने शरीर में निवास करने वाली बुराई का सही ज्ञान प्राप्त करते है और अपने को शुध्द करते हुये दूसरों की सहभागिता के आनंद को प्राप्त करते हैं । कलीसिया पूरे संसार में प्रभु की महिमा फैलाने में सक्षम होती हैं ।

अध्याय 10
ख्रीष्ट विरोधी की आत्मा पर विजय प्राप्त करना

हम ख्रीष्ट विरोधी के संसार में आने के निकट युग में रह रहे हैं । इसके पहले कि वह शैतान का मुख्य प्रतिनिधी बन कर संसार में आये संसार की परिस्थिति उसके आने के अनुकूल होगी । उसी प्रकार जैसे पर्वत की चोटी पर जाने के लिए एक दालू रास्ता होता है । पहली शताब्दी से ही इस दालू रास्ते का निर्माण शुरू हो गया है । (योहन्ना २:१८) और अब उसके आने का अंतिम पहर है और इस बीच कई ख्रीष्ट विरोधी उठ भी खडे हुए । पवित्रात्मा ने उजागर किया की १०० एडी में ग्यारह बजे रात का समय था ।

हम उसके आने के युग के अंतिम सेकण्ड में है परिस्थितियों ऐसी बनी है कि हम चोटी पर पहुँचने वाले हैं । हमे समय को पहचान की समझ रखते हुए जीना हैं । (मत्ती १६:३)

ख्रीष्ट विरोधी का साम्राज्य राजनैतिक, आर्थिक और धार्मिक होगा । हम केवल धार्मिक पहलू पर विचार करना चाहते हैं । शैतान ने अपने मकसद को नास्तिक सरकारों के बजाए झूठे धर्म के द्वारा एवं झूठे धर्म के सिवाय नकली मसीहियत के द्वारा पूरा कर लिया हैं । इसीलिए योहन्ना कहता है कि ख्रीष्ट विरोधी प्रथम शताब्दी की मसीही कलीसिया पर विराजमान हैं । यद्यपि ये नकली मसीही चेलों के प्रचार के द्वारा भगा दिये गए जैसा । योहन्ना २:१९ मे लिखा हैं वे हमारे बीच से निकल गए ।

आज की मसीही कलीसिया में ख्रीष्ट विरोधी की आत्मा अधिकता से पाई जाती हैं । हमे इन्हे सही रीति से पहचानना है ताकि हम इन्हे अपने शरीर से और इस प्रकार अपनी कलीसियाओ से अलग कर सके २ थिस २:३१२ में ख्रीष्ट विरोधी की विशेषताएँ बताई गई हैं

  1. पाप का पुरूष कहलाएगा।
  2. वह अपने को बडा कहलाता है और परमेश्वर के तुल्य होना चाहता है ।
  3. झूठा और धोखेबाज होगा।

ख्रीष्ट विरोधी में इन विशेषताओं को पाने की हम आशा रख सकते हैं ।

पाप

ख्रीष्ट विरोधी पाप का पुरूष कहलाता है उसकी यह आत्मा मसीही साम्राज्य में पाप को हल्के रूप मे लेने से प्रर्दशित होती है । प्रभु के आने के पहले इस अंतिम युग में पाप के प्रति प्रचार लोगों को अच्छा नही लगेगा । सामाजिक समानता, गरीबों और अज्ञानियों के प्रति चिंता बढ पीडितों को राहत यद्यपि अच्छे विषय है इनका प्रचार ज्यादा होता हैं । परंतु धन और सांसारिक वस्तुओ से प्यार, यौन संबंधि गलत विचार, क्षमा न करने का भाव, क्रोध का फूट पडना, दूसरों से लडाई प्राप्ती की इच्छा, चुगली, निन्दा करना, गप्पमारना से संबंधित पापों पर शायद ही जोर दिया जायेगा । २ थिस २:७ अधर्म का भेद झूठे अनुग्रह को प्रगट करेगा जिसके द्वारा लोगों के यह आश्वासन दिया जायेगा चूंकि उन्होंने प्रभु यीशु को एक बार ग्रहण कर लिया । अनंत काल तक वह सुरक्षित है चाहे वे आगे को पाप में Šयों न गिरे । ऐसे प्रचार कान की खुजली मिटाते है और इसलिए विश्वासी इन पर सरलता से ध्यान देंगे (२ तिमो ४:३:४)

प्रका वाŠय १३ मे ख्रीष्ट विरोधी के राज्य के विषय मे लिखा हैं कि वह अपने चेलों को यह छूट देगा चाहे तो उसे खुल्लम खुल्ला माने या गुप्त रूप से माने । यदि वे प्रगट में मानना चाहें तो उसका निशान अपने माथे पर लगवाएँ और यदि कलीसिया में अपनी प्रसिध्दि बनाये रखना चाहते है तो अपने दाहिने हाथ की हथेली में निशान लगाएँ ताकि पशु के निशान के द्वारा उन्हे सब सुविधाएँ मिल सके ।

ख्रीष्ट विरोधी के राज्य में बिना पशु का निशान रखे कोई भी आवश्यक वस्तुएँ या खाद्य पदार्थ प्राप्त नहीं होंगे । हम अभी तक इस चोटी पर नहीं पहॅुंचे हैं परंतु उसके बहुत ही करीब हैं । भारत में आज भी शैक्षणिक संस्थाआें मे प्रवेश के लिए या नौकरी प्राप्त करने के लिये बिना हथेली गरम किये काम नहीं बनता । मशीनी कामगार यदि आयुध पूजा में शामिल नहीं होते तो उन्हे कारखाने में कठिण काम देकर प्रताडित किया जाता हैं । कई तथाकथित विश्वासी ऐसी स्थितियों में समझौता कर लेते है और रविवारीय अराधना में भी आत्मिक विश्वासी की तरह शामिल होते हैं Šयों कि हफ्ते भर में उन्होंने जो अधार्मिक और पाप कर्म किए है वह कोई नहीं जानता । उसके दाहिने हाथ की हथेली में पशु का निशान अद्‌ृश्य होता है । ऐसे लोग अपने व्यवहार को सही दर्शाते हैं कि जीने के लिए कुछ झुकना पडता हैं । यह वे लोग हैं जो शैतान के आगे झुकने को भी न्यायपूर्ण मानते हैं । यदि कार्य गुप्त में किया जाये ताकि वे गलत गवाही के पात्र न बनें । जिस कलीसिया के अगुवे इस प्रकार गुप्त में निशान लिए फिरते है उस कलीसिया में ख्रीष्ट विरोधी आत्मा प्रबल होती हैं । यही कारण है कि बहुत कलीसियाआें में अनबन लडाई झगडे और मृत्यू हैं ।

केवल वे जो प्रभु यीशु की तरह पाप से घृणा करते है उनमे ही यह सामर्थ होती है कि कलीसिया मे पाप को उजागर कर उसका नाश करें ।

स्वयं का उत्कर्ष

अपने को ईश्वर के तुल्य बनाने के लिए लूसीकर शैतान बन गया ताकि वह अपने साथी स्वर्गदूतो की उपासना प्राप्त कर सके । अपनी अराधना करवाने की इच्छा सब क्षेत्र मे पायी जाती है वह राजनैतिक, व्यवसायिक और धार्मिक क्षेत्र है । झूठे धर्मो मे तथाकथित महात्मा होते है जिन्हे वास्तव मे पूजा जाता है

मसीहियत मे भी हम लोगों को अपने को 'रेव्ह', 'फादर', 'रेव्ह डॉŠटर' 'इत्यादि' कहलाना चाहते हैं जैसे यहूदी अपने को रब्बि कहलवात थे जिसको प्रभू ने गलत कहा । इन पदवी की जड मे पूजा करवाने की शैतानी चाहत निहित है यही वह श्रीष्ट विरोधी की आत्मा भी है जो अपने को बडा बना कर ईश्वर के तुल्य दिखाना चाहता है रथिस २: ४

जब लोग अपने कार्य की रिपोर्ट आंकडो के जरिए और प्रचारक के प्रचार करने और प्रार्थना करने के ढेर चित्रों को समावेश करने की चाहत भी अपनी अराधना कराने का कुटिल तरीका हैं ।

साथ ही विश्वासियों से अपने को ऊँचा दिखाने की चाहत तब दिखाई देती है जब व्यŠत कलीसिया मे अपने को अगुवा बनाने की चाल चलता है, नामी प्रचारक की तरह दुनियाँ की सैर करना चाहता हैं सलाह न माँगने पर भी सलाह देता है और नियंत्रक बन कर दूसरों के कामों की आलोचना करता हैं । बने बनाए उपदेशों के माध्यम से सुन्दर प्रचार कर अपने को दूसरों से अच्छा प्रचारक सिध्द करने का प्रयास करता हैं और दूसरों के सेवकाई के वरदान की नकल कर मनुष्यों में आदर चाहता है और अपने नाम का यश चाहता हैं ।

हमे यह जानना जरूरी है कि ऐसी घृणित चाहतें हमारे शरीर में सुप्त रहती हैं इन से छुटकारा पाने के लिए इनके प्रति कठोर होना चाहिए और तभी हमे ऐसा अधिकार और सामर्थ प्राप्त होगा कि ख्रीष्ट विरोधी आत्मा को भगा सकें ।

झूठ बोलना

२ थिस २:९,१० 'उस अधर्मी का आना शैतान के कार्य के साथ और नाश होनेवालो के लिए अधर्म के सब प्रकार के धोखे के साथ होगा, Šयोंकि उन्होने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया जिससे उनका उध्दार होता ।'

शैतान झूठ का पिता है परमेश्वर की संतान जो अपनी जीभ से झूठ बोलता है वास्तव मे अपनी जीभ को शैतान को सौंपता है कि उसे झूठ बोलने की कोख बनाएँ । झूठ बोलने में हम माहिर हैं । भजन ५८:३ हम पैदा होने के बाद से ही झूठ बोलते हैं । झूठ बोलने के कई तरीके है अर्ध सत्य बोलना, तस्वीर का एक ही पहलू बताना, अपने काम का बढा चढा कर लेखा देना । अपनी आत्मकथा मे घटनाआें को काल्पनिक रूप देना और दूसरों की सहानुभूति पाने के लिए बिमारी और दर्द का बहाना करना, दयालु बनने का नाटक करना, अपने को शुध्द दिखाना, उन घटनाआें का वर्णन करना जो प्रार्थना, उपवास और अशुध्द आत्मा को निकालने से संबोधित है कि अपने को इन बातों में माहिर दिखा सकें । झूठ बोलने की सैकडो संभावना हैं ।

यदि तुम पाप से हार गए परन्तु इसको स्वीकार करने के लिए ईमानदार हो, दु:खित हो तो तुम्हारे लिए बहुत ही आशा हैं परंतु यदि तुम अंदरूनी रूप से पाप से हार गए हो और दावा करते हो कि तुमने पाप पर विजय पायी है या अपने प्रचार से ऐसा प्रभाव डालते हो तो प्रभु यीशु के ये शब्द तुम्हारे लिए लागू होते है मत्ती २३:३३ 'हे साँपो हे करैतो के बच्चो कम नरक के दण्ड से Šयो कर बचोगे ? '

अपने जीवन में हम झूठ की जड को तब तक नहीं निकाल सकते जब तक ज्यों ही यह पैदा होता है तो कठोरता से उसके विरोध मे कदम न उठाएँ । झूठ की आत्मा होते हुए भी जो पवित्रता की भाषा बोलते हैं उनपर अभी भी ख्रीष्ट विरोधी आत्मा का साम्राज्य हैं । Šयों कि वे परमेश्वर से भी नहीं डरते जो उनकी गुप्त बातों को एक दिन न्याय करेगा । हमारी कलीसिया वह स्थान हो जहाँ वचन का प्रचार कर झूठों को कठोरता से उजागर किया जाए । योहन्ना के दिनों में ख्रीष्ट विरोधी को इसी प्रकार भगाया गया था और आज भी वही प्रक्रिया आजमायी जाए।

धोखा

हमने देखा कि ख्रीष्ट विरोधी झूठा बोल बोलकर चिन्ह ऑर आश्चर्यकर्म के द्वारा लोगों को धोखा देगा । अलौकिक आश्चर्य कर्म में लोगों को धोखा देने की बहुत शंका होती हैं । भारत में हम देखते है कि मूर्तिपूजकों के धार्मिक अगुवे शैतान की शŠत से आश्चर्य कर्म दिखा कर चेलों की बहुत भीड इकठ्‌ठा कर लेते हैं ।

अलौकिक आश्चर्य कर्म और चंगाई की सामर्थ परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को भी दी है ताकि संसार में अपना अभिप्राय पूरा कर सकें । प्रभु यीशु पतरस और पौलुस इस सीमा के आश्चर्य कर्म किए जो आजकल सुनने में भी नहीं आता । यह उनके विश्वास के द्वारा संभव था । प्रेरितो के काम में दिया गया वर्णन आज हमारे विश्वास को कमी को चुनौती देते है । कलीसिया आत्मा के दानों से रहित हो कर उस मनुष्य के समान है जो अंधा, गूंगा, बहरा और लकवामारा हुआ हैं (१ कु १२) हम उन अविश्वासी विश्वासियों के समान नही होना चाहते जो कहते है कि आश्चर्यकर्म का युग बीत गया यह उनके लिये बीता होगा पर विश्वासियों के लिए नहीं ।

इसका मतलब यह नहीं कि जो कोई भी यीशु के नाम पर आश्चर्य कर्म करता है उसके पीछे आँख मूंद कर चला जाये । ऐसा आश्चर्य करनेवाले कई अंत में प्रभु के द्वारा अस्विकृत कर दिए जायेंगे । (मत्ती ७:२२,२३) तो परमेश्वर Šयों ऐसे लोगों को यीशु के नाम पर आश्चर्य कर्म करने देता है । इसका उत्तर व्यवस्था विवरण १३: १-५ मे दिया हैं । परमेश्वर परीक्षा करना चाहता है कि हम पवित्रशास्त्र की शिक्षाआें पर चलेंगे या इन चिन्ह और अचंभा के कार्यो से गुमराह होंगें । इसलिए हम सतर्क हों कि हमारे आत्मिक अगुवे अंतिम दिनों मे स्वीकृत हाने योग्य है अथवा नहीं पढे प्रकाशित वाŠय १३: १३,१४ । छोटे भविष्यवŠता जो यीशु के चेलो की तरह भेडो के समान दिखते हैं लोगों को चिन्ह और आश्चर्य कर्म से धोखा देते हैं ।

हम अपने को धोखा दिए जाने से कैसे बचाएँ ? हम मसीही आश्चर्य कर्म दिखाने वालों को ऊपर वर्णित ख्रीष्ट विरोधी को तीन विशेषताओ से परखें । अपने से इन प्रश्नों को पूछें ?

  1. Šया प्रचारक का जीवन और सेवा मनुष्यों को पाप की पकड से छुडाता है? या केवल पाप की माफी का आश्वासन देता है Šया वह ह्दय और जीवन की शुध्दता पर जोर देता हैं ?
  2. या वह यीशु और उसके चेलों के समान नम्र और अपनी बडाई न चाहने वाला है ? या वह अपनी प्रसिध्दि चाहता है और चाहता हैं ? उसकी सलाह और भविष्यवाणी पर हम निर्भर रहे और प्रभु को अपना सिर मानने से हटें । Šया उसमे दास की आत्मा हैं ? या वह मालिक की तरह हुŠम चलता रहता हैं ?
  3. Šया तुमने उसके जीवन मे ईमानदारी और सिधाई पायी हैं खास कर आर्थिक मामलों में

ख्रीष्ट विरोधी की आत्मा से शैतान ने मसीही कलीसिया को भ्रष्ट कर रखा हैं काश परमेशव्र हमारे देश में चेलों के समान सामर्थी पुरूष खडा करे जो कलीसिया से इस आत्मा को भगा दे ।

अध्याय 11
प्रशंसा के द्वारा विजय

यीशु का चेला बनने की हमारी बुलाहट यह है कि हम विश्वास का जीवन जिऍ । विश्वास का प्रमुख चिन्ह प्रशंसा और धन्यवाद देना हैं (भजन १०६:१२) 'उन्होने वचन पर विश्वास किया उन्होंने प्रशंसा के गीत गाए' (भजन १०६:८) इस्राएलियो ने परमेश्वर की प्रशंसा की तब जब कि उनहों ने मिश्रियों को लाल सागर में डुबते देखा उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास किया और उसकी प्रशंसा की । वे दृष्टि के द्वारा चले ।

परन्तु हमे विश्वास पर चलना हैं । अपने शत्रुओ को डूबते देखने के पहले ही हमको परमेश्वर के वचन पर विश्वास करना हैं । हम विश्वास करते है कि हमारे शत्रुआें से परमेश्वर अपनी तरह और अपने समय में न्याय करेगा । यही काख है कि नयी वाचा के अर्न्तगत हमे हर परिस्थिति और हर समय परमेश्वर की प्रशंसा करना हैं ।

इब्रा २ का १२,१३ मे हम पढते हैं मै तेरा नाम अपने भाइयों को सुनाऊँगा, सभा के बीच मे तेरा भजन गाऊँगा । और फिर यह मै उस पर भरोसा रखुंगा । भरोसा करना और प्रशंसा करना एक ही सिŠके के दो पहलु है बिना प्रशंसा और स्तुति के विश्वास एक नकली और मृत विश्वास हैं।यीशु की तरह हमे भी परमेश्वर पिता की प्रशंसा व्यŠतगत रूप से और कलीसिया के मध्य करना चाहिए ।

परमेश्वर एक महान राजा है और वह जिस सिंहासन पर बैठता है वह सोने और चाँदी का नहीं Šयों कि उसके लिए वह बहुत घटिया होगा । भजनकार कहता है प्रभु तू भŠतों की स्तुति पर विराजमान है यही कारण है कि स्वर्ग में सदैव स्तुति होती रहती हैं । जब पवित्रात्मा हमारे ह्दय में आता है तो वह हमारे ह्दयों में स्वर्ग को लाता है । तो हमे भी अपने ह्दय में अपने घरों मे अपनी कलीसिया में स्तुति का सिंहासन बनाना चाहिये जिसमें परमेश्वर विराजमान हो ।

इसलिए हम डरते और थरथराते हुए कुडकुडाने और शिकायत करने से बाज आये ताकि पवित्रात्मा हमारे ह्दयों में पिता के लिए सिंहासन का निर्माण करे । परमेश्वर हर परिस्थितियों को हमारी भलाई में बदलता है कि हमारे पास कुडकुडाने का विषय ही न हो जब हम विश्वास से चलते है (रोमियो ८:२८)

यदि हम अपने घरों और ऑफीस में बुडबुडाहट की आत्मा रखते हैं तब संभव नहीं कि हम कलीसिया मे परमेश्वर की स्तुति सही ढंग से कर सकें । क्रूस पर चढाए गये जीवन के द्वारा ही सच्ची स्तुति निकलती हैं । ध्यान देने की बात है कि पवित्रशास्त्र में परमेशव्र के सिंहासन का वर्णन उस भजन के बीच में आया हैं। जहाँ क्रूस की मृतयु का वर्णन हैं । भजन यीशु की पुकार से शुरू होता है जहाँ उसके हाथों और पैरो पर कीले ठोंकी जाती हैं (भजन २२:१६, २२,२३) मै अपने माइयों के सामने तेरे नाम का प्रचार करूँगा, सभा के बीच में तेरी प्रशंसा करूँगा । हे यहोवा के डरवैयों, उसकी स्तुति करों । हे याकुब के वंश, तुम सब उसकी महिमा करो। हे इस्राएल के वंश, तुम उसका भय मानों । हम भी इस संसार और अपनी अभिलाषाआें के लिए क्रूसित होकर पिता की स्तुति करें । जिस कलीसिया में क्रूस को केंद्रिय स्था न मिले वहाँ को स्तुति और अराधना खोखली हैं । बस खोखलेपन को देख कर कई स्तुति और अराधना को ही आवश्यक नहीं समझते । परन्तु ये पहाड की चोटी से दूसरी ओर गिर जाना हैं ।

क्रूस पर यीशु के साथ क्रुसित होने पर हम पिता के लिए स्तुति का सिंहासन बनाते हैं । बली की वेदी पर लेट कर हम क्रूस से संबंध जोडते है और प्रभु को धन्यवाद देते है यह कहते हुये कि 'आज का दिन यहोवा ने बनाया हैं । आओ हम उसमे आंन्दित हों

' हमारा सिर बनने के लिए यीशु का अभिषेक हुआ कि हमे हर्ष के तले और स्तुति का वस्त्र दे (यशा ६१:१-३) यदि तुम निराशा की आत्मा में जी रहे हो तो जान लो यह शैतान का ज्ञान हैं । यीशु आया कि तुम्हारे जीवन से इस आत्मा को निकाल ले और तुम्हे स्तुति के वस्त्र पहनाए परमेश्वर की यह इच्छा कभी नहीं है कि हम निराश उदास दु:खी मन के रहें Šयों कि यीशु मसीह ऐसा कर्म नहीं था और हमें बुलाया गया है कि हम ऐसी चाल चले जैसा प्रभु चला । (१ योहन्ना २:६) परंतु यह तभी संभव है जब कि हम प्रति दिन अपना क्रूस उठाएँ ।

भजन संहिता ८:२ मे हम पढते है कि परमेश्वर ने कि छोटे और दुधमुंए बच्चों के मुंह से सामर्थ निकलेगी कि शत्रु हराए जाए । यीशु ने इसी पद को उध्दरित किया जब मुख्य याजको ने बच्चों के द्वारा चिल्लाने और परमेश्वर की स्तुति करने की आलोचना की । (मत्ती २१:१५,१६) आज के बहुत लोगों की तरह यह याजक भी सोचते थे कि परमेश्वर के मंदिर मे चिल्लाना और ऊँची आवाज में आराधना करना ठीक नहीं है । वे सोचते थे कि गंभीर चेहरा रखते हुए परमेश्वर की उपस्थिति मे शांत रहना चाहिए । परंतु यीशु मसीह स्तुति की आवाज सून कर खुश हुआ Šयों कि स्वर्गीय घर मे स्वर्गदूत ऊँची आवाज में परमेश्वर की स्तुति करते हैं । यह भी एक कारण है कि शैतान और उसके चेले सवर्ग में नहीं रह सकते Šयों कि वे परमेश्वर की स्तुति के सामने खडे नहीं हो सकते और इसी प्रकार जिस कलीसिया में ऐसी स्तुति हो वे ठहर नहीं सकते । सो वे इन तरीकों का उपयोग करते हैं । वे स्तुति से ईमानदारी को चुरा लेना चाहते हैं या स्तुति की आवाज को रोक देना चाहते हैं । यदि हम अपने चारों ओर मसीही सम्प्रदायों पर नजर दौडाएँ किन तरीकों से शैतान सफल भी हुआ हैं ।

शैतान परमेश्वर की सच्ची आराधना से Šयों घृणा करता हैं Šयों कि स्तुति से शैतान भागता है । (भजन सं ८:२ मत्ती २१:१६)

ऐसी खोखली आवाज जो पवित्र जीवन से नहीं निकलती उसमे सामर्थ नहीं होती । निर्गमन ३२ में हम पढते है कि इस्राएलियो ने सोने का बछडा बनावर उसे यहोवा माना और ऐसी ऊँची आवाज से नाच गाना किया कि कई मील दूर खडे मूसा और यहोशु को भी यह सुनाई दिया । परंतु इस अद्‌भुत स्तुति के बीच शैतान था । उनके बीच में अनैतिकता थी । और कइ नाचा गानो के बीच जो यीशु के नाम से किए जाते है यही होता हैं ।

हमारी स्तुति तब सामर्थवाली होती है जब वह क्रूसित और पवित्र जीवन से निकलती हैं ।

लूक १९:३७, ३८ मे वर्णन है कि जब प्रभु के चेलों ने ऊँची आवाज में परमेश्वर की स्तुति की तो फरीसियो ने गुस्सा हो कर यीशु से कहा कि वह अपने चेलो को चूप कराए, परंतु यीशु ने उत्तर दिया यदि ये चूप होंगे तो पत्थर भी परमेश्वर की स्तुति मे चिल्हा उठेंगे । हम मनुष्यो का आदर पाने के लिए अपनी अराधना में परमेश्वर की स्तुति ऊँची आवाज में करने से डरते हैं । कुछ मसीही समुदायों मे ऊँची आवाज मे स्तुति करने की रीति नहीं है परंतु हमे जोर से इसका विरोध करना हैं (मत्ती ११:१२)

यीशु ने अपने पिता के साथ करोडो वर्ष बिताए जहाँ स्तुति और आराधना का माहोल था जब वह पृथ्वी पर आया तो धार्मिक लोगों को गंभीर और उदास चेहरे वाला पा कर बहुत बदलाव महसूस किया और इसलिए उन थोडे लोगों के बीच जहाँ स्वर्ग की तरह स्तुति का वातावरण था वह बहुत खुश हुआ ।

प्रका वा की पुस्तके जहाँ कई सात बातों का वर्णन मिलता हैं हमे स्वर्ग में स्तुति के साथ दर्शन होते हैं । यह दर्शन इन सात स्थलों मे पाए जाते हैं प्रका वा ४:१८:११, ५:८१४, ७:९:१२, ११:१५१८, १४:१४, १५:१४, १९:१६ । प्रत्ये दर्शन में हमारे भविष्य का घर, आनंदपूर्ण स्तुति जो गडगडाहट की आवाज के समान हैं दिखता हैं । परमेश्वर की स्तुति उसके सर्व प्रभुत्व, उसकी पवित्रता, उसके न्याय इत्यादि के कारण होती हैं । शिकायत का एक शब्द नहीं सुनाई देता, एक भी स्वर्गदूत उदास नहीं दिखता । यदि हम भी इसके आगे नहीं होते तो स्वर्ग में जाने पर हमे एक धŠका सा लगेगा जहाँ लोग लगातार हालेल्लुय्याह और आमीन की पुकार करते है । प्रका वा १९:१२६ । पवित्रात्मा हमारी कलीसिया में इसलिए आया कि ऐसा ही जीवन हम में पैदा करें ।

हमे बताया गया है कि १,४४,००० लोगों ने इस पृथ्वी पर इस नये गाने को सीखा था प्रका वा १४ का १-४१ पुराना गीत जो पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी गाता हैं । वह लोगों और परिस्थितियों के विरूध्द शिकायत और कुडकुडाहट का होता है । परंतु वे थोडे जो मेम्ने के पीछे चलते है और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाते है और जिन्होंने स्वयं का इंकार किया है उन्होंने शिकायत और कुडकुडाहट को अपने जीवन से निकाल दिया हैं । इन्होंने परमेश्वर के उस संप्रभुता विश्वास किया हैं (रोमियो ८:२८) इन्होंने सब बात पर धन्यवाद देना सीखा हैं । (१ यिस ५:१८) (इफी ५:२०, १ तिमो २:१) इर एक मुसीबत के समय अपने शरीर में यीशु की मृत्यू को ढोया है और स्तुति और अराधना का नया गीत सीखा है और इसलिए अंत समय मे अंतिम दिन सिय्योन पर्वत पर मेग्ने के साथ ये खडे होगे ।

यह काफी नहीं है कि हम अपने ह्दय मे अपने परमेश्वर की स्तुति करें हमे परमेश्वर को अपने क्रूसित जीवन की स्तूति का बलिदान चढाना है, अपने होठों के द्वारा । जो ह्दय पर भरा है वही मुँह से निकलता हैं (मत्ती १२:३४) सो यदि स्तुति हमारे होठों से नहीं निकलती तो साफ है कि वह हमारे ह्दयों में नहीं हैं । छुटकारे के लिए हमे मुँह से अेशीकार करना हैं (रोमियो १०:१०)

भजन ५० के २३ मेहम पढते है जो, मुझे धन्यवाद का बलिदान चढाता है वह मेरा आदर करता है कि मै उसको छुटकार करूॅ ।

परमेश्वर बहुत सी स्थितियों से हमारा छुटकारा कर सकता है जब हम उसकी स्तुति कर सकते है Šयों कि स्तुति ही विश्वास लाने का चिन्ह है, केवल प्रार्थना ही कई स्थितियों से हमें नहीं छुडा सकती । हमे लगातार प्रार्थना करते रहना चाहिये जब तक हमारे ह्दय में यह आश्वासन न आ जाये कि हमारी प्रार्थना सुनी गयी है तब विश्वास उत्पन्न होता है और हमे निश्चय होता है कि हमारी प्रार्थना सुनी गयी है यद्यपि हम तब तक उत्तर नहीं जान पाते । हम कैसे जाने कि यह विश्वास हमारे ह्दयों में उत्पन्न हो गया हैं । हम परमेश्वर की स्तुति करना शुरू करते है यही विश्वास उत्पन्न होने का प्रमाण हैं । इस प्रकार हम परमेश्वर को मौका देते है कि वह अपने छुटकारें को हमें दिखाए ।

२ इतिहास २० राजा यहोशपात का उदा है कि वह बडी सेना से घिर गया तो उसने जो बुध्दिमानी का काम किया वह यह था कि उसने उपवास के साथ प्रार्थना की और परमेश्वर को आरे ताका । उसकी प्रार्थना पद ६-१२ /में दी गयी है जहाँ यह सात बाते दिखाई देती हैं

  1. उसने परमेश्वर की संप्रभुता की प्रशंसा की (पद ६)
  2. उसने याद किया कि बीते समयों मे परमेश्वर ने Šया Šया काम कर आशीषें दी । (पद ७)
  3. उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाआें के शब्दों को याद किया । (पद ९)
  4. उसने परमेश्वर को याद दिलाया कि वे परमेश्वर के ही संतान निज संतान हैं (पद ११)
  5. उसने परमेश्वर से कहा कि आई हुई मुसीबत का सामना करने की उसमे सामर्थ नहीं हैं । (पद १२)
  6. उसने यह भी कहा कि उनमे बुध्दि भी नहीं हैं (पद १२)
  7. उसने परमेश्वर से कहा कि वे उस पर ही निर्भर हैं । (पद १२)

यह हमारे लिए भी प्रार्थना करने का अच्छा तरीका हैं । परमेश्वर ने उसे एकदम उत्तर दिया कि हल निकलेगा । यहोशापात ने परमेश्वर पर विश्वास किया और अपनी सेना के सामने परमेश्वर की स्तुति ऊँची आवाज में करनेवालों की पंŠत को भेजा । इस स्तुति के बलिदान के द्वारा यहोशापात ने रास्ता खोला कि परमेश्वर उसे छुटकारा दे और परमेश्वर ने शत्रु सेना को पूरी तरह उजाड दिया । (पद २२)

योना की पुस्तक मे हम इसका दूसरा उदाहरण पाते हैं । योना मछली के पेट मे तीन दिन और तीन रात था और इस समय उसने प्रार्थना भी नहीं की । योना २:१ मे लिखा है कि इसके बाद योना ने प्रार्थना करना शुरू किया । हो सकता है बीते तीन दिनों मे उसने किसी तरह खसक कर मछली के मुँह से निकलने का सांचा हो जैसा हम भी अपनी समस्याआें से पार पाने के लिए हर संभव उपक्रम अपनाते है जब सब मानवीय सहायता असफल हो जाती है तभी बहुत से लोग ईश्वर के पास आते हैं । इसी प्रकार अपने प्रयास मे असफल होने पर ही योना ईश्वर के पास आया ।

और परमेश्वर भी ठहरा रहता है जब तक हम अपना अंतिम प्रयास न करें। योना ने भी प्रार्थना जारी रखी परंतु कुछ नहीं हुआ जब तक उसने धन्यवाद देना शुरू नहीं किया । उसने माना कि छुटकारा परमेश्वर से ही प्राप्त होता हैं जब योना ने इस प्रकार परमेश्वर की स्तुति की तो परमेश्वर ने मछली को आज्ञा दी कि उसे सूखे कोने पर उगल दें।

हम कितने समय तक मछली के पेट में (अपनी समस्याआें को हल करने के प्रयास में ) पडे रहेंगे । परमेश्वर का छुटकारा नहीं मिल सकता जब तक कि हम उसकी स्तुति कर आदर न करें । (भजन ५०:२३)

प्रेरितो के काम १६ से एक अंतिम उदाहरण पौलुस और सिलास सुसमाचार प्रचार करने के कारण जेल में बंद थे मध्य रात्री मे सोने के बदले वे प्रार्थना और स्तुति करने लगे । उनके मन मे कोई शिकायत नहीं थी । उन्हे परमेश्वर की संप्रभुता पर पूरा पŠका विश्वास था और वे परमेश्वर की स्तुति करने लगे । उसी समय परमेश्वर ने जेल के दरवाजों को खोल दिया । यह इसलिए संभव हुआ कि पौलुस और सिलास ने अपने होठों की स्तुति के द्वारा परमेश्वर को रास्ता दिया कि उनके पक्ष में काम करें ।

प्रत्येक मछली के बंदमुॅह और हर एक जेल के दरवाजों की चाबी परमेश्वर के हाथ में हैं (प्रका वा ३:७), और जब वह द्वार खोलता है उसे कोई बंद नहीं कर सकता । परमेश्वर की स्तुति करना बहुत सरल होता हैं । जब सब बाते हमारी इच्छा और योजना के अनुसार होती रहती है, परंतु जब हमारी अपेक्षा के विरूध्द घटना घटे, तब समय और मौका है कि हम परमेश्वर को स्तुति की भेंट चढाएँ ।

भजन १४९ के ९ में हम से कहा गया है कि जब हम अपने बिस्तरों पर सोते है तो हमे अपने मुँह से परमेश्वर की उच्च स्तुति करनी चाहिये Šयों कि जब हम सोते जाते है तब ही चिंताएँ सताती हैं । इस प्रकार स्तुति करने से हम अंधकार की ताकतों को बांधते हैं (रोमि १६:२०) यह प्रावधान हर एक ईश्वर की संतान के लिए सुरक्षित हैं ।

अत: हर एक परिस्थितियों और हर एक व्यŠतयों के लिए आईए हम स्तुति और धन्यवाद के नये गीतां को सीखें कि संसार के अपने जीवन मे हम अपने परमेश्वर का आदर कर सके और उसके छुटकारे का अनुभव कर सकें । आमीन

अध्याय 12
मसीही Šयों गिरते हैं

मसीही Šयों पाप मे गिरते हैं

इसके पहले कि हम कारण खोने हमे परीक्षा में पडना और पाप करना में अंतर जानना पडेगा । याकुब १:१४,१५ मे साफ वर्णित है कि हर एक परीक्षा में सब पडता है जब सांसारिक लालसाआें के वशीभूत होता हैं (शरीर की अभिलाषाएँ) और जब उसका मन परीक्षा को स्वीकृति देता है तो लालसा गर्भवती हो कर ह्दय में पाप को जन्म देती हैं ।

हम इस महान सत्य को देखते हैं कि जब हमारा पुराना मनुष्यत्व मसीह के साथ क्रुसित हो जाता है तो हम विश्वास से पुराने मनुष्यत्व को छोड देते हैं । तब हम जानबूझ कर पाप करनेसे बच जाते हैं हम नया जन्म प्राप्त करते हैं । योहन्ना ३:९ परीक्षाएँ फिर भी आती हैं हमारा मन शरीर को अवसर नहीं देता ।

यद्यपि हम पाप करना बंद कर देते हैं फिर भी हम पाप में गिर सकते हैं (गलतियों ६:१) पाप करने और पाप में गिरने में अंतर हैं ।

यद्यपि हमारा पुराना मनुष्यत्व क्रूस पर चढा दिया गया है परंतु हमारा शरीर लालसाआें में फसाने अभी भी जिन्दा है । हमे प्रभु को दुल्हन की तरह विश्वास योग्य होना चाहिए और अपने को शरीर की अभिलाषाआें में फँसने से रोकना चाहिए । हम शरीर के साथ व्यभिचार नहीं करते नहीं तो हम वेश्या कहलाते और प्रभु की दुल्हन नहीं होते (प्रका वा १७:५) परंतु एक स्त्री को जोर जबरदस्ती से गर्भवती किया जा सकता है जब कि वह स्वेच्छा से ऐसा नहीं करना चाहती । इस स्थिति में वह अच्छी स्त्री कहलाएगी ये वाकया पाप में गिरने और पाप करने मे अंत बतलाता हैं ।

यद्यपि पाप मे गिरना बुरा नहीं है जितना पाप करना । परंतु दोनो के अंत मे पाप जन्म लेता हैं । नये नियम में प्रभु यीशु की प्रतिज्ञा है कि वह हमे पाप में गिरने से बचाऐगा यहूदा २४ यूही विजयी जीवन है जब हम पाप में गिरने से भी बचते हैं ।

यदि तुमने पाप करना रोक दिया है फिर भी पाप में गिरते हो तो पाप मे गिरने के निम्न कारण हो सकते हैं

१) परमेश्वर के डर, भय में कमी

परमेश्वर का भय मानना बुध्दि का मूल हैं (नीतीवचन ९:१०) यदि हम वर्णमाला नहीं सीखते है तो हम आगे नहीं बढ सकते हैं । परमेश्वर स्वयं बुराई से घृणा करता हैं (नीति ८:१३) जब हमने प्रभु की यह बुलाहट सुनी है कि हम पवित्र हों तो यह बुलाहट हमे पाप से घृणा करना सिखाएेंगी ।

कई विश्वासी कुछ पाप जैसे क्रोध, यौन अपराध इत्यादि पर सरलता से विजय प्राप्त कर लेते है Šयों कि उन्हे अन्य विश्वासियों के बीच अपनी इज्जत खोने का डर होता है । परंतु ये पाप सरलता से करते हैं जब वे अकेले होते हैं । इससे यह प्रगट होता है । परमेश्वर के भय से अधिक अपनी इज्जत को प्यार करते हैं । परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक लोगों की प्रशंसा, ऐसे मसीहियों को दु:खित होना चाहिए और पश्चाताप करना चाहिए कि वे कर्ता से अधिक कृति की पूजा करते हैं। और उन्हे संपूर्ण ह्दय के साथ परमेश्वर के सामने रोना चाहिए कि परमेश्वर भय सीख सकें । (नीतीवचन २:३५, मत्ती ५:६) परमेश्वर उन्हें ही मिलता हैं जो संपूर्ण ह्दय से उसे खोजते हैं । (यिर्मयाह २९:१३) केवल उन्हं जो अपनी असफलता के लिए दुखित होते है केवल वे ही दिलासा प्राप्त करते हैं (मत्ती ५:४)

परमेश्वर ने हर कए को एक व्यŠतगत दायरा (हमारी वैचारिक जिंदगी) दी है कि वह परख सके कि हम उससे भय खाते है कि नहीं ? यदि केवल हम प्रभु की प्रशंसा पर ध्यान देते है तो हम अपनी वैचारिक जिन्दगी पाप करने से छूट पा लेेंगे । इसलिए परमेश्वर उन लोगों मेें जो सच्ची विजय चाहते है और जो पाप के ऊपर ऊपरी और सतही विजय चाहते है उसमें भेद करता हैं ।

२) विश्वास की कमी

मसीही जीवन मे उन्नति विश्वास के द्वारा होती हैं । धर्मी विश्वास के द्वारा जीवित रहता है (रोमियो १:१७) और उसका रास्ता ज्योति में बढता जाता हैं । (नीति व ४:१८)

हमे पाप की क्षमा और पुराने मनुष्यत्व से छुटकारें के लिए विश्वास हो सकता है परंतु फिर भी यह विश्वास न हो कि यीशु हमे पाप में गिरने से बचायेगा जैसा इस्राएलियों ने कादेशबर्निया में राक्षस सरीस्ते लोगों को देख कर यह अविश्वास किया था कि वे प्रतिज्ञा के देश में नहीं प्रवेश कर सकते ।

परमेश्वर के राज्य का यह महत्वपूर्ण नियम है कि हम अपने विश्वास के अनुसार ही आशीषें प्राप्त करते हैं । (मत्ती ९:२९) परमेश्वर पक्षपात नहीं करता जो उसे विश्वास के साथ तत्परता से खोजते हैं उनपर वह पुरस्कृत करता हैं (इब्रा ११:६ ) इसलिए कुछ विजयी जीवन को प्राप्त करते है जैसे यहोशु और कालेब और कई हार मान लेते हैं । जिंदगी की राह सकरी हैं जिसमें थोडे चलते हैं और ये थोडे वे हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और उससे डरते हैं । प्रभु यीशु अपने नगरवालों के अविश्वास के कारण वहाँ आश्चर्यकर्म नहीं कर सका । वह खुद बहुत इच्छुक था कि उन्हें चंगाई दें । परंतु उनके अविश्वास ने उन्हें सीमित कर दिया (मत्ती १३:५८) और यही आज भी होता हैं । वह बडे काम करना चाहता हैं परंतु हमारे विश्वास की घटी के कारण सीमित हो जाता हैं ।

विश्वास बौध्दिक भरोसे के ऊपर हैं । यह ज्ञान की यीशु हमे पाप में गिरने से रोकने की सामर्थ रखता है और यह विश्वास कि यीशु हमें पाप में गिरने से बचायेगा दो अलग बाते है । पहली ज्ञान की क्रिया है जो शैतान के पास भी है, दूसरी आत्मिक क्रिया ह्दय से संबंधित है, विजयी बनाने वाली ।

परमेश्वर की प्रतिज्ञा है पाप तुम्हारे ऊपर शासन नहीं करेगा रोमियो ६:१४ इस पर विश्वास करो और याद रखो प्रतिज्ञा के वचन नहीं बदलते । उठो और परमेश्वर के वचन पर आशा रखो, जब तक वह विश्वास में न बदल जाये और विजय तुम्हारी होगी।

३ देह की कमजोरियों को न जानना

हमारी देह परमेश्वर की इच्छा पर चलने के लिए पूर्णत:या असमर्थ हैं (मत्ती २६:४१) पौलुस ने भी इसे महसूस किया और कहा मेरी देह में कोई अच्छी चीज वास नहीं करती (रोमियो ७:१८) और जो कोई इस चीज को महसूस करता है वह ये दो बाते करेगा । वह परीक्षा से मागेगा और परमेश्वर से सहायता प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करेगा । जो मनुष्य ऐसा नहीं करता वह अपनी देह को अभी भी कमजोर नहीं मानता ।

प्रभु यीशु ने हमे प्रार्थना करना सिखाया कि हमे परीक्षा में न डाल (मत्ती ६:७३) इस प्रार्थना को हम पूरे ह्दय से करते हैं Šयोंकि हमे पŠका हैं कि हमारी देह कमजारे हैं । तिमोथी सरीखे परमेश्वर के जन को भी सिखाया गया कि वह अपनी जवानी की अभिलाषा से भागे और धन के मोह से दूर रहें । (२ तिमो २:२२ १ ति ६:१०-११) कोई यह सोच सकता है कि मसीही जीवन मे परिपŠव हो जाने के बाद भी तिमोथी कैसे इन परीक्षाआें में पड सकता है परन्तु पौलुस जानता था कि ऐसा हो सकता है और उसने इसलिए तिमोथी को परीक्षाआें से भागने को कहा जो व्यŠत अपने देह की कमजोरी को जानता है वह इस शिक्षा को अवश्य मानेगा ।

जो व्यŠत इस कमजोरी को महसूस करता है वह अनुग्रह के लिए परमेश्वर को पुकारेगा कि कमजोरी पर विजय पाने के लिए परमेश्वर सहायता करें । हम सब कमजोर हैं परंतु सब अपनी कमजोरी के प्रति सतर्क नहीं हैं । कमजोर व्यŠत खतरे को देख कर भागता है परन्तु बलवान अपने को कुछ समझ कर नहीं डरता। वह सहायता के लिए नहीं पुकारता और इस लिए आैंधे मुॅह गिरता है ।

सच्ची नम्रता इसमें है कि देह की कमजोरी को पहचाने, परीक्षा से भागे और सहायता के लिए पुकारें । उन लोगों को परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त होता है जो नम्र हैं । (१ पत ५:५)

४ दु:ख उठाने के मन का अभाव

पाप करने में आनंद हैं । परंतु यह धोखेवाला कम अवधि का होता हैं (इब्रा ३:१३, ११:२५) आनंद का उलटा दु:ख हैं दु:ख सहना मतलब देह में किए गए पाप के आनंद का इंकार करना । यदि हम अपने को इस भावना से लैसे करेंगे तो हम पाप करना छोड के पूरी जिन्दगी ईश्वर की इच्छा पर चलेंगे । (१पत ४:१२) देह में दु:ख उठाने का अर्थ शारीरिक चोट उठाना नहीं हैं, Šयोंकि ऐसा करके कोई पाप करने से नहीं बचता । इसका अर्थ उस दर्द से है जो देह को तब होता है जब हम देह की इच्छाआें का इंकार करते हैं । हम अपने को खुश करने का इंकार वैसा ही करते है जैसा यीशु ने किया । रोमियो १५:१३ इस प्रकार हम उसके दु:ख मे भागी होते हैं ।

देह में दु:ख सहने का यह निश्चित भाव पतरस कहता है हमारी लडाई का मुख्य अस्त्र हैं । परंतु लडाई के पहले ये अस्त्र हमारे पास होना चाहिए । परीक्षा की मार के बाद इन अस्त्रों को खोजना व्यर्थ हैं Šयोंकि तब ये नहीं मिलेंगे । लडाई के पहले अस्त्र धारण करना हैं । यदि ये अस्त्र न हो तो परीक्षा में पडने पर पीछे हटने से मुँह की खानी पडती हैं । (इब्रा:१०:३८)

यदि हम पाप करने के बदले मर जाँए या मरने का निश्चय कर ले तो हम यीशु की तरह मरने तक विश्वास योग्य होंगे (फिलिप्पियों २:८) तब यह अस्त्र हमारी शŠत होगा और लडाई के दिन हमारी रक्षा करेगा ।

यदि हम पार्थिव वस्तुआें से प्रेम रखते है तो जब हम उन्हें खोते हैं या कोई हमारी बहुमूल्य सम्पत्ति का नुकसान पहुँचाता है तो हम सरलता से शांति खोकर पाप में पड जाते हैं । यदि हम विश्वास करते है कि परमेश्वर हमारे लिए सब बातों को मिले के लिए निश्चित करता है तो हम इस सम्पति की हानि आनंदपूर्वक उठा सकते हैं (रोमियो ८:२८) (और इब्रा १०:३४)

५ आगे नहीं बढना

पतरस कहता है यदि हम अपने मसीही जीवन में आगे बढते जाएंॅ तो हम कभी नहीं गिरेंगे । (२ पत १:५-१०)कई मसीही आगे बढने के बदले अपनी आत्मिक उन्नति से ही संतुष्ट हो जाते है और इस लिए पाप मे गिर जाते है । पौलुस ने एक बात यह की निशाने की ओर बढता गया । यीशु की तरह बनने के लिए । (फिलि ३:१३,१४) इस बात में निष्क्रिय रहने और पाप करने से रोका । उसने तिमोथी को प्रोत्साहित किया कि न केवल परीक्षा से भागे परंतु प्रेम, दया सरीखों ईश्वरीय भावनाआें का पीछा करें । (१ तिमो ६:११) और (२ ति २:२२)

कुछ पाप करना छोड देते है और संतुष्ट हो जाते है परन्तु फिर भी वे पाप में पडते है और इस तरह कमी गिरने से बच नहीं पातें ।

उस बुराई को जो हमारे देह में वास करती है कि खोज में हमे लगे रहना चाहियें । और यह तब संभव है जब हम परिस्थिति में परमेश्वर के प्रकाश के अनुसार अपने को सदैव जोचते रहें । जब हम प्रकाश मे चलते है तो हम स्वर्गीय स्वभाव में लगातार भागी हो सकते हैं ।

इस प्रकार हम अपने विश्वास के साथ भाईचारे की दया, प्रेम, अच्छा स्वभाव इत्यादि का मेल कर सकें । यदि हम अपने मन हर समय अच्छे विचारों से भरते रहें तो पाप हमारे मन में सरलता से प्रवेश नहीं करेगा । खाली मन है जो परीक्षा का शिकार बनता हैं ।

६ अपनी जिन्दगी के सिंहासन से अहँ को न हटाना

आदम की संतान मे उसका दैहिक जीवन की मालिक (प्रभु) हैं । वे अपने तर्क और भावनाआें के अनुसार जीते हैं । हम जब परिवर्तित होते है और देह के पापों को छोड देते है हम प्राय: यह नहीं सोच पाते कि हमे अपने दैहिक जीवन अर्थात तर्क और भावनाआें के प्रभुत्व को निकाल फेंकना हैं । हम इन चीजों को हानि रहित और साधारण समझते है जब कि यही शासन करनेवाला दैहिक जवीन मसीहियों को पाप में गिरा देता हैं ।

मसीही सम्मेलनो में भावनाआें का अनियमित उच्चार, कई असामान्य अ ती की ओर ले जाकर पाप मे गिराता हैं । भावनाआें में जीना आत्मा में जीने के समान नहीं हैं ये दोनो धरती और स्वर्ग की तरह अलग है । भावनाआें से ओत प्रोत समा जरूरी नहीं है कि आत्मिक हो Šयोंकि कई लोग ऐसे वातावरण में जोशीले होने के बाद पाप कर बैठते हैं । हमारी भावनाएँ धोखेबाज हैं ।

इसी प्रकार हमारा ज्ञान भी धोखेबाज होता है । कई मसीही अपनी समझ के और तर्क के द्वारा ईश्वर से संबंधित बातो को समझने की कोशिश करते हैं नतीजा यह होता है कि वे मृत बाईबिल के ज्ञान से फूल कर पाप में गिर पडते हैं (१ कु ८:१) उनका यह गिरना ज्यादा स्पष्ट नहीं होता Šयोंकि अहं व्यभिचार की तरह कुरूप नहीं दिखता । परंतु यह वास्तव में बुरी रीति से गिरना हैं । और यह आगे भी गिरने का कारण बनता हैं ।

इस कारण नम्र बनो अपने ज्ञान और भावनाआें के प्रभुत्व को हटाओ और छोटे बच्चे की तरह बिना प्रश्न किए ईश्वर के प्रति आज्ञाकारी जीवन जिओ । अपने दैहिक जीवन से घृणा करो । आत्मा से जीवन जिओ और परमेश्वर की बुध्दि और सामर्थ पर निर्भर रहों । इस प्रकार तुम अपनी आत्मा को बचाओगे और पाप में पडने से बचोगे ।

७ सहभागिता की कीमत न समझना

नये नियम में व्यŠतगत मसीहियत की तरह कोई चीज नहीं हैं । पुराने नियम में भविष्यवŠता अकेले रहते थें । Šयोंकि वे दिन छाया मात्र थे । (कुलु २:१७) परंतु अब प्रभु की देह है जिसमें हमारा स्थान है और हमारा सिर प्रभु है हमे पाप में पडने से बचाता हैं । पौलुस स्पष्ट रूप से कहता है कि जब हम प्रभु को पकडे रहते हैं तो गलती करने से हम बचाये जाते हैं । और इस आशीष को हमे अन्य सदस्यों की ओर बहने देना चाहिए । (कुलु २:१९)

यीशु ने कहा कि इस कलीसिया पर अधोलोक के फाटक प्रबल न होंगे (मत्ती १६:१८) परंतु शैतान उस मसीही पर जो अकेले रहता है अवश्य प्रबल होता हैं । यह काफी नहीं है कि हफ्ते में दो बार समाआें में जायें, हमे अन्य सदस्यों के साथ सहभागिता को मूल्यवान समझना है और प्रभु की देह में एक होना हैं । केवल तब जब हम प्रभु की देह के सक्रिय सदस्य बनते हैं हम उसकी विजय में भी शामिल हैं । और तब जब हमारे ऊपर दबाव की घडी आती है तो अन्य सदस्य हमारे, हमे ताकत दे सकते हैं (समो ९:४१२) यही आपसी उत्साह बद कि परमेश्वर के साधन बनते हैं कि हमे धोखा खाने और पाप में गिरने से बचाये (इब्रा ३:१३) । इस सहभागिता की कीमत पहचानो तो तुम कई असफलताआें और ह्दय की वेदना से बच जाओगे ।

अत: हमने देखा कि ऐसा कोई एक बार का अनुभव नहीं है जिससे यह निश्चित हो कि हम आगे को पाप में नहीं गिरेंगे । परंतु यदि हम आत्मा के नियमों का पालन करे तो यह हमे पाप की गुलामी से छुडाएगा और हम पाप में गिरने से बचेंगे रोमियो ८:२ तब हम चेले की तरह पुकार सकते है । २ Šलु २:१४ परंतु परमेश्वर का धन्यवाद हो जो मसीह में हमे सदा सह को जय के उत्सव में लिए फिरता है, और अपने ज्ञान की सुगंध हमारे द्वारा हर जगह फैलाता हैं

अध्याय 13
मृत कार्य

नये नियम मे देह के कार्य (गला ५:१९) और इसी प्रकार मृत कार्य (इब्रा ६:१) के विषय बताती हैं ।

जो देह के कार्य जैसे अनैतिकता, झगडा, जलन, क्रोध इत्यादि मे लिप्त रहते है वे परमेश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं होंगे । ये कार्य स्पष्टत: से बुरे हैं और मुश्किल है कि विश्वासी इन कार्यो में लिप्त हों Šयों कि उनका विवेक उन्हें अवश्य काटेगा ।

मृत कार्य इनसे भी अधिक धोखे वाले हैं । यह ऊपरी तरह से अच्छे कार्य लगते है परंतु इनका जन्म भष्ट स्त्रोत से होता है और इस कारण यह परमेश्वर की दृष्टि में मैले कपडों की तरह हैं । (रोमियो ७:१८), (यशा ५४:६)

इसलिए हमे आज्ञा दी गयी है न केवल अपने पापों के लिए परंतु मृत काया] के लिए भी पश्चाताप करें । ऐसी ही नीव डालने के बाद हम सिध्दता की ओर बढ सकते हैं (इब्रा ६:१)

विश्वासियों के बीच यह जानी मानी बात हैं कि मसीह का लोहू हमे सल पापों से शुध्द करता हैं । जो बात नहीं मालूम वह यह है कि मसीह का लोहू हमारे विवेक के मृत कार्यो को भी शुध्द करता हैं कि हम जीवते परमेश्वर की सेवा कर सकें ।

इसलिए जरूरी है कि हमे मृत कार्यो की सही जानकारी हो ।

१) बिना प्रसन्नता के किये गये कार्य

परमेश्वर आनंद से देने वाले से प्रेम करता हैं (२ Šलू ९:७) वह उन्हें भी प्यार करता हैं जो आनंद पूर्वक उसकी इच्छा पर चलते हैं । वह उनसे मिलता है जो आनंदपूर्वक धार्मिकता के काम करते हैं (यशा ४:५) जब इस्त्राएलियों ने परमेश्वर की आनंद से सेवा नहीं की, तब उन्हें प्रताडना मिली कि वे अपने शत्रुओ की सेवा करें (व्यव वि २८ :४७:४८) परमेश्वर का राज्य पवित्रात्मा के द्वारा आनंदपूर्वक की गयी धार्मिकता हैं (रोमियो १४:१७) केवल वे जो उसकी आज्ञा पर चेन से खुश होते है परमेश्वर के ह्दय को आनंदित कर सकते हैं ।

उदाहरण स्वरूप दसवांश के विषय सोचे यह पुराने नियम की व्यवस्था थी परन्तु नये नियम मे न तो यीशु नही चेलों के द्वारा ऐसी आज्ञा दी गयी तो भी बहुत से लालची पास्टर अपनी कलीसिया पर दसवांश देने पर दबाव डालते है Šयों कि उन्हें ऐसा करने से ईश्वरीय कृपा प्राप्त होगी अन्यथा वे ईश्वरीय न्याय के भागी होंगे । लोग देते तो है पर खुश हो कर नहीं । यह मन से देना नहीं परंतु कुडकुडाकर देना हैं । जब दान की पेटी भरती हैं तो पास्टर खुश होते हैं न कि परमेश्वर । पास्टर अधिक देनेवालों को प्यार करते हैं परन्तु परमेश्वर आनंद से देनेवालों से प्रेम करता हैं ।

नये नियम का सिध्दांत यह नहीं है कि उतना दो जितना दे सकते हो परंतु यह है कि उतना दो जितना कि प्रसन्नतापूर्वक दे सको, परमेश्वर इससे अधिक नहीं चाहता । यह जरूर हैं कि वही पाओगे जिस अनुपात में दोगे । (२ Šलू ९:७)( और लुका ६:३८) परमेशव्र ऐसी कोई सेवा और भेंट नहीं चाहता जो अनिच्छा पूर्वक दी गयी हों । जो हम बिना प्रसन्नता के करते हैं वह मृत कार्य हैं ।

२ प्रेम रहित किया गया कार्य

परमेश्वर को प्यार करना और मनुष्यों को प्यार करना ये दो खूंटियाँ हैं जिन पर सारी व्यवस्था टंगी हुयी हैं । (मत्ती २२:४०) खूंटियो को निकालो और पूरी आज्ञाए घराशायी हो जायेंगी यही कारण था कि इफीसिया को कलीसिया के अगुवे को डाँटा गया, उसके कार्य परमेश्वर और मनुुष्य के प्रति प्रेम के द्वारा प्रेरित नहीं थे । (प्रका वा २:२४) यदि हम परमेश्वर के आज्ञाआंे को उनमें छिपी आत्मा के अनुसार न माने तो हमारे कार्य मृतकार्य हो जाते हैं । यदि हमे प्रभू के झूठ की चखाही करने के लिए चूना जाता है तो पतरस की तरह पहले वह हमे परखता है कि हम उससे पूर्णत: प्रेम करते है या नाही (योहन्ना २१:१५-१७) अन्यथा हमारी सेवा व्यर्थ होती हैं । इसी प्रकार यह काफी नहीं है कि हम उन्हें आशीष दे जो हमे श्राप देते हैं हमे उन्हें ह्दय से प्रेम भी करना चाहिए अन्यथा हम आज्ञा के शब्दों को पूरा करते है न कि उसकी आत्मा को । इसी प्रकार जब हम कलीसिया के भाई बहनों की सेवा करते हैं जैसा कि हमें सिखाया गया है परन्तु यदि उनकी आलोचना भी करते है तो हमारी सेवा मृत कार्यो का देर बनती हैं । परमेश्वर के कार्य के लिए किये गये हमारे सब बलिदान व्यर्थ होते है यदि वे परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम से नही उपजते ।

३ बिना उत्साह के किए गए कार्य

प्रभु कहता है मै तुम्हारे कार्यो को जानता हूँ न कम ठंडे हो न गरत परन्तु गुनगुने हो उत्साही बनों (प्रका वा ३:१५-१९) आधे ह्दय से किय गये मृत कार्ये । हमे अपने प्रभु परमेश्वर से अपने सारे ह्दय से, अपने सारे प्राण से अपने सारे मन से और अपनी सारी शŠत से प्रेम रखना चाहिए । (मखुस १२:३०) हमारी स्तूति अराधना भी सम्पूर्ण ह्दय से हो न कि बजान और मृत । हमे प्रार्थना बोझ के साथ और भविष्यवाणी उत्साह के साथ करनी चाहिए । हमें हर समय आत्मा से प्रकाशित रहना चाहिए (रोमियो १२:११) वेदो मेआग सदैव जलती रहना चाहिये (लैव्य ६:१३) । हमे इस अग्नी को आत्मा के वरदानों से जो ईश्वर ने हमे दिये है हवा देते रहना चाहिए । इन वरदानों का तिरिस्कार नहीं करना चाहिए । (२ तिमो १:७) बहुत सी मसीही समाएँ पवित्रात्मा की अग्नी से रहित हो कर बेजान स्थिति में हैं । वे प्रभु के द्वारा तिरिस्कृत किए जाने पर (प्रका वा ३:१६) हैं । अपने जीवन में अपने इन काया] के लिए पश्चाताप करने की जरूरत हैं ।

४ बिना विश्वास के किए गए कार्य

बिना कार्य के जैसे विश्वास मरा हुआ है उसी प्रकार कार्य बिना विश्वास के मृत कार्य हैं । (याकूब २:२६) बहुत सी प्रार्थना समाएँ विश्वास की कमी से मरी हुयी हैं । विश्वास से की गयी पाँच मिनट की प्रार्थना परमेश्वर के उद्देश्य को पूरा करने के लिए ज्यादा सामर्थी हैं बनिस्बत पूरे रात भर की गई प्रार्थना । यीशु ने पूरी रात प्रार्थना की हमे भी ऐसा ही करना चाहिये जब जरूरत हो । विश्वास का अर्थ व्यŠतगत सच्चाई जानना हैं (रोमियो १४:२२) परमेश्वर का कोई बडा जन जिन विशेष सिध्दांतों पर विश्वास करता है और सिखाता हैं बिना सƒाई जाने उस पर चलना ठीक नहीं । तो भी मसीही समाज ऐसे विश्वासियों से भरा हैं जो दूसरों का अंध अनुसरण करते हैं । यह नकल मृत कार्य हैं । इस्त्राएलियों ने विश्वास से लाल समुद्र को पार किया । मिश्रियो ने नकल की और डूब गये यह हमारी चेतावनी के लिए लिखा गया हैं । हमे दूसरों की सेवा के तरीके की नकल नही करना चाहिए । हमे अपने विश्वास के अनुसार भविष्यवाणी करना चाहिए । परमेश्वर चाहता है कि हमे जो गुण दिये गये है उसी के अनुरूप प्रभू की देह को अपनी विशेष सेवा प्रदान करें ।

५ व्यŠतगत लाभ और प्रशंसा के लिए गए कार्य

मै तेरे कामों को जानता हँू , तू जीवित तो कहलाता हैं, पर है मरा हुआ (प्रका वा ३:१)

यहों एक मनुष्य था जो आत्मिक रूप से मरा हुआ था पर संतुष्ट था कि वह जीवित हैं वह परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक मनुष्यों की प्रशंसा चाहता था (योहन्ना ५:४४) और इस कारण उसके काम मरे हुए काम थे । वह कार्य जो हम मनुष्यों को प्रभावित करने के लिए करते है वे मरे हुए कार्य हैं । वे सब कार्य जो हम चाहते है कि लोग जाने वे भी मृत कार्य है (मत्ती ६:१८) जीवित कार्य वे हैं जो परमेश्वर के सम्मुख गुप्त में किये जाते हैं लोगों की नजरों से छिपा कर । परमेश्वर के लिए किए गए कार्यो के लिए जब हम प्रशंसा चाहते है तो हम अपने हाथो के कार्य की पूजा करते हैं (प्रेरित ७:४१) और हमारे कार्य मृत कार्य ही जाते है । दानियल ४:३० मे बतलाया गया है कि बेबीलोन इसी प्रकार बनाया गया ।

ज्यों ही हम इस परीक्षा में पडते है कि लोग हमारे और हमारे कार्यो के विषय में Šया सोचते है हमे इन विचारों को कचरे की टोकरी में डाल देना चाहिए । यहाँ तक कि उन विचारों को भी जो प्रभु के भŠत हमारे विषय रखते है वे भी कचरे में फेंकने योग्य हैं । लोगों की आँखो मे अपने को धर्मी सिध्द करना परमेश्वर की दृष्टि में गंदगी (लूका १६:१५)

केवल वही जो इन बातों के प्रति सतर्क है । मृत कार्यो को करने की आशा से बच सकता है । इसी प्रकार पैसा लेकर की गयी प्रभू की सेवा भी मृत कार्य हैं । वेतन लेकर किया गया कार्य मसीही कार्य नही हैं । मसीही नाम लेकर भी यह मात्र मानवीय कार्य है प्रभू और पैसे के सेवा एक साथ करना असंभव हैं ।

६ अपने विवेक को संतुष्ट करने मात्र किया गया काम

अविश्वासी भी अपने विवेक से दोषरहित रहने के लिए उपवास, प्रार्थना और दान देने को कार्य करने के लिए प्रेरित किये जाते हैं (रोमियो २:१५)

मसीहियों के लिए भी अपने विवेक को शांत रखने के लिए रोज बाईबिल पढते और प्रार्थना करते हैं इसी भावना से वे सभाओ में जाते, दसवांश देते भिखारियों को दान देते हैं ये सब कार्य मृत कार्य हैं । लोगों की इसी कमजोरी का फायदा कई प्रचारक उठा कर कहते हैं कि दान दो Šयों कि करोडो बिना मसीह के मर रहे हैं । दान दें अन्यथा उन्हें छोडें । इससे प्रेरित होकर कुछ लोग पैसा देते हैं और कुछ लोग अपनी नौकरी छोड कर मसीही सेवा मे लग जाते हैं, परंतु ये दोनो प्रकार के लोग परमेश्वर की अग्राही के अनुसार ऐसा नहीं करते परंतु अपने दोषी विवेक को शांत करने की भावना से प्रेरित होकर मृत काया] को करने के चŠकर मे पड जाते हैं ।

७ स्वर्गीय न्याय के डर से किये गये कार्य

परमेश्वर के न्याय से डर कर पाप से माँगना अच्छी बात हैं । परंतु प्रभू यीशु ने पाप से बचने के लिए इस बात से प्रेरणा नहीं ली । वह पिता परमेश्वर को खुश रखना चाहता था इसलिए वह पाप मं नहीं पडा । यही हमारी भी प्रेरणा होना चाहिए । मान लें पराई स्त्री का लालच करना या झूठ बोलना, या दूसरे के प्रति बुरी भावना रखने के लिए कडी सजा का प्रावधान हैं । तो हम ऐसे पापों में नही पडेंगे । या परमेश्वर को प्रसन्न करने की प्रबल इच्छा के कारण हम यह गलत कार्य नहीं करेंगे । प्रत्येक व्यŠत इन चुनाआें में से एक को चुने कि डरते और काँपते हुए मृत कार्यो से उध्दार पाएँ । दूसरों को इसलिए क्षमा करना कि ईश्वर हमे विपति में डालेगा बनिस्बत इसके कि ईश्वर भी हमे इसी प्रकार क्षमा करें । बाली भावना भी मृत कार्य को जन्म देती है । तो प्रतिदिन प्रात:काल बाईबिल पढना और प्रार्थना करना कि दिन भर हम खतरों से बचें रहे के विषय हम Šया कहेंगे ? वास्तव में यह भी अविश्वासी के अंध विश्वास की तरह हैं ।

८ पुरस्कार पाने हेतु कार्य करना

यह सच है कि यीशु विश्वासियों को पुरस्कृत करेगा (प्रका वा १२:२२) और यह भी सच है कि हमारी असली इच्छा परमेश्वर को खुश रखना है कि वह हमारे विषय कह सके हे अच्छे और विश्वासी दास तू ने अच्छा किया । (२ क्रूर ५:९) । तो भी प्रभू यीशु ने ऐसी स्वर्गीय पुरस्कार प्राप्त करने की आत्म केंद्रित इच्छा के विरूध्द सतर्क किया है कि हम इनके वशीभूत में हो कर अपना बलिदान न चढाएँ और उसकी सेवा करें ।

पतरस ने भी जब अपनी तुलना धनवान जवान शासक से की (जो प्रभु यीशु मसीह के पीछे नहीं चला और प्रश्न पूछा कि तेरे पीछे सब छोडने के द्वारा हमे Šया प्राप्त होगा (मत्ती १९:२७) । प्रभु यीशु ने उन्हें नौकरों के दृष्टांत के द्वारा उन्हे उत्तर दिया (मत्ती २०: १-१६) इस दृष्टांत मे हम पाते है कि जिन्हों ने पैसे के लिए काम किया वे अंतिम हुए परंतु जिन्होंने बिना पैसे के सोच के काम किया वे पहले हुए यद्यपि उन्हों ने कार्य का बहुत कम हिस्सा निपटाया ।

काम की अधिकता विरूध्द काम का अच्छा पन, यही अन्तर है मृत कार्य और जीवित कार्य में ऐसे कार्य जो कलीसिया में दूसरे विश्वासियों से ऊपर बेहतर स्थिति में रखे जाने की आशा में किए जाते हैं अंतिम दिन में मृत कार्य सिध्द होंगे ।

यदि तुम अपने विचारों को शुध्द रखते हुए दूसरों से अच्छा व्यवहार करते हो अपने पति या पत्नी से प्रेम रखते हो कि भविष्य के दिन तुम्हे ऊँचा स्थान प्राप्त होगा तो यह भी आत्म केन्द्रित हो कर अच्छे कार्य करना है जो मृत कार्य की श्रेणी में आता हैं ।

जिन्हें जीवन का मुकुट प्राप्त होता हैं वय इसे परमेश्वर के पैरों तले रख देते है यह कहते हुए तू ही प्रभु महान हैं (प्रका वा ४:१०) जब हम अपनी भावनाआें को परमेश्वर की प्रशंसा करने की इच्छा से शुध्द करते है तभी हम मृत कार्य करने से बच सकते हैं । यदि हम अपने द्वारा किए गए अच्छे कामों को स्मरण करेंं तो पाएेंगे किये मृत कार्य हैं । प्रभु यीशु ने अंतिम न्याय के दिन की दो तस्वीरे पेश की हैं । एक उन मनुष्यों की जिन्होंने इस पृथ्वी पर किये गये, अपने अच्छे कामों को वर्णन किया कि उन्होंने प्रभु के नाम से भविष्यवाणी की, लोगों को चंगा किया इत्यादि (मत्ती ७:२२,२३) ये लोग प्रभू द्वारा तिरिस्कृत किये गए । दूसरा यह तस्वीर उन धार्मिक लोगों की है जिन्हें प्रभु ने उनके अच्छे कार्यो की याद दिलायी तो वे अचंमित हुये और कह उठे हमने कब यह किया (मत्ती २५:३४-४०) वे अपने द्वारा किये गये अच्छे कार्यो को भूल चुके थे Šयोंकि पुरस्कार प्राप्ती के लिए उन्हों ने ये कार्य नहीं किये थें । यहाँ हम अच्छे कार्य और मृत कार्य के बिमेद को अच्छी रीति से देख सकते हैं । हम किस श्रेणी में आते हैं ।

९ कार्य जिनमें यीशु की मृत्यु की धारणा न हो

प्रभू को हजारो जीवन में निवास करने के द्वारा किये गये कार्य जीवित कार्य हैं । प्रतिदिन अपना क्रूस उठाने के द्वारा यीशु की मृत्यु को धारण करने से ही ऐसे कार्य करना संभव हो सकता हैं (र Šलू ४:१०) यदि हम अपनी जीभ को क्रोधित होने से रोकते है और अपने चेहरे को गुस्सा होने से रोकते हैं परंतु अन्दर ही अन्दर गुस्से और चिडचिडाहट से आमबबूला होते हैं तो यह विजयी होना नहीं हैं परंतु अपने को दबाना हैं । योगा की यही शिक्षा है न प्रभु यीशु की । प्रभु यीशु ने प्रतिदिन अपना क्रूस उठाने को कहा क्रूस की मौत, गोली मार देने या फाँसी पर लटका देने के विपरीत लंबी प्रक्रिया हैं । यदि हम इस अपराधी देह को क्रुसित किये रहें तो इसकी मृत्यु अवश्य होगी और हम अंदर से भी पाप करने से बच जायेंगे । (१ पतरस ४:१) तब हमारे अन्दर से जीवित जल की नदियाँ फूट निकलेगी जो आत्मा के अच्छे कार्य होंगे । (योहन्ना ७:३८) हमारा आंतरिक स्वभाव तब हमारे बाहरी रूप और कार्य से मेल खायेगा और तब हमे नकली हंसी और दिखावे की जरूरत नहीं होगी ।

१० हमारे मानवीय तर्क से उत्पन्न कार्य

माथी की प्रभु और उसके लोगों की सेवा करने की बिना स्वार्थ और त्याग से किये गए अच्छे कार्य भी मृत कार्य के अच्छे उदाहरण हैं । (लुका १०: ३८-४२) उसने ये कार्य अच्छे कार्य सोच कर किये परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि सेवक अपनी इच्छा के अनुसार नहीं परंतु मालिक के बताये अनुसार कार्य करें (१ Šलू ४:२) इस तरह मरियम बुध्दिमान थी कि प्रभु के पाव के तले बैठकर जाने कि वह Šया चाहता है (इब्रा ४:१०-१२) में बताया गया कि परमेश्वर का वचन अत्मिक कार्य और दैहिक कार्य में अंतर बतलाता है और जिस प्रकार हमे पाप करने से बचना चाहिए उसी प्रकार अपने मन से किए गए कार्य से भी बचना चाहिए । दैहिक कार्य मृत कार्य होते हैं । प्रभु यीशु ने अपने मन से कोई कार्य नहीं किया (योहन्ना ५:३०) । आज भी परमेश्वर उनको नहीं खोजता जो उसके कार्य को करने के लिए चमत्कारिक विचार रखते हैं । (Šयों कि इससे इस्माईल ही पैदा होते हैं) परन्तु परमेश्वर उनको ढूॅढता है जो नम्र होते है और अपनी बुध्दि और सामर्थ की कमी को पहचानते हुए अपने को समर्पित करते है कि परमेश्वर अपनी इच्छा से काम में लाए । परमेश्वर योग्यता को नहीं पर समर्पण को चाहता हैं ।

मृत कार्यो के इस बखान को सून कर कुछ के लिए यह एक खतरा है कि वे मृत कार्यो की चोटी के दूसरी ओर गिर कर कुछ न करने की चोटी पहुँच जाएँ । आत्मा के जीवित कार्य तभी उत्पन्न हो सकते है जब हम अनुशासित जीवन से आत्मा को सहयोग प्रदान करें । नियम नहीं परंतु अनुशासन जरूरी हैं ।

अत: हम केवल देह की अशुध्दता से ही परंतु आत्म की अशुध्दता से भी अपने को शुध्द करें (२ Šलू ७:१) । ताकि हमारे धार्मिक कार्य मेम्ने के दिन विवाह का पहिरावा बन सकें (प्रका वाŠय १९:८)

अध्याय 14
परमेश्वर की आशीष या परमेश्वर की स्वीकृति

दो प्रकार के विश्वासी होते हैं "एक जो ईश्वर की आशीष चाहते है और दूसरे जो परमेश्वर की स्वीकृति चाहते हैं" | और इनके बीच मे भारी अंतर हैं । प्रका वा ७:९-१४ मे हम पढते हैं विश्वासियो की एक बडी भीड है जिसे गिना नही जा सकता । और उनकी गवाही है कि उनका उध्दार परमेश्वर से हुआ है और उन्होने अपने कपडे मसीह के लहू से धो कर सफेद किये हैं । अर्ति उन्हे परमेश्वर ने आशीष दी हैं । बेशक यह अच्छा हैं परंतु प्रका वा १४ का १५ में बताए गए विश्वासी समुदाय की गवाही इन से बहुत अलग हैं ।

यहाँ हम एक छोटे समुदाय जिन्हे गिना जा सकता है के विषय मे पढते हैं । वास्तव में यह छोटी संख्या १४४०० हैं । जो कि पृथ्वी के रहनेवाले करोडो लोगों मे से चुने गये हैं । इनकी गवाही है कि इन्होंने पृथवी पर मसीह का पूर्णतया अनुसरण किया । उनके मुॅंह मे कोई दुष्टता की बात नहीं पायी गयी और उन्होंने अपने को उस स्त्री के संपर्क से बचाये रखा जो प्रका वा १७ मे बेबीलोन और उसकी पुत्रियों को दर्शाता है अर्थात उन्होंने परमेश्वर को प्रसन्न रखा ।

अन्तर पर ध्यान दें । पहले समुदाय ने परमेश्वर की आशीषे प्राप्त की और दूसरे समुदाय ने परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त की । हम वही पाते है जो खोजते हैं । यदि हम प्रभु की आशीषे पाने से संतुष्ट हैं तो वही हमे मिलेगी । यदि हम परमेश्वर से सांसारिक आशीषें पा कर ही संतुष्ट है तो हमे आत्मिक आशीषे नहीं मिल पायेंगी ।

बहुत से विश्वासी परमेश्वर से सांसारिक आशीषे ही प्राप्त कर संतुष्ट हो जाते हैं । यही कारण है कि मसीही ग्रन्थालय ऐसी पुस्तकों से भरे हुए है जो सिखाती है कि कैसे बिमारी से चंगाई प्राप्त की जाये और दशवांश देकर छनी बना जाए इत्यादि महत्व दैहिक और सांसारिक कुशलाई पर दिया जाता हैं । यह आत्मकेन्द्रित जीवन का स्पष्ट संकेत हैं । परन्तु हम पढते है कि मसीह मरा कि हम अब अपने लिए नही पर परमेश्वर के लिए जिए । (२ Šलू ५:१५) । दूसरे शब्दों में मसीह मरा कि हमे आत्मकेन्द्रित जीवन से छुटकारा दें और परमेश्वर केन्द्रित जीवन की ओर ले जाएँ ।

हमे यह अचंमा हो जाता है कि कई मसीही सेवाओ मे जो समझौतावादी है परमेश्वर उन्हें पनपाता है । तो Šया इसका अर्थ यह हुआ कि परमेश्वर इन समझौतों से और अपने वचन से दूर जाने से बुरा नहीं मानता ? नहीं इसका यह अर्थ नहीं हैं । परमेश्वर न सेवाआें को भी आशीष देता है जिनका वह पूर्ण स्वीकृति नहीं देता ।

जब मूसा ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन कर चट्‌टान पर लाठी मारी जब कि उसे चट्‌टान से बात करना था तो भी परमेश्वर ने उस अनआज्ञाकारी सेवा को भी आशीषित किया । वास्तव में इस घटना से दो लाख लोग आशीषित हुए । ईश्वर इस अनआज्ञाकाीर सेवक से बाद मे कडाई से निपटा । (गिनती २०: ८१३) परमेश्वर ने इस सेवा को इसलिए आशीष दी कि वह जरूरत मंद दो लाख लोगों से प्यार करता था न कि इसलिए कि जो मूसा ने किया था उसे स्वीकृति दिया । आज भी ऐसा ही होता हैं ।

कई सेवाएँ परमेश्वर द्वारा आशीषित होती है Šयों कि परमेश्वर जरूरत मंद लोगों को जिन्हे उध्दार और चंगाई आदि की आवश्यकता है उनसे प्यार करता पंरतु प्रभु के नाम से आज जो चल रहा है उसे वे स्वीकृति नहीं देते । वह निश्चय इन समझौतावादी प्रचार को ठीक समय पर दण्ड देगा ।

परमेश्वर से सांसारिक आशीष पाने वाले अच्छे और बुरे दोनो होते है Šयोंकि परमेश्वर भले और बुरे दोनो पर मेह बरसाता और प्रकाश देता हैं । (मत्ती ५:४५) अत: सांसारिक आशीषे प्राप्त करना इस बात का संकेत नहीं है कि परमेश्वर हमारी जिन्दगी से खुश हैं । बियाबान मे ४० वषा] तक दो लाख इस्त्रायलियो ने परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानी और परमेश्वर उन पर नाराज हुआ । (इब्रा ३:१७)तो भी परमेश्वर ने अद्‌भुत तरीके से उन्हें भोजन उपलब्ध कराया और उन्हें चंगा किया । (व्यव वि ८:२७) । प्रार्थना द्वारा अद्‌भुत रीति से हमारे शरीर में चंगाई प्राप्त होना इस बात का संकेत नहीं कि परमेश्वर हमारी व्यŠतगत जिन्दगी से खुश हैं ।

आदम की संतान होने के नाते हम जन्म से ही आत्मकेन्द्रित हैं । हम इस अपेक्षा से जीते है कि हर वस्तु हमारी सेवा में हमारे चारो ओर घूम रही हैं । जब हमारा मन परिवर्तन होता है तब भी हमारी अपेक्षा रहती हैं कि परमेश्वर विभिन्न तरीको से हमे आशीष दे । आरंभ में हम आते है कि परमेश्वर से क्षमा प्राप्त करें । और बाद मे चंगाई प्राप्त करने, प्रार्थना का उत्तर प्राप्त करने, धन धान्य प्राप्त करने, नौकरी घर जीवनसाथी इत्यादि की आशीषे प्राप्त करना चाहते हैं । दूसरों की और अपनी नजरों मे हम घोर धार्मिक लगते है परंतु फिर भी संभव है कि हम अभी भी आत्मकेन्द्रित हैं । हमारेचारो ओर घूमने वालों मे एक परमेश्वर भी होता है और उससे हम ही लेने के ही इच्छुक रहते हैं । उडाऊ पूत्र अपने पिता के पास भोजन प्राप्त करने के लिए आया । परंतु पिता ने उसे गले लगाया । हमारी भावना पूरी तरह स्वार्थी भी हो तो भी परमेश्वर हमे स्वीकार करता हैं । परमेश्वर यह आशा धरता है कि हम शीघ्र ही परमेश्वर के गुणों को आत्मसात करने लगें कि लेने के बदले देना सीखें । यद्यपि परमेश्वर की संतानो मे से बहुत से लोगों के ऊपर परमेश्वर अपने इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाता । ऐसे लोग मै, मुझे, मेरा और सांसारिक आशीषों के आत्मकेंद्रित विचार मेहीजी कर मर जाते हैं ।

परिपŠव होने का यह अर्थ है कि हमारा मन परमेश्वर से पाने के लिए आत्मकेन्द्रित जीवन न जिए परंतु ऐसा मन हो न कि हमारे जीवन से परमेश्वर Šया प्राप्त कर सकता हैं। हमारे मन की यह शुध्दता ही सच्चे परिवर्तन को लाती हैं (रोमियो १२:२) एक लाख चवालीस हजार चुने हुये लोगों की यही योग्यता सिय्योन पर्वत पर मेम्ने के साथ खडा करती है ।

सच्ची आत्मिकता अपने क्रोध, चिडचिडाहट गन्दे यौन विचार, संपत्ति प्रेम, इत्यादि पर विजय प्राप्त करना ही नहीं हैं । स्वत: के लिए जीवन जीने का त्याग करना ही सच्ची आत्मिकता हैं । यह निम्न बातों का त्याग करना खुद का लाभ, आराम, सहुलियते, इच्छाएँ, अधिकार, आदर, और अपनी धार्मिकता, इत्यादि हैं ।

जब चेलों ने यीशु से आग्रह किया कि उन्हे प्रार्थना करना सिखलाए तो जो उन्हे प्रार्थना सिखलाई गयी उसमें मै मुझे और मेरा शब्द एक बार भी नहीं आता हैं । (लूक ११:१४) इस प्रार्थना मे सिखाया गया है कि हमे पिता का नाम, उसका राज्य और उसकी इच्छा पर ध्यान देना है और उसके बाद अपने साथी विश्वासियों कि सांसारिक और आत्मिक कुशलता पर ध्यान देना है जैसा हम अपने ऊपर ध्यान देते हैं । इस प्रार्थना की याद कर तोते की तरह बोलना सरल है परंतु इसका आशय परमेश्वर को अपने ह्दय मे स्थान हैं । यदि हम अपनी ईमानदारी से परीक्षा करें तो अपने अंगो में स्वार्थ को राज्य करता पाएँगे जिसके कारण हम पूरी जिन्दगी अपनी सहुलियतो और अधिकार को ही खोजते रहते हैं (रोमियो ७:२२)

यीशु ने सिखाया कि हम पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करें अर्थात अपने स्वार्थ को सिंहासन से उतारें और उस पर परमेश्वर की इच्छाआें को विराजमान करें । यीशु ने स्वर्ग के आराम को छेडा कि पृथ्वी पर अपने पिता की इच्छा पूरी करें । पौलुस ने तारसस मे रह कर धनी व्यापारी की आरामप्रद जिन्दगी को छेडा कि प्रभु को चेला बन कर कठिनाईयों को झेले । हर एक चेलों ने यही बलिदानी परमेश्वर केन्द्रित जिन्दगी को जिया । उन्होंने इस पृथ्वी पर परमेश्वर के राज्य की बढती के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर किया । जो आज के घुमŠकड प्रचारक नहीं कर पातें ।

ऐसी पवित्रता जो हमे अपने आराम और सहूलियतों को खोजने की छूट देती हैं झूठी पवित्रता हैं । चाहे क्रोध और गन्दे विचारों पर विजय Šयो न प्राप्त कर ली गयी हो । बहुत से ऐसा महसूस नहीं करते इसलिये शैतान उन्हें धोखा दे पाता हैं । बहुत से मसीही अपनी सुख सुविधा और धन के लिए विदेशों मे बस जाते हैं । उनके जीवन मे परमेश्वर की आशीष भी मिलती रहती हैं परन्तु परमेश्वर की प्रशंसा नहीं मिलती Šयों कि व्यŠत परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकता । अपनी जिंदगी के अंतिम समय मे हमारी गवाही हनुक के समान होनी चाहिए हनुक ने परमेश्वर को प्रसन्न किया (इब्रा ११:५) इस दुनियाँ मे इससे जबरदस्त गवाही नहीं हो सकती । प्रभु यीशु और पौलुस की भी यही गवाही थी । केवल यह गवाही परमेश्वर ने उसे आशीष दी व्यर्थ है Šयों कि लाखों अविश्वासियों की भी यही गवाही हो सकती हैं ।

परमेश्वर ऐसे लोगों को खोजता है जो उससे प्रशंसा चाहते है न कि आशीषें मात्र ।

अध्याय 15
दूसरा यीशु और उसकी सेवकाई

अनुमान करो कि १९६० वर्ष पहले तुम फिलिस्तीन मे थे । और तूमने किसी नासरत के यीशु को सेवकाई के विषय सून रखा था जो बीमारों को चंगा करता था। यीशु को नहीं देखते हुए जब तुम एक भीड के साथ खुशी खुशी यरूशलेम में होनेवाली चंगाई सभा में जा रहे थे जिसमे वŠता यीशु बोलनेवाला था ।

जब तुम सभा स्थल के पास पहुँचते हो तो सभा स्थल मे लगी कुर्सियों में यीशु के साथ पिलातुस, हेरोद, हन्ना और कैफास को बैठे हुए पाते हो । और तब भीड को सम्बोधित करने के लिए एक व्यŠत आकर कहता है कि आज का दिन हमारे लिए बहुत आदर का है Šयों कि फिलिस्तीनके दो अति आदरणीय महानुभाव हेरोद और पिलातुस ने इस सभा मे उपस्थित होने का निमंत्रण स्वीकार किया है और न केवल इतना परन्तु दो बडे परमेश्वर के लोग अति आदरणीय हन्ना और कैफास भी सभा को आशीष देने के लिए उपस्थित हैं ।

परिचय के इन शब्दों के बाद यीशु हेरोद और पिलातुस को आमंत्रित करते है कि वह सभा को शुरू करने के लिए दो शब्द कहें । हैरोद और पिलातुस दोनो, यीशु की प्रशंसा कर कहते है, कि इस समुदाय के लिए यीशु की प्रशंसा कर कहते हैं कि इस समुदाय के लिए यीशु ने अपनी सेवकाई के द्वारा बहुत अच्छे काम किए है और इसलिए उन्हें लोगों की सम्बल प्राप्त करने के अधिकारी हैं । उसके पश्चात यीशु राईट रेव्ह हन्ना और कैफास को भी दो शब्द कहने बुलाते हैं और अपनी प्रार्थनाआें के द्वारा सभा को प्रारंभ करने का आग्रह करते हैं । वे भी यीशु की बहुत प्रशंसा और बडाई करते है और अपने अनुयायीयों से मांग करते है कि यीशु की सेवकाई को अपने सम्पूर्ण ह्दय से आगे बढाएँ।

और तब यीशु यहूदास्कार योती को बुला कर अपनी सेवकाई की आर्थिक जरूरतो के विषय बताने के लिए कहते है । यहूदा इस सेवकाई के लिए कई हजार दीनार की जरूरत होने की बात करता हैं । वह बतलाता है कि सेवकों से दान पत्र प्राप्त किए जा सकते है और जो लोग एक हजार दीनार या उससे ज्यादा देंगे, चाहे वो विश्वासी हो या अविश्वासी यीशु ने उनके लिए विशेष प्रार्थना करने की प्रतिज्ञा की हैं । हर एक धनी लोगों को आमंत्रण है और अतिधनी आगे आएँ तो और अच्छा होगा । हेरोद अपनी कुर्सी से उठते है और उन सब के र्क माँफी का आश्वासन देते है जो इस सेवकाई मे दान देंगे । दान उठाया जाता हैं । तब यीशु एक ध्येय संदेश देते है और अपनी अद्‌भुत शŠत का प्रदर्शन करते है जो साधारण लोगों को प्रभावित करता हैं और कुद लोगों को चंगा करता हैं । इसके पश्चात यीशु बिना लोगों से मिले रोमन बदली में हेरोद पिलातुस, हव्वा कैफास और यहुदा स्कारयोती और पैसो की थैली के साथ हन्ना याजक के महत्व में जो ( यरूशलेम के बीच में है ) भोज मे शामिल होने चले जाते हैं ।

इन सब अनुभवों के बाद यद्यपि तुम नये विश्वासी हो थोडा असहज महसूस करते हो जो कुछ तुमने देखा वह यीशु के चले मत्ती पतरस और योहन के द्वारा बतलाई गयी बातों से मेल खाती हुयी तुम्हें नही लगती ।

शैतान तुम्हारे कानों मे फुसफुसाता है लिखा है न्याय न करो परन्तु तुम उससे कहते हो यह भी लिखा है कि हर एक आत्मा पर विश्वास न करो परंतु परखो कि वह परमेश्वर की ओर से है या नहीं Šयों कि इस संसार मे बहुत से झूठे भविष्य वŠता उठ खडे होंगे (१ योहन ४:१)

अन्त मे तुम इस दृढनिश्चय पर पहुँचते हो कि वह यीशु नहीं जिसके विषय (हमे बतलाया गया) हमने सुना । यह निश्चय ही दूसरा यीशु हैं (२ कु ११:४) ।

और तुम सही हो यह दूसरा यीशु हैं

तुम इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँचे Šयों कि तुम्हारे अन्दर का अभिषेक निम्न तथ्यो को जतलाता है । (१ योहन्ना २:१९,२०,२७)

  1. असली यीशु राज्य के अधिकारियों के पोषण की आवश्यकता नहीं समझता । और न ही अविश्वासी धार्मिक अगुवों की सिफारिश अपनी सेवकाई के लिए चाहता और न ही वह उनकी लल्लो चप्पो करता । जब एक बिशप यीशु के पास आया तो उसने उससे कहा कि तुझे नया जन्म लेना आवश्यक हैं । (योहन्ना ३:१-१०) यीशु ने हरोद राजा को एक लोमडी कहा (लुका १३:३१,३२)और उससे बात करना न चाहा जब उससे मिला । (लूका २३:८९)
  2. असली यीशु कभी पैसों की माँग नहीं करते अपनी सेवकाई के लिए भी नहीं । वह अपनी जरूरतों को अपने पिता से बताते और पिता तब लोगों को प्रेरित करता है कि उसकी जरूरतों की पूर्ति करें । (लूका ८:१३), (मत्ती १७:२७) ।
  3. असली यीशु कभी भी किसी किमत पर भी अपनी प्रार्थनाओ को नहीं बेंचता । सामरिया के जादूगर शिमोन ने पतरस के समान जादुई प्रार्थना करने का अधिकार चाहने के लिए वैसों की भेंट देना चाहा । पतरस ने उसे धमकाया । उसने कैसे सोच लिया कि ईश्वरीय दान पैसों से खरीदा जा सकता हैं । (प्रेरितो के काम ८:१८२३) । शिमोन उसी समय पछताया पर सदियों से शिमौन के समान लोग नहीं पछताते । रोमन केथलिक लोग जो अपने को पतरस का उत्तराधिकारी मानते हैं अपनी प्रार्थनाओ को पैसे में बेंचते हैं । मार्टिन लुथर भी अपने दिनों में पतरस की तरह इन बुराईयों के विरूध्द खडा हुआ । परंतु लूथर के उत्तराधिकारी प्रोटेस्टेन्ट लोग फिर से अपनी भविष्यवाणी और प्रार्थनाआें को पैसों में बेंच रहे हैं और शिमौन जादूगर की तरह बहुत से लोग पैसा देने को तैय्यार हैं ।

यीशु ने विशेषत: अन्त के दिनों के लिए यह चेतावनी दी हैं कि धोखेबाजी इतनी चतुरता से की जावेगी कि अद्‌भुत कामों और चिन्हों को देख कर चुने हुए लोग भी धोखा खा जायेंगे । (मत्ती २४:२४) यदि कोई सेवकाई है जिससे चेलों को सतर्क रहना है वह चिन्ह और आश्चर्यकर्मो की सेवकाई हैं । यीशु ने कहा है कि हम ऐसे लोगों पर विश्वास न करें कि यीशु उनके कमरे में आया और उनसे बातें की (मत्ती २४:२६) यीशु की पुनरूत्थित देह स्वर्गारोहण के बाद से पिता के दाहिने हाथ पर है और स्तिफनुस ने उसे वहीं देखा (प्रे काम ७:५३ ९:३) योहन्ना ने भी पतमुस टापू में यीशु की शारीरिक देह को नहीं परन्तु उसकी आकृति की छवि को देखा ।(प्रका वा १:१३-१६) यीशु स्वर्ग छोडेगा जब वह दूसरी बार पृथ्वी पर आवेगा ।

इसलिए यदि वे कहें कि आज यीशु उनके घर आया था तो विश्वास न करना

सरलता से बहकर जानेवाले विश्वासियों के बीच में बहकर हमे परख का जीवन जीना हैं । परमेश्वर का वचन हमे साफ प्रकाश प्रदान करता हैं । यदि हम इस प्रकाश का अनुसरण करे तो कभी धोखा न खावेंगे।

अध्याय 16
मनुष्य निर्मित धार्मिक सम्प्रदाय के चिन्ह

कोई भी तुम्हें उध्दार के विजयी पुरस्कार से वंचित न करें । कोई भी जो, यीशु मसीह जो कलीसिया का सिर है और जिसके कारण पूरी कलीसिया उन्नति पाती है, को छोडकर दिखावटी संदेश वाहकों के धार्मिक सम्प्रदाय और संदेशवाहक की अराधना करते हैं से संगति न रखें । (कुलु २:१८१९)

ऐसे लोग जो अपनी विचारों के मुताबिक गलत रास्ते पर चलते हैं और अपने को ज्यादा धार्मिक दिखा कर तुम्हें अपने पास भटकने नहीं देते इनसे दूर रहो (यशा ७२:२५)

प्रेरितो २०:३०३१ मे लिखा है कि तुम्हारे बीच से ही ऐसे लोग उठ खडे होंगे जो निकम्मी बातें बोल कर प्रभु के चेलों को अपनी ओर कर लेंगे

कल्ट को माननेवाले किसी व्यŠत या सिध्दांत के प्रति श्रध्दा रखते हैं और प्रभु यीशु को भी मानते हैं । यह वैसा ही है जैसा चेलो ने प्रभु यीशु के साथ साथ एलियाह और मूसा के लिए भी झोपडी बनाने की सोची । इससे सदैव परमेश्वर की उपस्थिति के सामने बादल आकर उपस्थिति को छिपा लेते हैं । परमेश्वर की इच्छा है कि हमारा जीवन प्रभु यीशु में ही केन्द्रित रहें । (तमत्ती१७:१८)

अंत के दिनो मे मसीही समुदाय मे कल्ट की बढती दिखाई देगी । बहुत से लोग कल्ट के शिकार हो कर प्रभु यीशु जो कलीसिया का सिर है से व्यŠतगत प्रगाढ संबंध रखने के बदले मसीही संदेश वाहको की अराधना करेंगें ।

इन खतरों से बचने के लिए अच्छा है कि हम कल्ट के चिन्हों को पहचाने और हर वŠत के लिए अपने को सुरक्षित रख सकें ।

कल्ट सम्प्रदाय का एक भाग होना और कल्ट के सिध्दांतों पर चलना दोनो अलग बातें हैं ।

यह संभव है कि तुम वैसी कलीसिया के सदस्य हो जो बाईबिल सिध्दांत पर आधारित है और जिसके अगुवे ईश्वर के जन हो और तोभी तुम उन अगुवों के प्रति कल्टवाली साये रख रहे हो । कल्ट की भावना गलत सिध्दांतों मे ही नहीं परंतु गलत सोच रखने में भी प्रगट होती है ।

ऐसे लोग जो अपने सिध्दांत में सही है और अच्छी जिन्दगी जी रहे हैं परंतु कल्ट की सोच रखते हुए भी उससे अन्जान हैं ।

१) ख्रीष्ट साथ में दूसरा व्यŠत

कल्ट की प्राथमिक पहचान यह है कि उसकी नींव डालनेवाला अगुवा बहुत आदर प्राप्त करता हैं और उसका जीवन सिध्द समझा जाता है और जिसकी शिक्षाएँ परमेश्वर के वचन के तुल्य मानी जाती हैं ।

बेरिया के यहूदियों को पवित्रात्मा अच्छे मनवाला माना हैं Šयोंकि वे पौलुस की शिक्षाआें को पवित्रशास्त्र के बचने से परखते थे । पौलुस एक बडा चेला था परंतु उसकी शिक्षाएें पवित्रशास्त्र से परखी जाना शास्त्र सम्मत होना जरूरी था ।

बाईबिल कहती है कि जब सभाआें मे भविष्य वŠता बोलते है तो दूसरे उनकी बातों को जाँचे (१ क्रूर १४:२९) । Šया जाँचा जाए ? बेरियन लोगों की तरह यही कि भविष्यवŠता की बातें परमेश्वर के वचन पर आधारित है या नहीं ? कल्ट के विरूध्द यह सबसे बडा सुरक्षा इंतजाम हैं ।

कल्ट को मानने वाले अपने अगुवे पर इतनी ज्यादा श्रध्दा रखते है कि उसकी हर शिक्षाआें को बिना पवित्रशास्त्र से परखे मान लेते हैं यह बेरियन की तरह शुध्द मन के नहीं हैं ।

कल्ट सम्प्रदाय में उसके जन्मदाता की मृत्यु के बाद कोई दूसरा अगुवा सम्प्रदाय का मुखिया मान लिया जाता हैं । सम्प्रदाय के हर सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वर्तमान मुखिया को ईश्वर के हर जनो से ऊँचा मान लिया जाए । परिणामत: इस सोच के आधीन अगुवे की हर शिक्षा को अधिकारिक मान कर बिना प्रश्न किए माना जाता हैं । सम्प्रदाय के हर सदस्य पर पोप की तरह उसका शासन होता हैं।

कई कल्ट सम्प्रदाय मे यदि अगुवे का एकपुत्र है तो उसे सम्प्रदाय के अक्षर अगुवाई करने का प्रशिक्षण दिया जाना प्रारंभ हो जाता हैं । सब सदस्य पिता की तरह उस पुत्र का भी आदर करने लगते हैं ।

२) बाईबिल के साथ साथ एक दूसरी पुस्तक

कल्ट का दूसरा चिन्ह यह हैं कि पवित्रशास्त्र के साथ साथ उनके पास अगुवे द्वारा लिखित एक पुस्तक भी होती हैं जिसे पवित्रशास्त्र की तरह हर मामलों में अकाटय मान लिया जाता हैं ।

कई कल्ट सम्प्रदाय, अगुवे द्वारा लिखित ऐसी पुस्तक को पवित्रशास्त्र की तरह मानने का इन्कार करते हैं । परंतु अपनी सोच में वह उस पुस्तक को बाईबिल की तरह ही मानते हैं । उनके कार्य उनके वचनों से अधिक मुखर होते हैं ।

कल्ट सम्प्रदाय के निर्माण के प्रारंभिक समयों में वे प्रभु के प्रति ईमानदारी से भŠत रखनेवाले होते हैं और उनका अगुवा भी परमेश्वर का जन होता हैं । परंतु बाद में अनुयायी अगुवे की शिक्षाआें को सिध्दांत में दान कर बाईबिल की तरह अधिकृत मानने लगते हैं ।

अगुवे की व्यŠतगत सोच अनुयाईयों के लिए परमेश्वर का वचन बन जाती हैं । जहां अगुवा एक सच्चा ईश्वर भŠत होता है वह अपने जीवन काल में ऐसी बातों को पनपने नहीं देता । परंतु यदि अगुवा ईश्वर का जन नहीं हैं तो अपने जीवन काल में ही अपनी कही गयी बातों को वह ईश्वर प्रदत मानने का दावा करता हैं ।

इस कल्ट सम्प्रदाय के सदस्य, अगुवे द्वारा लिखित उस पुस्तक को बारंबार पढते रहते हैं । बहुत से सदस्य इस पुस्तक को अपने साथ रखते है चाहे वे यात्रा भी कर रहे हों और सभाआें में बाईबिल की तरह इस पुस्तक के वचनों को उदृत करते हैं । पवित्रशास्त्र के किसी वाŠय पर यह पुस्तक जो टीका करती हैं या पवित्रशास्त्र के सिध्दांत को जिस विशेष तरह पेश करती हैं, यही सदस्यों के लिए सही टीका होती हैं । इस पुस्तक का लगातार वाचन उनकी बुध्दि भ्रष्ट कर देता हैं और वे उसके द्वारा की गयी व्याख्या को ही सही मानते हैं । इस तरह उनकी बुध्दि पवित्रात्मा से प्रकाश पाने में असमर्थ होती हैं और इस तरह उनका मन सदा के लिए इस तरह व्यवस्थित हो जाता हैं कि वह पवित्र आत्मा की पहुँच के बाहर हो जाता हैं ।

यह वैसा ही है जैसे रोमन कॅथलिक पुजारी अपने अनुयाईयों को सिखाते है कि बाईबिल की वहीं व्याख्या सह मानी जाए जो रोमन केथलिक धार्मिक गुरूआें ने की हैं ।

इन सिध्दांतों और शिक्षाआें के विरूध्द प्रश्न उठाने की पूरी तरह हतोत्साहित किया जाता हैं ।

३ संगति मे अपने को अलग दिखाना

कल्ट सम्प्रदाय के विश्वासियों का मानना हैं किअन्य नये जम्न पाये विश्वासियों जो अन्य समुदाय के हैं से संगति रखने पर कोई आत्मिक फलप्राप्त नहीं होता । अत: वे अन्य समुदाय के विश्वासियों को अपने मत में मिलाने के सिवाय और किसी प्रकार का सम्बंध नहीं रखते और ऐसे लोग प्राय: यह भी मानते हैं कि वे ही सच्ची कलीसिया और सच्ची विश्वासी हैं । और अन्य विश्वासी भी अंत में उन्ही में शामिल होंगे । उनकी यह धारणा वास्तव में अकल्पनीय हैं ।

इस प्रकार का अलगाव ऐसे कल्टवालों को फरीसियों से भी बदतर बना देता हैं । परमेश्वर के वचन को अधिकारीयों से समझने की यह भावना उनमें हम और दूसरो के लिए वे कि, की भावना से भर देते हैं । ऐेसे लोग अपने प्राय: अपने इस फरीसी व्यवहार के प्रति अंजान होते है और सोचते है कि वे ही सच्चे भŠत और यीशु के पीछे चलनेवाले नम्र चेले हैं । मनुष्य के दिमाग की यह ऐसी ही शŠत है जो उन्हें धोखा देती हैं जबकि बाहर के लोग उनके फरीसीपन को स्पष्ट रूप से देखते हैं ।

सच्ची पवित्रता परमेश्वर के अनुग्रह का फल है (रोमियों ६:१४) परमेश्वर अपना अनुग्रह केवल नम्र लोगों को देता हैं (१ पत ५:५) अत: सच्ची पवित्रता की प्राथमिक निशानी नम्रता हैं । जहाँ नम्रता की कमी हैं वहाँ कल्टवाले की पवित्रता केवल नियम की धार्मिकता बन जाती है । यही कारण है कि बहुत से कल्ट वाले अपने पवित्र जीवन और पवित्र घराने के प्रति डींग मारते हैं । यदि उनकी पवित्रता परमेश्वर के अनुग्रह का फल हो तो वे कभी डींग नहीं मार सकतें ।

कल्टवाले लोग केवल अपने अगुवों द्वारा लिखित पुस्तक ही पढते हैं । उनकी पत्रिकाओ के लेख केवल उनके सदस्यों द्वारा ही लिखे जाते हैं । कल्टवाले दूसरे विश्वासियों के द्वारा लिखित सामग्री को पढने का घोर विरोध करते हैं Šयों कि उनकी दृष्टि में यीशु के चेलों के बाद केवल उनका अगुवा ही एक ईश्वरीय जन हुआ हैं । लोगों को धोखा देने का कल्टवालों का ऐसा ही दबाव हैं ।

कल्टवाले केवल अपने सदस्यों द्वारा लिखित गीतों को ही गाते हैं । उनकी गति पुस्तक मे केवल उनके ही गीत होते हैं । अन्य गानों में वे मानते हैं कि गलत आत्मा हैं अत: खतरनाक हैं । कल्टवाले अपने सदस्यों को अपने द्वारा बनाए गए ककून के अन्वर ही रखते हैं और चाहते है कि उनके सदस्य अन्य परमेश्वर के जनों के द्वारा किये गए सद्‌कार्यो के प्रति अंजान रहें ।

जब कोई परमेश्वर का भय माननेवाले विश्वासियों से अलग रहता है तो वह वास्तविकता के सम्पर्क में नहीं आ पाता हैं और इस दुनियाँ मे अपने को धोखा देते हुए जीता हैं।

स्वर्गीय पिता ने अपने जिस बालक को स्वीकार किया हैं किसी भी कारण से यदि हम उसे अपनी संगति से काट देते हैं तो वास्तव में हम कट जाते हैं Šयों कि परमेश्वर का यह विधान हैं कि सब भŠत साथ रह कर ही परमेश्वर के प्रेम की पहचान सकते हैं (इफी ३:१८,१९)

उपरोŠत का अर्थ यह नहीं कि विश्व व्यापी एक कलिसिया का समर्थन किया जाए और न ही उसमे समझौते की बात हैं । हम कोई ऐसे विश्वासियों के साथ कार्य नहीं कर सकते जो बेबाेिन पध्दति से कार्य करते हैं । (प्रका वा १८:४) । परंतु हमारा ह्दय प्रभु से डरनेवाले हर चेले के प्रति खुला होना चाहिए। जिसे प्रभु ने स्वीकार किया हैं उसे हम कैसे अस्वीकार कर सकते हैं यद्यपि वह हमारे विचारों से सहमत न हो (लूका ९:४९,५०) ।

एक दूसरे की संगति में बने रहने का पौलुस और बरनबास का उदाहरण सबसे अच्छा हैं । (प्रेरितों के काम ३६: १५:३६-४१) किसी एक बात में उनमें गम्भीर भिन्नता थी इतना की वे एक साधू काम न कर सके परंतु उन्होंने अपनी संगति को नही तोडा न ही एक दूसरे से घृणा की नही गाली दी । यदि वे इनमें से कोई भी कार्य करते तो कल्टवाले बन जातें । परंतु वे एक दूसरे से प्यार करते हुए और एक दूसरे के लिए प्रार्थना करते हुए काम करते रहे । कल्टवाले ऐसी व्यवस्था को असंभव समझते हैं । ़वे केवल उनसे संगति रखते हैं जो पूरी तरह उनकी बात को मानते हैं ।

४ प्रचार के लिए कोई बोझ नहीं

कल्टवालो का चौथी पहचान यह है कि दुनिया के अविश्वासी लोगों तक सुसमाचार पहुँचाने का बोझ उनमें नहीं होता ।

कुछ कल्ट समुदाय वाले सीमित मात्रा मे अविश्वासियों के बीच प्रचार जरूर करते हैं परंतु प्राय: बहुत से कल्टवाले केवल विश्वासियाेें के बीच ही काम करते हैं । जैसा प्रभु यीशु मसीह ने आज्ञा दी कि हर एक व्यŠत तक सुसमाचार पहुँचाओ ऐसी मंशा उनकी नहीं होती । इसके बदले ही अन्य विश्वासियों में से लोगों को अपने मत में मिलाते हैं ।

चूॅंकि कल्ट समुदाय आपसी संबंधो में गुथा हुआ हैं उनके मतवाले अपने समुदाय मे सुरक्षा महसूस होती हैं । इस समुदाय के लोग एक दूसरे की चिन्ता करते सहायता करते है और बहुत तरीकों से एक दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं । ऐसे असुरक्षित मसीही जिन्होंने अपने समुदाय में प्रेम नहीं पाया और जो अपने समुदाय में (न कि परमेश्वर में) सुरक्षा और स्वीकार्यता प्राप्त नहीं की है वे ही इन कल्टों की और खिंच जाते हैं । पर वे इस खतरे से अंजान होते है कि बाद में वे बिलकुल अलगअलग पड जायेंगे ।

ये कल्टवाले नये मेहमान के प्रति बहुत ही अपनापन और प्रेम दर्शाते है कि उन्हें अपने समुदाय का अंग बना ले । वे जानते हैं कि एक बार कोई उनमे शामिल हो गया तो वह उनकी शिक्षाआें को मानेगा । उनके अगुवों के दैवीय अधिकार को स्वीकार करेगा ।

कुछ वषा] बाद ये नये सदस्य अकेले हो जाने के डर से अपने कल्ट समुदाय को छोडने की सोच नहीं पाते । इस तरह ये नये सदस्य जीवन भर कल्ट समुदाय में फॅॅंस जाते हैं ।

कल्ट विश्वासी, परमेश्वर से डरनेवाले मिशनरीयों की तरह त्याग कर ही नहीं पाते कि गरीबी की अवस्था में रह कर अविश्वासियों को मसीह की ओर फेर लें। कल्टवाले इन मिशनरियों के काम की चर्चा हलकाई से करते हैं Šयों कि यह उनके लिए कठिन होता हैं ।

कल्ट समुदाय के प्रचारक अविश्वासियों के बीच में बुलाए गए प्रचारक के रूप मे ही जाते हैं । वे इन अविश्वासी क्षेत्रों में एक स्थानीय प्रतिनिधि नियुŠत कर देते है और उनके प्रचारक वर्ष में एक बार वहाँ एक सभा ले लेते हैं । स्थानीय प्रतिनिधि को इनाम इत्यादि दे कर और पैसे दे कर खुश करते हैं ।

मसीह के चेले ऐसी कोई रिश्वत नहीं देतते थे Šयों कि वे गरीब थे और इसलिये वे अविश्वासी क्षेत्रों मे परमेश्वर का सच्चा कार्य करते थे ।

५ विश्वास से न्यायी ठहराये जाने को अवमूल्यन करना :

कल्टवालों को पाँचवाँ चिन्ह काया] के द्वारा उध्दार पाना ।

पवित्रशास्त्र कार्यो के विषय यह कहता है कि वह हमारे विश्वास का प्रमाण हैं । (याकुब २:२४) । परन्तु पवित्रशास्त्र रोमियो ४:५ में कहता है कि 'परन्तु जो काम नहीं करता वरन्‌ भŠत हीन के धर्मी ठहराने वाले पर विश्वास करता हैं, उसका विश्वास उसके लिए धार्मिकता गिना जाता हैं'।

यहाँ खतरा केवल असंतुलन का नहीं परंतु धर्म विरोध का हैं Šयोंकि जब कोई बाईबिल का तथ्य गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाये तो वह धर्म विरोध बन जाता हैं और यदि हम किसी बाईबिल के सिध्दांत को धारण करते हैं परन्तु उसे दूसरों तक नहीं पहुँचाते तो यह उसको न मानने के ही तुल्य हैं ।

बहुत से प्रचारकों ने विश्वास के द्वारा धार्मिकता की शिक्षा को पाप करने की छूट मान लिया हैं अत: हम इस सच्चाई को छोडकर कार्यो के द्वारा धार्मिकता की शिक्षा के विपरीत छोर पर न जाएँ ।

कल्ट के विश्वासी केवल अच्छे कामों से धार्मिकता प्राप्त करने की बात करते हैं । सब गैर मसीही धर्म भी यही कहते हैं । कल्टवाले रोमियों ४ की टीका कार्योद्वारा धार्मिकता प्राप्त होने से करते हैं और भŠतहीन के धर्मी ठहराने वाले यीशु को महत्व नहीं देते (१ कु १:३०) वे रोमियो ८:४ पर यहाँ लिखा है 'कि व्यवस्था की विधि हम मे जो शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं पूरी की जाये' पर जोर देते हैं। और यह महसूस नहीं करते कि मसीह हमारी धार्मिक ही हम मे रोमियो ८:४ के कथन को पूरा करने की नींव हैं ।

कल्टवाले विश्वासी यीशु के लोहू का भी अवमूल्यन करते हैं । अपनी कलीसिया में जो गाने वे गाते है वे भी उनके विश्वास को प्रगट करते हैं उनके गीत की पुस्तक मे शायद ही हमे पापों से क्षमा या विश्वास से प्राप्त धार्मिकता या यीशु के लोहू से पापों की शुध्दता का वर्जन मिले । कलवरी के क्रूस पर बहाए गए यीशु के लोहू जिसकी महत्ता का वर्णन लूक २२:२०, इफी २:१३ में दिया है और जिसे हम स्वर्ग में अनंत काल तक गाते रहेंगे (प्रका वा ५:९) कल्ट के गीतसंग्रह मे नहीं के बराबर स्थान पाते हैं ।

जब कि यह सच है कि बहुत से कल्ट विश्वासी उपरी तौर से बहुत अच्छा जीवन जीते है और अपने अगुवों की शिक्षाआें के भारी बोझ से दबे रहते है । वे यह निश्चित नहीं कर पाते कि परमेश्वर उनसे प्रसन्न हैं या नहीं और इस तरह स्थायी दोषी भावना ले कर जीते है और शैतान उन पर दोष लगाता रहा हैं । परन्तु अविश्वासी ठहरायें जाने के डर से वे अपनी समस्याआें को नही स्वीकारते ।

इन्ही दोषी भावनाआें के रहते उनके अगुवे उन पर नियंत्रण रखते है और इस लिये उनका प्रचार लोगों को दोषी महसूस करवाने की तरफ रहता हैं ।

इनमे बहुत से विश्वासी दृढ निश्चय वाले भी होते है और अपनी दोषी भावनाआें पर विजय भी प्राप्त करते हैं परन्तु कमजोर लोगों को शैतान अपना गुलाम बना लेता हैं । विश्वास के द्वारा धार्मिकता की शिक्षा का तिरस्कार करने का यही नतीजा होता हैं ।

७) विश्वास को गुप्त रखना

कल्टवालों की पृथ्वी पहचान अपने विश्वास को गुप्त रखना हैं ।

जब अन्य विश्वासी कल्टवालों के उन विश्वासों पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं जो शास्त्र सम्मत नहीं है तो वे गुस्से में उत्तर देते हैं ।

जब वे अपने विश्वास को शास्त्र सम्मत नहीं सिध्द कर पाते तो प्राय: उनका यह खास जबाब होता है तुम्हें पवित्रात्मा के प्रकाशन की जरूरत हैं अत: वे परमेश्वर से विशेष प्रकाशन का दावा करते हैं जो शास्त्र नही सिखाता और जो अन्य विश्वासी नहीं मानते ।

कल्ट विश्वासी उन अदभुत बातों को जानने में और बताने मे खुशी महसूस करते हैं जिनका वे दावा करते है कि उन्हें आत्मा से प्राप्त हुआ है और जो केवल उन समर्पित ह्दयों को प्राप्त होता है जो उनके समुदाय में शामिल होते है और उनके अगुवे की बातों को स्वीकार करते हैं ।

वे यह विश्वास नहीं करते कि उनके समुदाय के सिवाय अन्य विश्वासी भी समर्पिते ह्दय हो सकते है और इस प्रकार वे उत्सुक विश्वासियों को अपने आन्तरिक समृध्द घेरे में जिसे सत्यता प्रकाश प्राप्त हुआ वे मानते हैं में फाँस लेते हैं

मनुष्य मे यह सोचने की बहुत चाह होती है कि वे ईश्वर के विशेष कृपा पात्र हैं और उसके उस आंतरिक घेरे में हैं जिन पर परमेश्वर अद्‌भुत बाते प्रगट करता हैं जिसका ज्ञान अन्य विश्वासियों को होता ही नहीं ।

यह चाह जो प्रत्येक मनुष्य में पायी जाती हैं उसका पोषण कल्टवाले करते हैं ।

परंतु सत्य Šया हैं?

सƒाई यह है कि हर एक भेद की बातें परमेश्वर ने शास्त्र में प्रगट कर दी हैं ।

इफी ३:४६ मे स्पष्ट बताया गया हैं कि प्रभु यीशु के भेद की बातें पुराने नियम के समय ही भेदपूर्व थी वरन अब नहीं । कुलु १:२६२७ कहता है कि परमेश्वर ने अब इन भेद की बातों को हर एक भŠतों पर प्रगट कर दिया है किसी भी भेद की बातों में अब गुप्त बातें नही पायी जाती Šयों कि नये नियम मे सब स्पष्ट कर दिया हैं । कल्टवाले फिर भी मानते हैं कि कई भेद की बाते अभी भी छीपी हैं ।

दो बडे भेद की बातें जिनका नये नियम वर्णन है वह पवित्रता और कलीसिया है । (१ तिमोथी ३:१६ और इफी ५:३२)

उपरोŠत दोनो भेद की बातें शास्त्र मे स्पष्ट सिखाई गयी हैं यदि लोगों ने इन्हें नहीं देखा हैं तो या तो वे शास्त्र को सावधानी से नहीं पढते या तो वे पूर्वग्रही और अहंमी हैं जो अपनी सोच को बदलना नहीं चाहतें ।

अत: कल्टवाले जिन भेद की बातों को कहते हैं उनके प्रति हम सतर्क रहें ।

७ समानता पर जोर देना

कल्टवालों की सातवी पहचान अपने सदस्यों से समान विचारों की माँग करना

कल्टवाले यह महसूस करते है कि एकता तभी स्थिर रह सकती हैं जब विचार एक हो । वे (१ कुर १०:७)को गलत तरीके से उद्यृत करते हैं (परंतु एक ही मन एक ही मत हो कर मिले रहो ) मत में हल्का सा भी परिवर्तन उन्हें सहन नहीं होता । वे यह भूल जाते है कि पद यह कहता है कि आत्मा में एकता हो यह नहीं कि हर एक छोटी छोटी बातों में भी एकता हों ।

कल्टवाले विश्वासी किसी भी ऐसे भाई का सत्कार नहीं करते जिसका मत उनसे मिलन हो (रोमि १४:१) । वे केवल उनका पूर्व जोश से सत्कार करते है जो उनके मत से शतप्रतिशत सहमत हो । वास्तव में रोमियो १४ की शिक्षाओ का कोई स्थान नहीं देते ।

समाओ को किस तरह से संचालित किया जाये इसका खाका मुख्यालयद्वारा तय विधि द्वारा ही होता है । बहुत से कल्टवाले विश्वासी अपने अगुवे की संस्कृति की ही नकल करते हैं ।

मुख्यालयद्वारा निर्धारित बातों को अक्षरश: मानने का दबाव हर एक विश्वासी का होता हैं ।

वे विश्वासी जो कठपुतली की तरह बिना प्रश्न किए अगुवों की बातों को मानते है वे चूने हुअे दीन और समर्पित ह्दय माने जाते हैं । अन्यों को वे प्रकाश रहित और अहमी मानते हैं ।

अगुवे के विरूध्द न जाने की छिपी चेतावनी के द्वारा वे अपने समुदाय के प्रति प्रतिबध्दता प्राप्त करते हैं जो लोग अगुवे से असहमत हुए उनके बुरे परिणाम की डरावनी बातें बता कर लोगों को मत मे खींचते हैं । इस प्रकार सदस्य अपने परखने की कला को भूलक समुदाय की दासता मे फँस जाते हैं ।

यीशु आया कि लोगों को स्वतंत्र करे परंतु कल्टवाले लोगों को कैदी बनाते हैं ।

यीशु मसीह के समय यहूदी भी इसी प्रकार पाप के गुलाम थे और अपने अगुवों के रीति रस्मो के भी गुलाम थे ं। यीशु को इन दोनों गुलामी से इन्हें मुŠत कराना पडा । बहुत थे जिन्होंने यीशु के संदेशां को ग्रहण किया परंतु अगुवो के रीतिरस्म को न छोड सके ताकि वे समुदाय से अलग न कर दिये जाये । (योहन्ना १२:४२, ४३) ।

हम देखते है कि धार्मिक अगुवों के मत के प्रति इस गुलामी का बंधन इतना मजबूत होता हैं कि पतरस भी बीस साल तक आत्मा से पूर्व जीवन जीने के बाद भी इस गुलामी से छूट न सका । पौलूस जो की एक कनिष्ठ चेला था इतनी हिम्मत जुटा सका कि पतरस का सरेआम विरोध कर सके और यह दिखा सके कि पतरस अगुवों के रीति रिवाज पर चल रहा हैं । वरिष्ठ चेला बरनबास भी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाया । (राला २:११-२१) ।

परमेश्वर नहीं चाहता कि कोई बिना व्यŠतगत अगाही के शास्त्र से असम्मत बातों को माने । परमेश्वर जैसे खुशी से देनेवाले को प्यार करता है उसी प्रकार खुशी से आज्ञा मानने वाले से भी प्यार करता हैं । (२ कुर ९:७‹) दबाव के प्रति उसे चिढ हैं ।

परमेश्वर हमारी स्वतंत्र इच्छा का कभी अतिक्रमण नहीं करता । उसने यह स्वतंत्रता दे रखी है कि हम उस की आज्ञा को माने या ना माने यही स्वतंत्रता उसने आदम और हवा को अदम मे दी थी । Šयों कि परमेश्वर जानता है कि पूर्ण स्वतंत्रता का वातावरण ही ऐसा है जहाँ सच्ची पवित्रता पनपती और बुध्दि पानी हैं।

सच्ची पवित्रता परमेश्वर के प्रति भय से जानी जाती है न कि मनुष्यों के प्र्रति भय से । (२ कु ७:१) । परमेश्वर के प्रति प्रेम और कृतज्ञता के द्वारा वशीभूत होकर मानी गयी आज्ञाएँ परमेश्वर को भाती हैं ना कि न्याय के डर से मानी गयी आज्ञाएँ ।

परमेश्वर भी हमे उस बात से परखेगा कि हम उसका अनुग्रह चाहते है या अपने साथी विश्वासियों का ।

स्वतंत्र रहना

गला ५:१ मसीही जीवन में सबसे बडा संग्राम अपने क्रोध या अपने बुरे विचारों के विरूध्द नहीं परन्तु मनुष्यों की प्रशंसा चाहने के विरूध्द हैं ।

तुम यदि कल्ट की भावना है तो भी तुम अच्छा जीवन जी सकते हो परन्तु तुम अपने जीवन के द्वारा परमेश्वर के उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकते । परमेश्वर के राज्य के अधिकारी वे ही हो सकते है जो कल्ट के प्रचारको द्वारा बतायी गयी कैद के सीखबों को तोड सकें ।

यदि हम परमेश्वर की संतान होने की स्वतंत्रता मे प्रवेश करना चाहते है तो हमे मनुष्यों की प्रशंसा की गुलामी से हर हालत में छूटना ही पडेगा ।

अध्याय 17
यीशु के द्वितीय आगमन की ओर संकेत करनेवाले चिन्ह

१९३९ के बाद दुनियाँ कभी वैसी नही रही जैसी थी । उस समय कुछ ऐसा हुआ जिसने किया की ऐसी श्रृंखला को जन्म दिलया जो यीशु के द्वितीय आगमन पर समाप्त होगी ।

यीशु ने कहा कि उसके द्वितीय आगमन का दिन और समय केवल पिता परमेश्वर जानता है परंतु उसने यह भी कहा कि यदि लोग चैतन्य हों तो जिन चिन्हों की भविष्यवाणी की गई हैं उसे जान सकते हैं कि प्रभु का आना अब निकट हैं (मत्ती २४:३३,३६)

इसलिए यह आवश्यक है कि हम इन चिन्हों पर ध्यान करें ।

१ लडाईयाँ

मत्ती २४:७ मे यीशु कहते हैं कि अंतिम दिन नृह के दिनों के समान होंगें । आक्रमकता नूह के दिनों की विशेष पहचान हैं । पृथ्वी आक्रमकता से भर गयी थी ऐसा उत्त ६:१११३ मे वर्णित हैं । यह वर्णन आज के दिन जिसमें हम रहते है मेल खाता हैं । आतंकवाद, अपहरण, बलवा, हत्या, लूटपाट और राज्यों के बीच में लडाई आज के प्रतिदिन की घटना हैं । हत्या के लिए दी जानेवाली फाँसी की सजा का दिया जाना बहुत से देशों मे खत्म कर दिया गया हैं जिससे हत्या अपराध बढ रहा हैं । आक्रमकता को खुले रूप से बेशर्मी के साथ सिनेमा के पर्दे पर वाहवाही के रूप में पेश करने से बच्चे तक आक्रमकता सीख रहे हैं । सन ५० से दूरदर्शन और सन ७० से वीडिओ का आ जाना सुदूर क्षेत्र तक आक्रमकता को फैलाने मे साथ दे रहा हैं । कराटे और अन्य सैन्य कला आक्रमण के संदेश को फैला रहे हैं । जिसके कारण लोग प्रेतबाधा में फँस रहे हैं । यह सब १९३९ से बाढ की तरह आ रहा हैं । १९३९ से शैतान ने द्वितीय विश्व युध्द का प्रारंभ किया जो घृणा और कटुता उस समय से शुरू हुयी उसने मानवता पर हमला करने के लिए बुरी आत्माआें का द्वार खोल दिया । तब से लडाईयाँ का प्रारंभ हो चुका हैं १९४५ मे परमाणु बम फूटा और इसने परमानु युध्द की शुरूआत की ।

द्वितीय विश्व युध्द के बाद आक्रमण और लडाईयों का जो सिलसिला शुरू हुआ है वह मानव इतिहास मे पहले कभी नहीं हुआ ।

२ आकाल

मानव इतिहास मे तो आकाल आते ही रहते हैं परंतु द्वि विश्व युध्द के बाद जनसंख्या वृध्दि के कारण आकाल ने करोडो को मौत के घाट उतार दिया । सूखा और फसल का न होना सन ५० से बहुत क्षेत्रों मे सामान्य घटना हैं । जैसे जैसे हम अंत के निकट आयेंगे यह और भी सामान्य होता जायेगा ।

३ प्राकृतिक आपदाएें

भूकंप, बाढ, चक्रवात और ज्वालामुखी का फूटना कुछ ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ है जिन्हे हम आज के समय बढता हुआ देखेंगे । द्वितीय विश्व युध्द के बाद ये आपदाएँ बढ रही है और बढती ही जावेंगी । (मत्ती २४:७)

४ ज्ञान मे वृध्दि

दानियल नबी ने भविष्यवाणी की थी की अंत के दिनों मे ज्ञान मे वृध्दि होगी । पूरा वैज्ञानिक ज्ञान जो उसी के समय से सन १९३९ तक अर्थात ५९०० लगभग ५९०० मे जो मानव जाति ने प्राप्त किया आज का ज्ञान उससे बीस गुना अधिक हैं । यह भी यीशु के आगमन का स्पष्ट रहा हैं। (दानिएल १२:४)

५ दुनियाँ भर की यात्रा में वृध्दि

बीते ५८०० वषा] से जानवरों चढ कर यात्रा की जाती थी । सन १९०० तक यात्रा की अधिकाधिक गति ५० मील प्रति घंटा थी । परंतु आज मनुष्य आकाश मे २४ मील प्रति घंटे की रफ्तार से यात्रा कर रहा हैं । द्वितीय विश्व युध्द के बाद से पूरी दुनियाँ का भ्रमण लोकप्रिय हो गया। दानिएल ने भविष्यवाणी की थी कि बहुत से लोग यहाँ वहाँ यात्रा करेंगें ।

६ सूख की अभिलाषा

२ तिमोथी ३:४ मे पौलुस ने विशेषत: दर्शाया है कि लोग अंत के दिनों मे परमेश्वर की अपेक्षा सुख के खोजी होंगे । आक्रमण के अलावा यौन मे लिप्त रहना नूह के दिनो के लोगों की पहचान थी । (उत्त ६:२) यह भी हम आज संसार में देख रहे हैं । प्रारंभ से लेकर आज लों मनुष्य यौन अनैतिकता मे लिप्त है परंतु इतिहास मे कभी भी इतना खुल कर और बेशर्म होकर आज जो मनुष्य की लिप्तता है वह कभी नहीं रही । द्वितीय विश्व युध्द के बाद पूरे संसार मे ंभ्रष्टता बढती ही जा रहीं हैं । अशुध्द आत्माआें की बाढ ने दुनिया पर आक्रमण कर दिया हैं । दूरदर्शन, सिनेमा और वीडिओ टेप ने शैतान को सहायता ही की है कि वह सूख की अभिलाषा को बढाए ।

पौलुस प्रेरित ने कहा है कि अंत के दिनो मे शैतान का सिध्दांत होगा कि विवाह का निषेध करें । (१ ति ४:१३) यह आज दो अतियों मे प्रगट है एक अति यह है कि पवित्र होने के लिए साधु बना जाए । दूसरा अति यह है कि बिना विवाह के साथ रहा जाए । चूँकि अंत के दिनों में मनुष्य में प्राकृतिक प्रेम का अति अभाव होगा । उनके लिए गर्म गिराना एक सही घटना होगी । (२ तिमो ३:३) बैतलहम मे जितना हेरोद ने शिशुओ का संहार नहीं किया उससे कहीं अधिक आज के एक डॉŠटर के हाथ नौजात शिशुआें के खून से सने हैं ।

यीशु ने कहा था कि अंत के दिन सदोम मे लुत के दिनों के समान होंगे । पुरूष का संबंध आज स्वीकार्य घटना हैं । वे इस पाप को सदोम ही कहते हैं और उसे नहीं छिपाते । (यशा ३:९) और इसलिए परमेश्वरने उन्हे उनके हाल पर छोड दिया हैं । एडस्‌ की भयानक बिमारी इस पाप के विरूध्द परमेश्वर का न्याय हैं । (रोमियो १:२६-२८)

करोडो जवानों का नशे की दवाईयों से बर्बाद होना इस पीढी का बरबादी के गद्दे मे सीधे गिरने का कारण है ।

७ विद्रोह की आत्मा

द्वितीय विश्व युध्द के बाद से बच्चों का अपने पालकों से विद्रोह शिष्यों का अपने शिक्षकों से विद्रोह और सेवकों का अपने आफिस और कारखाने के अपने मालिकों के प्रति विद्रोह आज जिस सीमा पर है पहले कभी न था । उच्च शिक्षा ने आज के जवानों को इतना ढीठ और अशालीन बना दिया है कि वे अपने पालकों और वृध्द लोगों का कोई लिहाज नहीं करते । विद्रोह की आत्मा मसीही समाज मे भी घूस गयी हैं और इसलिए आज यह देखा जाता है कि पास्टर और अगुवे अपने जवानों को खुश करने मे लगे रहते हैं ।

महिलाआें ने भी घर से बाहर जा कर काम करना शुरू कर दिया है जिससे आत्मनिर्भर होकर वे भी अपने को स्वतंत्र और ढीठ बना लिया हैं । और परमेश्वर द्वारा नियत पुरूष के अधिकार को स्वीकार करना छोड दिया हैं । यह आत्मा मसीही समाज मे भी आ गयी हैं । इससे प्रगट है एक अधिकारी के प्रति विद्रोह की यह आत्मा कितनी व्यापक और गहरी जउे जमाए हुए हैं ।

महिला आज प्रमुखत: माँ नही बनना चाहती । द्वितीय विश्व युध्द के महिला भी प्रधानमंत्री बनने लगी हैं । मसीही समाज में भी अब महिलाएँ अगुवा, पुरोहित एवं शिक्षक बनने लगी है । यह इजबेल की आत्मा हैं जिसका मंडली में एलिय्याह की आत्मा के द्वारा विरोध करना चाहिए । (१ राजा २०:२१-२३)

८ विश्वास से गिर जाना

'पवित्र आत्मा का स्पष्ट कथन है समय में अनेक लोग विश्वास से भटक जाएँगे' (१ तिमो ४:१) इसमे संदेह नहीं कि हमारे धर्म का रहस्य गहन हैं (१ तिमो ३:१६) मसीही समाज परमेश्वर के भय में नहीं और इससे वह प्रभु की आज्ञा को मानने से दूर हो गया हैं (मत्ती ५,७) और इससे झूठे अनुग्रह की शिक्षा आ गयी हैं । यह सब प्रथम शताब्दी में भी था परंतु अब बहुत अधिक बढ गया हैं ।

अधिकारों की व्यवस्था, झूठे कल्ट, पवित्र आत्मा जाली वरदान इत्यादि । बीते ४० वषा] में बहुत बढ गये हैं ।

यीशु ने कहा झूठे भविष्य वŠता चूने हुअे भी अपने चिन्ह और आश्चर्य कमा] से बहका देंगे । १९४५ के बाद से मसीही समाज में तथाकथित चंगाई की सभाएँ बढ गयी हैं । और इन नकली एवं दिखावटी कार्यो के प्रति यीशु ने हमे सतर्क किया था । चूंकि ये आश्चर्य कर्म यीशु के नाम से किए जाते हैं विश्वासी भी धोखा खा जाते है और वे इस बात की सत्यता जानने की कोशिश नहीं करते कि तथाकथित आश्चर्य कर्म करने वाले परमेश्वर का भय मानते और लोगों को यीशु की आज्ञाएँ मानने के लिए प्रेरित करते हैं या नहीं? (पढिए व्यवि १३:१४)

९ इस्त्रायल

लूका २१:२९-३२ यीशु ने यहाँ कहा है सब पेडों में पत्तियाँ उगेगी अर्थात कई देश स्वतंत्रता प्राप्त करे । १९४५ के बाद से देशों का स्वतंत्र होना बडे पैमाने पर शुरू हुआ । भारत १९४७ मे स्वतंत्र हुआ । और इसी प्रकार कई अन्य देश भी स्वतंत्र हुए । पर इससे भी बढ कर यीशु ने कहा कि अंजीर के वृक्ष अर्थात इस्त्रायल पर ध्यान दो । (लूका २१:२९) यीशु इस्त्रायल मे आया कि अंजीर के वृक्ष मे फल पाए परंतु उसमे उसने केवल पत्ते अर्थात धार्मिक खोखले रीति रिवाज पाए । उसने उसे श्राप दिया और वह सूख गया । यीशु के क्रूसारोहन के ४० वर्ष बाद जनरल टाईटस्‌ की अगुवाई में रोमी सेना थरूशलेम में घुसी और यहूदियों के मंदिर को नष्ट कर दिया और यहूदी दुनिया की छोर तक बिखेर दिए गए। करीब १९०० वर्ष तक यह अंजीर का वृक्ष सूखा रहा ।

परन्तु यीशु ने हमे उस समय को ध्यान मे रखने को कहा जब इस अंजीर के वृक्ष में पुन: पत्तियाँ लग जाएँगी । द्वितीय विश्वयुध्द के समय करोडों यहूदियों को मौत े घाट उतार देने के कारण दुनियाँ की सहानुभूति यहूदियों के प्रति उपजी और मई १९४८ से यहूदी अपने देश को आने लगें । उन्होंने यरूशलेम पर भी पुन: कब्जा किया । अंजीर के वृक्ष मे पत्तियाँ लगने लगी । यीशु ने कहा था कि यरूशलेम अविश्वासियों के द्वारा रौंदा जाएगा जब तक अविश्वाससियों का समय पूरा न हो जाए लूका २१:२४ । हम आज इसी समय मे रह रहे हैं ।

परमेश्वर की समय सारिणी

परमेश्वर ने मनुष्य को छ: दिन काम करने के लिए कहा और सातवाँ दिन विश्राम का दिन रखा । प्रभु के लिए एक दिन हजार वर्ष के बराबर है २ पत: ३:८ । इस तरह मनुष्य को ६००० वर्ष परिश्रम के मिले । सातवाँ हजार वर्ष विश्राम काल होगा जब कि यीशु पृथ्वी पर राज करेगा । आदम से यीशु के जन्म तक करीब ४००० वर्ष होते हैं । यीशु के जन्म के बाद अब २००० वर्ष पूरे हो रहे हैं । अर्थात छ: दिन पूरे हो गए हैं ।

बियाबान में इस्त्रायलियों को दो दिन उनके शुध्दिकरण के लिए दिए गए और तिसरे दिन परमेश्वर उनके बीच आया (निर्ग १९:१०, ११, १६) कलीसिया को भी अपने शुध्दिकरण और तैय्यारी के लिए दो दिन अर्थात २००० वर्ष दिए गए हैं और तीसरे दिन प्रभु आ कर हमे जिलाएगा । (होशे ६:२)

हमारी जिम्मेवारी

यीशु के आगमन के प्रति तैय्यार रहने के लिए हमे सब पापों से फिरना है और परमेश्वर के सामने मानना है कि हम पापी हैं । तत्पश्चात यह विश्वास करना है कि प्रभु यीशु ने हमारे सब पापों के दण्ड को उठा लिया हैं । वय मर कर जी उठा और स्वर्ग में विराजमान हैं । यीशु से प्रार्थना करें कि वह हमारी जिन्दगी में हमारा उध्दारकर्ता और प्रभु बन कर आए, हमारे पापों को क्षमा कर हमे परमेश्वर की संतान बनाए ।

हरएक जोयीशु के आगमन पर आशा लगाए अपने को शुध्द करेगा जैसा कि यीशु शुध्द हैं । (१ योहन्ना ३:३)

और हम अपने को शुध्द करना तब तक न छोडेंगे जब तक प्रभु की तरह शुध्द न हो जाएँ । इसीलिए पेन्तीवुस्त के दिन हमे पवित्र आत्मा दिया गया कि वह परमेश्वर के वचन के दर्पण मे हर मसीह की महिमा दिखाए । और हमे क्रमश: प्रभु की महिमा के तुल्य बदलता जाए । (२ कु ३:१८)

पवित्रात्मा की दो बुलाहट

बाईबिल आत्मा की दो बुलाहट समाप्त होती हैं ।

  1. (१) दुनिया के अविश्वासियों के लिए आओ (प्रका २२:१७), पश्चाताप करो, और मसीह पर विश्वास करो
  2. (२) विश्वासियों के लिए विजयी हो (प्रका २:७ से ३:२१ तक ) और मसीह की दुल्हन का हिस्सा बनों ।

अध्याय 18
प्रभु के आगमन के लिए तैय्यार रहना

जब हम यीशु के पृथ्वी पर आगमन के विषय सोचते है तो मुखय बात यह नहीं है कि वह तिथी कौन सी होगी परंतु यह कि हम उसके आगमन के लिए आत्मिक रूप से तैय्यार हैं या नहीं ? बहुत से लोग जो आगमन की इन भविष्यवाणियों से परिचित हैं अपने को मसीह की तरह शुध्द नहीं कर रहे हैं । इस तरह वह सिध्द कर रहे हैं कि मसीह के आगमन की आशा उनके लिए एक मृत आशा है न कि जीवनदायी आशा (१ योहन्ना ३:३) इसके विपरीत जो बाईबिल की भविष्यवाणियों के सम्पूर्ण पहलुआें को नहीं समझ पाते या प्रकाशित वाŠय में दिए गए चिन्हों को टीका नहीं कर पाते तो भी यह संभव है कि वे आगमन के प्रति १००% तैय्यार हों । जरूरी हे कि हम उन बातों पर ज्यादा ध्यान दे जो प्रभु ने बताई हैं ।

जब यीशु ने अपने चेलों को अपने द्वितीय आगमन की बात बतलाई तो उसने उन्हें सतर्क रहने की बात बतलाई । (मत्ती २४:४२,४४) अत: हर समय आत्मिक रीति से तैय्यार रहना ज्यादा महत्तवपूर्ण है भविष्यवाणियों के भेद को जानना ।

मत्ती २५ में तीन क्षेत्रों मे सतर्क और विश्वासी रहने की बात कहीं हैं ।

अपनी आंतरिक जिन्दगी में विश्वास योग्य रहना

मत्ती २५ का । से १३ मे यीशु ने दस कुआरियों का दृष्टांत बताया । ध्यान दें वे वेश्याएँ नही थी । वे सब कुँआरी थी । अर्थात मनुष्यों के सामने उनकी अच्छी गवाही थी उनके दिए जल रहे थें । उनके अच्छे काम दूसरों को दिखते थे परंतु इनमे केवल पाँच बुध्दिमान थी । शुरू में किसी को यह नहीं मालूम था कि केवल पाँच ने अपने पात्र मे तेल रखा हैं ।

रात मे यह तेल दिखाई भी नहीं देता था, उसी प्रकार हमारी जिन्दगी का प्रकाश भी इस जगत के अंधियारे मे नहीं दिखाई देता । हम सब के पास पात्र है प्रश्न यह है कि उसने तेल हैं या नहीं ?

पुराने नियम मे तेल पवित्रात्मा का चिन्ह है और यह तेल उस ईश्वरीय जिन्दगी को दर्शाता है जो पवित्रात्मा हमारी आत्मा पर प्रगट करता हैं । इस जीवन का बाहरी रूप ही उजियाला हैं । आंतरिक सामग्री तेल हैं । हम बहुतों को बाहय रूप से पहचानते है यह गलत हैं । इस सताव और परीक्षा के समय हम पाते है कि यह बाहय रोशनी ही पर्याप्त नहीं । आंतरिक ईश्वरी जीवन ही हमें विजयी बनाता हैं ।

यदि संकट के समय तुम कमजोर हो वो तुम वास्तव मे कमजोर हो (जीवि २४:१६) । जीवन का संकट ही हमे कमजोर या मजबूत दिखाता हैं । इस दृष्टांत में संकट यह था की दुल्हे ने आने मे देरी की ।

जो विश्वासी है वह अन्त तक स्थिर रहता है और बचाया जाता हैं । यह समय ही है जो परखता है कि हमारे जीवन मे आंतरिक सामर्थ है या नही । बहुत से उस बीज की तरह हैं जो जल्दी उगा परंतु उसमें जीवन नहीं रहा । उनके ह्दय की जमीन गहरी नही थी (मरकुस४: )

इसीलिए यह जानना कठिन है कि नये विश्वासी में कितनी आत्मिकता और समर्पण हैं । समय सब कुद प्रगट करता है यदि हममें जानने का धैर्य हो । अतएव प्रभु के आगमन के लिए तैय्यार रहने का अर्थ है कि परमेश्वर के सम्मुख हम आंतरिक जीवन शुध्द और विश्वास योग्य हो । हमारे विचारों मे हम व्यवहार और उद्देश्यों में जिन्हे हमारे आस पास के लोग नही सकते यदि ऐसा नही है तो हम अपने आप को धोखा दे रहें हैं ।

हमारी सेवकाई में विश्वास योग्यता

मत्ती २५:१४-३० मे किए गये दूसरे दृष्टांत का जोर परमेश्वर द्वारा प्रदत्त हमारी योग्यता के उपयोग से संबंधित हैं । ये योग्यताएँ हमारी संपत्ती, पैसा, प्राकृतिक योग्यताएँ, मौके और आत्मिक वरदानों को दर्शाती हैं।

ये आपस मे समान नहीं हैं Šयों कि दृष्टांत में बतलाया गया है कि एक को पाँच दूसरे को दो और अन्य को केवल एक तोडा मिला । परंतु प्रत्येक को उसका उपयोग करने के लिए समान समय मिला । जिसको अधिक मिला उसे की आशा की गई । अत: जिसने दो को चार बनाया उसे वहीं मिला जितना उसे, जिसने पाँच को दस बनाया ।

न्याय उसका किया गया जिसने अपने तोडे लेकर जमीन में गाड दिया । यह वह हैं जिसने ईश्वर प्रदत्त तोडों को संसार के लिए काम मे लाया ।

कोई यह नहीं कह सकता कि उसे कुछ नहीं मिला । प्रश्न यह है कि हम उन तोडों का कैसा उपयोग करते हैं । जिन तोडों का उपयोग हम अपने लिए करते है उसे हमने जमीन पर गाड दिया, समझा जाता हैं । जिनका उपयोग हम परमेश्वर की महिमा के लिए करते है वहीं हमारे लिए अनंत धन हैं । इस हिसाब से हम बहुत से विश्वासियों की निर्धनता को जान सकते हैं ।

हमारा आदर्शवाŠय होना चाहिए सब कुछ परमेश्वर के लिए है और स्वयं के लिए कुछ नहीं तब हम प्रभु के आगमन के लिए तैय्यार होंगे । हम यीशु के चेले नहीं बन सकते जब तक जो कुछ हमारा है उसे त्याग न दें ।

वह जो अपनी सम्पति और दान प्रभु के लिए उपयोग में नहीं कर रहा है वह अपने को धोखा दे रहा है कि वह प्रभु के आगमन के लिए तैय्यार हैं ।

अपने साथी विश्वासियो की सेवा करने में विश्वास योग्यता

मत्ती २५:३१-४६ हे अंत में अपने साथी विश्वासियों के लिए हमारा व्यवहार दिखाया हैं । यह आवश्यकता आत्मिक एवं शारीरिक हो सकती हैं ।

यहाँ हम देखते है कि कुछ स्वर्ग के राज्य को प्राप्त करते है Šयों कि उन्होने अपने साथी विश्वासियों की वैसी ही सेवा की जैसे प्रभु की । उनकी यह सेवा कितनी गुप्त थी कि उनका बायाँ हाथ यह नहीं जानता था कि दायाँ हाथ Šया कर रहा हैं (मत्ती ६:३) । Šयोंकि प्रभु ने जब उनके द्वारा किए गए अच्छे कामों की याद दिलाई तो उनहें वह याद भी नहीं था ।

यीशु ने सिखाया कि जो हम अपने छोटे से छोटे भाई के लिए करते हैं वह प्रभु के लिए की गयी सेवा मानी जाती हैं । यह ध्यान देने योग्य है कि उसने छोटों की बात कहीं Šयोंकि हमारा लगाव महत्वपूर्ण विश्वासियों की सेवा करना और गरीबों को तुच्छ जानना होता हैं । जो खान पीने में, खरदीने बेचने में निर्माण करने मे और बोने मे अपने को उलझाए रहते है वे प्रभु के आगमन पर अवश्य पीछे छोड दिए जाएँगे । (लुका १७:३८:३४)

केवल वे जो साथी विश्वासियों की सेवा करने को प्रभु की सेवा मानते है वे ही उठा लिए जाएँगे । यीशु ने दूसरे समुदाय के विषय कहा जो इस समुदाय के विरूध्द थे यह दूसरा समुदाय वे लोग हौ जो प्रभु के नाम पर की गयी प्रत्येक अच्छी बातों को याद करते हैं । वे प्रभु को यह याद दिला कर कि उन्होने दुष्टात्माआें को निकाला, प्रचार किया , यीशु के नाम से बीमारो ंको चंगा किया खूद ही न्याय की राह पर बैठ जाते हैं । परंतु प्रभु ने इनको अस्वीकार किया Šयोंकि उनके आंतरिक जीवन में पवित्रता की कमी थी उन्हे अपनी योग्यता पर घमंड था ।

इस विरोधाभास को देखना दिलचस्प हैं ।

जिन्होने बिमारों को चंगा किया छोड दिए गए (मत्ती ७:२२,२३) । परन्तु जिनने बीमारों की सुचि ली स्वर्ग के राज्य के वारिस हुए, प्रभु हमसे यह नहीं कहता कि बिमारों को चंगा करें यदि हम वह दान नहीं हैं । परन्तु हम बीमारों को देखने जा सकते है । उनका उत्साह बढा सकते है और प्रभु के नाम पर उन्हें आशीर्वाद देत सकते हैं । तब हम पाएँगे कि हम प्रभु के आगमन के लिए तैय्यार हैं । परंतु कई जिन्हों ने बीमारों को चंगा पीछे छोड दिये जाते हैं । दूसरों की इस प्रकार सेवा करने के लिए, हमे आराम तलबी छोडने के लिए इच्छुक होना चाहिए ।

वे लोग जो जरूरत मंद लोगों के कारण अपने दिन की योजना में व्यवधान पसन्द नहीं करते यीशु के आगमन पर पीछे छोड दिए जाएँगे । हमे अपने समय, पैसे और हस बढ कर अपनी योजनाआें और अपनी इच्छाआें का त्याग करना है । यदि हम प्रभु के नाम से दूसरों की सेवा करना चाहें ।

हमारे शरीर में स्वार्थ पस्ता ने इतनी गहरी जडे कर ली है कि यद्यपि अपने को आँखो की अभिलाषा के से तथा क्रोध और लालच से शुध्द कर लिया हैं परंतु फिर भी हमारा स्वाीर्थी हो कर जीना संभव रहता हैं । यह पवित्रता फरीदियों की पवित्रता के समान है जो हमे आत्म केन्द्रित होने से छूटने नहीं देती । यह सच्ची पवित्रता की नकल हैं । परंतु इससे सरलता से धोखा खाया जा सकता हैं ।

यीशु ने हमे प्रार्थना करना सिखलाया हमे दीजिये हमे क्षमा कीजिए, हमे छुटकारा दीजिए (मत्ती ६:११-१३) ऐसी पवित्रता जो हमे पापों और जरूरतमंद लोगो के प्रति सोचने को मजबूर नहीं करती । बेकार और नकली है और इस योग्य की कूडेदान मे फेंक दी जाए ।

हमे अपने सेच की दिशा बदलनी चाहिए । और समझने की कोशिश करना चाहिए कि दूसरे किस कठिनाई से गुजर रहे हैं । यह प्रभु की तरह सोचना है जो केवल अपने लिए और अपने घराने की जरूरत के लिए सोचता है वह पवित्र भी हो तो भी उसका यह सोचना कि वह प्रभु के आगमन के लिए तैय्यार है केवल एक धोखा हैं ।

अध्याय 19
प्रचार करना एवं चेले बनाना

मसीहियों के बीच एक गलत बात यह है कि वे किसी विषय पर शास्त्र के एक स्थल को लेकर अपनी धारणा बना लेते है और उस विषय से सम्बंधित अन्य उदाहरणों को छोड देते हैं।

शैतान की यह पहली कोशिश होती है कि वह हमारी जरूर आवश्यकता के आधार पर हमे फँसाए और हमे परमेश्वर की इच्छा से बिमुख करें । यीशु ने शैतान की परीक्षा का सामना यह कह कर किया कि वह वही करेंगे जो परमेश्वर उनसे कहते हैं (मत्ती ४:४) और यही हमे भी करना चाहिए ।

जब शैतान यह देखता है कि हम यीशु की तरह परमेश्वर के वचन का सहारा लेकर उसका सामना करते है तो वह चतुराई से परमेश्वर के वचन की उघृत करता हैं । यीशु की दूसरी परीक्षा में उसने कहा ऐसा लिखा हैं (मत्ती ४:६) यदि यीशु परमेशव्र की सम्पूर्ण आज्ञा को नहीं जानता तो वह भी शैतान के द्वारा बताए गए शास्त्र के वचनों से धोखा खा जाता जैसे बहुत से विश्वासी आज भी धोखे में पड जाते है परन्तु यीशु ने इस परीक्षा का यह कहते हुए सरलता पूर्वक सामना किया यह भी लिखा है(मत्ती ४:७)

इसलिए जरूरी है कि हम परमेश्वर के सम्पूर्ण उद्देश्य को जाने । पूरी सच्चाई ऐसा लिखा है और यह भी लिखा हैंइन दोनो तथ्यो में पायी जाती हैं । यह लिखा है कि पूरे जगत मे जाकर प्रत्येक को सुसमाचार प्रचार करो (मरकुस १६:१५) यह भी लिखा है जाओ हर देश मे चेले बनाओ (मत्ती २८:१९) । इन दो आज्ञाओ और मांगो पर प्रचार करने इस काल और दिन मे हम परमेश्वर की इच्छा को पूरी कर सकते हैं ।

प्रचारस्वभावत

पहला काम पूरे जगत मे जाना है यह आज्ञा किसी एक विश्वासी के लिए नहीं पर मसीह की पूरी कलीसिया ये हैं । एक विश्वासी या एक स्थानीय कलीसिया के लिए संभव नहीं कि जगत के हर प्राणी को सुसंदेश पहुँचा सकें । हम मे भी हर एक इस कार्य का छोटा हिस्सा पूरा कर सकता हैं ।

चाहे यह हिस्सा छोटा हो हमे उसे पूरा करना है और यहीं प्रेरितो के काम १:८ की तस्वीर सामने आती हैं । हम एक विश्वासी के ऊपर पवित्रात्मा का अभिषेक आना चाहिए तभी वह मसीह का अच्छा गवाह बन सकता हैं । ध्यान दे कि सब प्रचारक हो कर नहीं बुलाए गए । परन्तु सब गवाह होकर बुलाए गए हैं ।

प्रचारक के काम का क्षेत्र गवाह से अधिक हैं । एक गवाह को अपने कार्य क्षेत्र में अपने रिश्तेदारों के बीचपडोसियों के बीच, साथी कर्मचारियों के बीच प्रतिदिन मिलनेवाले लोगों के बीच, यात्रा के साथियों के बीच मसीह को प्रचार करना हैं । हमारा कोई भी धंदा हो यही हमारी गवाही हैं ।

परन्तु मसीह ने कलीसिया को प्रचारक भी दिए हैं आत्माआें को बचाने के लिए नहीं और न ही लोगों को मसीह के पास लाने के लिए जैसा की प्राय: सुना जाता है परन्तु मसीह की कलीसिया का निर्माण करने के लिए । यहीं बहुत से प्रचारक असफल होते हैं । आज के प्रचारक मसीह की कलीसिया का निर्माण नहीं करते परन्तु व्यŠतगत आत्मा को बचाने का काम करते हैं । यह आत्माएँ अपने पुराने मृत संस्थाओ (वशरव वशपोळपरींळेप उर्हीीलहशी) मे भेज दिए जाते हैं जहाँ वह पुन: गुनगुने बन जाते हैं । परन्तु मसीह की कलीसिया नही बन पाती और शैतान का उद्देश्य पूरा हो जाता हैं Šयों कि वह व्यŠत दुगना नरक की संतान बन जाता हैं (मत्ती २३:१५) प्रथम तो वह खो जाता है और दूसरा यह कि वह बहका दिया जाता हैं कि वह बचाया हुआ हैं । इस प्रकार के प्रचार से प्रचारक का साम्राज्य बढता है और इसके द्वारा मनुष्यों से आदर पाने की चाह पनपती हैं ।

यीशु ने प्रचारकों को मनुष्यों के मछुए कहा परन्तु जो प्रचार अविश्वासी बिशप और पास्टरों के सहयोग से किया जाता है वह बडे छेदों से भरपूर जाल के समान हैं । अपनी प्रचार सभाआें के उद्‌घाटन के लिए हम यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि यीशु या पतरस हनन्याह और कैफा को मंच पर बैठने का आग्रह करेंगे । तो भी आज के प्रचारक यही करते हैं और इतना ही नहीं वे अविश्वासी बिशप की प्रशंसा के पूल बांध देते हैं । यह प्रचारक एक नम्बर के समझौतावादी हैं ।

जो मछलिया पकडी जाती है वे पुन: समुद्र मे छोड दी जाती है ताकि अगली प्रचार के जागृत सभा में उन्हें पकडा जाए और पुन: समुद्र में जाने दिया जाए । आज के प्रचारकों के द्वारा यह प्रक्रिया बार बार दोहराई जाती हैं और हर प्रचारक उठे हाथों की गणना करते है और निर्णय पत्र भरवाते हैं इस प्रकार का प्रचार स्वर्ग के स्वर्ग दूतों को खुश नहीं करता परन्तु केवल शैतान की सभा को । आखिर स्वर्गदूत कैसे खुश हो सकते हैं जब कि प्रभावित लोग नरक की संतान बनते हैं ।

यह प्रचार करने से कि यीशु पापों को क्षमा करता है और बीमारों को चंगा करता है तो कई चिन्ह और आश्चर्य कर्म घटित हो सकते हैं परन्तु प्रश्न यह है कि प्रचार कार्य से कितने लोग मसीह की देह के अंग बने ।

चेलों ने इस प्रकार का प्रचार कभी नहीं किया । उनके द्वारा परिवर्तित लोग स्थानीय कलीसिया को सौंप दिये जाते थे कि उन्हें प्रभु का चेला बनाए । बीसवी शताब्दी में मसीहियों के बीच चंगाई के प्रचारकों का वर्चस्वी रहा हैं । और यह भी एक संकेत है कि मसीही परमेश्वर के वचन की शिक्षा से कितनी दूर हो चुके हैं ।

इफी ४:११ पाँच सेवाआें का वर्णन है जो अपनी महत्ता के क्रम में इस प्रकार हैं । चेले, भविष्यवŠता, प्रचारक, गडरिये और शिक्षक । १ कु १२:२८ में बताया गया है परमेश्वर ने कलीसिया में भिन्न भिन्न व्यŠतयों को नियुŠत किया हैं प्रथम प्रेरित दूसरे नबी, तिसरे शिक्षक, तब आश्चर्यकर्म करनेवाले तब वे जिन्हे स्वस्थ्य करने का वरदान मिला हैं, सहायक अर्थात, चरवाहे या पास्टर प्रबंधक एवं अनेक अध्यात्म भाषाएँ बोलनेवाले

इससे स्पष्ट है कि परमेश्वर की दृष्टि में प्रेरित,नबी, और शिक्षकों को काम प्रभू की देह के निर्माण मे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, बनिस्वत प्रचारकों के । प्रचारक अपनी सेवा तब अच्छी तरह कर सकते है जब वे अन्य सेवाआें के अर्न्तगत काम करें । तभी प्रभु की देह का निर्माण हो सकता हैं । यहीं बीसवी सदी के प्रचारक परमेश्वर के वचन से विमुख हो गए हैं ।

चेले बनाना

प्रचार का उद्देश्य दुनियाँ के हर एक देश में चेले बनाने से हैं । अविश्वासियों के लिए यही परमेश्वर की योजना हैं ।

पश्चातापी को चेला बनाना आवश्यक हैं । परन्तु आज जो लोग परिवर्तित होते है वे प्राय: सच्चे पश्चातापी नहीं होते हैं । प्रचार सभाआें में उसे केवल विश्वास करने को कहा जाता है । पश्चाताप करने का जिक्र नहीं होता । अत: आज के परिवर्तित लोग उन असमय जन्मे बच्चों की तरह है जिन्हें संख्या वृध्दि दिखाने के लिए द्याय (प्रचारक) पहले ही पैदा करवा देती हैं । ये बच्चे या तो मर जाते हैं या जिन्दगी भर समस्याआें से घिरे रहते हैं । स्वर्गदूत उन पापियों के लिए खुशी मनाते हैं जो पश्चाताप करते है न कि उनके लिए जो मात्र विश्वास करते हैं । (लूका १५:७,१०) ।

तथापि यदि सच्चा पश्चाताप हुआ है और मनुष्य का ह्दय परिवर्तन हुआ हैं उसे चेला बनने की जरूरत है कि परमेश्वर की इच्छा उसके प्रति पूरी हो ।

ऐसा प्रचार जिसमे चेले नही बनते अधूरा हैं । प्राय: प्रचारक अपने खुद के साम्राज्य को बढाने के लिए परिवर्तित लोगों को चेला बनने से रोकते हैं ।

हमे ऐसे प्रचारको का न्याय नही करना हैं Šयोंकि हमारा कार्य न्याय करना नहीं है वे प्रभु के प्रति उत्तरदायी हैं ।

आईए मखुस १६:१५ और मत्ती २८:१९२० दोनों स्थलों पर ध्यान देकर परमेश्वर के उद्देश्य को समझें ।

पहला काम विश्वास करनेवाले और पश्चातापी को पानी का बाप्तिस्मा देना । ऐसे प्रचारक जो बिशप को नाराज न करने के डर से के बाप्तिस्मे का प्रचार नहीं करते जैसा पेन्तीकुस्त के दिन पतरस ने प्रचार किया । (प्रेरित २:३८)

आगे मत्ती २८:१९ प्रभु की आज्ञा है कि हम चेले बनाएँ । चेले बनाने का अर्थ इन परिवर्तित लोगों को अपने नाते रिश्तेदारों के अनपेक्षित मोह, माया से दूर रखना,पार्थिव संपत्ति से अलग करना और अपने जीवन में प्रतिदिन क्रूस उठाना हैं ।चेले बबने के लिए कम से कम यह तीन आवश्यकता हैं ।

मत्ती २८:१९ मे फिर पानी का बाप्तिस्मा लेने को दोहराया गया हैं । यद्यपि दो बार यह आज्ञा दी गयी है परन्तु आज ऐसे प्रचारक मिलना मुश्किल है जो इस बात का प्रचार करने का साहस जुटाएँ । वे संस्थाओ के अगुवो की नजर मे अच्छे दिखने के लिए तथा परमेश्वर से डरने के बजाय मनुष्य से डरने के कारण यह साहस नहीं जुटा पाते ।

मत्ती २८:२० मे आगे कहा गया है कि जो चेले बनाए जाते है उन्हें ईश्वर की एक एक आज्ञाआें को मानना और उसपर चलना चाहिये । इन आज्ञाआें को जानने के लिए मत्ती ५,६,७, अध्याय पढा जा सकता हैं । और बहुत से विश्वासी इन आज्ञाआें को महत्व नहीं देते ।

अतएव हम देखते है कि इन दोनों आज्ञाआें का पालन करवाना कितना बडा कार्य हैं ।

हमारे देश के लोगों को परमेश्वर की सलाह पर चलने और उसका प्रचार करने के लिए उत्सुक रहना चाहिए ।

यीशु ने कहा कि उसके चेले इस एक चिन्ह से पहचाने जाएँगे कि वे एक दूसरे से प्रेम रखते हैं ।

ध्यान दें, चेले अपनी अधिक संख्या या अधिक संपत्ति से नहीं परन्तु आपसी प्रेम से ही पहचाने जाएँगे । चंगाई की प्रचार सभाओ मे जो हजारो लोग संदेश सुनने आते हैं चाहिए कि उन्हें स्थानीय कलीसिया का सदस्य बनाया जाये जहाँ सदस्य एक दूसरे से प्रेम करते हैं ।

परन्तु यह दु:खद बात हैं कि उन जगहों में जहाँ चंगाई की सभाएँ साल दर साल चलाई जाती हैं ऐसी कलीसिया मिले जिसके सदस्य एक दूसरे से नहीं लडते । एक दूसरे की पीठ पीछे निन्दा नहीं करते आदि । आपस मे प्रेम रखना तो दूर की बात हैं । नए विश्वासियों के लिए विजयी जीवन नहीं जी पाना, जी पाना, समझा जा सकता है, परन्तु यदि उस क्षेत्र की कलीसिया के अगुवों में लडाईझगडा और बचपना पाया जाए तो Šया कहेंगे ।

यह इस बात का साफ संकेत है कि मत्ती २८ के १९, २० में बताई गई बातों का तिरस्कार किया गया हैं । मखुस १६:१५ में विश्वास और पानी का बाप्तिस्मा का पालन तो होता हैं परंतु यह भी अंशिक रूप से

मखुस १६:१५-२० मे प्रचार पर जोर है और जो संदेश दिया जाता है उसे प्रभु के द्वारा चिन्ह और आश्चर्य कर्म से मान्य होना चाहिए । मत्ती २८:१९,२० मे चेले बनने पर जोर है ऐसे चेले जो यीशु की आज्ञाआें का पूरी रीति से पालन करते हैं । बहुत से मसीही पहली बात के अनुसार तो चलते है पर बहुत कम दूसरी बात पर परन्तु दो पर नहीं चलने से कोई लाभ नहीं । पर किसके पास यह देखने के लिए आँख हैं ।

यीशु की सेवकाई के विषय हम पढते हैं कि भीड उसके पीछे हो लेती थी उसका उपदेश सुनने और चंगे होने के लिए । और वह उन्हें हमेशा चेले बनने के लिए प्रोत्साहित करना था (लूका १४:२५२६) । Šया आज के प्रचारक स्वत: या प्रेरितो नबियों, शिक्षकों और चरवाहों की सहायता से ऐसा करेंगे ।

जब यीशु भीड से चेले बनने का आव्हान करता था तो लोग हट जाते थे केवल मुठ्‌ठी भर के ग्यारह चेले बने । बाकि लोगों ने संदेश को बहुत कठिन पाया। परंतु इन ग्यारह से ही परमेश्वर ने अपने उद्देश्य की पूर्ति की और यीशू द्वारा शुरू किए गए कार्य को आगे बढाया ।

आज भी हमे इस पृथ्वी पर मसीह की देह होकर उसकी सेवकाई को आगे बढाना हैं । जब प्रचारक भीड जुटा लेता है तो हमे परिवर्तित लोगों को आज्ञाकारी चेला बनाने के लिए प्रचार करना चाहिए । केवल इसी प्रकार प्रभू की देह का निर्माण हो सकता हैं ।

अध्याय 20
कलीसिया बनने के लिए हमारी विशेष बुलाहट

कलीसिया बनने के लिए हमारी विशेष बुलाहट, उन विभिन्न क्षेत्रों मे जहाँ ईश्वर ने हमे रखा हैं । कलीसिया के तौर पर हमारी विशेष बुलाहट Šया हैं ?

यदि बिना समझौतावादी हुए हमे परमेश्वर के वचन के प्रति इमानदार होना है तो कम से कम ऐेसे सात क्षेत्र हैं जिसमे हमे आज की मसीहियत के पैमाने से अलग होने का जोर देना हैं।

१ बडप्पन नहीं परन्तु पवित्रता

प्रकाशित वाŠय में बेबीलोन (झूठी कलीसिया) को ग्यारह बार महान कहा गया हैं । जब कि यरूशलेम मसीह की दुल्हन को पवित्र शहर कहा गया हैं (देखे प्रका वा १२:२१)

यदि हम संसार की दृष्टि में एक कलीसिया होकर बडे बनना चाहते हैं तो बेबीलॉन का चिन्ह हैं । ऐसा नहीं हैं ईश्वर हमारी संख्या नहीं बढाना चाहता वह अवश्य चाहेगा यदि हम उसकी सिफारिश के लायक हों । Šयोंकि अधार्मिक कल्ट और मूर्तिपूजक धर्मवालों की संख्या बहुत बढ रही हैं । और प्राय: इन लोगों की संख्या का जोड मसीह समुदाय की संख्या से अधिक होता हैं ।

सच्ची कलीसिया की पहचान पवित्रता हैं । अत: यरूशलेम की वृध्दि उसकी पवित्रता की वृध्दि से नापी जाती हैं । जिसका अर्थ होता है वहाँ लोग एक दूसरे से कैसा प्रेम रखते हैं । यीशु ने कहा कि जीवन का पथ सकरा है और थोडे है जो उसे पाते हैं । जो लोग यीशु की तरह सकरे रास्ते को सकरा घोषित करते हैं बहुत कम लोग उनकी कलीसिया में शामिल होते हैं (मत्ती ७:१३,१४) । यदि हम यीशु के विपरीत प्रवेश को चौडा बनाते हैं तो हम सरलता से अपनी संख्या बढा सकते हैं । यही आज की मसीहियत में हो रहा हैं । यीशु ने सकरे द्वार और सकरे रास्ते को वर्णन पहाडी उपदेश के संदर्भ में किया हैं । (मत्ती ५:७) इस अध्याय की बाते सब द्वार और सकरे रास्ते को परिभाषित करती हैं ।

१ कुर ३:१३ में यह स्पष्ट किया गया हैं कि न्याय के दिन हमारे कार्यो की अच्चतम परखी जाएगी न कि उसकी मात्रा ।

२ बाहय जिन्दगी को प्राथमिकता नहीं परन्तु आन्तरिक जिन्दगी को

पुरानी वाचा में सदैव जोर बाहय बातों पर था Šयोंकि मनुष्य का ह्दय कठोर था । व्यवस्था बाहरी स्वच्छता पर जोर देती थी इसके विपरीत नयी वाचा मे पात्र की आन्तरिक स्वच्छता पर जोर हैं । (मत्ती २३:२५,२६) इसके २७ वें पद में यीशु कहते है कि यदि अन्दर सफाई है तो बाहरी अपने आप साफ होगा और उसे साफ करने की आवश्यकता नहीं होगी । यदि कोई अपने ह्दय से क्रोध को मिटाता हैं तो बाहय रूप से उसके द्वारा हिंसा किए जाने का खतरा खतम हो जाता हैं । इसी प्रकार यदि ह्दय में गंदे यौन विचार नहीं आते तो वह व्यभीचार के खतरे से बच जायेगा ।

कलीसिया में जहाँ प्रमुखत: बाहय बातों पर जोर दिया जाता है जैसेसिनेमा न जाना, बीडी न पीना, शराब न पीना, जुआ न खेलना, गहने न पहनना इत्यादि । ऐसी कलीसिया पुराने नियम की कलीसिया बन जाती हैं । इन बाहय बुराईयों से बचने के लिए अधिक अच्छा हैं कि मन का सोच शुध्द हो कि यह बुराईयाँ उत्पन्न ही न हो ।

बिना आन्तकिर परख के यह आन्तरिक स्वच्छता नहीं मिल सकती । पवित्रशास्त्र हमे प्रोत्साहित करें कि वे पाप के धोखे मे पड कर कठोर बनने से बचें । (इब्रा ३:१३, १०:२५) बहुत सी मसीही कलीसियाआें में कभी कदार ही ऐसा प्रचार किया जाता हैं । इन कलीसियाआें में फरीसी उत्पन्न होते हैं जो पाप को बाहर से माँजते हैं प्रभु की दुल्हन के इससे भिन्न होना हैं ।

३ व्यस्त कार्यक्रम नहीं परन्तु आज्ञाकारिता

संस्थागत मसीहियत का हमेशा जोर कार्यक्रम पर होता हैं । जैसे रास्ते मे प्रचार, घर घर मुलाकात, मिशनरी कार्य इत्यादि । यह सब अच्छा है परन्तु दु:खद है कि इसने परमेश्वर की आज्ञा मानने का स्थान ले लिया हैं ।

यीशु ने कहा कि हमे सब मसीहियों को आज्ञा मानने की शिक्षा देनी चाहिए (मत्ती २८:२०) । परमेश्वर बलिदान नहीं परंतु आज्ञा मानने से प्रसन्न होता हैं (१सामु १५:२२) । यह मूर्तिपूजकों का विचार है कि परमेश्वर हमारे विभिन्न प्रकार के शारीरिक कष्ट सहने से प्रसन्न होता हैं । जिससे हम उसके प्रति प्रेम को सिध्द करते हैं । मूर्तिपूजक संस्कृति में यह अहम बात है और भारत के मसीहियों के में भी यह छा गयी हैं । आत्मिकता का यह अर्थ देखा जाता हैं कि हम अपने धंन्दे को छोडकर कष्टप्रद स्थानों पर जा कर कष्ट सहें । इन सब के लिए बहुत त्याग की आवश्यकता है परंतु फिर भी यह परमेश्वर की आज्ञा मानने का विकल्प नहीं बन सकता ।

यीशु के प्रति हमारा प्रेम बलिदान से नहीं परंतु उसकी आज्ञा और आदेश को मानने से सिध्द होता हैं । जो कुछ यीशु ने हमे सिखाया उस पर चलना हमारे प्रेम को ज्यादा प्रगट करता हैं बनिस्बत इसके कि हम अपने वेतन का पचास प्रतिशत भेंट मे चढा दे या अपनी नौकरी छोडकर मिशनरी बन जाए ।

ऐसी मसीहियत को मार्था की सक्रियता की तस्वीर से दिखाया गया हैं (लुका १०:३९-४२) । वह ईमानदार थी त्याग करनेवाली स्वार्थरहित और प्रभु के लिए रसोई की सेवा देने के लिए उत्साहित थी । तोभी प्रभु ने उसे झिउका उसका मन अपनी बहन के प्रति आलोचनात्मक और खट्‌टा था । मरियम ने प्रभु के लिए त्यागवाला कार्य नही किया इसके बदले वह प्रभु के चरणों मे बैठ कर उसके वचनों को सुनती थी ।

यही हमारा आचरण होना चाहिए । प्रभु की आज्ञाआें को मानना न कि वह करना जो हमारा तर्क हमे सुझाता हैं । परमेश्वर की इच्छा पर हमे चलना हैं ।

४ बिना चेला बनाए प्रचार का कोई अर्थ नहीं

कुछ विश्वासी प्रभु परमेश्वर के वचन में केवल एक आज्ञा पाते हैं कि सारे संसार में जाकर हर प्राणी को सुसमाचार सुनाओ (मरकुस १६:१५) । इस आज्ञा का पालन विश्व की पूरी कलीसिया को करना चाहिए । खास कर उन्हें जिन्हें प्रचारक नियुŠत किया गया हैं (इफी ४:११) परंतु यह कार्य भी अधूरा रह जाएगा यदि यीशु की आज्ञा कि सारे देश मे जाकर चेला बनाओ के द्वारा इसे पूरा न किया जाए ।

हम उन लोगों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद देते है जिन्होने व्यŠतगत कष्ट उठा कर दुनियाँ के कोने कोने में जाकर सुसमाचार का प्रचारभी ऐसे लोगों के बीच में जिन्होंने यीशु का नाम नहीं सूना था परन्तु दु:खद है कि इस बीसवी शताब्दी के प्रचार कार्य में तीन आज्ञाआें कि चेले बनाआें उन्हें पानी का बाप्तिस्मा दो और यीशु की आज्ञा मानना सिखाआें पूरी तरह से नकारा गया हैं ।

बहुत यह सोचते है कि संसार के जो क्षेत्र प्रचार से अधूते रह गए हैं वहाँ सुसमाचार पहुँचना चाहिए । परमेश्वर उनको यह बोझ देता हैं जिन्हें प्रचारक होने की बुलाहट हैं । परंतु दूसरों को इसके ही समान महत्वपूर्ण और कठिण कार्य सौंपता है कि इन परिवर्तित लोगों को चेला बनाया जाए ।

इसे मेज बनानेवाली बढई की दुकान के उदाहरण से समझा जा सकता हैं जहाँ बहुत से बढई चारों पैर बनाने में व्यस्त हैं परंतु कुछ ही है जो मेज का ऊपरी सिरा बना रहे हैं । नतीजा यह होता है कि अधूरी मेज की भरमार हो जाती हें और फिर भी बढई पैर बनाने में ही लगे हैं । यह पŠका है कि यीशु अपनी बढई की दुकान मे एक मेज बनने के बाद ही दूसरी मेज का काम शुरू करता हैं । वह विश्वास करता था कि जो कार्य शुरू हुआ हे उसे पूरा होना हैं । वह आज भी वही हैं । उसके सहभागी हो कर हमे भी यह सोचना हैं प्रत्येक नये विश्वासी को चेला बनाना हैं ।

५ पुराने नियम की भेंट नहीं पर नये नियम की भेंट

बहुत से विश्वासी पुरानी वाचा और नयी वाचा के अंतर से अनिभिज्ञ हैं । बहुत से प्रचारक इसी काम उठा कर उन पर दशमांश देने का नियम लादते हैं ।

जब यीशु फरीसियो से बात करता हैं जो पुरानी वाचा के अन्तर्गत थे उसने उनसे कहा कि मूसा की आज्ञा के अनुसार दशवांश (मत्ती २३:२३) । परंतु जब उसने अपने चेलो से नयी वाचा के विषय के उसने भेंट चढाने के प्रतिशत पर नहीं परन्तु भेंट देने की भावना पर जोर दिया (मत्ती ६:१४) । भेंट देने की हमारी मनसा को नयी वाचा में स्थान न कि उसकी मात्रा को । अब प्रश्न यह है कि हम फरीसी बनना चाहते हैं या यीशु के चेले ।

आजकल मसीही साहित्य में विश्वासियों को उभारा जा है कि वे प्रचारकों और अन्य सेवकाईयों की सहायता के लिए दसवॉंश दें प्राय: सभी मसीही पत्रिकाएंॅ बेबिलोन की व्यवसायिक आत्मा के कारण दूषित हो कर ,प्रभू के नाम से विभिन्न्ा कार्यक्रमो के लिए पैसे की भीख मांगते है ।

प्रेरित कभी भी अपनी सेवकाई के लिए इस तरह पैसों की भीख नही मॉंगते थे यीशू ने भी ऐसा कभी नही किया आज जो हम देखते है वह यीशू और प्ररितों के उदा से एकदम विपरीत है तौ भी बहूत से वि इस तय से पूर्णत: अन्जान होकर आंॅख मूॅंद कर ऐसी सेवकाईयों की सहायता करते हैं और अपने को भी दूूषित करते है ।

नये नियम में पैसा सौंपने के बदले प्रभू को अपनी देह सौंपने के लिए ज्यादा समझाया गया है (रोमि १२:१ )इसी बात का जोर हमे कली सिया को देना । यदि हम प्रभू के साम्राज्य की खोज करे तो वह हमारी आर्थिक जरूरतों को पुरा करेगा (मत्ती ६:३३ ) ।

मनुष की सामर्थ नही वरन परमेशवर की सामर्थ

मसीहियों के बीच आज मनुषय के मन की सामर्थ पवित्रात्मा के सामर्थ की भोंडी नकल बन गयी है । मसीहियो के कई करिश्मायी कारनामे जो मन की सामर्थ से किए जाते हैं । पवित्रात्मा की सामर्थ की तरह पेश होते है इस धोखे से बचने के लिए हमे मन और आत्मा के अन्तर को समझना चाहिए । और परमेश्वर के वचन से हमारे चर्चा में इन बातों पर प्रकाश डाला जाना चाहिए ।

परमेश्वर मनुष्य की दीनता के द्वारा कार्य करता हैं । उसने मूर्खो को चुन लिया कि बुध्दिमानों को लज्जित करें । परमेश्वर की सच्चाई बुध्दिमानों और होशियारों के लिए छिपी हुयी है जब कि बच्चों पर प्रगट हैं (मत्ती ११:२५) । जहाँ शास्त्री लोग मनुष्य की बुध्दि से प्रचार करते हैं वह बेबीलोन का चिन्ह हैं । चाहे वे बाईबिल ज्ञानी अपने सिध्दांत में प्रचारक हों । बेबीलोन मसीहियत ने परमेश्वर की योजना को छोड दिया है कि कम बुध्दिवालों ईश्वर का काम करें ।

मनुष्य की बुध्दि को गौरवशाली दिखाना बेबीलोन का निर्माण करने का रास्ता हैं । और यह खतरा अभी भी कलीसिया में बना हुआ हैं । ऐसे बुध्दिमान लोग जिन्हों ने अपने मन को क्रूस पर नहीं चढाया हैं और ईश्वर के काम के लिए बुध्दि का सहारा लेते हैं इसी खतरे में हैं । कलीसिया में जो अपनी बुध्दि का सहारा लेते हैं वे ही बाधक हैं । परमेश्वर अपना काम अहमी शिष्यों से नहीं परन्तु दीन और परमेश्वर से डरनेवाले लोगों के द्वारा करता हैं ।

कलीसिया मं अगुवायी का काम हमेशा चरित्रवान लोगों को देना चाहिए और कभी भी अन्य आधार पर नहीं । परमेश्वर की सामर्थ सदैव पवित्रात्मा और क्रूस से संबंधित वचन से प्रगट होती हैं । (१ कु १:१८ और २:४) । न कि प्रभावशाली व्यŠतत्व के द्वारा ।

जहाँ कलीसिया परमेश्वर की आत्मा की सामर्थ और क्रूस के पथ का सहारा नहीं लेती वहाँ मनुष्य के मन की शŠत के प्रगट होने का द्वार खुल जाता हैं । मनुष्य की चतुरायी और योग्यता हावी होती हैं न कि पवित्रात्मा की सामर्थ और उसके द्वारा प्रकाशन । इसलिए बेबीलोन के निर्माण की जमीन तैय्यार हो जाती हैं । चाहे पवित्रात्मा का ही प्रचार Šयों न किया जाए ।

७ भीड एकत्र करना नहीं परन्तु प्रभु की देह का निर्माण

पुराने नियम में यहूदी जो ईश्वर के लोग थे उनका एक देह बनना असंभव था यह तब संभव हुआ जब यीशु का स्वर्गारोहण हुआ और उन्होंने मनुष्य में बसने के लिए पवित्र आत्मा को उंडेला । पुराने नियम में दो तन एक हो सकते थे । इस्त्राएल एक झुन्ड था । उनकी संख्या बढती गयी परन्तु वे झुन्ड ही रहें । नये नियम में कलीसिया एक देह है न कि झुन्ड ।

मसीह की देह के लिए महत्त्वपूर्ण बात आकार का नहीं परन्त एकता का हैं । इस पैमाने से ऐसी कलीसिया खोज पाना कठिन हैं जो झून्ड न हो । हर जगह झून्ड आकार में बढ रहा हैं एकता में नहीं । कलीसिया के अगुवों के बीच में ही लडाईझगडे जल और होड पायी जाती हैं ।

विश्व के विभिन्न स्थानों में परमेश्वर मसीह की देह का आचरण चाहता हैं । बेबीलोन की मसीहियत यह पूरा नहीं कर सकती । परन्तु बचे हुअे के द्वारा जो यह महसूस करते हैं कि यीशु के चेलों के बीच प्रेम का बंधंन है ईश्वर का कार्य चल रहा हैं ।

प्रभु की देह में प्रत्येक मनुष्य बहमूल्य हैं चाहे उसके पास तोडे न हों । उसका मूल्य देह का सदस्य होने में हैं । कलीसिया में हमे भी ईश्वर की तरह तोडा रहित लोगों का आदर करना चाहिए यदि वे परमेश्वर से डरनेवाले और दीन हैं । बेबीलोन की कलीसिया में योग्य प्रचारक, दान प्राप्त गायक और परिवर्तित एस्ट्रोनॉट का आदर होता हैं । परन्तु परमेश्वर के मंदिर में हम उनका आदर करते हैं जो परमेश्वर का आदर करते हैं । (भजन १५:१)

एक बडा अन्तर हैं बेबीलोन और यरूशलेम के बीच।

आज परमेश्वर हमे बुलाता है कि बेबीलोन से निकल कर यरूशलेम का निर्माण करें (प्रका १८:४) ।

अध्याय 21
रोटी तोडना - एक वाचा

जब यीशु ने रोटी तोडने की विधि स्थापित की उसने ऐसे शब्द का उपयोग किया जिसका उपयोग उसने पहले कभी नही किया था । शब्द वाचा इस शब्द का अर्थ समझना जरूरी है यदि हम सार्थकतापूर्वक प्रभु की मेज में शामिल होना चाहते हैं ।

वाचा के द्वारा परमेश्वर से संबंध

वाचा शब्द का पहला उपयोग उत्पत्ति ६:१८ में आया हैं जहाँ परमेश्वर ने नूह से वाचा बांधने की प्रतिज्ञा की (उत ९:९,११) परमेश्वर ने मनुष्य के पाप के कारण दुनिया का न्याय किया और उसने मुंह से वाचा बांधी कि पहले की तरह वह संसार को जल प्रलय से नाश नहीं करेगा । अपनी बांधी गयी इस वाचा के लिए परमेश्वर ने एक चिन्ह दिया और यह चिन्ह रंगो का धनुष हैं। परमेश्वर ने इस आकाश में इसे आकाश में मेरा धनुष कहा (उत ९:१३) । यहाँ इस धनुष का अर्थ वहीं है जो हथियार धनुष का हैं । एक धनुष सदैव उस दिशा में इंगित होता हैं जिसे मारने का निशाना बनाया गया हैं । आकाश के इस धनुष का पृथ्वी के परे निशाना साधने का अर्थ है कि मनुष्य के पाप के बदले परमेश्वर ही उस न्याय के तीर को सहेगा । धनुष का निशाना मनुष्य की ओर न हो कर परमेश्वर की ओर होता हैं । इसके बाद कभी पृथ्वी जलप्रलय से नाश नहीं हुयी । भजन ६९:१२ मे यह लिखा है कि परमेश्वर के न्याय की धारा क्रूस पर टंगे यीशु से टकराई । यह आकाश की धनुष के चिन्ह का अर्थ हैं ।

दूसरा व्यŠत जिससे परमेश्वर ने वाचा बांधी अब्राम था । इसका पहला वर्णन उत १५:१८ में हैं । यहाँ ध्यान दें परमेश्वर कैसे अब्राम के साथ वाचा में बंधता हैं । अब्राम से कहा गया कि वह तीन पशु और दो पक्षी लाए और जिला कर (हत्या) जमीन पर फैला कर रखें । पशुआें को दो भागों में काटा जाए यह दो भाग एक दूसरे के विपरीत रखे जाएँ । रात्री में परमेश्वर नीचे आया और जलती अग्नी के रूप मे इन दोनो भाग के बीच से गुजरा इस तरह परमेश्वर ने अब्राम से वाचा बांधी । इसका अर्थ साफ है कि परमेश्वर खुद इन काटे गए जानवरों की तरह अब्राम के लिए अपना जीवन देगा । नूह की वाचा के समान मृत्यू ही वह जरिया है जिससे वाचा पूरी होती हैं । ऐसी मृत्यु जिसे परमेश्वर ने झेलने का बीडा उठाया ।

इस तरह वाचा बांध कर उसे निश्चित करने की विधि इस्त्रायल के लिए एक संस्कार बन गयी (यिर्म ३४:१८,१९) । जब दो लोग वाचा में बंधते थे तो एक बछडे को दो भागों में किया जाता था और उन दो भागों के बीच से गुजरा जाता था जो यह दर्शाता था कि वाचा को पूरा करने के लिए वे एक दूसरे के लिए अपने जीवन को कुर्बान करेंगे । यदि वाचा पूरी न की जाए तो यह बहुत बुरा अपराध माना जाता था। इसीलिए परमेश्वर ने यहूदा दे के लोगों से यिर्मयाह के माध्यम से यह कहा कि वाचा बांधने के बाद उसे तोडना उनके ऊपर गंभीर न्याय को लाएगा ।

उत १७ मे हम देखते है कि परमेश्वर अब्राम के साथ बांध गयी वाचा को पुन: निश्चित करता हैं । पुन: परमेश्वर एक चिन्ह देते है यह चिन्ह खतना का हैं । खतना का अर्थ देह का मरना हैं । इस अब्राहम और उसकी संतान को वाचा के प्रति मृत्यु तक विश्वास योग्य रहना हैं । बाहरी खतना ईश्वर की इच्छा का संकेत हैं कि इस्त्राएलि के ह्दय का खतना हो कि वे परमेश्वर से अपने संपर्क ह्दय से प्रेम रखें । (व्य वि ३०:६, रोमियो २:२८,२९) । ये स्थल यह सिखाता हैं कि बिना देह को मारे परमेश्वर से सच्चा प्रेम नहीं हो सकता ।

इसके बाद हमे वाचा का विवरण तब मिलता है जब परमेश्वर इस््रत्राएलियों से मूसा के माध्यम से वाचा बांधता हैं जिसे हम पुरानी वाचा कहते हैं । इसका वर्णन निर्गमन २४:४७ में हैं । मूसा ने परमेश्वर की वाचा की पुस्तक लिखी, बछडों की बली चढाए और यह कहते हुए उनके खून को लोगों पर छिडका कि यह वाचा का लोहू देखो जो वाचा परमेश्वर ने तुम से बांधी है निर्ग २४:८ । वाचा पर मारे गये जानवरों के लोहू की मुह लगाई गई ।

बाईबिल में वाचा का लोहू वाŠयांश यहाँ पहली बार आया हैं । यही वह वाŠयांश हैं जिसका उपयोग यीशु ने अपने चेलों को अंतिम व्यारी के समय कटोरा देते हुए किया था । (मत्ती २६:२८) । पुरानी वाचा के अन्तर्गत लोहू लोगों पर केवल छिडका गया था । नयी वाचा के अन्तर्गत यीशु का निमंत्रण है कि हम उस प्याले से पिएँ । पुरानी वाचा व्यवस्था केवल व्यŠत के बाहरी जीवन को शुध्द कर सकती हैं जब कि नयी वाचा में हम अन्दर से शुध्द हो सकते हैं ।

वाचा मं प्रवेश मृत्यु से ही होता हैं । इब्रा ९:१३-२२ मे बछडों का लोहू और मसीह द्वारा बहाए लोहू के बीच अंतर बतायागया है और कहा गया है कि जहाँ वाचा बंधी है वहाँ वाचा बांधनेवाले की मृत्यु आवश्यक हैं Šयों कि जब तक वाचा बांधनेवाला जीवित हैं वाचा लागु नही होती । इसीलिए परमेश्वर जन भी किसी मनुष्य से वाचा बांधता है वह मृतयु से प्रदर्शित होती हैं ।

यीशु का हमारे साथ नयी वाचा बांधने का एक ही तरीका है कि उसकी खुद की मृत्यु हो और उस वाचा में हम तब ही उसका उपयोग करते या बंधते हैं । जब हम अपनी देह को मारते हैं । यही प्रभु की ब्यारी मे रोटी खाने और दाखरस पीने का अर्थ हैं ।

इब्रा १३:२० में हमेतबाया गया हैं कि परमेश्वर ने यीशु को अनंत वाचा के लोहू द्वारा जिलाया । इसका Šया अर्थ हैं ? कलवरी के क्रूस पर जो लोहू यीशु ने बहाया वह मृत्यु तक पाप का विरोध करने का परिणाम था (इब्रा १२:४) । यीशु ने निश्चित किया कि वह पिता की आज्ञा मानते हुए कभी पाप में नहीं पडेगा उसका विचार था पिता मेरे लिए मरना बेहतर हैं बदले इसके कि मैं किसी छोटी सी भी बात में अनआज्ञाकारी रहूँ । यह यीशु की वाचा अपने पिता के साथ थी ।

अब यीशु अपनी ब्यारी में हमे निमंत्रित करता हैं कि उस प्याले से पिएँ जिसमे नयी वाचा का लोहू हैं । Šया हम इच्छुक हैं Šया हम उस कटोरे से पी सकते हैं जिस कटोरे को उसने पिया Šया हम पौलुस प्रेरित के समान चाहते हैं कि यहजाने ताकि मैं उसको और उसके मृत्युग्जय की सामर्थ्य को और उसके साथ दु:खों मे सहभागी होने के मर्म को जानूँ, और उसकी मृत्यु की समानता को प्राप्त करूँ । कि मैं किसी भी रीतिसे मरे हुआें में से जी उठने के पद तक पहुँचू । (फिलि ३:१०,११) ।

बहुत से विश्वासी हलकेपन से प्रभु की मेज में आते हैं बिना यह समझे कि उसका Šया मकसद हैं और वाचा का Šया अर्थ है । केवल वह जो पाप के विरूध्द लडने के लिए खून बहने तक दृढ निश्चयी हैं केवल वे ही सही मायने मे प्रभु की मेज में शामिल हो सकते हैं ।

शब्द वाचा को हम नयायलय में समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के तुल्य मान सकते हैं । कोई भी बिना पढे और बिना समझे समझौता पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करता परन्तु कितनी हलकाई से विश्वासी प्रभु की मेज मे रोटी लेते और दाखरस पीते हैं । आश्चर्य नहीं कि कुरन्थ में आज भी बहुत विश्वासी कमजोर और बीमार हैं और समय के पहले मर जाते हैं ( १ क्रुर ११:३०) ।

लैव्यव्यवस्था २६ का १४-२० मे परमेश्वर ने इस्त्राएलिया को चिताया था यदि वे उससे वाचा बांध कर उसे तोडते हैं तो वे कमजोर बीमार और हारे हुए होवेंगे और उन्हें अपने परिश्रम और व्यवसाय का कोई भी फल प्राप्त नही होगा ।

वाचा को तोडना एक गंभीर बात हैं । परमेश्वर के सम्मुख जल्दबाजी में बोलों जब तुम परमेश्वर से मन्नत बांधते हो तो उसे पूरा करने मे देर न करो । यह बेहतर है कि मननत ही न बाँधो बदले में इसके कि मन्नत बांध कर इसे तोडो । (समों २:२५) ।

जो बारबार बीमार पडते या कमजोर होते है उन्हें ध्यान से यह सोचना चाहिए कि उसनें परमेश्वर से बांधी वाचा को तोडा तो नहीं । इसीलिए याकूब कहत हैं कि अपने पापों को मान लो की चंगे हो जाओ (याकूब ५:१६) ।

जो रोटी हम तोडते है वह मसीह की देह का प्रतीक हैं । सर्वप्रथम यह उस शारीरिक देह का प्रतिक है जो यीशु की पृथ्वी पर थी जिस देह मे उसे अपनी नहीं परंतु अपने पिता की इच्छा का पालन सदैव किया (इब्रा १०:५) इस प्रकार उसकी देह इस सांसारिक जिन्दगी में तोडी हुयी और समर्पित देह थी । जब हम रोटी तोड कर उसमें शामिल होते हैं तो यह प्रदर्शित करते है कि हमारी इच्छा भी अपनी देह को उसी तरह तोडना और समर्पित करना हैं । प्रभु की मेज में यह प्रदर्शित करना एक गंभीर बात हैं यदि बाद में हम ऐसा जिएँ जैसा कि हमने परमेश्वर से वाचा ही नहीं बांधी । हम सिध्द नहीं हैं परन्तु प्रभु नए विश्वासियों से भी यह आशा करते है कि वे अपने लिए मरने को इच्छुक हों और अपने लिए नहीं परंतु प्रभु के लिए जिएँ (२ कु ५:१५) । अन्यथा हम गलत तरीके से रोटी मे शामिल होते है और प्रभु की देह को सही रूप मे नही पहचानते ।

भाईयों के बीच वाचाई सम्बंध

जो रोटी हम तोडते हैं वह केवल मसीह की शारीरिक देह का ही नहीं परतु कलीसिया (जो प्रभु की देह हैं ) का भी प्रतीक हें । (१ कु १०:१६,१७) राेी एक ही है जैसे हम सब भी बहुत होकर कलीसिया में एक हैं जो बलि को खाते है वे वेदी के सहभागी होते हैं (१ कु १०:१८) । यदि हम प्रभु की मेज से खते हैं तो हम भी क्रूस पर उसकी मौत के सहभागी होते है कि परमेश्वर से संबंध रखने के लिए और कलीसिया के सदस्यों से संबंध रखने के लिए अपनी देह को मार दें ।

हमे अपने भाईयों के लिए अपना प्राण देना है (१ यो ३:१६) प्रभु की मेज पर गवाही देने का यह दूसरा प्रकार हैं । हम केवल प्रभु से ही नही परंतु अपने साथी विश्वासियों से भी वाचा में बांधते हैं । और यहाँ भी वाचा अपनी देह को मारने से पŠकी की जाती हैं ।

इस्त्राएल में जब दो व्यŠत बद्‌दडे के आधे कटे भागों के बीच से चल कर वाचा को स्थापित करते थे वैसे ही आज भी हम रोटी तोडकर एक दूसरे से वाचा बाँधते है । यह बात उतनी ही गंभीर है जितनी की परमेश्वर से वाचा बाँधना ।

१ शामु १८:१८ मे हम पढते है कि किस प्रकार से योनातन ने दाउद से वाचा बाँधी । यहाँ बताया गया है कि योनातन का प्राण दाउद के प्राण से गुथा हुआ था यहाँ गुथा होने का वही आशय है जो नेहम्याह ४:६ मे बिना सुराख की दीवर बनाने से हैं । इन दोनों के दिलों के बीच ऐसी कोई सुराख नहीं था कि दुश्मन प्रवेश करें । आगे यह भी कहा गया है कि योनातन, दाउद से अपने समान प्रेम करता था । प्रभु की देह मे हमे भी यह बुलाहट है कि हम एक होकर इस तरह मिल जॉए कि हमारे बीच मे गलत फहमी, घृणा, अविश्वास के कोई सुराख न हो । ताकि हम में अलगाव पैदा करने के लिए शत्रु प्रवेश न कर सके ।

योनातन ही वह अकेला व्यŠत था जिसे दाउद से जलन होनी थी Šयों कि इस्त्राएल का राजा बनने के लिए वह योनातन का प्रतिद्वंव्द्वी था । फिर भी उसने इस जलन पर विजय पायी और दाउद को अपने समान प्रेम किया । नये नियम के विश्वासियों को योनातन शर्मिन्दा कर सकता हैं ।

योनातन ने दाउद से वाचा बांँधी और इसके चिन्ह स्वरूप अपना राजसी वस्त्र दाउद को ओढा दिया । योनातन ने इस बात का संकेत दिया कि वह अगले राजा बनने की इच्छा को दफन करता है और दाउद को राजा बनाना चाहता हैं । कलीसिया की देह में हमे भी आज्ञा दी गयी हैं । एक दूसरे से बढ कर आदर करने में लिप्त रहो अत: हमे भी अपने स्वार्थ को मरना है और इमानदारी से अपने भाईयों के लिए यह चाह रखना है कि वे बढें, ऊँचा उठें और हमसे ज्यादा उनका सम्मान हो और यदि जरूरत पडे तो हमे भी अपने नंगे भाई का तन ढाँकने अपना पहरावा पहनाना हैं । इस प्रकार हम अपने भाईयों को दूसरों की नजरों मे ऊँचा उठा सकते हैं । यही अपने भाई के साथ वाचाई सम्बंध का अर्थ ।

उपरोŠत बातें असंभव हैं यदि लगातार न की जाँए । हर एक कलीसिया इसीलिए समस्या ग्रस्त है Šयों कि विश्वासी उपरोŠत वाचायी संबंध मे नहीं बंधे हैं । हर एक अपने मन की करना चाहता हैं । कुल परिणाम यह होता है कि शैतान विजयी होता हैं । ऐसे झुन्ड के द्वारा निर्मित कलीसिया नहीं है Šयों कि यीशु ने ऐसी कलीसिया के निर्माण की बात कही जिस पर अद्योलोक के फाटक विजयी न होंगे । (मत्ती १६:१८)

आज इस संसार मे यीशु अपनी कलीसिया का निर्माण कर रहा हैं यदि हम इस कलीसिया के भाग बनना चाहते हैं तो ह्दय से इस वाचाई संबंध को अपनाना है और अपने भाई को महिम युŠत बनाना हैं ।

आगे हम पढते है कि योनातन ने अपने अस्त्रशस्त्र तलवारतर धनुष और अपने कटिबंध को भी दाउद को सौंप दिया । अपने भाईयों के साथ वाचा बांधने के लिए हमे भी उन सब शस्त्रों का त्याग करना चाहिए जो किसी भी तरह भाईयों को हानि पहुॅचा सकते हैं । यही योनातन के कार्य की मनसा हैं ।

वह शस्त्र जिसने मसीहियत को सबसे अधिक बर्बाद किया है जीम हैं । Šया हम चाहते है कि इसका उपयोग न करें तो हम अपने भाईयों के लिए कभी बुरा न कहें, पीठ पीछे चुगली न करें और एक दूसरे से निन्दा न करें ।

वस्त्रों का यह त्याग यह भी दर्शाता है कि हम अपने भाई पर भरोसा रखते है और उसके सामने अपने को बचाव रहित पेश कर सकते हैं । इसी भरोसे और विश्वास से अपना पन बढता हैं ।

१ सामु १९,२० मे हम देखते हैं कि योनातन अपने पिता के विरूध्द भी खडा होकर दाउद के प्रति प्रतिबध्द रहता है । अपने सगे संबंधियों की उपस्थिति मे भी योनातन अपने भाई दाउद के साथ खडा रहा । सच मे वह हमारे अनुसार के लिए एक योग्य उदा हैं । हमे भी अपनी कलीसिया के भाई से अपने खून के रिश्तेदारों से भी अधिक प्यार करना चाहिए ।

आमास १:९,१० में हम पढते है कि कैसे भाईयों के बीच वाचा तोडने को परमेश्वर ने बडी गंभीरता से लिया राजा ही राम के दिनों में सोर (वायर) ने इस्त्राएल के साथ वाचा बाँधी थी तौमी इस्त्राएल की जरूरत के समय उन्होंने इस्त्राएल को धोखा दिया और दुश्मन के हाँथ सौंप कर वाचा तोडा । परमेश्वर ने आमोस से कहा कि वे इस बात के कारण सोर का कठोरता से न्याय करेगा ।

२ सामु २१:१२ एक दूसरा उदाहरण हैं । इस्त्राएल में तीन वर्ष तक अकाल पडा जब दाउद ने परमेश्वर से इसका कारण जानना चाहा तो परमेश्वर ने कहा कि यह इसलिए हुआ कि यहोशू के समय में इस्त्राएल ने गिबोनियों से जो वाचा बाँधी थी उसे तोड दिया । राजा शाउल ने गिबोनियों को मार डाला । शाउल की मृत्यु के सालों बाद इस्त्राएल का न्याय किया गया । परमेश्वर न्याय करने मे देरी करता हें परंतु यदि गलत काम का पश्चाताप न किया जाए तो न्याय जरूर आता हैं । कोई पूछ सकता हैं अकाल भेजने में परमेश्वर ने देरी Šयों की कोई शक नहीं इसलिए Šयों कि वह इस्त्राएल को पश्चाताप करने का समय देना चाहता था । जब उन्होंने पश्चाताप नहीं किया तो न्याय उन पर आ पडा।

पौलूस कुरन्थियों को कहता है कि यदि वे अपना न्याय खुद करें तो परमेश्वर उनका न्याय नहीं करेगा । परंतु चूंकि उन्होंने अपना न्याय नहीं किया वे कमजोर और बीमार हो गए और बहुत समय से पहले मर गये । जो आग लगातार कमजोर और बीमार हैं वे परमेश्वर की ओर ताक कर सोचे कि शायद उन्होंने अपने भाई से बांधी वाचा को तोडा हैं, प्रभु की मेज में शामिल होकर भी अपने भाईयों और बहनों को धोखा दिया हैं और पीठ पीछे उनकी निंदा की हैं । यहूदा स्कारयोती का भी यह मुख्य अपराध था कि वह यीशु के साथ वाचा की ब्यारी में शामिल होकर यीशु को धोखा दिया । जैसा कि भजनकार भविष्यवाणी करता है मेरा परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, जो मेरी रोटी खाता था उसने भी मेरे विरूध्द बात उठाई हैं । (भजन ४१:९) ।

प्रभु हमारी सहायता करे कि आगे को प्रभु की भेज में शामिल होने के पहले हम अपने को परख सकें । हम संपूर्ण ह्दय से इस पाप के लिए पश्चाताप करें कि जो वाचा हमने प्रभु और अपने भाई बहनों से बाँधी हैं उसको हमने तोडा है और इस संबंध में पवित्रात्मा की अगाही पर ध्यान दें ।

अध्याय 22
कलीसिया और सताव

इफी ३:१० मे लिखा है ताकि अब कलीसिया के द्वारा, परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान उन प्रधानों और अधिकारियों पर जो स्वर्गीय स्थानों में है, प्रगट किया जाय इफी ६:१२ मे हमे पता चलता हैं कि आकाश के थे प्रधान और अधिकारी शैतान और उसकी दुष्ट सेना है जो तीसरे आसमान से गिरा देने के बाद दूसरे आसमान में रहते हैं । तीसरा आसमान परमेश्वर का निवासस्थान हैं ।

हम यह भी जानते हैं कि सब मनुष्यों के लिए हमे प्रभु के गवाह होना हैं, परन्तु हमे यह बताया गया हैं, कि हमे अपनी गवाही इन बुरी आत्माआें का भी देना हैं । यह गवाही Šया यह परमेश्वर के ज्ञान की गवाही हैं (फी ३:१०) । यह हमारी आत्मा की एक आनंद दायक अंगीकार है कि परमेश्वर ने अपने सिध्द ज्ञान हमारे जीवन में सब कुछ व्यवस्थित किया हैं । यह उन जीवनों की गवाही है जो ऊपर से प्राप्त ज्ञान के सहभागी हुए ।

अय्युब की पुस्तक में हम पढते हैं कि अय्यूब की गवाही उसके जीवन के द्वारा शैतान को मिली । जब शैतान पृथ्वी का भ्रमण कर परमेश्वर के सम्मुख आया तो परमेश्वर ने उससे पूछ कि Šया उसे परमेश्वर के सीधे दास अय्यूब के जीवन को देखा हैं (अय्यूब १:८) । शैतान ने उत्तर दिया कि अय्यूब परमेश्वर का भय इसलिए मानता है Šयों कि परमेश्वर ने अय्यूब के चारों ओर तीन प्रकार के बाडो का निर्माण किया हैं। शैतान जानता था कि एक बाडा अय्युब के चारों ओर दूसरे उसके घराने के और तीसरा उसकी संपत्ति के चारों ओर हैं । बहुत विश्वासी इन तीन बाडों के विषय नहीं जानते हैं जो परमेश्वर ने के चेलों के चारों ओर रखी हैं । लूका १४:२६:३३ में चेले बनने को तीन शर्ते बताई गयी हैं । तो जो कोई अपनी सम्पत्ति, प्रिय लोग और अपनी जिन्दगी को परमेश्वर के लिए समर्पित करता परमेश्वर उनके चारों ओर बाडा बांधता हैं ।

परंतु फिर हम पढते है कि अय्यूब को घेरे इन बाडों को एक एक कर पमरेश्वर शैतान के लिए खोल देता है कि शैतान उसमे प्रवेश कर अय्युब की सम्पत्ति, उसके प्रिय लोग उन्हे उसकी देह पर आक्रमण करें । यह इसलिए हुआ कि परमेश्वर शैतान के समक्ष अय्युब के चरित्र का प्रदर्शन कर सके ।

इससे हम यह सींखते है कि प्रभु के चेलों को और जो कुछ उनके पास है परमेश्वर के बिना स्वीकृति के शैतान छू नहीं सकता । यह एक बडा महत्वपूर्ण सत्य हैं जिस पर हमे खडे रहना हैं । और आनेवाले दिनों मे हम उसकी और भी आवश्यकता महसूस करेंगे । यीशु मसीह की सच्ची कलीसिया आनेवाले दिनों में प्रारंभिक शताब्दि के दिनों की तरह सताव का सामना करेगी । इसके पहले कि वह दिन आए हमे इस तथ्य पर कायम रहना है कि मसीह के सच्चे चेलों के चारो ओर यह तीन बाडे हैं और शैतान बिना परमेश्वर की अनुमति के उसमे प्रवेश नहीं करत सकता ।

अय्युब के जीवन से दूसरा पाठ हम यह पढते हैं कि हमारे अपने लोग ही और भŠत मसीही ही हमे दोषी ठहरायेंगे । अय्युब के विषय में उसकी पत्नी और तीन धार्मिक अगुवे उसे गलत समझकर उसकी आलोचना करते हैं । यह भी परमेश्वर की मनसा से ही हुआ । हमारे प्रिय लोग और भŠतजन भी हमे गलत समझ हमारी आलोचना करेंगे । यदि परमेश्वर उनके लिए इन बाडों को खोल देगा ।

अय्युब दीन बना और कहा अपनी माता के गर्भ से मैं नंगा आया और नंगा ही लौट जाऊंॅगा, प्रभु ने दिया प्रभु ने ले लिया प्रभु का नाम धन्य हो (अय्युब १:२१) । वह सच्चा चेला था Šयों कि वह किसी संपत्ति का मालिक नहीं था । वह यह जानता था कि प्रत्येक वस्तू जो उसके पास हैं वह परमेश्वर की हैं । परमेश्वर को अधिकार है कि उसे दे या उससे लेले । जो चलेले नहीं हैं वे ये सोचते है कि वे आशीषित हैं जब परमेश्वर उन्हें चीजें देता हैं । जो चेले हैं वे यह मानते है कि जब परमेश्वर ले लेता है तो हम अधिक आशीषित होते हैं । इस प्रकार हम जान सकते हैं कि हम चेले हैं या नहीं ।

दु:ख की बात यह रही कि अय्यूब अपने इस दृढ अंगीकार मं अंत तक कायम नही रह सका । कुछ समय पश्चात सताव के लगातार दबाव के कारण वह कमजोर हो गया और परमेश्वर के विरूध्द शिकायत करने लगे । अध्याय ३ से अध्याय ३१ तक अय्युब के अंगीकार के कमजोर होने और मजबूत होने की दु:खद घटना को देखते हैं । यही पुरानी वाचाके लोगों का अनुभव हैं ।

परंतु जैसा कि हम इब्रा ११:४० मे पढते हैं नयी वाचा मे इससे बेहतर प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की हैं । इब्रा १२:१-१३ में हमे प्रोत्साहन दिया गया हैं कि अंत तक विजयी रहने के लिए हम यीशु का अनुकरण कर सकते हैं ।

आज हम अय्युब के नहीं पर यीशु के अनुचर है और कैसे भी सताव आये हम ईश्वर की सामर्थ के अनुग्रह से अन्त तक हो कर शैतान के सामने गवाह बन सकते हैं । इस अय्युब की आलोचना नहीं कर सकते Šयों कि जिस समय वह रह रहा था अनुग्रह नहीं आया था और पवित्रात्मा नहीं दिया गया था । नयी वाचा की स्थापना नहीं हुयी थी । उस समय की सीमाआें को देखते हुए अय्युब ने बहुत अच्छा व्यवहार किया इतना अच्छा कि परमेश्वर ने उसे तीन बार सराहा (अय्युब १:८, २:३, ४२:७) ।

जब कि हम यीशु का अनुसरण कर सकते हैं जो हमारे विश्वास का कर्ता और पूरा करने वाला हैं ।

यीशु सताव की बडी पाठशाला से गुजरा और पूर्वत: आज्ञाकारी रहने का तगमा प्राप्त किया और आज जो इस पाठशाला मे मर्ती होना चाहते हैं उनको आज्ञापालन का पाठ सिखाने के लिए उत्तम शुरू हैं । (इब्रा ५:८९) । यहाँ कोई दबाव नहीं है जैसा पुरानी वाचा मे था तुम्हें ऐसा करना है नहीं परंतु आत्मा दुल्हन से कहते आओ और इस पाठशाला मे मर्ती न हो, Šयों कि यही एक मात्र जगह हैं जहाँ चेले पन का गुर सिखाया जाता हैं ।

यीशु ने अपने चेलों से स्पष्ट कहा कि इस दुनियाँ तुम्हे सताव का सामना करना पडेगा । परन्तु डरना मत Šयों कि यीशु ने दुनियाँ और उसके शासकों पर विजय पायी हैं और चेले भी विजयी होंगे । (योहन्ना १६:३३) ।

आज यीशु की तारीफ करनेवाले तो बहुत परंतु अनुसरण करनेवाले थोडे हैं । उसने लोगों को तारीफ करने के लिए नहीं कहा पर उसका अनुसरण करने कहा यदि हम उसका अनुसरण करे तो फिर हम इस दुनियाँ के नहीं रहेंगे, तब ये दुनियाँ हम अवश्य घृणा करेगी ।

यीशु ने कहा संसार उसे प्यार करता हैं जो संसार के होते हैं । (योहन्ना १५:१९) ।

एक पŠका और स्पष्ट चिन्ह हमारे यीशु के चेले होने का ये है कि संसार हम से घृणा करें । यीशु ने कहा जब कि उन्होंने मुझे सताया हैं वे तुम्हें भी सताएेंगे । (योहन्ना १५:२०) ।

चेलेपन का दूसरा चिन्ह यह है कि चेले उनसे प्रेम करेंगे जो उन्हें सताते हैं । (मत्ती ५:४४-४८) । इन दो चिन्हों से हम अपनी स्थिति को पहचान सकते हैं ।

यदि तुम इस संसार में यश के पात्र हो तो निश्चय तुम समझौता वादी हो । यह भी हो सकता है कि तुम्हारा मन परिवर्तन ही नही हुआ हो ।

संसार ने यीशु से Šयों घृणा किया इसलिए नहीं कि वह अपना कर पटाता था । लोगों के पैर धोता था न ही इसलिए कि उसने पवित्र जीवन जिया । संसार उससे घृणा करता था Šयों कि उसने उनके पाखंडी पन को उजागर किया । उसने उनके अशास्त्रीय क्रिया कर्मो को (रीति रिवाज) को भी उजागर किया । अत: जो लोग अगुवों के रीति रिवाज को कायम रखना चाहते थे उससे घृणा की । हमारा भी यही हश्र होगा यदि हम यीशु की बोली बोलें । यदि हम धार्मिक अगुवों और मनुष्यों से आदर चाहने के लिए चुप रहें तो हमारा यश कायम रहेगा । हम में से हर एक अपने पथ को चून सकता हैं ।

प्रका वा १२ मे हम पाते हैं कि शैतान कुछ लोगों के ऊपर क्रोधित था हम पढते हैं कि वह मनुष्य की संतान (यीशु मसीह) को खा जाना चाहता था जिसे स्त्री ने (इस्त्राएल) इस दुनिया में लाया । शैतान सफल नहीं हुआ और मनुष्य की संतान बढता गया और अपनी सेवा पूरी की और परमेश्वर के सिंहासन तक उठ गया । (प्रका वा १२:४५) । शैतान का क्रोध अब मनुष्य की संतान के छोटे भाई के विरूध्द हैं । यह वे हैं जो परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं और यीशु के गवाह हैं (प्रका १२:१७) । यीशु मसीह ने जो भी शिक्षा दी और जो भी गवाही दी उसको बताने के लिए ये भŠत अपना मुँह खोलते हैं । दुनियाँ में आज ऐसे लोग कम हैं Šयों कि ऐसी कम कलीसियायें है जो ईश्वर कि आज्ञाआें को सम्पूर्ण दिल से मानने का प्रचार करती हैं ।

प्रका वा १२ में वर्णन है कि आज के युग के अंत के समय में प्रभु यीशु के आगमन के पहले शैतान साढे तीन वर्षो कें लिए दूसरे आकाश से पृथ्वी पर गिरा दिया जाएगा । (आयत ९) उस समय पृथ्वी पर ऐसे लोग होंगे जो परमेश्वर की आज्ञाआें को मानते हैं और निर्भय होकर प्रभु यीशु की गवाही देकर शैतान पर विजय प्राप्त करते हैं (आयत ११) । यह परमेश्वर के (कमांडोज) हैं और पृथ्वी पर उसकी सेना की वफादार टुकडी हैं ।

इन लोगों में शामिल होना एक बडी प्रशंसा की बात होगी । इनमें से बहुत यीशु के लिए अपनी जान भी दे देंगे । प्रका वा १३:७ यह स्पष्ट करता हैं कि ख्रीष्ट विरोधी को परमेशव्र की ओर से यह स्वतंत्रता मिलेगी कि वह यीशु के ऐसे चेलों को मार डाले । याद रखें यह परमेशव्र ही है जो सुरक्षा के बाडा को हटा देता हैं अन्यथा कोई उसके भŠतों को छू नहीं सकता । यही कारण है कि हम डरते नहीं हैं ।

अय्युब कह सका परमेश्वर मेरे विषय सब कुछ जानता हैं अय्युब २३:१० । नयी वाचा के अन्तर्गत हम यह कह सकते हैं परमेश्वर मेरी हर कार्यप्रणाली की योजना बनाता हैं और यही रोमन ८:२८ का सीधा अर्थ हैं । यह भी सच हैं कि ऐसे समयों में परमेश्वर इतना अनुग्रह कारी हैं कि हमारी सामर्थ के बाहर वह हमारी परीक्षा नहीं होने देगा । हर परीक्षा के समय वह यह रास्ता बनाऐगा कि हम विजयी हों और उसका तिरिस्कार करें और पाप करने से बचे रहें । (१ कु १०:१३) । उसका अनुग्रह इतना पर्याप्त साबित होगा कि हम स्थिर रह सकें । (२ कु १२:९) । स्वाभाविक रूप से साहसी व्यŠत भी उस समय स्थिर नहीं रहेगा पर वह जिसमें डर हैं, जो प्रभु पर भरोसा रखता हैं कि वह उसे सामर्थ देगा ।

वे दिन बडे सताव के होंगे जब ख्रीष्ट विरोधी राज्य करेगा । यीशु ने बताया कि अपने चुने हुआें के लिए परमेश्वर ने इन नाेिं को सीमित कर दिया हैं (मत्ती २४:२१,२२) । ईश्वर के चुने हुए अर्थात कलीसिया इन दिनों पृथ्वी पर रह कर प्रभु की गवाह होगी । इस सताव के तुरंत बाद मनुष्य का पुत्र आकाश में दिखायी देगा, और बडी तरही ही गर्जना से अपने दूतों को भेजेगा कि चुने हुआें को इकट्‌टा कर लें (मत्ती २४:२९-३१) । तूरही के फेकने के वर्णन १ थिस्स ४:१६,१७ मे भी हैं जब कि प्रभु मे मृत जी जाएेंगे और उस समय जो जीवित हाेेंगे वे यीशु के पास बादलों में उठा लिए जाएँगे ।

यीशु ने यह स्पष्ट किया कि चुने हुए लोग बडे सताव के बाद ही बादलों में उठने का अनुभव प्राप्त करेंगे । ये लोग यीशु के द्वितीय आगमन पर उसका स्वागत करेंगे और प्रभु के साथ पृथ्वी पर आकर एक हजार वषा] तर राज्य करेंगे । प्रभु के साथ १००० वषा] तक राज्य करनेवालों के विषय में कहा गया हैं कि ये वे हैं जिन्होंने पशु या उसकी मूरत के आगे सिर नहीं झुकाए हैं और जिन्हांने अपने हाथ या माथे के ऊपर उसकी दाप नहीं लगवायी हैं (प्रकावा २०:४) । इससे स्पष्ट है कि यह विजयी लोग जो प्रभु की दुल्हन हैं और जो प्रभु के प्रति विश्वास योग्य रहे ख्रीष्ट विरोधी के शासन काल में पृथ्वी पर रहेंगे ।

सताव उन लोगों के द्वारा आयेगा जो शैतान के द्वारा कलीसिया के विरूध्द उस्काए जाएँगे । यह सताव परमेश्वर के उस क्रोध से भिन्न है जो विधर्मियों के ऊपर पडेगा । हम परमेश्वर के इस क्रोध का सामना नहीं करेंगे परन्तु मनुष्यों के बडे सताव का सामना हमे करना पडेगा । पुरानी वाचा की आशीष धन धान्य से पूर्ण और सुख हैं, नयी वचा की आशीष सताव का सहना हैं ।

जब यीशु मसीह ने मृत्यु का सामना किया तो यह नहीं कहा कि पिता इस घडी से मुझे बचा परन्तु कहा कि पिता उपने नाम की महिमा कर (योहन्ना १२:२७,२८) । वेश्या का गीत है पिता मुझे सताव से बचा दुल्हन का गीत है पिता अपने नाम की महिमा कर । हम सताव मे उन्नति प्राप्त करते हैं (रोमि ५:३, प्रेरितो १४:२२)

यीशु ने पिता से प्रार्थना की कि उसके अनुयायीयों को दुनियाँ से उठा न ले जा परन्तु पाप से बचाए रख । (योहन्ना १७:१५) यीशु की कभी यह इच्छा नहीं रही कि उसकी दुल्हन सताव से बचने के लिए उठा ली जाए ।

आज से करीब १५० वर्ष पहले मसीहियों के बीच यह सिध्दांत उभरा कि मसीह गुप्त रूप से आकर सब विश्वासियों को उठा ले जायेगा ताकि वे बडे सताव का सामना न कर पाएँ । इस सिध्दांत से यह लगा कि मनुष्यों की ओर से सताया जाना परमेश्वर के द्वारा प्राप्त सजा है कोई आश्चर्य नहीं कि यह सिध्दांत उन देशों से नही उभरा जहाँ मसीहियों को सताया जाता था, परंतु पश्चिमी देशों से निकला जहाँ मसीहियों को शताब्दियों से सताया नहीं गया । इस सिध्दांत को लागू करने के लिए पवित्र शास्त्र में भी तोडमरोड की गयी । शैतान भी मसीहियों को इस गलत सुखदभावना मे रख कर जीन मे सफल हुआ कि वे जब सताव आए तो उसके लिए तैय्यार न रहें ।

चूंकि मसीहियो की प्रार्थना प्राय: यही रहती है कि प्रभु इस दुनियाँ मे मेेरे जीवन को सुखद बना, आश्चर्य नहीं कि बहुतेरे मसीहियों ने सताव से बचने के लिए इस शिक्षा को खुखी खुशी स्वीकार किया । वे जो मसीह की शिक्षा मे रमे हुए थे उन्होने समझ लिया कि सताव से बचना कोई अच्छा गुण नहीं । यीशु मसीह ने चेलों को लगातार सिखाया कि उन्हे इस संसार मे सताव और कष्ट का सामना करना पडे ।

कुछ लोग यह सिखाते है कि सम्पूर्ण ह्दय से विश्वास करनेवालों को मसीह उठा लेगा और आधे मन से विश्वास करने वालों को ख्रीष्ट विरोधी का सामना करने के लिए छोड देगा । इससे यह अर्थ निकलता है कि परमेश्वर विश्वासियों को कष्ट से बचने का इनाम देता हैं । कोई भी जागरूक सेनापति द्वितीय पंŠत की टुकडी को लडने के लिए आगे नहीं करता । अत: यह समझ से बाहर है कि परमेश्वर उन सशŠत सेनिको को पृथ्वी से उठा ले, जब कि उनकी गहवाही की उसे सख्त जरूरत हैं ।

पवित्रशास्त्र से यह स्पष्ट है कि जो ख्रीष्ट विरोधी का विरोध करेंगे वे ऐसे लोग होंगे जो परमेश्वर की आज्ञाआें को मानते और यीशु की अच्छी गवाही देते (प्रका वा १२:१७) । यह निश्चय ही अर्धमन वाले नहीं इसके विपरीत ये जो विजयी योध्दा है जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हैं । (प्रका वा १३:८, २:५), शैतान अर्धमन वालों से नही परंतु पूर्ण समर्पित मसीहियों से क्रोधित रहता हैं । आज शैतान उन लोगों के प्रति जलाभूना है जो परमेश्वर की आज्ञाआें पर चलने की सीख देते है इसीलिए पौलूस सब विश्वासियों से विनम्र होकर विनती करते है कि उसके लिए प्रार्थना करें Šयों कि वह जानता था कि वह शैतान के प्रमुख निशाने पर हैं । हमे भी ऐसे लोगों की सुरक्षा के लिए वर्तमान में प्रार्थना करना चाहिए ।

ईसा पश्चात प्रथम तीन शताब्दियों मेें मसीहियों के विरूध्द तीव्र विद्रोह उठा परंतु परमेश्वर ने उन्हें सताव से अलग नहीं किया । वे सिंहो का अहेर बने, खम्बो मे लटका कर जला दिए गए । रोमन एरिना मे जब यीशु के चेलों का घात किया गया कोई गुप्त उठाए जाने की घटना नहीं घटी इन समयों मे यीशु के समर्पित चेलों के साथ कोई आश्चर्य कर्म नहीं हुआ । जब कि दानिएल के दिनों मे परमेश्वर ने सिहों के मुंह को बन्द किया, और धधकते आग के मट्‌ठे को ठंडा किया Šयों कि ये नयी वाचा के मसीही थे जिन्हे आग का सामनाकर परमेश्वर की महिमा करनी थी । यीशु के आगमन के पहले यीशु के अनुयायीयों के साथ भी ऐसा ही होगा । प्रथम शताब्दी में परमेश्वर के सैनिक उसके प्रति वफादार रहें और यह आशा नहीं की, न माँग की कि परमेश्वर अपने हजारों स्वर्गदूतों को भेजकर विपत्ती से छुडा ले । परमेश्वर अपने पुत्र की दुल्हन को सिंहो के द्वारा पकडे जाने से और आग से जलाए जाने को देखता रहा Šयों कि उन्होंने मेम्ने का अनुसरण कर कष्टदायक शारीरिक मृत्यु को सहा । यीशु ने उनसे केवल यह वाŠय कहा मृत्यु तक विश्वास योग्य रह और मै तुझे जीवन का मुकुट दुंगा ।

यही कुछ वह आज हम से भी कहता हैं । ख्रीष्ट विरोधी के समय मे विश्वास योग्य बने रहेन के लिए हमे आज की छोटी छोटी परीक्षाआें के विरूध्द जयवंत होना सीखना है जा आज हमारे सामने आती हैं यही कारण है कि हमे अपनी आंतरिक जिंदगी में विश्वासी रहना सीखना हैं । हमे परीक्षाआें पर विजय पाना है जब वे हमारे जीवन के गुप्त कोने मे, हमारे विचारों मे, व्यवहार में, लालसाआें मे, वित्तीय मामलों मे सामने आती हैं । ये छोटी बातें हैं परंतु जब हम इन छोटी बातों में विश्वास योग्य रहेंगे तो हम बडी बातों में भी विश्वास योग्य होंगे । यदि आज हम मनुष्यों के साथ नहीं दौंड सकते तो उस समय घोडों के साथ कैसे दौंडेंगे । यदि हम सुख के समय विश्वास योग्य नहीं तो विपत्ति के समय कैसे विश्वास योग्य होंगे (यिर्मा १२:५) । परमेश्वर चाहता है कि आज हम उसके कमाण्डो सैनिक बनना सीखें कि भविष्य में उसी सेवा कर सकें ।

अध्याय 23
सत्य जिस पर हम विश्वास करते हैं

पवित्रशास्त्र मे यह आज्ञा दी गयी है कि हम अपनी और अपने शिक्षाओ पर विशेष ध्यान दें Šयों कि तभी हम अपने और उन लोगों के उध्दार को सुनिश्चित कर सकते है जिन्हे हम उपदेश देते हैं (१ तिमु ४:१६)

हमारा जीवन और हमारे सिध्दांत उन दो पैरो के साथ हैं जो हमारे मसीही जीवन को स्थिर रखते हैं । आम आदमी की तरह दोनों पैरों की लम्बाई बराबर होनी चाहिए । मसीह समाज मे हम यह देखते हैं कि कई विश्वासी दो पैरो मे से किसी एक पर ज्यादा जोर देते हैं ।

सिध्दांत के लिए हमे सिखाया गया है सत्य के वचन को सही रीति से व्याख्या करनी चाहिए । (२ ति २:१५) । कई पवित्रशास्त्र के अध्ययन के प्रति लापरवाह हें और इस लिए अपने सिध्दांत की समझ में असंतुलित रहते हैं ।

परमेश्वर का सत्य मानव शरीर की तरह हैं । यह तभी सिध्द हैं जब हर एक अंग सही नाप मे पाया जाए । पवित्रशास्त्र की सब सच्चाईयों समान रूप से महत्वपूर्ण नहीं हैं । उदा सवरूप अन्य अन्य भाषा बोलना, एक दूसरे को प्रेम करने से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं । यदि हम किसी एक सिध्दांत के बदले किसी सिध्दांत पर ज्यादा ध्यान देते हैं तो हमारा सिध्दांत वैसाही बेढंगा होगा जैसे बहुत बडी आँखे या कान । साथ मे यह हमे भी बना देगा ।

यह कहना सरल होगा कि हम परमेश्वर के वचन की सच्चाईयों पर विश्वास करते हैं यही सच हैं । परंतु चूंकि शैतान ने परमेश्वर के वचन को अपनी चतुराई से तोड मरोड कर भ्रष्ट कर दिया है यह जरूरी है कि उसकी सही व्याख्या की जाए ।

विज्ञान और गणित के समान परमेश्वर की सच्चाई केवल ज्ञानपूर्ण अध्ययन से नहीं समझा जा सकता परंतु पवित्रआत्मा के प्रकाशन द्वारा ही । यीशु ने कहा कियह प्रका केवल बच्चों (दीन लोगों) को दिलया गयाहै न कि अहमी ज्ञानियों को (मत्ती ११:२५) । यही कारण है कि यीशु के समय के बाईबिल टीकाकार उसकी शिक्षाआें को नही समझ पाए । आज के बुत से बाईबिल अध्ययन कर्ता भी उसी नाव पर सफर कर रहे हैं ।

हमे अपने दिमाग का भी उपयोग करना है Šयों कि आज्ञा हैं कि समझ में प्रौढ बनो (१ कु १४:२०) ।

अत: वह दिमाग जो पवित्रात्मा पर निर्भर है ही परमेश्वर के वचन को सही रीति से समझ सकता हैं ।

परमेशव्र चाहता है कि उसकी संताने हर तरह से स्वतंत्र हों । परंतु बहुत विश्वासी मानव संस्कारों और पापर मय आदतों के गुलात कळं । उसका एक कारण यह है कि वे परमेश्वर के वचन को लापरवाही से पढते हैं ।

परमेश्वर के वचन को समझने में हम जितनी इमानदारी दिखाएेंग उतना ही सत्य हमारे जीवन के हर क्षेत्र में हमे स्वतंत्र करेगा । (योहन्ना ८:३२) ।

बहुत से विश्वासी अपने धन के निवेश में बहुत सतर्क रहते हैं परन्तु शास्त्र के अध्ययन में लापरवाह । यह दिखाता है कि वे परमेश्वर की अपेक्षा धन को महत्व देते हैं । ऐसे विश्वासी स्वभाविक रूप से परमेश्वर के वचन की समझ में भटक जाते हैं ।

हमे साफ बताया गया है कि हर एक शास्त्र हमे सिध्द बनने के लिए दिया गया हैं । (२ तिमो ३:१६-१७) ।

परमेश्वर का भय बुध्दि का भूल है और परमेश्वर अपनी गंभीर बाते उन पर प्रगट करता हैं जो उनसे डरते हैं । (भजन २५:१४)

परमेशव्र से संबंधित सत्य

बाईबिल सिखाती है कि परमेश्वर एक है और इस एक परमेश्वर मे तीन व्यŠतत्व हैं ।

चूंकि अंक पार्थिव संसार से संबंधित है और परमेश्वर आत्मा है । हमारा सीमित दिमाग इस त्रिएक परमेश्वर के सत्य को नही समझ सकता । वैसे ही जैसे कि एक छोटे कप मे एक पूरे समुद्र का पानी नही समा सकता

एक कुत्ता शुणन फल के गणित को नहीं समण सकता कि कैसे एक मे एक का तीन बार गुणा करने से भी एक ही प्राप्त होता हैं । (१ु१ु१=१) इसी प्रकार । हमी भी नहीं समझ सकते कि परमेश्वर मे तीन व्यŠत होकर भी एक ही परमेश्वर हैं । एक कुत्ता केवल दूसरे कुत्ते को समझ सकता है वह इंसान को भी पूर्णतया नही समझ सकता इसी प्रकार परमेश्वर को जब हम अपने तर्क से समझना चाहते हैं तो उसे अपने ही समान एक इंसान पाते हैं । यह सच्चाई कि परमेश्वर हमारे तर्क के परे हैं इस बात का साफ प्रमाण कि यही सच्चाई हैं ।

त्रिएक परमेशव्र की सच्चाई बाईबिल के प्रथम पद से ही स्पष्ट हैं, जहाँ परमेश्वर के लिए इब्रानी माला का बहुवचन इलोहिम प्रयुŠत किया गया हैं । हम यह भी देखते है कि परमेश्वर अपने लिए हम और हमारा शब्द का उपयोग करता हैं (उत्तय १:२६) यीशु के बाप्तिस्मा के समय इसी बात पर ज्यादा प्रकाश पडता है जहाँ पिता (आकाश से आवाज ), पुत्र (यीशु मसीह), और पवित्रआत्मा (पंडुक के रूप में ) तीन उपस्थित रहते हैं । (मत्ती ३:१६,१७) ।

जो लोग यह कहते हें कि यीशु ही पिता पुत्र और पवित्रात्मा है कैसे समझा पाएँगे कियीशु ने इस पृथ्वी पर अपने पिता की इच्छा को पूरी किया और अपनी स्वयंकी इच्छा का इंकार किया । (योहन्ना ६:३८) । एकत्ववादी जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर एक ही व्यŠत है और जो केवल एकमात्र यीशु के नाम से ही बाप्तिस्मा देते हैं वास्तव मे इस बात का इंकार करते हैं कि यीशु मनुष्य देह में आया ।

बाईबिल कहती है कि उसके पास ही सही शिक्षा हैं जो पिता और पुत्र दोनों को मानता हैं और जो लोग या तो पिता या पुत्र का इंकार करते हैं वे ख्रीष्ट विरोधी आत्मा के हैं (२ योहन्ना ९, । योहन्ना २:२२) ।

मसीही बाप्तिस्मा में यीशु ने आदेश दिया कि पिता , पुत्र और पवित्रात्मा के नाम से बाप्तिस्मा दिया जाए । और पुत्र को प्रभु यीशु मसीह से जाना गया । (मत्ती २८:९, प्रेरितो २:३८) ।

मसीह से संबंधित सत्य

शास्त्र सिखाता है कि यीशु मसीह पूर्व अनंत काल से परमेश्वर के तुल्य था और जब वह मनुष्य होकर इस धरती पर आया उसने परमेश्वरत्व की उन शŠतयों कोउपयोग न करते का ऐच्दिक मन बनाया । उसने अपने आप को खाली किया, इस वाŠय का यही अर्थ हैं । (फिलि २:६,७) ।

उपरोŠत बात को साबित करने के लिए कुछ उदाहरणों पर गौर करें । शैैतान परमेश्वर की परीक्षा नही ले सकता । परन्तु यीशु ने अपनी परीक्षा लेने दी (याकुब १:१३ मत्ती ४:१-१०) । परमेश्वर सर्वज्ञानी है परंतु यीशु ने जब वह धरती पर था यह कहा कि वह अपने द्वितीय आगमन के दिन को नहीं जानता (मत्ती २४:३६) । वह अंजीर के वृक्ष के पास गया यह जानने के लिए कि उसमे फल है कि नहीं, मत्ती २१:१३। यदि उसने आपेन परमेश्वरत्व की सामर्थ का उपयोग कियाहोता तो दूर से ही जान लेता कि वृक्ष मे फल नहीं हैं । परमेश्वर का ज्ञान अपरिवर्तनीय और सनातन हैं । तो भी प्रभु यीशु के विषय दो बार कहा गया कि वह बुध्दि में बढता गया (लुका २:४०-५२) ।

इन अयतों से यह संकेत मिलता है कि यीशु ने परमेश्वरत्व की बहुत सी सामर्थ से अपने को खाली किया, जब वह पृथ्वी पर था ।

यद्यपि यीशु ने इन सामर्थ से अपने को खाली किया तो भी अपने व्यŠतत्व मे अभी भी वह परमेश्वर था । साफ है कि यह असंभव है कि परमेशव्र अपने परमेश्वर होने को कभी त्याग दें । एक राजा अपने अधिकार को छोडकर निर्धन के झोपडे में रह सकता है परंतु फिर भी वह राजा रहेगा । इसी प्रकाश यीशु भी ।

यीशु जब पृथ्वी पर था तो उसके परमेश्वर होने के सात प्रमाणशास्त्र में दर्ज हैं । जहाँ उसने दूसरों की उपासना को स्वीाकर किया (मत्ती ८:२, ९:१८, १४:३३, १५:२५, २०:२० मखुस ५:६ योहन्ना ९:३८) स्वर्ग दूत और परमेशव्र के भŠत ऐसी उपासना स्वीकार नहीं करतें (प्रेरितो १०:२५,२६, प्रका वा २२:८,९) परंतु यीशु ने इस लिए स्वीकार किया Šयों कि वह परमेश्वर का पुत्र था । पिता परमेश्वर ने भी पतरस पर प्रगट किया कि यीशु परमेश्वर का पुत्र हैं (मत्ती १६:१६,१७) ।

इब्रा २:१७ मे यीशु की मानवता के विषय मे साफ लिखा हैं कि यीशु सब बातों में अपने भाईयों के समान बना । वह आदम की संतान नहीं बना Šयों कि तब उसमें शेष मानवता की तरह पुराना मनुष्यत्व होता । पुराना मनुष्यत्व शास्त्रीय मुहावरा हैं जिसे बहुत से लोग गलत रीति से पापमय स्वभाव मानते हैं ।

यीशु के पास पापमय स्वभाव नहीं था Šयों कि उसका कोई मानव पिता नहीं था । यीशु पवित्रात्मा से पैदा हुआ और अपने गर्भ से पवित्र था (लूका १:३५)

यीशु के आत्मिक भाई वे हैं जो परमेश्वर की इच्छा चलते हैं और जो आत्मा से जन्मे हैं तथा जिन्होंने पुराने मनुष्यत्व को छोड कर नए को पहना हैं (मत्ती १२:४९,५०, ३:५ और इफी ४:२२, २४) परंतु हम जो मसीह के भाई है खुद की इच्छा भी है और चूंकि सब बातों मे मसीह हमारे समीप था उसकी भी खुद की इच्छा थी जिसका उसने इंकार किया (योहन्ना ६:३८)

जब हम पैदा हुए तो आदम मी संतान होने के नाते हम में पुराना मनुष्यत्व था। इस पुराने मनुष्यत्व को तब हम ऐसे अविश्वासी सेवक से कर सकते है जो लालसाआें के लिए हमारे ह्दय के कपाट को खोल देता हैं । जैसे एक निकम्मा सेवक डाकुआें के गिरोह के लिए घर के दरवाजे को खोलता हैं । जब हम नया जन्म पाते हैं तो परमेश्वर पूर्व मनुष्य को मार डालता हैं (रोमियो ६:६) परंतु हममे अभी शरीर के कारण परीक्षाएँ आती हैं (याकुब १:१४,१५) पुराने मनुष्य के बदले अब नया मनुष्य आ जाता हे जो शरीर की अभिलाषा को रोकता है और डाकुआें के गिरोह को अन्दर आने से ह्दय के कपाट को बन्द रखता हैं ।

यीशु मसीह हर बात मे हमारे समान गया और विजयी रहा । (इब्रा ४:१५) यह जरूर है कि वह पापमय शरीर मे नहीं आया था पर पापमय शरीर के समान था । (रोमियो ८:३) हम बहुत वर्षों तक पाप मे जी रहे थे इस कारण ने पापमय आदतों को अर्जित किया और इस लिए नए जन्म के बाद भी अन्जाने में पाप मे पडते हैं ।

उदा स्वरूप जिन्होने कसमे खाने के बुरे शब्दों का उपयोग किया है हलकी सी छेडछाड में भी अन्जाने मे उनके मुँह से ये शब्द निकल पडते हैं । जब कि वे जिन्हों ने इनका उपयोग नहीं अन्जाने मे भी इनका उपयोग नही करतें । इसी तरह जो अश्लील पुस्तके पढते रहें अब गन्दे विचार और गन्दे स्वप्न आने की समस्या का सामना करते हैं ।

यीशु ने कभी पाप नहीं किया और उसके जीवन में कोई अंजान पाप भी नहीं था यदि अन्जाने में भी उसने पाप किया होता तो सके लिए उसे बलि चढानी पडती । (लैव्य ४:२७,२८) और तब वह हमारे पापों के खातिर सिध्द बलिदान नहीं होता ।

यीशु के व्यŠतत्व से संबंधित सिध्दांत कलीसिया के इतिहास मे एक विवादित बिंदु था । और इससे संबंधित गलत धारणाआें का प्रचार भी हुआ । कुछ ने उसके देवत्व के विषय इतना बढा चढा कर कहा कि वे उसे ऐसा इंसान मानने के लिए तैय्यार नहीं हुए कि जिसकी परीक्षा की जा सकती हैं । दूसरों ने उसकी मानवता की इतना बढा चढाकर माना कि उसके दैवत्व के गुण को नकार दिया ।

इन गलत धारणाआें से बचने का एकही उपाय हें कि शास्त्र में दिए परमेश्वर के प्रकाशन पर स्थिर रहा जाए ।(२ योहन्ना ७:९) ।

यीशु का पृथ्वी में मनुष्य की तरह आना एक रहस्य हैं । बाईबिल में बतलायी गयी बातों से परे जा कर इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश करना मूर्खता होगी । ऐसा करना वैसा ही होगा जैसा कि इस्त्रायलियों ने उत्सुकता वश परमेश्वर के सन्दूक के भीतर झाँकने की कोशिश की । और इसके लिए उन पर परमेश्वर की मार पडी ।(१ शामु ६:१९ )

यीशु ने कहा कि वह पृथ्वी पर आया है कि पिता की इच्छा को पूरी करे और अपनी इच्छा का इंकार करे ।(योहन्ना ६:३८) यह दिखाता है कि यीशु में भी मानवीय इच्छा थी जो पिता की इच्छा के विरूध्द थी ।(मत्ती २६:३९) अन्यथा उसे अपनी इच्छा का इंकार करने की जरूरत नहीं होती ।

यीशु भी बिलकुल हमारे समान हर बिंदुआें में परीक्षा में पडा परंतु इन परीक्षाआें के प्रति उसने कभी भी सहमती नहीं दी अतएव कभी भी पाप नहीं किया ।(याकूब १:१५)

हम जानते है कि एक दिन भी बिना पाप किए रहना कितना कठिन हैं अत: हम कह सकते है कि तैत्तीस साल तक बिना पाप मे पडे जीना यीशु का सबसे बडा आश्चर्य था । मृत्यु तक वह निष्पाप रहा । और इसलिए रो कर और आँसू बहा कर उसने परमेश्वर के अनुग्रह को प्राप्त किया ।(इब्रा ५:७, ३,४)

हमारा अगुवा होकर उसका अनुसरण करने के लिए वह बुलाता है कि क्रूस उठाएँ और अपनी स्वत: की इच्छा को मार डालें ।(लूक ९:२३)

हम पाप मे इसलिए पडते हैं Šयों कि हम गंभीरता से प्रतिकार नहीं करते और न ही उस पर विजय पाने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह की माँग करते हैं । आज जब कि हम से के पीछे चलने के लिए कहा जाता है तो जीवन की उपरी बातों के लिए नही, जैसे कुंवारा रहना, पानी चलना, मुर्दो को जिलाना, इत्यादि । परंतु पाप पर विजय पाने के लिए विश्वासी रहना ।

पवित्रात्मा हमे प्रेरित करता है कि यीशु मसीह के विषय दो वादा करें पहला यह कि वह प्रभु हैं और दूसरा यह कि वह शरीर मे आया ।(१ कु १२:३ १ योहनना ४:२,३) । दोनों अंगीकार समान रूप से महत्वपूर्ण हैं । परंतु चूंक ख्रीष्ट विरोध की आत्मा का यह चिन्ह हैं कि ख्रीष्ट विरोधी यह नहीं मानता कि यीशु शरीर में आया अत: दूसरा अंगीकार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ।

आज पुरूष ख्रीष्ट यीशु सब भाइयों में पहलौ है और उसका पिता हमारा भी पिता है ।(१ तिमो २:५, रोमि ८, योहन्ना २०:१७, इफी १:३, इब्रा २:११)

यीशु जब पृथ्वी पर आया तो परमेश्वरत्व के गुण को नहीं छोडा ।(योहन्ना १०:३३) और जब वह स्वर्ग पर वापस गया तो मनुष्यत्व को नहीं छोडा ।(१ तिमो २:५) ।

उध्दार का सच

परमेश्वर का वचन उध्दार का वर्णन तीन कालों मे करता हैं, भूत : (इफी २:८), वर्तमान (फिलि २:१२) और भविष्य (रोमियो १३:११) या दूसरे शब्दों मे दोष मुŠत करना, पवित्रीकरण होना, और महिमा युŠत होना

उध्दारकी एक नीव हैं और उसके ऊपर महल हैं । नींव पापों से क्षमा प्राप्त करना और दोषमुŠत होना हैं ।

दोषमुŠत होने का अर्थ परमेश्वर की दृष्टि मे धर्मी ठहराया जाना हैं । और इसका आधार है मसीह की मौत, उसका पुनरूत्थान और स्वर्गारोहन इसका आधार हमारे काम नहीं (इफी २:८९) Šयों कि हमारे धर्म के काम भी परमेश्वर की दृष्टि में मैलेकुचैले चिथडों के समान हैं (यशा ६४:६) । हमे मसीह की धार्मिकता का वस्त्र पहनाया जाता हैं । (गला ३:२७) । पश्चाताप और विश्वास क्षमा प्राप्ती और दोषमुŠत होने की शर्ते हैं (प्रेरितो २०:२१) ।

सच्चा पश्चाताप हम मे भरपाई का फल उत्पन्न करता हैं जैसे गलत तरीके से किसी की धन सम्पत्ती को हडप लेने और कर न पटाने की भरपाई करना और जहाँ तक संभव हो जिसका हमने बुरा किया है उससे माफी मॉंगना । (लुका १९:८,९) जब परमेश्वर हमे क्षमा प्रदान करता है तो चाहता है कि उसी प्रकार हम भी दूसरों को क्षमा करें । यदि हम इसमे असफल हो तो परमेश्वर भी अपनी क्षमा को वापस ले लेता हैं । (मत्ती १८:२३,३५) ।

पश्चाताप करने और विश्वास के बाद पानी का बाप्तिस्मा लेना जरूरी हैं इससे हम परमेश्वर को मुनष्यों को और दृष्टात्माआें को यह दर्शाते हैं कि हमारा पुराना मनुष्यत्व सच में गाडा गया हैं । (रोमि ६:४,६) ।

Šयों कि इसके बाद ही हम पवित्रात्मा का बाप्तिस्मा प्राप्त करते हैं जिससे हमे यह सामर्थ प्राप्त होती है कि अपने होठों और जीवन से मसीह के गवाह बने (प्रेरितो १:८) । पवित्रात्मा का बाप्तिस्मा एक प्रतिज्ञा है जो परमेश्वर की संतान विश्वास से प्राप्त करते हैं (मत्ती ३:११, लूका ११:१३) ।

प्रत्येक चेेले का यह विशेषाधिकार है कि आत्मा गवाही दे कि वह परमेश्वर की संतान हैं (रोमि ८:१६) । और वह यह निश्चित रूप से जाने कि उसने पवित्रात्मा प्राप्त किया हैं (प्रेरितो १९:२) ।

पवित्रीकरण महल का ढाँचा हैं । पवित्रीकरण अर्थात संसार और पाप से अलग किया जाना हैं । यह प्रक्रिया नया जन्म पाने से शुरू हो जाती हैं (१ कु १:२) और इसे मृत्यु पर्यंत जारी रहना चाहिये (१ थिस ५:२३-२४) परमेश्वर पवित्रात्मा के द्वारा हम में यह कार्य शुरू करता हैं, अपनी व्यवस्था हमारे ह्दय और मन में लिखता हैं परंतु हमे भी यह कार्य करना है कि अपने उध्दार को डरते और काँपते हुऐ सुनिश्चित करें (फिलि २:१२,१३) या हम ही है जो पवित्रात्मा की सामर्थ से अपने शरीर कार्यो को मारते हैं (रोमि ८:१३) । हमे ही शरीर और आत्मा सब गंदगियों से अपने को साफ रखना है और परमेश्वर भय मे अपने को पवित्र बनाना हैं । ( २ कु ७:१) ।

जब शिष्य पवित्रात्मा के क्रिया मे संपूर्ण ह्दय सहयोग देते है तो पवित्रीकरण का काम जीवन मे तेजी से हैं । स्वभावत: यदि सहयोग धीमी गति से दिया जाए तो पवित्रीकरण का काम भी धीमा होता हैं या रूक जाता हैं ।

परीक्षा मे पडने के समय ही पवित्रीकरण के लिए जो चाह हैं उसकी परख होती हैं ।

पवित्र होने का अर्थ धार्मिकता की व्यवस्था व हमारे ह्दय के भीतर पूरा होना हैं (रोमियो ८:४) इसी बात पर यीशु ने भी जोर दिया (मत्ती ५:१७-४८) ।

यीशु ने व्यवस्था का निचोड बताया कि परमेश्वर को सम्पूर्ण ह्दय से प्रेम किया जाए और अपने पडोसी से अपने समान प्रेम किया जाए (मत्ती २२:३६-४०) ।

यही प्रेम की व्यवस्था है जो परमेश्वर हमारे ह्दय मे लिखना चाहता हैं Šयों कि यही परमेश्वर का स्वभाव हैं । (इब्रा ८:१०, २ पत १:४) । इसका बाहरी प्रगटीकरण यह होगा कि हर पाप पर विजय पायेंगे और यीशु की सब आज्ञाआें का पालन करेंगे (योहन्ना १४:१५) ।

उपरोŠत असंभव है यदि हम शिष्यता की उन शर्तो को पूरा नहीं करते जो यीशु मसीह ने रखीं । (लूका १४:२६-३३) यह वास्तव में परमेश्वर को प्रथम स्थान देना है । हमारे रिश्तेदारों, हमारे जीवन के ऊपर । तथा अपनी धन संपत्ति से विमुख होना हैं ।

यह सकरा फाटक है जिस से हम पहले प्रवेश करना है और तब पवित्रीकरण का सकरा रास्ता आता हैं । जो पवित्रीकरण का पीछा नहीं करते वे प्रभु को नहीं देख सकते । (इब्रा १२:१)

जब कि यह संभव है कि यहाँ हम अपने विवेक मे शुध्द हों फिर भी यह संभव नहीं कि हम पाप रहित होकर हो जाएँ जब तक यीशु के द्वितीय आगमन पर महिमा युŠत देह प्राप्त न हो । (इब्रा ७:१९, ९:९,१४) (१ योहन ३:२) । तभी हम प्रभु के समान हो सकते हैं परंतु हमे वैसा ही चलना है जैसा प्रभु चला था (१ योहन्ना २:६) ।

जब तक हम मे यह नाशवान देह है हम में अंजाना पाप पाया ही जावेगा । चाहे हम पवित्र हो जाएँ । (१ योहन्ना १:८) परंतु हम अपने वेिवक मे शुध्द होंगे और ज्ञात पापों से स्वतंत्र भी होंगे । (प्रेरितो २४:१६, १ योहन्ना २:१, १ बुर ४:४)

अत: हम महिमा प्राप्त करने के लिए मसीह के द्वितीय आगमन की प्रतिक्षा में है जो हमारे उध्दार का अंतिम भाग हैं जब हम पापरहित होकर सिध्द बनेंगे । (रोमि ८:२३, फिलि ३:२१)

कलीसिया से संबंधित सत्य

कलीसिया मसीह की देह हैं और उसका केवल एक ही सिर मसीह है और उसका एक ही मुख्यालय है जो तीसरा स्वर्ग हैं । मसीह की देह मे हर अंग का कार्य हैं (इफी ४:१६) कुछ सदस्यों को ज्यादा महत्त्वपूर्ण सेवा दी गयी हैं परन्तु हर एक सदस्य का उपयोगी योगदान होता हैं ।

मसीह ने अपनी देह के निर्माण के लिए अपनी कलीसिया में प्रेरित नबी, प्रचारक, चरवाहे और शिक्षक दिए हैं ।(इफी ४:११) ये सेवाएँ हैं । काई पदनाम नहीं । प्रेरित वे हैं जो स्थानीय कलीसिया के निर्माण के लिए परमेश्वर द्वारा बुलाएँ और भेजे गए हैं । इनका कलीसिया में पहला स्थान हें (१ कु १२:२८) और इसलिए वे अगुवों के भी अगुवे हैं । (२ कु १०:१३) । नबी वे हैं जो परमेश्वर के लोगों की छिपी आवश्यकताआें का समाधान करते हैं । प्रचारक वे हैं जिन्हें अविश्वासियों को मसीह की ओर फेरने का दान मिला हैं । इन्हें ऐसे नए परिवर्तित लोगों को स्थानीय कलीसिया में लाना चाहिए Šयों कि वही मसीह की देह हैं। चरवाहे वे हैं जो जवान मेम्नो और मेडों की चिंता कर उनका मार्गदर्शन करते हैं। शिक्षक वे हैं जो शास्त्र और उसके सिध्दांत को समझा सकते हैं । पूरे विश्व की कलीसिया में जो पाँच वरदान दिए गए हैं और इनमें चरवाहे स्थानीय कलीसिया में स्थायी रूप से रहते हैं । अन्य वरदान पाए अन्य जगहों में भी घूमते हैं ।

स्थानीय कलीसिया का प्रबंधन अगुवों के हाथ में होना चाहिए । यही नया नियम सिखाता हैं (तीत्तुस १:५ प्रेरित १४:२३) । अगुवे शब्द का बहुवचन होना यह प्रगट करता हैं कि हर कलीसिया में कम से कम दो अगुवे हों । अगुवों की संख्या स्थानीय कलीसिया के प्रबंधन को स्थायित्व देने के लिए आवश्यक हैं और इसलिए भी कि प्रभु की उपस्थिति की सामर्थ से शैतान के कार्यक्रमो को बाँधा जाए । (मत्ती १८:१८-२०)

एक व्यŠत का अधिकार नए नियम की शिक्षा के विरूध्द हैं । अगुवों के बीच एक अवश्य कलीसिया का संदेश वाहक हो सकता है यदि वह वचन में प्रवीण हैं । (प्रका २:१)

यीशु ने अपने चेलों को पदनाम लेने से रोका (मत्ती २३:७-१२) इसलिए रब्बी, फादर, पास्टर, रेव्हरेन्ट या मुखिया कहलाना परमेश्वर के वचन के विरूध्द हैं। शब्द रेव्हरेन्ट वास्तव में बाईबिल मे परमेश्वर के लिए उपयोग में आया हैं (भजन १११:९) । और जो इसका उपयोग करता हैं वह लूसीफर के समान दोषी है जो परमेश्वर के तुल्य बनना चाहता था । (यशा १४:१४) । चर्च मे प्रत्येक चाहे बडा हो या छोटा केवल भाई और सेवक हैं ।

स्थानीय कलीसिया की सभा हर एक सदस्यों के लिए खुली होना चाहिए कि वे नबुवत कर सके । (१ कुर १४:२६-४०) । Šयों कि सभा मे सभी को नबूवत की चाह की स्वतंत्रता होना चाहिए । बात अलग होगी यदि सभा शिक्षण के लिए हो (प्रेरितो २०:९११) या प्रार्थना के लिए (प्रे १२:५,१२) या प्रचार के लिए (प्रे २:१४-४०) अन्यान्य भाषा का वरदान प्रमुखत: व्यŠतगत उन्नति के लिए हैं। (१ कु १४:४,१८,१९) सभा मे भी इसका उपयोग हो सकता हैं यदि अनुवाद किया जाए । (१ कु १४:२७) भाषा का यह अनुवाद प्रकाशन हो सकता हैं, ज्ञान का वचन हो सकता हैं, नबूवत, शिक्षा और परमेश्वर से प्रार्थना भी हो सकता हैं । (१ कु १२:८१०, २८ और रोमियो १२:६८) मे वर्णित दान मसीह की देह के निर्माण के लिए आवश्यक हैं । ऐसी कलीसिया जो पवित्रात्मा के इन दानों का अनादर था तिरिस्कार करती हैं इन दानों को कभी नहीं पा सकती ।

महिलाआें को सभा में सिर ढांँक कर प्रार्थना करने और नबूवत करने की स्वीकृति हैं । परंतु उन्हें पुरूषों को सिखाने और उन पर अधिकार जताने की स्वीकृति नहीं हैं । (१ कुर ११:५, और १ ति २:१२) ।

कलीसिया की यह जिम्मेदारी है कि हर संभव तरीके से वह जिन तक पहँुच सकती है उनमे सुसंदेश का प्रचार करें । और उसका यह उद्देश्य हो कि सारे जगत में मसीह के लिए चेला बनाएँ (मार्क १६:१५ मत्ती २८:१९) । बिना चेला बनाए प्रचार का होना इस संसार में मसीह की गवाही के लिए रूकावट हैं ।

हर एक स्थानीय कलीसिया रोटी तोडने के द्वारा प्रभु की मृत्यु का प्रचार करें । (१कु ११:२२-३४) ब्यारी मनाने को संख्या हरएक चर्च की, के विवेक पर निर्भर हैं। परन्तु किसी भी स्थिति में यह एक मात्र विधि ही न रह जाए ।

मेंट के विषय ईश्वर का वचन साफ है कि परमेश्वर के काम के लिए अविश्वासियों से पैसा लेना गलत हैं । अत: जिस सभा मे अविश्वासी भी उपस्थित हैं वहाँ भेंट न उठाई जाए । विश्वासियों के द्वारा दी गयी सब भेंट भी ऐच्छिक एवं गुप्त में हों । (२ कु ९:७) । दूसरों से पैसा प्राप्त करने के लिए कार्य से संबंधित रिपोर्ट भेजना भी गलत हैं ।

वह कलीसिया नहीं हिलाई जा सकती जो अपने सदस्यों को यीशु की शिक्षाआें विशेष कर वे जो मत्ती ५ से ७ अध्याय मे वर्णित है का मानना सिखा कर विश्वास में बढाएँ । नए नियम की छोटी से छोटी आज्ञा को पूरे उत्साह के साथ सिखाना और मानना जरूरी हैं यही वे बातें हैं जो व्यŠत को परमेश्वर की दृष्टि में बडा बनाती हैं (मत्ती ५:१९) ।

कई विषय हैं जिनके प्रति नया नियम शाँत हैं । ऐसे विषयों के लिए सैध्दांतिक नहीं बनना चाहिए परन्तु दूसरे सदस्यों को भी अपनी मान्यताआें को मानने की स्वतंत्रता देना चाहिए । (रोमि १४:५) ।

उनसे प्रेम करना सरल है जो हर बात मे हम से आँख मे आँख मिला कर बात करते है । हमारे प्रेम की परख उस व्यवहार से होती है जो हम अपने से विभिन्न मत रखनेवाले के प्रति रखते हैं । परमेश्वर ने यह नहीं चाहा कि प्रत्येक छोटी बातों पर उसकी संतानों का मत एक हो । न ही उसने यह चाहा है कि हर एक स्थानीय कलीसिया शास्त्र से परे मतों पर एक मत हों । परमेश्वर की महिमा किया जाना तब दिखता हैं जब हम विरूध्द मतों के बीच आपस में एक हो । एक समान व्यवहार मनुष्य के द्वारा बनाया जाता हैं और आत्मिक मृत्यु लाता हैं । परमेश्वर समानता नहीं परन्तु एकता चाहता हैं ।

अन्तत: हम यह याद रखे कि मसीह के शिष्य की असली पहचान इसमे हैं कि वे एक दूसरे से प्रेम रखे । (योहन्ना १३:३५) । अतएव कलीसिया वैसे ही एक होने का प्रयास करें जैसा पिता और पुत्र एक हैं (योहन्ना १७:२१) ।

संक्षेप में यह सब ही वह सत्य हैं जिसमे हमे पŠकी नींव पकडनी हैं ।

हम जानते हैं कि यह सच हैं Šयों कि जितनों ने इसे पूरे ह्दय से स्वीकार किया है वे स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं (योह ८:३२)

अध्याय 24
क्रिसमस और ईस्टर- मसीही या मूर्तिपूत्रकों का

मनुष्यों को भेड के समान माना गया हैं । और भेड की झुकाव बिना प्रश्न किए भीड के साथ चलने की होती हैं । यीशु आया और सिखाया कि हमे हर बात परमेश्वर के वचन से परखना चाहिए । करीसियों ने न मनुष्यों के रीति रिवाजों को बढावा दिया । यीशु ने परमेश्वर के वचन को ऊँचा किया । मनुष्य को हर उस वचन के आधार पर जीना हैं जो परमेश्वर के मुख से निकलता हैं (मत्ती ४:४) ।

यीशु की फरीदियों से परमेश्वर के वचन और मनुष्य की परम्परा के विरूध्द सदैव लडाई होती रही । आज भी कलीसिया को वही लडाई लडनी हैं । इस पृथ्वी पर परमेश्वर का वचन ही सही प्रकाश देनेवाला हैं । परमेश्वर ने प्रारम्भ मे जब उजाला किया तो उसी वŠत उसे अंधकार से अलग किया । यह अंधकार पाप और मानव परम्परा दोनों हैं । हमे भी इन दोनों को परमेश्वर के शुध्द वचन से अलग रखना चाहिए ।

क्रिसमस

क्रिसमस पर विचार करें जो बहुतों के द्वारा यीशु मसीह के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता हैं । हर धर्म के दुकानदार क्रिसमस की आस लगाए रहते हैं Šयों कि उस समय बहुत मुनाफा कमा सकते हैं । यह व्यापारिक उत्सव है ना कि आत्मिक । अरबों रूपये क्रिसमस कार्ड और मेंटो के देने में खर्च होता हैं । शराब जैसे पेय पदाथा] की विक्री बढ जाती हैं । और परिचालन पुलिस को अपने पैरों पर सदैव सतर्क रहना पडता है Šयों कि क्रिसमस के समय सडक दुर्घटनाएँ बहुत होती हैं । इन सडक दुर्घटनाआें के कारण साल के अन्य दिनों के बनिस्बत होने वाली सडक दुर्घटनाआें से बहुत से लोग नर्क जाते हैं ।

Šया यही वास्तव मे परमेश्वर के पुत्र का जन्म दिन हैं या किसी अन्य यीशु का

चले पहले परमेश्वर के वचन को देखे । बाईबिल बतलाती है कि जब यीशु बैतलहम में जन्मा तो यहूदा देश के खेतों में रात को चरवाहे अपनी मेंडो का पहरा दे रहे थे । फिलिस्तीन के चरवाहे अŠटूबर के बाद और फरवरी तक रात में अपने जानवरों के झुन्ड को खुले में खेल में नहीं रखते । Šयों कि इस समय मौसम बरसाती और ठण्डा होता हैं । अत: वास्तव मे यीशु ने मार्च और सितंबर के बीच कभी जन्म लिया था । दिसम्बर पच्चीस को किसी अन्य यीशु का जन्म हुआ जिसे शैतान ने नादान मसीहियों के बीच खडा कर दिया ।

आगे यदि हमे जन्म दिन की सही तारीख मालूम भी हो जाए तो प्रश्न रहेगा कि Šया परमेश्वर चाहता है कि कलीसिया इसे मनाए । यीशु की माता मरियम अवश्य यीशु के जनम की सही तारीख जानती होगी और वह पेन्तीकुस्त के दिन के बाद कई वषा] तक चेलों के साथ रही परन्तु कहीं भी यीशु की जन्म तिथि का विवरण नहीं मिलता । यह Šया दर्शाता हैं । केवल यही कि परमेशव्र ने इसे जानबूझ कर छिपा रखा Šयों कि वह नहीं चाहता था कि कलीसिया इसे मनाए

बाईबिल मे हम पढते हैं कि पृथ्वी के राजा लोगों के बीच अपना जन्म दिन मनाते थे जैसे फिरौन और हेरोद । (उतपत्ति ४०:२० मरकुस ६:२१) परमेश्वर ने कभी नहीं चाहा कि प्रभु यीशु इनकी श्रेणी में रखा जाए ।

नयी वाचा और पुरानी वाचा के अन्तर की समझ यह मानने के लिए प्रेरित करती है कि परमेश्वर नहीं चाहता कि उसकी संतान कोई विशेष पवित्र दिन मनावें । पुरानी वाचा के अन्तर्गत इस्त्रायलियों को आज्ञा थी कि वे विशेष पवित्र दिन मनावें । परंतु यह एक छाया मात्र थी जब मसीह हमारे साथ है तो परमेश्वर की इच्छा है कि हमारे जीवन का हर दिन समान रूप से पवित्र हो । यहाँ तक कि साप्ताहिक सब्त का दिन नयी वाचा मे नहीं हैं । यही कारण है कि नये नियम मे कोई भी पवित्र दिन नहीं बताया गया । (कुलु २:१६१७) ।

तब कैसे क्रिसमस और ईस्टर पर्व ने मसीही समाज मे प्रवेश पाया उत्तर है उसी प्रकार जैसे बाल बाप्तिस्मा पुजारी कला और कई मानव परम्पराएँ जिन्होंने शैतान की कुटिल चाल से प्रवेश पाया ।

महाराज कॉन्स्टेटाईन ने जब मसीहियत को चौथी शताब्दी में रोम का राजधर्म बनाया तो बहुत से लोग नाम के मसीही बन गए जिनका ह्दय परिवर्तन नहीं हुआ था । और ये लोग दो बडे वार्षिक उत्सवों को छोडना नहीं चाहते थे । एक सूर्य देवता का जन्म दिन जो दिस २५ तय था Šयों कि इस समय सूर्य उतरायण होता था । दूसरा बसत्न ऋुतू का उत्सव जो मार्च और अप्रेल के बीच में पडता था । जब शीत ऋुतू की मृत्यु और सूर्य देवता द्वारा गर्मी का आगमन माना जाता था । उन्होने सूर्य देवता का नामकरण यीशु कर दिया । और दोनो बडे उत्सवों को क्रिसमस और ईस्टर के नाम से मनाने लगे ।

इनसायकोपीडिया ब्रिटेनिका में क्रिसमस की उत्पत्ति के विषय यह लिखा है

फिलोकेलस के अजेय सूर्य नामक प्रकाश देवता का भोज दिसंबर पच्चीस को मनाया जाता था । मसीहियत काल के आगमन पर ऋुतु संबंधित मूर्तिपूजक धार्मिक और राष्ट्रीय परम्पराआें ने मिथकों के साथ मिल कर क्रिसमस के रीतिरिवाजों को जन्म दिया । मसीह के जन्म की सही तिथि और वर्ष कभी भी संतुष्टी के साथ तय नहीं किया गया । परंतु जब एडी ४४० में चर्च बुर्जुगों ने जन्म तारीख को तय कर जन्म दिन मनाने की सोची तो उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने के दिन को तय किया Šयों कि यह लोगों के मन में अच्छी तरह जमा था और यह दिन उनका बहुत महत्त्वपूर्ण त्यौहार था । जब मसीहियत मूर्ति पूजकों में फैली तो मूर्ति पूजकों के बहुत से क्रिया कर्मो को जो सूर्य के उत्तरायण से संबंधित मसीहियो के क्रिया कलापों में शामिल हो गए । (१९५३ मे छपी, वॉल्यूम फाईव पेज ६४२ अे और ६४३)

ये मूर्तिपूजक रीति रिवाज बेबीलोन के धर्म से उत्पन्न हुए जिसे निम्रोघ ने शुरू किया था । (उत ८:८१०) जब निम्रोघ मर गया तो उसकी पत्नि सेमी रामिस के पास अवैध संतान थी जिसके लिए उसने यह दावा किया कि निम्रोघ पुन: जीवित हो गया हैं । तब से माँ और पुत्र की पूजा प्रारंभ हुयी । शताब्दियों बाद केथलिक समुदाय ने इसे मरियम और यीशु की पूजा में परिवर्तित कर दिया ।

सेमीरामिस के पुत्र का जन्म दिन पुरातन बेबिलोन वासियो द्वारा दिसम्बर पच्चीस को मनाया जाता था । सेमिरामिस स्वर्ग की रानी थी (यिर्म ४४:१९) । जिसको शताब्दियों बाद इफीसुस में डायना या अर्टिमिस नाम से पूजा जाता था (प्रेरितो १९:२८) ।

सेमिरामिस ने यह दावा किया कि रातभर में एक मृत ठूंठ से एक जवान हराभरा पेड उग गया । इसे माना गया कि निम्रोघ पुन: जीवित हो गया और स्वर्ग से मनुष्यों के लिए कई भेंटें लाया । सब से फर वृक्ष को काट कर उसे भेंटें लटका कर सजाने का रिवाज प्रारंभ हुआ । यही आज के क्रिसमस ट्री का जन्म हैं

प्रभु यह कहता है मूर्तिपूजकों की राह पर चलना मत सीखों लोगों के रीति रिवाज व्यर्थ हैं । एक व्यŠत जंगल मे कुल्हाडी से पेड काटता हैं वे उसे सोने चाँदी से सजाते हैं और गिरे नहीं इसलिए कीलों से जड देते हैं ।(यिर्म १०:२४)

ईस्टर

ईस्टर शब्द एक पदनाम है जो स्वर्ग की रानी एस्तोरोत को दिया गया (१ राजा ११:५) । यह मूर्तियों मे एक है जिसे राजा सुलेमान पूजता था । विभिन्न देशों में इसनाम से थोडा हट कर नाम भी पाए जाते हैं ।

एनसाइŠलोपीडिया ब्रिटेनिका बताता है कि

अंग्रेजी का ईस्टर शब्द और इससे मिलता जर्मन शब्द ओस्टर यह प्रगट करते हैं कि मध्य यूरोप के टयूटॉनिक ट्राईब से मसीहियों ने इसे पाया । मसीहियत जब टयूटॉन्स के बीच फैली तब उन्होंने इस वसंत उत्सव और उससे संबंधित मूर्तिपूजकों के क्रिया कर्म और रीतिरिवाजों को मसीहियों के बडे मोज के दिन मे मिला लिया । यह वसंत उत्सव जो पुर्नजीवन को दर्शाता है, मृत्यु पर जीवन की विजय के रूप मे मनाया जाता था । कलीसियाँ के लिए इसे अपनाना सरल हो गया Šयोंकि टयूटॉन्स इसे शीत की मृत्यु के रूप में आदर देते थे और सूर्यदेवता ऑस्तरा के वापस आने के नये वर्ष के जन्म के रूप में मनाते थे । अन्डे को उर्वरापन का चिन्ह सोचा जाता है और पुरातन मिस्त्री और फारसी वसंत उत्सव में अंडों को रंगते थे और उन्हें खाते थे । अन्डे को, जीवन का चिन्ह होने की यह पुरातन सोच अन्डे के पुनरूत्थान के चिन्ह की सोच में बदल गया । पुराने अंध विश्वास के अनुसार ईस्टर प्रात: काल सूर्य उग कर आकाश में नाचता है यह विश्वास मूर्तिपूजकों के सूर्य को आदर देने के लिए किए गए नाच गाने से मिलाया जा सकता हैं । प्रोटेस्टेन्ट कलीसियाएँ भी सूर्य उगने पर ईस्टर मनाने के रीति रिवाज को मानते है (१९५९ में छपी वॉल्यूम ७ पेज ८५९, और ८६०)

बेबीलोन वासियों का विश्वास था कि स्वर्ग से एक बडा उल्का युफ्रेटिस नदी मे गिरा और उससे अश्तोरेत निकली । यही से वसन्त उत्सव में सूर्य की आराधना के साथ अंडो का आदान प्रदान शुरू हुआ । मसीहियों ने इसे अपना लिया और आज तक ईस्टर अन्डो के साथ मनाया जाता है यह समानता मानते हुए कि जैसे अन्डे से चूजा निकलता हैं कब से यीशु जी उठा ।

यीशु के कई शताब्दि पहले मूर्तिपूजक स्वर्ग की रानी को पवित्र केक अर्थात बन चढाते थे (यिर्म ७:१८) जब मसीहियो ने इस रीति रिवाज को अपनाया तो यह शुभ शुक्रवार का हॉट क्रॉस बन बन गया ।

यीशु की मृत्यु और उसका पुनरूत्थान, सुसमाचारो का केन्द्रिय संदेश हैं । इन्हें मनाने के लिए यीशु ने जो विधि चाही वह रोटी का तोडना रही । जिसे हमे कलीसिया के रूप मे लेना होता हैं । निश्चय ही यह साल के एक दिन शुभ शुक्रवार और ईस्टर केसमय अन्डे और बन के साथ लेना नहीं हैं ।

जब हम रोटी तोडते हैं तो मसीह की मृत्यु कोही नहीं परंतु उसके साथ अपनी मृत्यु को भी याद करते हैं । शुभ शुक्रवार को भावुक हो कर और ईस्टर में उत्तेजना से भर कर हम प्रभु के पीछे चलने की आवश्यकता से विमुख हो जाते है और खोखले रीति रिवाजों का पालन करते हैं ।

परमेश्वर का वचन या मनुष्यों की परम्पराएँ

क्रिसमस और ईस्टर मनाने के पीछे जो खतरनाक सिध्दांत कार्य करता हैं वय यह है कि मनुष्यों की परम्परा पर चलना हैं जिसका परमेश्वर के वचन से कोई आधार प्राप्त नहीं हैं । इन परम्पराआें का जोर इतना अधिक है कि बहुत से विश्वासी जो अन्य क्षेत्रों में शास्त्र का अनुगमन करते है उनके लिए भी यह कठिन होता है कि क्रिसमस और ईस्टर को मनाना छोडे ।

यह आश्चर्य की बात है कि बहुत से विश्वासी उन तटस्थ लेखकों की बातों को भी स्वीकार नहीं करते जो क्रिसमस और ईस्टर को मुख्यत: मूर्तिपूजक उत्सव मानते हैं । तुम गधे को सिंह कह सकते है पर आखिर रहेगा वह गधा ही । इनका नाम बदल देने से वे मसीही उत्सव नहीं हो जाते । क्रिसमस और ईस्टर का गणेश पूजा और दशहरा से कोई अंतर नहीं रह पाता ।

अत: स्पष्ट हो जाता है कि क्रिसमस में मसीही जो उत्सव मनाते हैं वह अन्य यीशु अर्थात बेबिलोन के निम्रोघ का जन्म दिन हैं और ईस्टर के समय भी वे अन्य यीशु का पुनरूत्थान दिवस मनाते हैं अर्थात सूर्य देवता का उत्तरी गोलार्ध में आना । निम्रोध और सूर्यदेवता के पीछे शैतान है जो अराधना स्वीकार करता हैं । इस्त्राएलियों ने सोने के बछडे को यहोवा कहा परंतु वह शैतान था जिसकी पूजा हुयी (निर्ग ३२:४५) । अत: वे सब जो क्रिसमस और ईस्टर मनाते हैं इन बातों को याद कर सतर्क रहें ।

जैसा हमने शुरू में कहा यीशु लगातार फरीसियों से इसी बात पर लडता रहाकि परमेश्वर का वचन और मनुष्य की परम्पराएँ विरोधी हैं । उसने पाप के विरूध्द उपदेश देने की अपेक्षा पितरों की खोखली परम्पराआें का विरोध करने पर ज्यादा मुसीबत सही । यही अनुभव हम भी पाएँगे यदि हम वैसे ही ईमानदार हो जैसे वह था ।

आज चर्च के लिए जरूरी हैं कि इन बेबिलोन के खोखली उत्सव को जो कि मसीही जगत में शैतान ने लाया है और जो परमेश्वर के वचन से मेल नहीं खाते, को उजागर करना चाहिए ।

रोमियों १४:५६ का उदाहरण दे सकता है कि कोई भी दिन परमेश्वर की अराधना के लिए रखा जा सकता है यह सब्त के दिन की बात थी, जिसे विश्वास में आए यहूदी छोडना नहीं चाहते । पौलूस ने उन लोगों को जो नयी वाचा के प्रकाश मे थे को उत्साहित किया कि ऐेसे कमजारे यहुदियों की सहें । परंतु यह बात आज के मसीहियों पर लागु नहीं होती कि वे गणेश पूजा या क्रिसमस या दिवाली के विषय ऐसा कहें ।

परमेशव्र का वचन ही हमारा मार्गदर्शक होना चाहिए न कि किसी भŠत पुरूष की बातें जो कि परमेश्वर के वचन के अनुरूप नहीं हैं रोमियो ३:४ 'चाहे प्रत्येक मनुष्य झूठा निकले किन्तु परमेश्वर सच्चा प्रमाणित होगा । बेरिया वासी पौलूस की शिक्षाआें को भी शास्त्र मे खोज कर परखते थे और पवित्रात्मा ने उनकी सराहना की (प्रेरितो के काम १७:११)। हमारे लिए एकअच्छा उदाहरण हैं ।

दाउद भी परमेश्वर के ह्दय के बहुत निकट था परंतु उसने भी इस्त्राएलियों को मूसा के पीतल के साँप की चालिस वषा] तक पूजा करने दी । बिना यह सोचे कि यह परमेश्वर के लिए घृणित हैं । उसने भी इसे मूर्ति पूजा नहीं समझा । यह तो अदना राजा हिजिकिय्याह था जिसको यह प्रकाश मिला कि इस मूर्ति पूजा को उजागर कर इसे खतम करें । (२ राजा १८:१४) । हम परमेश्वर के भŠतों का उनके पवित्र जीवन के कारण अनुसरण कर सकते हैं । परंतु उनमे भी मनुष्य की परम्पराआें को समझने की कमी हो सकती हैं । सुरक्षित यह है कि हम परमेश्वर के वचन के अनुसार चले और उसमें कुछ न जोडे न घटाएँ ।

सच्ची आत्मिकता जीवन के सब पहलू में यीशु का अनुसरण करना हैं । इसके लिए प्राथमिकता यह है कि क्रूस उठाएँ और परमेश्वर के वचन को प्रतिदिन के जीवन मे लागु करें । और वे सब मानव परम्पराएँ जो नए नियम मे नहीं पायी जाती उनका त्याग करें । परमेश्वर हर स्थान पर सच्ची गवाही चाहता हैं अत: कलीसिया को सब पापों से मुŠत होना और बेबिलोन की परंपराआें से स्वतंत्र होना।

अध्याय 25
जो असफल हुए उनके लिए परमेश्वर की सिध्द योजना

कई ऐसे भाई और बहन है जो यह सोचते है कि चूंकि हमने बीते जीवन में पाप कर ईश्वर की इच्छा को पूरी नहीं किया इस लिए ईश्वर ने जो सिध्द योजना उनके जीवन के लिए बनाई थी वह पूरी नहीं होगी ।

आईए देखे इस विषय मे शास्त्र Šया कहता है और अपनी समझ और तर्क का सहारा न लें ।

ध्यान दे बाईबिल किस प्रकार शुरू होती हैं ।

आदि मे परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की (उत्त : १:१) । और अवश्य है कि चूंकि परमेश्वरने बनाया आकाश और पृथ्वी पूर्णत: सिध्द स्थिति में थी ।

परन्तु कुछ स्वर्गदूत जिन्हें परमेश्वर ने सृजा गिर गए और यह बात यशा १४:१११५ और येहेजकेल २८ का १३ से १८ मे बताई गई हैं । और तब से पृथ्वी उत्पत्ति १:२ मे बताई गई स्थिति मे आ गई 'बेडौल, सूनसा और अंधियारी' ।

बाकि के उत्पत्ति १ अध्याय मे वर्णन है कि किस प्रकार परमेश्वर ने इस बेडौल सूनसान और अंधियारे पिंड को इतनी सुन्दरता दे दी कि खुद उसने कहा बहुत अच्छा । (उत १:३१) । उत १:२,३ मे हम पढते है कि परमेश्वर का आत्मा पृथ्वी के उपर मंडराता था और परमेश्वर ने वचन कहे और उन वचनों से परिवर्तन आया ।

आज के लिए इसमें Šया संदेश हैं ?

यही कि हम कितना भी असफल हो जाएँ और कितना भी बातों को बिगाड दे परमेश्वर फिर भी हमारे जीवन को महिमायुŠत बना सकता हैं ।

अब ध्यान दें आगे Šया हुआ ।

परमेश्वर ने आदम और हवा को बनाया और फिर से शुरूआत की । परमेश्वर के पास इनके लिए भी सिध्द योजना थी जिसमें यह शामिल नहीं था कि वे अच्छे और बुरे ज्ञान के पेड के फल की खाएँगे । परन्तु उन्होंने मना किए गए पेड से फल खाया और परमेश्वर की प्रारंभिक योजना में रूकावट पैदा की जो भी वह योजना रही होगी ।

तर्क हम से कहता है कि उन्होंने आगे को परमेश्वर की सिध्द योजना पूरी नही होने दी । तो भी हम देखते है कि जब परमेश्वर उनसे मिलने बाग मे आया, तो उसने उनसे यह नही कहा कि अब उन्हें उसकी दूसरी योजना के अनुसार आगे को जीवन बिताना होगा । उत ३:१५ मे परमेश्वर उन से प्रतिज्ञा करता है कि स्त्री की संतान साँप के सिर को कुचलेगा, यह प्रतिज्ञा मसीह का संसार के पापों के लिए मरने का और कलवरी पर शैतान को हराने के लिए थी ।

इस तथ्य पर विचार करते हुए देखो तुम कोई निष्कर्ष निकाल सकते हो ?

हम जानते है कि आदि काल से परमेश्वर की सिध्द योजना का एक भाग मसीह की मृत्यु भी थी । जगत को उत्पत्ति से मेम्ना वध किया गया प्रका वा १३:८। हम यह भी जानते है कि मसीह केवल इसलिए मरा Šयों कि आदम और हवा ने पाप किया और परमेश्वर की इच्छा के विरूध्द गए । अत: तार्किक रूप से हम कह सकते है कि परमेश्वर की योजना जो मसीह को जगत के पाप के लिए बलिदान करने की थी वह पूर्ण हुयी और यह आदम के असफल होने के कारण हुआ । हम कलवरी के क्रूस पर दिखलाए गए परमेश्वर के प्रेम को नहीं देख पाते यदि आदम पाप में न पडता ।

यह बात तर्क के लिए विस्मयकारी है और इसीलिए शास्त्र मे कहा गया है अपनी समझ का सहारा न लेना (नीति ३:५) ।

यदि परमेश्वर गणितीय तर्क के अनुसार कार्य करता तब हमे यह कहना पडता कि मसीह का पृथ्वी पर आगमन परमेश्वर के द्वितीय सर्वोच्च योजना थी । परंतु ऐसा कहना ईश्वर के विरूध्द अपशब्द कहना होता । यह मानव के लिए परमेश्वर की सिध्द योजना का एक भाग था । परमेश्वर गलती नहीं करता । परंतु चूकि परमेश्वर सर्वशŠतमान और साथ ही संप्रभू और जो आरंभ से अन्त तक की बातों को जाननेवाला तथा जो शान्तिपूर्वक हमारे प्रति प्रेम रखने के खातिर हमेशा योजनाएँ बनाता रहता है तो उसके इस क्रियाकलाप को समझने में मानव तर्क विफल हो जाता हैं ।

परमेश्वर का तरीका हमारे तरीके के समान नहीं और नही उसकी सोच हमारी सोच की तरह है इनका अंतर उतना ही अधिक अलग है जितना स्वर्ग और पृथ्वी । (यशा ५५:८९) इसलिए अच्छा होगा कि हम अपनी चतुराई और तर्क को अलग रखें, जब हम परमेश्वर के तरीकों को समझने का प्रयास करते हैं ।

अत: वह कौन सा संदेश है जो बाईबिल के प्रथम पन्ने से शुरू कर परमेश्वर हमे बताना चाहता हैं ? वह यही है कि वह असफल व्यŠत को भी ले कर उसे महिमायुŠत प्राणी बना सकता है और उसके जीवन के लिए परमेश्वर की सिध्द योजना के लिए तैय्यार कर सकता हैं ।

यह परमेश्वर का संदेश मानव को है जो बाईबिल में है और इसे हमे कभी भूलना नहीं चाहिए ।

परमेश्वर उस व्यŠत को जो बार बार असफल होते है लेकर अपनी सर्वोच्च योजना को पूरा करवाता हैं न की अपने किसी द्वितीय अच्छी योजना को ।

परमेश्वर की सिध्द योजना में व्यŠत का असफल होना भी एक हिस्सा है ताकि व्यŠत कुछ अविस्मरणीय पाठों को सीख सकें । चूंकि हम परमेश्वर को बहुत कम जानते है इसलिए मानव तर्क को इन बातों को समझना मुश्किल हैं ।

परमेश्वर केवक टूटेमन वाले पुरूष और स्त्री का उपयोग करता है और वे उनकी बार बार की असफलता से दीन बनते हैं ।

पतरस को अगुवाइई का प्रशिक्षण देने का एक भाग उसके असफल होने में था । प्रभु ने पतरस की असफलता उसे तोडा ।

परमेश्वर के सामने एक बडी समस्या यह रहती है कि जब वह हमे वह आशीष दे तो उस आशीष से हम घमंड मे फूल न जाएँ । अपने क्रोध पर विजय पाने पर यदि हम घमंड करें, तो हम जिस गढ्‌ढे मे थे उससे भी गहरे गढ्ढे मे गिर जाते । हमारे विजयी होने पर भी परमेश्वर हमे दीन रखना चाहता हैं ।

पाप पर सच्ची विजय पाने के बाद हमेशा गहरी दीनता मिलती हैं । इसीलिए बार बार की विफलता हमारे स्वयं पर भरोसा करने के गुण को तोडती हैं ताकि हम जान सकें कि बिना परमेश्वर के अनुग्रह के हमारा पाप पर विजयी होना संभव नही हैं । तब जब हम विजयी होते हैं तो इस पर घमंड नहीं कर सकतें ।

यह भी कि जब हम बार बार विफल होते है तो हम उनको भी तुच्छ नही समझते जो हमारे समान विफल होते हैं Šयोंं कि अपनी विफलता से हम अपने देह की कमजोरी को समझ लेते हें । हम उन अज्ञानी और म्रमित लोगों से भी कोमलता का व्यवहार करते हैं Šयों कि हम स्वयं को कमजोरी से ग्रसित पाते हैं (इब्रा ५:३) ।

एक तार्किक मनुष्य इस संदेश को सून कर यह कह सकता हैं चलो हम पाप करें कि हमारा भला हो

रोमि ३:७८ ऐसे मनुष्य को इन शब्दों मे उत्तर देता है यदि मेरे झूठ के कारण परमेश्वर की सच्चाई उसकी महिमा के लिए, अधिक करके प्रगट हुई तो फिर Šयों पापी के समान मैं दण्ड के योग्य ठहराया जाता हँू ? हम Šयों बुराई न करें कि भलाई निकले ? जैसा हम पर भी यहीं दोष लगाया जाता है, और कुछ कहते हैं कि इनका यही कहना हैं । परंतु ऐसों का दोषी ठहराना ठीक हैं ।

नहीं हम ऐसा प्रचार नहीं करते कि हम पाप करें तो हमारा भला होगा और ना ही हम यह कहते है कि परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी बन कर जो हमने बोया है वैसी फसल काटने से बच जाएँगे । कभी नहीं ।

परंतु हम यह कहते है कि मानव तर्क पापी मनुष्य के प्रति परमेश्वर के अनुग्रह को नहीं समझ सकता । परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं हमारे बुरी तरह असफल हो जाने पर भी अपनी इच्छा हमारे द्वारा पूरी करवाना भी । केवल हमारा अविश्वास ही परमेश्वर को रोक सकता हैं ।

यदि तुम यह कहते हो मै ने तो बहुत बार बहुत गलतियाँ की हैं अब परमेश्वर के लिए असंभव है कि वह अब मुझे अपनी सिध्द योजना में सफल करेंं तब यह जरूर परमेश्वर के लिए असंभव होगा Šयों कि तुमने विश्वास नहीं किया कि वह तुम्हारे लिए Šया कर सकता हैं ? यीशु ने कहा यदि हम विश्वास करें तो हमारी भलाई करने के लिए परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं ।

तेरे विश्वास के अनुसार तेरे लिए हो जाये ही सब बातों मे परमेश्वर का नियम हैं (मत्ती ९:२९) । जो हम विश्वास करते हैं वह हम पायेंगे । यदि हम विश्वास करते हैं कि कोई बात हमारे लिये पूरी करना परमेश्वर के लिए असंभव है तो वह बात हमारे जीवन में कभी पूरी न होगी ।

मसीह के न्याय सिंहासन के पास जा कर तुम यह पाओगे कि वह विश्वासी जिसने अपनी जिंदगी से तुम्हारी अपेक्षा ज्यादा खिलवाड किया उसने अपने जीवन में परमेश्वर की सिध्द योजना को पूरा किया । केवल इस लिए उसने परमेश्वर पर विश्वास किया, कि वह उसकी जिंदगी के टूटे टुकडों को जोडकर कोई अच्छी बात पैदा कर देगा ।

उस दिन तुम्हारे लिए कितने अफसोस की बात होगी जब तुम यह पाओगे कि तुम्हारी असफलता ने नहीं परंतु तुम्हारे अविश्वास ने परमेश्वर को भला करने से रोक दिया ।

उडाऊ पुत्र का दृष्टांत यह दिखाता हैं कि परमेश्वर विफल को भी सबसे अच्छी चीज देता है । उडाऊ पुत्र के पिता ने कहा, अच्छे से अच्छा पहिरावा जल्दी लाओ उसके लिए जिसने बुरी तरह पिता को शर्मिंन्दा किया, यही सुसमाचार के उध्दार और नयी शुरूआत का संदेश हैं, केवल एक बार नहीं परन्तु बार बार Šयों कि परमेश्वर कभी भी किसी को छोडना नहीं चाहता ।

सम्पत्ति के मालिक का दृष्टांत जो मजदूरों को नौकरी देने के लिए निकलता हैं यही बात सिखलाता हैं । जिन मजदूरों को अंतिम पहर में काम पर लिया गया, वे ही थे जिन्हे पहले मजदूरी दी गयी, अर्थात वे जिन्होंने ९०% जीवन को बर्बाद कर दिया वे बचे हुए १०% प्रतिशत जीवन में भी परमेश्वर के लिए कुछ महिमा का काम कर सकते हैं यह उनके लिए बडे उत्साहवर्धन की बात हैं जो विफल हो गए ।

परमेश्वर के पुत्र के आने का कारण यह था कि वह शैतान के द्वारा बिगाडे गए कार्यों को दुरूस्त करें ।(१ यो ३:८)

इसका अर्थ यह हुआ कि मसीह आया कि हमारी जीवन की बंधी हुयी गाँठों को खोले इस ऐसा समझें हम सब ने बचपन मे एक धागे से बंधी हुयी गेंद से खेला परंतु अब उस धागे मे दस हजार से अधिक गाँठे पड गयीं कि अब हमे आशा नहीं कि उन गाँठो को खोल सकें, अपनी जिन्दगी को देख कर हम हतोत्साहित और निराश होते गॉस्पल का यह सुसन्देश है कि यीशु आया कि वह इन हर एक गाँठो को खोल दें ।

तुम कहते हो यह असंभव हैं ठीक है तुम्हारे विश्वास के अनुसार यही होगा, तुम्हारे मामले में यह असंभव होगा ।

परन्तु मुझे सुनाई देता है कि कोई जिसकी जिन्दगी तुमसे अधिक खराब हैं, कह रहा हैं हाँ मैं विश्वास करता हूँ कि ईश्वर मेरे लिए यह कर देगा । उसके लिए उसके विश्वास के अनुसार हो जाएगा । परमेशव्र की सिध्द योजना पूरी हो जायेगी।

यिर्म १८:१६ मे परमेश्वर ने यिर्मयाह से एक उदाहरण देकर अपने शब्द कहे यिर्मयाह से कहा गया कि वह कुम्हार के घर जाए और वहाँ यिर्मयाह ने कुम्हार को एक पात्र बनाते हुए देखा, परन्तु पात्र कुम्हार के हाँथ से बिगड गया तो उसने Šया किया ? उसने जैसा उसे पसंद आया एक दूसरा पात्र उस मिट्‌टी से बना लिया ।

और तब इस उदा के उपयोग की बात आई । Šया मैं भी तुम्हारे साथ ऐसा ही नहीं कर सकता ? जैसा उस कुम्हार ने किया? यह प्रभु का प्रश्न था ।

यदि तुम्हारी असफलता के लिए या तुम्हारी सब असफलता के लिए तुम्हारे जीवन में सच्चा दु:ख है तो यदि तुम्हारे पाप लाही रंग के भी Šयों न हो वे हिम के समान श्वेत किए जाएँगे यह पुरानी वाचा में परमेश्वर की प्रतिज्ञा हैं (यशा १:१८) । परंतु नयी वाचा मे परमेश्वर की प्रतिज्ञा है तुम अपने पापों को अब याद न करों (इब्रा ८:१२) ।

तुम्हारी कितनी भी गलतियाँ हो या विफलताएँ हो तुम परमेश्वर के कारण नयी शुरूआत कर सकते हो और तुमने चाहे बीते समयों मे हजारो नयी शुरूआत कर विफलता प्राप्त की हो तो भी तुम आज १००१ वी नयी शुरूआत कर सकते हो परमेश्वर अभी भी तुम्हारे जवीन से कोई महिमा युŠत बात पूरी कर सकता हैं ।

जब तक जीवन हैं तब तक आशा हैं ।

अतएव परमेश्वर पर भरोसा करना न छोडो । बहुत से परमेश्वर की संतानों के लिए बडे काम नहीं कर पाता इसलिए नहीं कि वे भूतकाल में विफल हूए थे परंतु इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर पर अब तक भरोस न किया ।

सब लोग चाहे जवान हो या बुढे भूतकाल मे असफल होने के बाद भी आशा रख सकते हैं यदि वे केवल अपनी विफलता को माने, दीन हो और परमेश्वर पर भरोसा करें ।

अत: हम अपनी असफलताआें से सबक ले सकते हैं और अपने जीवन के लिए परमेश्वर की सिध्द इच्छा को पूरी कर सकते हैं ।

और आनेवाले दिनों मे वह दूसरों के लिए हमारा उदाहरण पेश कर सकता हैं कि जो लोग पूरी तरह विफल हुए उन्हें किस तरह उसने सँवारा ।

उस दिन वह हमे दिखाएगा कि वह हमारे जीवन में Šया कर सकता है Šयों कि लिखा है कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु मे हम पर है आनेवाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए (इफी २:७) ।

इस पुस्तक के संदेश को सुनने के जिसके कान हों वह सुन लें । आमीन ।